भले ही आज के दौर में किस्से-कहानियां सुनने-सुनाने की परंपरा जीवित नहीं बची हो, लेकिन भेडिय़ा वाली कहानी ज्यादातर लोगों की स्मृति में है। इसमें एक भेड़पालक भेडिय़ा आया...भेडिय़ा आया... कहकर गांव वालों के साथ मसखरी करता, लेकिन एक दिन सचमुच भेडिय़ा आ जाता है और वह मुश्किल में पड़ जाता है। पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार के साथ भी कुछ ऐसा ही है। राजनीतिक विश्लेषक प्रत्येक विधानसभा चुनाव से पहले यह कयास लगाते कि इस बार उनका गढ़ ढहने वाला है, लेकिन परिणाम आते और वाम मोर्चा फिर सत्ता में आ जाता। बाकी राजनीतिक दलों के लिए पहेली बन चुकी इस उपलब्धि पर वाम नेता इतराये भी खूब, किंतु आजकल उनकी बोलती बंद है और वजह है ममता बनर्जी। ममता बनर्जी ने पहले पंचायत चुनाव, फिर लोकसभा चुनाव और अब स्थानीय निकाय चुनाव में उन्हें जिस तरह से शिकस्त दी है, उसके बाद यह कहा जाने लगा है कि इस बार सचमुच हार का भेडिय़ा आने वाला है। स्थानीय निकायों के चुनाव नतीजों से जाहिर है कि राज्य की जनता बदलाव के लिए बेचैन है। जब पंचायत चुनावों में वाम मोर्चा की हार हुई थी, तब इसके कुछ नेताओं ने कहा था कि जनता ने गलती की है, लेकिन यह क्षणिक है। अब उन्हें इस बात का अहसास होना चाहिए कि जनता बार-बार गलती नहीं कर रही है, बल्कि वह यह संकेत दे रही है कि वह वाम शासन से उकता चुकी है। तृणमूल कांग्रेस का शानदार प्रदर्शन यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि ममता बनर्जी का आत्मविश्वास हवाई नहीं है। अब वे केवल शहरी मध्यवर्ग की लीडर नहीं रह गई हैं, बल्कि किसानों-मजदूरों और राज्य के बुद्धिजीवियों का समर्थन भी उन्हें मिल रहा है। सिंगूर और नंदीग्राम के बाद गांव का वंचित तबका भी उनके साथ खड़ा हो गया है। वाम दलों को पश्चिम बंगाल में स्थापित करने का श्रेय ज्योति बसु को है। उन्होंने अपने कार्यकाल की शुरुआत में भूमि सुधारों के एजेंडे को लागू कर पश्चिम बंगाल में क्रांतिकारी परिवर्तन की नींव रखी। भूमिहीन मजदूरों को जमीन का मालिक बनाया। एक फसली जमीन को बहुफसली बनाया। नतीजतन, एक ऐसा राज्य जो अकाल की मार झेलने के लिए अभिशप्त था, अपने पैरों पर उठ खड़ा हुआ। 1980 के दशक में खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के साथ ही यह दूसरे राज्यों को निर्यात करने लगा, लेकिन यहीं आकर विकास की कहानी ठहर गई। कृषि पैदावार में कुलांचे भर रहा राज्य औद्योगिक विकास में पिछडऩे लगा। इसके लिए भी वामपंथी राजनीति जिम्मेदार थी। आंदोलन की आग से तपकर निकली राजनीति बदली हुई परिस्थितियों को समझ नहीं पाई और एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गई जहां आगे कोई रास्ता ही नहीं है। फिर भी ज्योति बसु ने यह भ्रम बरकरार रखा कि बंगाल तरक्की कर रहा है, लेकिन राजनीति के रंगमंच से उनके हटते ही पर्दे के पीछे की असलियत सामने आने लगी। सर्वहारा की राजनीति करने वाले वामपंथी नेता जब जमीनी हकीकत से कटने लगे, तो इससे पैदा होने वाले शून्य को भरने के लिए किसी राजनीतिक ताकत की जरूरत बढ़ती ही जा रही थी। लंबे समय से वामपंथियों के खिलाफ मोर्चा खोले बैठी बंगाल की अग्निकन्या ममता बनर्जी उन ताकतों में शीर्ष बनकर उभरीं। उनका साथ दिया माओवादियों और दूसरे गैर-राजनीतिक दलों और संगठनों ने। इन नई ताकतों को वामपंथ से निराश पूर्व वामपंथी लेखकों, कलाकारों और विचारकों का भी खुला समर्थन मिला। मजबूत विकल्प की संभावना देखकर राज्य की जनता ने भी उन पर पूरा भरोसा जताया। ऐसे में राज्य में अगले विधानसभा चुनाव में वामपंथियों की सत्ता छिन जाए, तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। वाम मोर्चे की पतली हालत का ठीकरा पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टïाचार्य के सिर फोड़ा जा रहा है। हो सकता है कि राज्य के औद्योगिक विकास और निवेश के लिए उनकी पहल में कोई खोट न हो, लेकिन उन्होंने नंदीग्राम और सिंगूर के जनाक्रोश का ठोस समाधान खोजने की बजाय विवाद का कुप्रबंधन किया। इससे पार्टी न केवल किसानों में अलोकप्रिय हुई, अपितु शहरी मध्यवर्ग में भी उसकी तीखी आलोचना हुई। वैसे वाम राजनीति आज दोराहे पर खड़ी है, तो उसके लिए ज्योति बसु की राजनीति भी कम कसूरवार नहीं है। साठ के दशक में राज्य में कांग्रेस सरकार के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंकने वाले बसु ने रास्ता तो लोकतंत्र का चुना, लेकिन उनके तरीके नक्सलवादियों के थे। उस खूनी दौर के गवाह रहे लोग जानते हैं कि कैसे वामपंथ और नक्सलवाद की जुगलबंदी ने राज्य में कहर बरपाया था। उस उद्वेलनकारी समय के गर्भ से भले ही वामपंथी सत्ता के शिशु ने जन्म लिया, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि उसने बड़े होकर अर्थ से ज्यादा अनर्थ किए। उन्हीं अनर्र्थों का नतीजा हुआ कि बसु के रिटायर होते ही वामपंथी किले की दीवारें ढहने लगीं। इसकी वजह यह थी कि आंदोलन की कोख से निकले वामपंथी आरामतलब हो गए। आम जनता से कटने लगे। जिन दीन-हीन लोगों की आवाज बनकर वे सत्ता के सिंहासन पर पहुंचे थे, उनकी चीख-पुकार को भी अनसुना करने लगे। नतीजतन, जनता से कटा हुआ नेतृत्व अपने पार्टीजनों के बीच भी विवाद का विषय बनने लगा। चूंकि ज्योति बसु राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी थे, इसलिए इस लड़ाई को उन्होंने सार्वजनिक नहीं होने दिया, लेकिन बुद्धदेव भट्टïाचार्य ऐसा नहीं कर पाए। वे हाथ-पांव तो खूब मार रहे हैं, लेकिन पार्टी की अंदरूनी खींचतान ने उन्हें निढाल कर रखा है।इसे वाम मोर्चे की भयंकर राजनीतिक भूल ही माना जाएगा कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का डटकर मुकाबला करने की बजाय उसके नेता केंद्र में यूपीए सरकार को मुसीबत में डालने में मशगूल रहे। भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील के सवाल पर यूपीए सरकार से समर्थन वापसी और कांग्रेस को सबक सिखाने के इरादे के साथ की गई तीसरे मोर्चे की स्थापना की भूमिका सबसे अहम रही। सबसे बुरी बात यह हुई कि आम लोगों ने सीपीएम के नेतृत्व में रची गई इस रणनीति को जनपक्षी मूल्यों में दृढ़ निष्ठा की मिसाल की तरह लेने के बजाय अवसरवाद और सिद्धांतप्रियता के अजब घालमेल की तरह लिया। 2004 के आम चुनाव में सीपीएम ने इराक पर अमेरिकी हमले को केरल और बंगाल में बाकायदा चुनावी मुद्दा बनाया था और इसके आधार पर भारत के साम्राज्यवाद विरोधी जनमत के अलावा मुस्लिम वोटों की भी भरपूर फसल काटी थी। अपनी इस मुहिम को खींचकर उसके नेता 2005 में न्यूक्लियर डील के लिए की गई जॉर्ज डब्ल्यु. बुश की भारत यात्रा तक ले गए और समर्थन वापसी के बाद इसका विस्तार पिछले साल हुए आम चुनाव तक करने की उन्हें पूरी उम्मीद थी, लेकिन चुनाव नतीजे बताते हैं कि इस चुनाव में एक वोट बैंक के रूप में वाम मोर्चे को सबसे बड़ा झटका मुसलमानों की तरफ से ही लगा है। इस उलटबांसी को समझना वाम नेताओं के लिए बहुत आसान नहीं है, लेकिन इसे समझे बगैर उनका गुजारा भी नहीं हो सकता। यूपीए सरकार में रहते हुए वाम दलों ने गरीब, मजदूर, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक तबकों की पैरवी करने का खूब दिखावा किया, लेकिन चुनाव में इसका रत्ती भर भी लाभ उन्हें नहीं मिला, तो इसके लिए वे खुद ही जिम्मेदार हैं। वे जिन मुद्दों पर केंद्र की यूपीए सरकार का विरोध कर रहे थे बुद्धदेव उन्हीं नीतियों का अनुसरण कर रहे थे।वाम मोर्चा यह भी उम्मीद नहीं कर सकता कि भविष्य में सब कुछ ठीक हो जाएगा। उनके पास अब न तो मुद्दे बचे हैं और न ही ममता बनर्जी के मुकाबले का कोई जनप्रिय नेता। ममता बनर्जी आज उन्हीं मुद्दों को लेकर राजनीति कर रही हैं, जिन पर किसी जमाने में वामपंथियों का एकाधिकार हुआ करता था। उन्होंने बड़ी चतुराई से बुद्धदेव भट्टïाचार्य के औद्योगिक विकास के एजेंडे को किसान और मजदूर विरोधी करार दे दिया। भट्टïाचार्य ने किसानों को समझाने की बजाय उद्योगों के लिए उनकी जमीन अधिग्रहण के धड़ाधड़ फरमान जारी कर दिए। विरोध में सिंगूर और नंदीग्राम उबल पड़े और जमकर खून-खराबा हुआ। इस दौरान ममता बनर्जी ने यह सफलतापूर्वक प्रचारित किया कि इस अत्याचार से उन्हें वे ही बचा सकती हैं। लिहाजा जनता के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई। इससे हुआ यह कि बरसों से वाम दलों को वोट देते आए लोग उनके नेतृत्व पर भरोसा जाहिर करने लगे। इसी वोट बैंक के दम पर ही तो वाम दल बरसों से सत्ता में बने हुए थे। पंचायत, लोकसभा और स्थानीय निकाय चुनाव के परिणाम यह साबित करते हैं कि वाम दलों के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लग चुकी है। वाम नेताओं को परेशानी यह है कि उन्हें इस वोट बैंक को फिर से समेटने का कोई रास्ता भी नहीं सूझ रहा है। ज्योति बसु के देहावसान के बाद ऐसा कोई नेता भी नजर आता, जो अपने दम पर जनाधार बढ़ा सके। वाम नेताओं की जिस पीढ़ी ने गरीबों की झोपडिय़ों में रह कर राजनीति का ककहरा सीखा था, वह अब या तो विदा हो चुकी है या नेपथ्य में है। शायद इसी का दुष्परिणाम है कि जिस अनुशासन के लिए वाम दलों को जाना जाता था, अब वह तार-तार होने लगा है। कुल मिलाकर देश की वाम राजनीति जाने-अनजाने कई व्याधियों से घिर चुकी है और फिलहाल यह संभावना भी कम ही है कि वह इनसे जल्द उबर पाएगी।
शनिवार, 12 जून 2010
रविवार, 30 अगस्त 2009
मेजर साहब के बहाने
जिन्ना का जिन्न फिर बोतल से बाहर निकला। इस बार हसरतें पूरी हुईं आडवाणी और राजनाथ की। और शिकार बने जसवंत सिंह। एक तयशुदा रणनीति के तहत उनकी पार्टी से विदाई की इबारत लिख दी गई। न कोई नोटिस, न सफाई का कोई मौका। चिंतन बैठक से ठीक एक दिन पहले फोन पर फरमान सुना दिया गया, बैठक में आने की जरूरत नहीं। आपको पार्टी से निकाल दिया गया है। ऊपरी तौर पर इस फैसले के पीछे पार्टी का अनुशासन तोडना और संगठन की विचारधारा से परे विचार रखना उनका दोष बताया गया है। लेकिन, सूत्र बताते हैं कि इस फैसले के पीछे कुछ लोगों की अपनी नाक बचाने की कवायद खास वजह है। इसके पीछे राजनाथ सिंह और लाल कृष्ण आडवाणी का नाम लिया जा रहा है।
बताया जाता है कि संघ के नेता चिंतन बैठक में पार्टी की हार पर हर हाल में समीक्षा पर आमादा थे। लेकिन, भाजपा के कुछ नेताओं को इसमें अपने लिए मुश्किलें नजर आ रही थीं। कारण, हार के लिए कहीं न कहीं उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना था। लिहाजा, शुरू से ही वे इससे बचने की कोशिशों में लगे थे। आडवाणी ने खुद भी बैठक से पहले कहा था कि इसमें हार की समीक्षा के बजाए आगे की रणनीति पर चर्चा करना बेहतर होगा। उनकी लॉबी के नेता तो इस बैठक को ही रद्द करवाने में लगे थे। लेकिन, संघ ने इस पर कडा रवैया अपनाते हुए अपना रुख स्पष्ट कर दिया था कि बैठक भी होगी और हार पर समीक्षा भी। यह उन नेताओं के लिए झटके की तरह था, जो अब तक हार की जिम्मेवारियों से बचने की कोशिश कर रहे थे।
गौरतलब है कि लोकसभा चुनावों में पार्टी की हार के लिए मुख्य रूप से आडवाणी और उनके रणनीतिकारों को ही कठघरे में खडा किया जा रहा था। इसके बहाने उनके विरोधी पार्टी में आडवाणी लॉबी को कमजोर करने की बाकायदा चालें भी चल रहे थे। वहीं राजनाथ सिंह द्वारा इस मुद्दे पर हीला-हवाली ने उन्हें भी आडवाणी विरोधी नेताओं के निशाने पर ला खडा किया था। पार्टी का अध्यक्ष होने के नाते उन पर भी इसकी जिम्मेवारी कबूल करने का दबाव बनाया जा रहा था। यानी राजनाथ और आडवाणी दोनों के लिए हार पर समीक्षा का मतलब था, संकट को बुलावा। लिहाजा, दोनों ही इससे बचने की कोशिश कर रहे थे। उन्हें लगा कि चिंतन बैठक में अगर हार पर चर्चा हुई, तो विरोधी खुल कर उन पर निशाना साधेंगे। यही वजह है कि बैठक में हार की समीक्षा के बजाए आगे की रणनीति पर चर्चा की जरूरत जताई जाने लगी थी। लेकिन, संघ के इस एलान से कि भाजपा चिंतन बैठक में हार की समीक्षा से नहीं बच सकती, इसे ठंडे बस्ते में डालने की इन नेताओं की कोशिश नाकाम होती दिखने लगीी थी। तभी जसवंत सिंह के मुद्दे के रूप में उन्हें वह हथियार मिल गया, जिसने उन्हें हलाल होने से बचा लिया। वैसे भी पत्र के माध्यम से हार के लिए राजनाथ को जिम्मेदार बताने से जसवंत पार्टी अध्यक्ष की नजरों में चढे हुए थे।
जिन्ना के गुणगाण के कारण संघ तो मेजर साहब से नाखुश था ही, लेकिन उनके खिलाफ किसी कार्रवाई की पहल भाजपा द्वारा ही होनी थी। लिहाजा, भाजपा आलाकमान ने एक तीर से दो निशाने साधने की योजना बना ली। जसवंत को चिंतन बैठक से महज एक दिन पहले पार्टी से निकाल कर एक तरफ संघ को भी खुश कर दिया और दूसरी तरफ चिंतन बैठक में अनुशासन जैसे मुद्दे की हवा बनाकर हार की समीक्षा के मुद्दे को भी नेपथ्य में पटकने में कामयाबी पा ली। अपने मतलब साधने के लिए जसवंत को बलि का बकरा बनाने से किसी तरह की परेशानियों से भी सामना नहीं करना पडा और चिंतन बैठक के मंच को आडवाणी-राजनाथ के खिलाफ इस्तेमाल करने की योजना बना रहे असंतुष्ट नेता भी शांत पड गए। तभी बैठक में हार को लेकर बाल आप्टे की रिपोर्ट रखे जाने के बावजूद उसपर कोई खास चर्चा नहीं हो पाई। सारा फोकस पार्टी में अनुशासन और संघ की विचारधारा के प्रति भाजपा नेताओं की आस्था को मजबूत बनाने पर ही रहा। यही वजह है कि फजीहत से बच जाने की खुशी में राजनाथ ने पहली बार अपने मुंह से यह घोषणा की कि आडवाणी पांच वर्षों तक प्रतिपक्ष के नेता के अपने पद पर बने रहेंगे। जबकि इससे पहले राजनाथ खेमे के लोग ही लौह पुरुष के लिए मुश्किलें पैदा करने में लगे थे।
भाजपा के सूत्रों का कहना है कि संभावित मुसीबत के मद्देनजर ही राजनाथ और आडवाणी फिलहाल अपनी-अपनी हैसियत बचाए रखने की कवायद में जुटे हुए हैं। इस वक्त उनकी प्राथमिकता एक-दूसरे के लिए गड्ढा खोदने की बजाए किसी तरह खुद को टिकाए रखने की है। वर्ना विरोधी भी मजबूत हो सकते हैं और संघ भी उनपर हावी हो सकता है। और अपनी इसी चाल के आगे उन्होंनेे जसवंत को अपने अभियान का बकरा बना दिया।
बताया जाता है कि संघ के नेता चिंतन बैठक में पार्टी की हार पर हर हाल में समीक्षा पर आमादा थे। लेकिन, भाजपा के कुछ नेताओं को इसमें अपने लिए मुश्किलें नजर आ रही थीं। कारण, हार के लिए कहीं न कहीं उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना था। लिहाजा, शुरू से ही वे इससे बचने की कोशिशों में लगे थे। आडवाणी ने खुद भी बैठक से पहले कहा था कि इसमें हार की समीक्षा के बजाए आगे की रणनीति पर चर्चा करना बेहतर होगा। उनकी लॉबी के नेता तो इस बैठक को ही रद्द करवाने में लगे थे। लेकिन, संघ ने इस पर कडा रवैया अपनाते हुए अपना रुख स्पष्ट कर दिया था कि बैठक भी होगी और हार पर समीक्षा भी। यह उन नेताओं के लिए झटके की तरह था, जो अब तक हार की जिम्मेवारियों से बचने की कोशिश कर रहे थे।
गौरतलब है कि लोकसभा चुनावों में पार्टी की हार के लिए मुख्य रूप से आडवाणी और उनके रणनीतिकारों को ही कठघरे में खडा किया जा रहा था। इसके बहाने उनके विरोधी पार्टी में आडवाणी लॉबी को कमजोर करने की बाकायदा चालें भी चल रहे थे। वहीं राजनाथ सिंह द्वारा इस मुद्दे पर हीला-हवाली ने उन्हें भी आडवाणी विरोधी नेताओं के निशाने पर ला खडा किया था। पार्टी का अध्यक्ष होने के नाते उन पर भी इसकी जिम्मेवारी कबूल करने का दबाव बनाया जा रहा था। यानी राजनाथ और आडवाणी दोनों के लिए हार पर समीक्षा का मतलब था, संकट को बुलावा। लिहाजा, दोनों ही इससे बचने की कोशिश कर रहे थे। उन्हें लगा कि चिंतन बैठक में अगर हार पर चर्चा हुई, तो विरोधी खुल कर उन पर निशाना साधेंगे। यही वजह है कि बैठक में हार की समीक्षा के बजाए आगे की रणनीति पर चर्चा की जरूरत जताई जाने लगी थी। लेकिन, संघ के इस एलान से कि भाजपा चिंतन बैठक में हार की समीक्षा से नहीं बच सकती, इसे ठंडे बस्ते में डालने की इन नेताओं की कोशिश नाकाम होती दिखने लगीी थी। तभी जसवंत सिंह के मुद्दे के रूप में उन्हें वह हथियार मिल गया, जिसने उन्हें हलाल होने से बचा लिया। वैसे भी पत्र के माध्यम से हार के लिए राजनाथ को जिम्मेदार बताने से जसवंत पार्टी अध्यक्ष की नजरों में चढे हुए थे।
जिन्ना के गुणगाण के कारण संघ तो मेजर साहब से नाखुश था ही, लेकिन उनके खिलाफ किसी कार्रवाई की पहल भाजपा द्वारा ही होनी थी। लिहाजा, भाजपा आलाकमान ने एक तीर से दो निशाने साधने की योजना बना ली। जसवंत को चिंतन बैठक से महज एक दिन पहले पार्टी से निकाल कर एक तरफ संघ को भी खुश कर दिया और दूसरी तरफ चिंतन बैठक में अनुशासन जैसे मुद्दे की हवा बनाकर हार की समीक्षा के मुद्दे को भी नेपथ्य में पटकने में कामयाबी पा ली। अपने मतलब साधने के लिए जसवंत को बलि का बकरा बनाने से किसी तरह की परेशानियों से भी सामना नहीं करना पडा और चिंतन बैठक के मंच को आडवाणी-राजनाथ के खिलाफ इस्तेमाल करने की योजना बना रहे असंतुष्ट नेता भी शांत पड गए। तभी बैठक में हार को लेकर बाल आप्टे की रिपोर्ट रखे जाने के बावजूद उसपर कोई खास चर्चा नहीं हो पाई। सारा फोकस पार्टी में अनुशासन और संघ की विचारधारा के प्रति भाजपा नेताओं की आस्था को मजबूत बनाने पर ही रहा। यही वजह है कि फजीहत से बच जाने की खुशी में राजनाथ ने पहली बार अपने मुंह से यह घोषणा की कि आडवाणी पांच वर्षों तक प्रतिपक्ष के नेता के अपने पद पर बने रहेंगे। जबकि इससे पहले राजनाथ खेमे के लोग ही लौह पुरुष के लिए मुश्किलें पैदा करने में लगे थे।
भाजपा के सूत्रों का कहना है कि संभावित मुसीबत के मद्देनजर ही राजनाथ और आडवाणी फिलहाल अपनी-अपनी हैसियत बचाए रखने की कवायद में जुटे हुए हैं। इस वक्त उनकी प्राथमिकता एक-दूसरे के लिए गड्ढा खोदने की बजाए किसी तरह खुद को टिकाए रखने की है। वर्ना विरोधी भी मजबूत हो सकते हैं और संघ भी उनपर हावी हो सकता है। और अपनी इसी चाल के आगे उन्होंनेे जसवंत को अपने अभियान का बकरा बना दिया।
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जनसंघ से जसवंत तक
हिंदुवादी विचारधारा को आधार बनाकर राष्ट्रवाद के नारे के साथ सन् 1925 में डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की थी। तब यह महज सामाजिक व सांस्कृतिक संगठन हुआ करता था। लेकिन, आगे चलकर इसके सदस्यों को लगा कि बिना राजनैतिक ताकत के वे हिंदुवादी, राष्ट्रवादी विचारधारा को लागूू करने के अपने मिशन में कामयाब नहीं हो सकते। लिहाजा, 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने संघ से इतर जनसंघ नामक एक राजनैतिक दल का गठन किया। यह संघ की राजनैतिक शाखा थी। दीन दयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, मदन लाल खुराना जैसे लोग तब इसके स्तंभ हुआ करते थे। अपने गठन के बाद से 1977 के आपातकाल तक जनसंघ ने कई मुद्दों पर देशव्यापी आंदोलन छेडा। गो-संरक्षण, जमींदारी और जागीरदारी की मुखालफत, परमिट व कोटा राज के विरोध जैसे मुद्दों पर इसे व्यापक जन समर्थन भी हासिल हुआ। इस दौरान जयप्रकाश नारायण के भ्रष्टाचार और एक पार्टी शासन के खिलाफ चलाए जा रहे जनआंदोलन में भी जनसंघ ने बढ-चढकर हिस्सा लिया। इसने कई राजयों में इसके पांव जमाए। इसी का परिणाम था कि आपातकाल में जनसंघ के नेताओं को भी दमन का कोप झेलना पडा। 77 के चुनाव के बाद जब मोरारजी देसाई के नेतृत्व में केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी, तो जनसंघ भी इसमें शामिल हो गया। लेकिन, कई कारणों से यह सरकार 30 महीनों के भीतर ही गिर गई। उस वक्त जनसंघ नेताओं की दोहरी सदस्यता को लेकर भी विवाद गहराया था। लेकिन अटल, आडवाणी जैसे नेताओं ने साफ कह दिया कि वे अपनी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को नहीं छोड सकते। फलत: 1980 में उन्होंने जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी।
प्रारंभ से ही भाजपा राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकता एवं संस्कृति की अलमबरदार संस्था के रूप में अपने को प्रचारित करती आई है। यही वजह है कि उसने हमेशा खुद को अन्य सियासी दलों से अलग माना और जताया। तभी भाजपा के लिए पार्टी विद डिफरेंस जैसी उपमाएं दी जाती रहीं। यह अलग बात कि सत्ता से नजदीकी और वक्त के साथ अब यह पार्टी विद डिफरेंसेस के तौर पर सामने है। संघ ने भले ही आज तक खुद को सक्रिय राजनीति से अलग रखा हो, पर भाजपा को हमेशा से उसका -पॉलिटिकल विंग ही माना गया। भाजपा के नेता भी इस संगठन को पिछले कुछ समय तक संघ परिवार नामक वटवृक्ष की प्रमुख शाखा के रूप में निरूपित करते थे। लेकिन, पार्टी में गैरसंघी पृष्ठभूमि वाले नेताओं ने हाल में भाजपा की चुनावी हार के बाद इसे संघ से पूरी तरह आजाद करवाने का स्वर छेड रखा है। इसे लेकर पार्टी में घमासान भी मचा हुआ है। जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता की भाजपा से छुट्टी को भी इसी घमासयान का नतीजा बताया जाता है।
जहां तक भाजपा के सियासी सफर की बात है, तो इसने अपना पहला चुनाव 1984 में लडा था। तब उसे महज लोकसभा की 2 सीटें हासिल हुई थीं। लेकिन, 89 में अयोध्या में शिलान्यास कार्यक्रम ने जबर्दस्त जोर पकडा और भाजपा को इसका काफी सियासी लाभ मिला। नतीजतन, 89 के लोकसभा चुनाव में उसके सीटों की संख्या बढकर 88 हो गई। मंदिर मुद्दे पर मिली इस सफलता से उत्साहित भाजपा ने फिर इस मुद्दे को अपना प्रमुख सियासी हथियार ही बना लिया। 1990 में आडवाणी ने इसी मुद्दे को लेकर रथ यात्रा शुरू की। हिुदंत्व के रथ पर सवार पार्टी ने 91 के चुनाव में 119 सीटें जीतीं और प्रमुख विपक्षी पार्टी बन बैठी। 96 के चुनाव में तो वह लोकसभा में सबसे बडी पार्टी के तौर पर उभरी। तब 161 सीटों के साथ भाजपा ने केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार तक बनाने में कामयाबी हासिल की। लेकिन, बहुमत हासिल न कर पाने की वजह से सरकार 13 दिनों में ही गिर गई। इसके बाद 98 के चुनाव में भाजपा एनडीए गठबंधन के तौर पर केंद्र में आई। लेकिन, इस बार भी घटक दलों में फूट ने सरकार को 13 महीने में ही जमीन पर ला पटका। इसके बाद 99 में चुनाव हुए, जिसमें भाजपा के नेतृत्व में एनडीए को जबर्दस्त जीत हासिल हुई। उसने सरकार भी बनाई और पूरे पांच साल शासन भी किया। इसके बाद 2004 से लगातार दूसरी बार कांग्रेस नीत यूपीए सरकार दिल्ली के तख्त पर काबिज है। हार और सत्ता से दूरी ने भाजपा के अंदर आंतरिक कलह को पूरी तरह सतह पर ला दिया है। जसवंत सिंह जैसे लोग लगातार सार्वजनिक तौर पर पार्टी और इसकी विचारधारा को कठघरे में खडा कर रहे हैं। ऐसे में कइयों का कहना है कि कहीं जनसंघ से शुरू हुई यह सियासी पारी यहीं आकर न खतम हो जाए।
प्रारंभ से ही भाजपा राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकता एवं संस्कृति की अलमबरदार संस्था के रूप में अपने को प्रचारित करती आई है। यही वजह है कि उसने हमेशा खुद को अन्य सियासी दलों से अलग माना और जताया। तभी भाजपा के लिए पार्टी विद डिफरेंस जैसी उपमाएं दी जाती रहीं। यह अलग बात कि सत्ता से नजदीकी और वक्त के साथ अब यह पार्टी विद डिफरेंसेस के तौर पर सामने है। संघ ने भले ही आज तक खुद को सक्रिय राजनीति से अलग रखा हो, पर भाजपा को हमेशा से उसका -पॉलिटिकल विंग ही माना गया। भाजपा के नेता भी इस संगठन को पिछले कुछ समय तक संघ परिवार नामक वटवृक्ष की प्रमुख शाखा के रूप में निरूपित करते थे। लेकिन, पार्टी में गैरसंघी पृष्ठभूमि वाले नेताओं ने हाल में भाजपा की चुनावी हार के बाद इसे संघ से पूरी तरह आजाद करवाने का स्वर छेड रखा है। इसे लेकर पार्टी में घमासान भी मचा हुआ है। जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता की भाजपा से छुट्टी को भी इसी घमासयान का नतीजा बताया जाता है।
जहां तक भाजपा के सियासी सफर की बात है, तो इसने अपना पहला चुनाव 1984 में लडा था। तब उसे महज लोकसभा की 2 सीटें हासिल हुई थीं। लेकिन, 89 में अयोध्या में शिलान्यास कार्यक्रम ने जबर्दस्त जोर पकडा और भाजपा को इसका काफी सियासी लाभ मिला। नतीजतन, 89 के लोकसभा चुनाव में उसके सीटों की संख्या बढकर 88 हो गई। मंदिर मुद्दे पर मिली इस सफलता से उत्साहित भाजपा ने फिर इस मुद्दे को अपना प्रमुख सियासी हथियार ही बना लिया। 1990 में आडवाणी ने इसी मुद्दे को लेकर रथ यात्रा शुरू की। हिुदंत्व के रथ पर सवार पार्टी ने 91 के चुनाव में 119 सीटें जीतीं और प्रमुख विपक्षी पार्टी बन बैठी। 96 के चुनाव में तो वह लोकसभा में सबसे बडी पार्टी के तौर पर उभरी। तब 161 सीटों के साथ भाजपा ने केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार तक बनाने में कामयाबी हासिल की। लेकिन, बहुमत हासिल न कर पाने की वजह से सरकार 13 दिनों में ही गिर गई। इसके बाद 98 के चुनाव में भाजपा एनडीए गठबंधन के तौर पर केंद्र में आई। लेकिन, इस बार भी घटक दलों में फूट ने सरकार को 13 महीने में ही जमीन पर ला पटका। इसके बाद 99 में चुनाव हुए, जिसमें भाजपा के नेतृत्व में एनडीए को जबर्दस्त जीत हासिल हुई। उसने सरकार भी बनाई और पूरे पांच साल शासन भी किया। इसके बाद 2004 से लगातार दूसरी बार कांग्रेस नीत यूपीए सरकार दिल्ली के तख्त पर काबिज है। हार और सत्ता से दूरी ने भाजपा के अंदर आंतरिक कलह को पूरी तरह सतह पर ला दिया है। जसवंत सिंह जैसे लोग लगातार सार्वजनिक तौर पर पार्टी और इसकी विचारधारा को कठघरे में खडा कर रहे हैं। ऐसे में कइयों का कहना है कि कहीं जनसंघ से शुरू हुई यह सियासी पारी यहीं आकर न खतम हो जाए।
एक था सर्कस
किसी वक्त मनोरंजन का प्रमुख जरिया रहा सर्कस आज दम तोड रहा है। बदलते माहौल और सरकारी उपेक्षा ने इसके कलाकारों को दो जून की रोटी से भी महरूम कर दिया है। इनके दर्द की किसी को परवाह नहीं। अगर यही हाल रहा, तो मनोरंजन का यह अनोखा माध्यम इतिहास के पन्नों में खो जाएगा।
मशहूर फिल्मकार राज कपूर ने कभी सर्कस और इसके कलाकारों को लेकर एक फिल्म बनाई थी। मेरा नाम जोकर। इस फिल्म में सर्कस के कलाकारों की व्यक्तिगत जिंदगी और उनके जज्बातों का बडा ही मार्मिक चित्रण किया गया था। उस वक्त यह फिल्म सुपर फलॉप साबित हुई थी। लेकिन, राज कपूर की मौत के बाद जब दोबारा इसे प्रदर्शित किया गया, तो इसे बेजोड सफलता हासिल हुई। तब लोगों की टिप्पणी थी कि अक्सर लोग किसी की मौत के बाद ही उसकी असली अहमियत समझते हैं। जब राज कपूर जिंदा थे, तो अपनी सारी कमाई दांव पर लगा कर बनाई गई उनकी इस ड्रीम प्रोजेक्ट को लोगों ने नकार दिया। लेकिन, जब वह इस दुनिया में नहीं रहे, तो दर्शकों-आलोचकों सभी ने इसे हाथों-हाथ लिया। कुछ ऐसा ही इस फिल्म का विषय-वस्तु रहे सर्कस के साथ दोहराया जा रहा है। बदले हालात और सरकार की बेरुखी के कारण यह फिलहाल अपने सबसे दुख भरे दौर से गुजर रहा है। मुमकिन है कि मनोरंजन की इस विधा का अस्तित्व ही खत्म हो जाए। और शायद तभी इस ओर लोगों का ध्यान जाए। लेकिन, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।
सर्कस इंडस्ट्री की दुर्दशा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कभी देश में 300 से ज्यादा सर्कस थे, आज इनकी संख्या सैकडे को भी पार नहीं करती। बमुश्किल 70-80 सर्कस कंपनियां ही बची हैं। उनमें भी महज 11 ही इंडियन सर्कस फेडरेशन में दर्ज हैं। बाकी किसी तरह अपना नाम जिंदा रखने की लडाई लड रही हंै। लेकिन, मनोरंजन के नए-नए साधनों के आगे आज उनकी भी हालत इतनी दयनीय हो चुकी है कि करीब 20 हजार लोगों को रोजी-रोटी मुहैया कराने वाली इस दिलचस्प कला की आखिरी सांसें कभी भी उखड सकती हैं। इंडियन सर्कस फेडरेशन के चेयरमैन अशोक शंकर को हालांकि पूरी उम्मीद है कि यह कला मरेगी नहीं, जिंदा रहेगी। लेकिन वह भी मानते हैं कि टेलीविजन और इंटरनेट के दौर में सर्कस को भारत में अपने सबसे बुरे दौर से गुजरना पड रहा है। इसके पीछे वह इस क्षेत्र के प्रति सरकार की बेरुखी को बडी वजह मानते हैं। वह कहते हैं, सरकार को सर्कस अकादमी का गठन करना चाहिए, ताकि विदेशों की तरह यहां भी सर्कस से जुडने की इच्छा रखने वाले नए कलाकारों की प्रतिभा को निखारा जा सके। साथ ही रिटायरमेंट के बाद कलाकारों को नौकरियों में आरक्षण दिया जाना चाहिए क्योंकि इस क्षेत्र में करिअर बहुत लंबा नहीं होता। ट्रेनिंग सेंटर के गठन से सर्कस में लोगों का मनोरंजन करके अपनी जिंदगी का बडा हिस्सा गुजार देने वालों को प्रशिक्षक के तौर पर रोजगार भी मुहैया हो पाएगा। आज सरकारी उपेक्षा और समुचित मंच नहीं होने के कारण ही प्रतिभाशाली कलाकार सर्कस से दूर होते जा रहे हैं।
जेमिनी सर्कस के मालिक अजय शंकर की भी कुछ ऐसी ही राय है। उनका कहना है कि सरकार का समुचित सहयोग न मिलने के कारण सर्कस खत्म हो रहे हैं। इसके साथ ही सर्कस के कलाकारों की खानाबदोश जिंदगी और मौजूदा वक्त में जरूरी स्थायित्व की कमी के कारण भी स्थिति बहुत विषम हो गई है। इस ओर सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है। उल्टे कभी बच्चों-जानवरों के शोषण या कभी कोई और आरोप लगा कर वह सर्कस वालों को परेशान ही करने का काम करती है। लिहाजा, देश में सर्कस की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। सर्कस से जुडे अन्य लोगों का भी मानना है कि सरकार की अदूरदर्शी नीतियों ने सर्कस के समक्ष अस्तित्व का संकट खडा किया है। पहले जब मनोरंजन के बहुत ज्यादा साधन नहीं हुआ करते थे, तब सर्कस में दर्शकों की अपार भीड जुटा करती थी। गांव-कस्बों ही नहीं, बडे शहरों व महानगरों में भी सर्कस खूब चलते थे। लोग दूर-दूर से सर्कस देखने आया करते थे। लेकिन आज टीवी, इंटरनेट के जमाने में लोगों की मनोरंजन की आदतों और रुचियों में बदलाव के कारण सर्कस को अपना अस्तित्व बचाने के लिए कठिन लडाई लडनी पड रही है। ऊपर से सरकार द्वारा सर्कस में जानवरों और बच्चों से काम कराने पर रोक ने सर्कस के ताबूत में अंतिम कील ठोंकने का काम किया है। इसकी आड में सर्कस वालों को तो परेशान किया ही जा रहा है, दर्शकों खासकर बच्चों की इसमें रुचि भी बिल्कुल खत्म हो गई है। नतीजतन, सर्कस का बिजनेस 50 प्रतिशत से भी ज्यादा कम हो गया है। अपोलो सर्कस के मैनेजर आर के यादव कहते हैं, सरकार का समर्थन तो सर्कस को नहीं ही मिल रहा है। ऊपर से उसने इतने नियम-कायदे हम पर थोप दिए हैं कि काम करना मुश्किल हो रहा है। बच्चों से हम काम करा नहीं सकते, जबकि हकीकत यह है कि कम उम्र में ही इस विधा को सीखा जा सकता है। 14 साल की उम्र तक तो शरीर इतना परिपक्व हो जाता है कि जिम्नाज्म सीखा ही नहीं जा सकता। जानवरों के खेल पर भी रोक लगा दिया गया है। इन वजहों से ही सर्कस को दिक्कतों का सामना करना पड रहा है।
सरकार की सख्ती का असर सर्कस की गुणवत्ता पर भी पड रहा है। पहले जहां एक बडे सर्कस में शेर-चीते, घोडे, हाथी, बाघ और अनेक जानवरों के अलावा 400-500 लोग इसके सदस्य होते थे, आज सौ लोग भी बमुश्किल ही होते हैं। स्वाभाविक है कि जब खर्च के मुकाबले आमदनी कम से कमतर हो जाएगी, तो भला कौन लाव-लश्कर के साथ सर्कस चलाना चाहेगा। यही वजह है कि आज अधिकांश सर्कस मजबूरी में ही गाडी खींच रहे हैं। और वह भी सर्कस के लिए अपनी पूरी जिंदगी झोंक चुके प्रौढ कलाकारों के बूते। जिनके लिए सर्कस के तंबुओं से अलग जिंदगी की ख्वाहिश भी मौत के समान है। वे जाएं, तो जाएं कहां। इसके अलावा वे कर भी क्या सकते हैं। करिअर की अनिश्चतता के कारण हीी इस इंडस्ट्री से नए लोग नहीं जुड रहे। जो यहां काम कर रहे हैं, वे भी अपने बच्चों को इससे दूर ही रखना चाहते हैं। नई लडकियों को खेल सिखाने वाली ऐसी ही एक प्रौढ कलाकार मोना विश्वास कहती हैं, मैंने अपनी पूरी जिंदगी सर्कस और इस कला के नाम समर्पित कर दी। लेकिन अनिश्चतताओं से भरी यहां की जिंदगी को देखते हुए मैंने अपनी दोनों बेटियों को इससे दूर रखा। आज मेरी एक बेटी नर्स है और दूसरी टीचर। बहुत संघर्ष से मैंने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है। सबके साथ ऐसा नहीं हो पाता है। मैं खुशकिस्मत थी कि अपने बच्चों को बेहतर जिंदगी दे पाई, वर्ना वे भी इन्हीं तंबुओं में कैद होकर रह जातीं।
40 वर्षीय मोहम्मद रशीद भी उन लोगों में हैं, जिन्हें सर्कस विरासत में मिली। उनके मां-बाप दोनों सर्कस में ढेर सारा पानी पीने और फिर उसे निकालने का करतब दिखाते थे। रशीद भी खुशी-खुशी इसका हिस्सा बन गए। लेकिन आज उम्र के इस पडाव पर आकर उनकी सोच बदल गई है। वह अपने बच्चों को इससे दूर रखना चाहते हैं। वह कहते हैं, मैं अपने बच्चों को खानाबदोशी की जिंदगी नहीं देना चाहता। आज वक्त बदल गया है। जरूरतें बदल गई हैं। इस क्षेत्र में रहकर अब कोई कुछ हासिल नहीं कर सकता। सर्कस मर रहा है। इस मरती हुई कला का हाथ थाम कर कोई जिंदा रहने का आखिर सोच भी कैसे सकता है। बदले दौर में सर्कस के लिए ऐसी सोच रखने वाले कलाकार ढेरों हैं। ग्रेजुएट हरी बाबू से लेकर मैनेजर बालाकृष्णन, झूले पर खेल दिखाने वाले जयराम, शूटर गजानंद व सीमा पंडा और रिंग मास्टर एस मोहम्मद तक। ये वे लोग हैं, जिन्होंने सर्कस के सुनहरे दिन देखे हैं। वे दिन, जब इसके कलाकारों को पैसा भी मिलता था और प्रसिद्घी भी। भारत में सर्कस का घर कहे जाने वाले केरल के कन्नूर जिले से कई ऐसे सर्कस कलाकार आए, जिन्हें दुनिया भर में प्रसिद्घी मिली। मार्शल आर्ट ट्रेनर और जिमनास्ट कीलेरी कुन्हिकन्नन गुरुक्कल न सिर्फ भारत में सर्कस की महान हस्ती थे, बल्कि सात समंदर पार भी उनके प्रशंसक हुए। लेकिन, आज के दौर में पुराने लोग भी सर्कस के भविष्य को लेकर अनिश्चित हैं। यही वजह है कि प्रतिभाशाली लोग अब इस क्षेत्र में नहीं आ रहे। जो नए लोग आ रहे हैं, वे गैर प्रशिक्षित और अकुशल होते हैं। जिनके लिए सर्कस में आना उनके लिए मजबूरी होती है। महज किसी तरह पेट भरने की मजबूरी। लिहाजा, जिंदगी को लेकर स्थायित्व की अनिश्चतता से असली कलाकार सर्कस से दूर होते जा रहे हैं। और साथ ही दर्शक भी। इससे सर्कस दम तोड रहा है।
हालांकि केरल में सरकार द्वारा सर्कस के कलाकारों को पेंशन दी जाती है। दक्षिण में सर्कस के कद्रदान भी हैं, पर सिर्फ चंद प्रशंसकों के बूते सर्कस जैसी विस्तृत कला को जिंदा रख पाना आसान नहीं है। कलाकारों को भी अब यहां अपने वजूद की संभावनाओं की कल्पना बेमानी सी लगती है। तभी तमिलनाडु के पुष्पा चक्रवर्ती कहते हैं, आज जवान हैं, काम कर रहे हैं। सर्कस की जिंदगी तब तक है, जब तक शरीर में दम। आगे क्या होगा, कुछ नहीं मालूम। अभी पिछले दिनों गाजियाबाद में एक सर्कस शो के दौरान एक कलाकार झूले पर खेल दिखाते गिर कर अपनी जान गंवा बैठा। इस घटना ने वृताकार क्षेत्र में ऊंचे तने शामियाने के भीतर चकाचौंध कर देने वाली रोशनी और आर्केस्ट्रा की तेज धुनों के बीच अपना गम भुला कर लोगों के जीवन में रस घोलने वाले मजबूर कलाकारों की जिंदगी के अंधेरे को बयां कर दिया। वह दर्द, जो इन तंबुओं में ही कैद होकर रह जाता है। लोग इन कलाकारों को हंसते-गाते, दूसरों को मनोरंजन करते तो देखते हैं, लेकिन इस हंसी के पीछे छिपे उनके दर्द को शायद ही कोई महसूस कर पाता है। न ही उसे महसूस करने की जरूरत ही समझी जाती है। सरकारें भी उनकी ओर नहीं देखती। सर्कस और इसके कलाकारों की यही दर्दे दास्तां है। खेल के दौरान उन्हें मिलने वाली हर दाद के पीछे एक दर्द। कराहते करतब शायद जल्द ही दम तोड दें।
मशहूर फिल्मकार राज कपूर ने कभी सर्कस और इसके कलाकारों को लेकर एक फिल्म बनाई थी। मेरा नाम जोकर। इस फिल्म में सर्कस के कलाकारों की व्यक्तिगत जिंदगी और उनके जज्बातों का बडा ही मार्मिक चित्रण किया गया था। उस वक्त यह फिल्म सुपर फलॉप साबित हुई थी। लेकिन, राज कपूर की मौत के बाद जब दोबारा इसे प्रदर्शित किया गया, तो इसे बेजोड सफलता हासिल हुई। तब लोगों की टिप्पणी थी कि अक्सर लोग किसी की मौत के बाद ही उसकी असली अहमियत समझते हैं। जब राज कपूर जिंदा थे, तो अपनी सारी कमाई दांव पर लगा कर बनाई गई उनकी इस ड्रीम प्रोजेक्ट को लोगों ने नकार दिया। लेकिन, जब वह इस दुनिया में नहीं रहे, तो दर्शकों-आलोचकों सभी ने इसे हाथों-हाथ लिया। कुछ ऐसा ही इस फिल्म का विषय-वस्तु रहे सर्कस के साथ दोहराया जा रहा है। बदले हालात और सरकार की बेरुखी के कारण यह फिलहाल अपने सबसे दुख भरे दौर से गुजर रहा है। मुमकिन है कि मनोरंजन की इस विधा का अस्तित्व ही खत्म हो जाए। और शायद तभी इस ओर लोगों का ध्यान जाए। लेकिन, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।
सर्कस इंडस्ट्री की दुर्दशा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कभी देश में 300 से ज्यादा सर्कस थे, आज इनकी संख्या सैकडे को भी पार नहीं करती। बमुश्किल 70-80 सर्कस कंपनियां ही बची हैं। उनमें भी महज 11 ही इंडियन सर्कस फेडरेशन में दर्ज हैं। बाकी किसी तरह अपना नाम जिंदा रखने की लडाई लड रही हंै। लेकिन, मनोरंजन के नए-नए साधनों के आगे आज उनकी भी हालत इतनी दयनीय हो चुकी है कि करीब 20 हजार लोगों को रोजी-रोटी मुहैया कराने वाली इस दिलचस्प कला की आखिरी सांसें कभी भी उखड सकती हैं। इंडियन सर्कस फेडरेशन के चेयरमैन अशोक शंकर को हालांकि पूरी उम्मीद है कि यह कला मरेगी नहीं, जिंदा रहेगी। लेकिन वह भी मानते हैं कि टेलीविजन और इंटरनेट के दौर में सर्कस को भारत में अपने सबसे बुरे दौर से गुजरना पड रहा है। इसके पीछे वह इस क्षेत्र के प्रति सरकार की बेरुखी को बडी वजह मानते हैं। वह कहते हैं, सरकार को सर्कस अकादमी का गठन करना चाहिए, ताकि विदेशों की तरह यहां भी सर्कस से जुडने की इच्छा रखने वाले नए कलाकारों की प्रतिभा को निखारा जा सके। साथ ही रिटायरमेंट के बाद कलाकारों को नौकरियों में आरक्षण दिया जाना चाहिए क्योंकि इस क्षेत्र में करिअर बहुत लंबा नहीं होता। ट्रेनिंग सेंटर के गठन से सर्कस में लोगों का मनोरंजन करके अपनी जिंदगी का बडा हिस्सा गुजार देने वालों को प्रशिक्षक के तौर पर रोजगार भी मुहैया हो पाएगा। आज सरकारी उपेक्षा और समुचित मंच नहीं होने के कारण ही प्रतिभाशाली कलाकार सर्कस से दूर होते जा रहे हैं।
जेमिनी सर्कस के मालिक अजय शंकर की भी कुछ ऐसी ही राय है। उनका कहना है कि सरकार का समुचित सहयोग न मिलने के कारण सर्कस खत्म हो रहे हैं। इसके साथ ही सर्कस के कलाकारों की खानाबदोश जिंदगी और मौजूदा वक्त में जरूरी स्थायित्व की कमी के कारण भी स्थिति बहुत विषम हो गई है। इस ओर सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है। उल्टे कभी बच्चों-जानवरों के शोषण या कभी कोई और आरोप लगा कर वह सर्कस वालों को परेशान ही करने का काम करती है। लिहाजा, देश में सर्कस की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। सर्कस से जुडे अन्य लोगों का भी मानना है कि सरकार की अदूरदर्शी नीतियों ने सर्कस के समक्ष अस्तित्व का संकट खडा किया है। पहले जब मनोरंजन के बहुत ज्यादा साधन नहीं हुआ करते थे, तब सर्कस में दर्शकों की अपार भीड जुटा करती थी। गांव-कस्बों ही नहीं, बडे शहरों व महानगरों में भी सर्कस खूब चलते थे। लोग दूर-दूर से सर्कस देखने आया करते थे। लेकिन आज टीवी, इंटरनेट के जमाने में लोगों की मनोरंजन की आदतों और रुचियों में बदलाव के कारण सर्कस को अपना अस्तित्व बचाने के लिए कठिन लडाई लडनी पड रही है। ऊपर से सरकार द्वारा सर्कस में जानवरों और बच्चों से काम कराने पर रोक ने सर्कस के ताबूत में अंतिम कील ठोंकने का काम किया है। इसकी आड में सर्कस वालों को तो परेशान किया ही जा रहा है, दर्शकों खासकर बच्चों की इसमें रुचि भी बिल्कुल खत्म हो गई है। नतीजतन, सर्कस का बिजनेस 50 प्रतिशत से भी ज्यादा कम हो गया है। अपोलो सर्कस के मैनेजर आर के यादव कहते हैं, सरकार का समर्थन तो सर्कस को नहीं ही मिल रहा है। ऊपर से उसने इतने नियम-कायदे हम पर थोप दिए हैं कि काम करना मुश्किल हो रहा है। बच्चों से हम काम करा नहीं सकते, जबकि हकीकत यह है कि कम उम्र में ही इस विधा को सीखा जा सकता है। 14 साल की उम्र तक तो शरीर इतना परिपक्व हो जाता है कि जिम्नाज्म सीखा ही नहीं जा सकता। जानवरों के खेल पर भी रोक लगा दिया गया है। इन वजहों से ही सर्कस को दिक्कतों का सामना करना पड रहा है।
सरकार की सख्ती का असर सर्कस की गुणवत्ता पर भी पड रहा है। पहले जहां एक बडे सर्कस में शेर-चीते, घोडे, हाथी, बाघ और अनेक जानवरों के अलावा 400-500 लोग इसके सदस्य होते थे, आज सौ लोग भी बमुश्किल ही होते हैं। स्वाभाविक है कि जब खर्च के मुकाबले आमदनी कम से कमतर हो जाएगी, तो भला कौन लाव-लश्कर के साथ सर्कस चलाना चाहेगा। यही वजह है कि आज अधिकांश सर्कस मजबूरी में ही गाडी खींच रहे हैं। और वह भी सर्कस के लिए अपनी पूरी जिंदगी झोंक चुके प्रौढ कलाकारों के बूते। जिनके लिए सर्कस के तंबुओं से अलग जिंदगी की ख्वाहिश भी मौत के समान है। वे जाएं, तो जाएं कहां। इसके अलावा वे कर भी क्या सकते हैं। करिअर की अनिश्चतता के कारण हीी इस इंडस्ट्री से नए लोग नहीं जुड रहे। जो यहां काम कर रहे हैं, वे भी अपने बच्चों को इससे दूर ही रखना चाहते हैं। नई लडकियों को खेल सिखाने वाली ऐसी ही एक प्रौढ कलाकार मोना विश्वास कहती हैं, मैंने अपनी पूरी जिंदगी सर्कस और इस कला के नाम समर्पित कर दी। लेकिन अनिश्चतताओं से भरी यहां की जिंदगी को देखते हुए मैंने अपनी दोनों बेटियों को इससे दूर रखा। आज मेरी एक बेटी नर्स है और दूसरी टीचर। बहुत संघर्ष से मैंने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है। सबके साथ ऐसा नहीं हो पाता है। मैं खुशकिस्मत थी कि अपने बच्चों को बेहतर जिंदगी दे पाई, वर्ना वे भी इन्हीं तंबुओं में कैद होकर रह जातीं।
40 वर्षीय मोहम्मद रशीद भी उन लोगों में हैं, जिन्हें सर्कस विरासत में मिली। उनके मां-बाप दोनों सर्कस में ढेर सारा पानी पीने और फिर उसे निकालने का करतब दिखाते थे। रशीद भी खुशी-खुशी इसका हिस्सा बन गए। लेकिन आज उम्र के इस पडाव पर आकर उनकी सोच बदल गई है। वह अपने बच्चों को इससे दूर रखना चाहते हैं। वह कहते हैं, मैं अपने बच्चों को खानाबदोशी की जिंदगी नहीं देना चाहता। आज वक्त बदल गया है। जरूरतें बदल गई हैं। इस क्षेत्र में रहकर अब कोई कुछ हासिल नहीं कर सकता। सर्कस मर रहा है। इस मरती हुई कला का हाथ थाम कर कोई जिंदा रहने का आखिर सोच भी कैसे सकता है। बदले दौर में सर्कस के लिए ऐसी सोच रखने वाले कलाकार ढेरों हैं। ग्रेजुएट हरी बाबू से लेकर मैनेजर बालाकृष्णन, झूले पर खेल दिखाने वाले जयराम, शूटर गजानंद व सीमा पंडा और रिंग मास्टर एस मोहम्मद तक। ये वे लोग हैं, जिन्होंने सर्कस के सुनहरे दिन देखे हैं। वे दिन, जब इसके कलाकारों को पैसा भी मिलता था और प्रसिद्घी भी। भारत में सर्कस का घर कहे जाने वाले केरल के कन्नूर जिले से कई ऐसे सर्कस कलाकार आए, जिन्हें दुनिया भर में प्रसिद्घी मिली। मार्शल आर्ट ट्रेनर और जिमनास्ट कीलेरी कुन्हिकन्नन गुरुक्कल न सिर्फ भारत में सर्कस की महान हस्ती थे, बल्कि सात समंदर पार भी उनके प्रशंसक हुए। लेकिन, आज के दौर में पुराने लोग भी सर्कस के भविष्य को लेकर अनिश्चित हैं। यही वजह है कि प्रतिभाशाली लोग अब इस क्षेत्र में नहीं आ रहे। जो नए लोग आ रहे हैं, वे गैर प्रशिक्षित और अकुशल होते हैं। जिनके लिए सर्कस में आना उनके लिए मजबूरी होती है। महज किसी तरह पेट भरने की मजबूरी। लिहाजा, जिंदगी को लेकर स्थायित्व की अनिश्चतता से असली कलाकार सर्कस से दूर होते जा रहे हैं। और साथ ही दर्शक भी। इससे सर्कस दम तोड रहा है।
हालांकि केरल में सरकार द्वारा सर्कस के कलाकारों को पेंशन दी जाती है। दक्षिण में सर्कस के कद्रदान भी हैं, पर सिर्फ चंद प्रशंसकों के बूते सर्कस जैसी विस्तृत कला को जिंदा रख पाना आसान नहीं है। कलाकारों को भी अब यहां अपने वजूद की संभावनाओं की कल्पना बेमानी सी लगती है। तभी तमिलनाडु के पुष्पा चक्रवर्ती कहते हैं, आज जवान हैं, काम कर रहे हैं। सर्कस की जिंदगी तब तक है, जब तक शरीर में दम। आगे क्या होगा, कुछ नहीं मालूम। अभी पिछले दिनों गाजियाबाद में एक सर्कस शो के दौरान एक कलाकार झूले पर खेल दिखाते गिर कर अपनी जान गंवा बैठा। इस घटना ने वृताकार क्षेत्र में ऊंचे तने शामियाने के भीतर चकाचौंध कर देने वाली रोशनी और आर्केस्ट्रा की तेज धुनों के बीच अपना गम भुला कर लोगों के जीवन में रस घोलने वाले मजबूर कलाकारों की जिंदगी के अंधेरे को बयां कर दिया। वह दर्द, जो इन तंबुओं में ही कैद होकर रह जाता है। लोग इन कलाकारों को हंसते-गाते, दूसरों को मनोरंजन करते तो देखते हैं, लेकिन इस हंसी के पीछे छिपे उनके दर्द को शायद ही कोई महसूस कर पाता है। न ही उसे महसूस करने की जरूरत ही समझी जाती है। सरकारें भी उनकी ओर नहीं देखती। सर्कस और इसके कलाकारों की यही दर्दे दास्तां है। खेल के दौरान उन्हें मिलने वाली हर दाद के पीछे एक दर्द। कराहते करतब शायद जल्द ही दम तोड दें।
ऐ मियां टेढा, हम तुमसे डेढा
संघ एक तरफ जहां आडवाणी की विदाई सुनिश्चित करने में लगा है, वहीं लौह पुरुष किसी भी हालत में हाथ खडे करने को तैयार नहीं। लिहाजा, दोनों के बीच रिश्तों में खटास बढती जा रही है। आने वाले दिनों में प्रभुत्व की यह जंग आर-पार की लडाई के रूप में भी सामने आ सकती है।
आज से करीब पांच साल पहले तत्कालीन संघ प्रमुख के.एस.सुदर्शन ने सार्वजनिक तौर पर इस बात की वकालत की थी कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व युवा हाथों को सौंप देना चाहिए। लेकिन, तब नेतृत्व को लेकर दूसरी पंक्ति के नेताओं में सिर-फुटव्वल की स्थिति ने इस कवायद को आगे बढने से रोक दिया। इस मुद्दे पर पार्टी में गुटबाजी के दृष्टिगत भी संघ को लगा कि अगर वह इस मामले में विशेष पहल करेगा, तो स्थिति और विस्फोटक हो सकती है। लिहाजा, सुदर्शन की सोच पर खास कवायद नहीं हो पाई। पर लोकसभा चुनावों में हार के बाद उपजी परिस्थितियों में संघ अब एक बार फिर भाजपा को अटल-आडवाणी युग से निकाल कर नए युग की ओर ले जाने के लिए सक्रिय हो गया है। चूंकि वाजपेयी तो अस्वस्थता का शिकार होकर पहले ही सक्रिय राजनीति से खुद को अलग कर चुके हैं, लिहाजा निशाने पर हैं लौह पुरुष आडवाणी। वही आडवाणी, जो लोकसभा चुनावों से पहले और बाद भी यह एलान कर चुके थे कि भाजपा के हारने पर वह सक्रिय राजनीति को अलविदा कह देंगे। लेकिन, चुनावों में भाजपा की हार के बावजूद न तो उन्होंने राजनीति से संन्यास लिया और न ही कुर्सी का मोह त्याग पाए। अब भी वह लोकसभा में विपक्ष के नेता के पद से चिपके बैठे हैं। यही वजह है कि संघ को उन्हें अब यह कहना पड रहा है कि बहुत हुआ, अब सिंहासन खाली करने की तैयारी करिए। पर लौह पुरुष इस मूड में नहीं दिखाई दे रहे। वह अब भी पार्टी में अपना दबदबा बरकरार रखना चाहते हैं। और साथ ही पीएम इन वेटिंग की तमन्ना भी। उनकी इस अदा ने संघ को कुपित कर दिया है।
पिछले दिनों दिल्ली आए संघ प्रमुख मोहन भागवत को बाकायदा आडवाणी को बुलाकर उन्हें जल्द से जल्द अपना उत्तराधिकारी चुनने का फरमान सुनाना पडा। हालांकि इसके लिए कोई समय-सीमा तो नहीं तय की गई है, लेकिन कहा गया है कि अब इस संबंध में और हीला-हवाली बर्दाश्त नहीं की जा सकती। अब यह आडवाणी पर निर्भर है कि इस संबंध में वह अपना निर्णय कब सुनाते हैं। लेकिन, अंदर की खबर यह है कि आडवाणी आसानी से हाथ खडा करने को तैयार नहीं। वह अब भी प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले हुए हैं। उन्हें लगता है कि अगर उत्तराधिकारी की घोषणा हो गई, तो उनके हाथ से यह मौका निकल जाएगा। यही वजह है कि वह ठोंक बजाकर नेता विपक्ष के रूप में पांच साल का कार्यकाल पूरा करने का इरादा जता रहे हैं। संघ के दबाव के बावजूद। इतना ही नहीं वह अपनी लॉबी के लोगों को पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर काबिज करवाकर अपने बचाव के लिए घेराबंदी की कोशिशों में भी जुटे हुए हैं। इसमें संघ आडे आते दिखा, तो उसे पार्टी से दूर रहने की अप्रत्यक्ष चेतावनी भी दे दी गई। विदित है कि भाजपा को संघ के नियंत्रण से आजाद करने के स्वर भी उन्हीं नेताओं ने छेडे हैं, जिन्हें आडवाणी का करीबी माना जाता है। ऐसे नेता नहीं चाहते कि आडवाणी कमजोर पडें। कारण, इससे उनके हित भी प्रभावित होंगे। लिहाजा वे आडवाणी पर भी हथियार न डालने का दबाव बना रहे हैं। पर संघ भाजपा को खुला छोडने को तैयार नहीं। न ही वह इस मामले में अब और इंतजार करने को राजी है। वह हर हाल में इस मुद्दे पर शीघ्रातिशीघ्र अंतिम निर्णय तक पहुंचना चाह रहा है। ऐसी परिस्थिति में हाल तक भाजपा और संघ के बीच चल रहा द्वंद्व अब आडवाणी बनाम संघ में तब्दील हो गया है। संभव है कि आने वाले दिनों में यह लडाई खुलकर भी सामने आए।
हालांकि संघ प्रमुख मोहन भागवत इस मामले का अमर्यादित ढंग से हल निकालने से बचना चाहतेे हैं। वह चाहते हैं कि आडवाणी खुद ही सम्मानजनक ढंग से अपना निर्णय सुना दें। कारण, भागवत के आडवाणी से हमेशा से अच्छे रिश्ते रहे हैं। उनके पिता ही कभी आडवाणी को संघ में लेकर आए थे। लेकिन, संघ के दूसरे नेताओं के दबाव के आगे भागवत भी मजबूर हैं। वह ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकते, जो संघ के प्रतिकूल हो। लिहाजा, उन्हें भी आडवाणी को दो टूक कहना पड रहा है कि वह युवा नेताओं को आगे आने के लिए रास्ता साफ करें। और वह भी जितनी जल्दी हो सके उतनी। वर्ना संघ को मजबूर होकर अपने सिरे से कदम उठाने होंगे। यहां दोनों पक्षों की अपनी-अपनी मजबूरियां हैं। इसी मजबूरी ने संघ और आडवाणी को एक-दूसरे के सामने ला खडा किया है। संघ भाजपा को स्वतंत्र नहीं छोडना चाहता और आडवाणी संघ का दबाव नहीं सहना चाहते। दोनों पक्षों की इसी सोच से तलवारें तनने वाली स्थिति पैदा हुई है। वहीं संघ और आडवाणी के बिच छिडी इस लडाई से भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेताओं के दरम्यान नेतृत्व को लेकर चल रहा घमासान भी फिर से सतह पर आता नजर आने लगा है। आडवाणी का उत्तराधिकारी बनने को लेकर पार्टी के नेताओं में दांव-पेंच तेज हो गए हैं। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह का कार्यकाल दिसंबर में खत्म हो रहा है। इसे देखते हुए आडवाणी समर्थक नेताओं ने इस पद पर भी अपनी नजरें गडा दी हैं। संसद के अहम पदों पर तो आडवाणी समर्थक नेताओं ने पहले से ही कब्जा जमाया हुआ है। अब अध्यक्ष पद की कुर्सी को लेकर भी उन्होंने अपनी चालें चलनी शुरू कर दी हैं। इसने आडवाणी विरोधी नेताओं के कान खडे कर दिए हैं। वे संघ को मोहरा बनाकर जवाबी चालें चल रहेे हैं। सूत्र बताते हैं कि संघ के कई बडे नेता भी चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने खेमे में बंटे भाजपा नेताओं की राजनीति में शामिल हो गए हैं। कोई आडवाणी के हिसाब से दांव चल रहा है, तो कोई राजनाथ के साथ चल रहा है। अपने-अपने पसंद के नेता के लिए सभी बिसात बिछाने में लग गए हैं। संघ बनाम आडवाणी की जंग में अगर आडवाणी खेमा राजनाथ की कुर्सी पर नजरें जमा रहा है, तो राजनाथ घडे की नजर लोकसभा में आडवाणी के पद पर है। इससे भाजपा में नेतृत्व की लडाई के निकट भविष्य में और भडकने की संभावना है।
बताया जाता है कि आडवाणी विरोधी खेमा संघ बनाम आडवाणी की जंग को और हवा देने में लगा है। इसके लिए बाकायदा मीडिया का सहारा भी लिया जा रहा है। ऐसी खबरें छपवाई जा रही हैं, जिससे लगे कि आडवाणी संघ को मुंह चिढाने में लगे हैं। ताकि आडवाणी और संघ के नेताओं में खटास बढे। आडवाणी विरोधी नेताओं को लग रहा है कि यह लडाई जितनी धार पकडेगी, उनके लिए रास्ते उतने ही आसान होंगे। कारण, अंत में वही होगा जो संघ चाहेगा। और संघ फिलहाल आडवाणी की विदाई चाह रहा है। पर्दे के पीछे चल रहे इस खेल से भाजपा में जारी गुटबाजी के और गहराने की आशंकाएं तैरने लगी हैं। राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष के पद से वसुंधरा राजे की विदाई को लेकर जैसा तमाशा हुआ, वह इसी की कडी है। हालांकि अब तक आडवाणी संघ पर भारी ही पडे हैं। भले ही जिन्ना प्रकरण के बाद उन्हें अध्यक्ष की कुर्सी छोडनी पडी, लेकिन खुद को पीएम इन वेटिंग घोषित करवाने में वह कामयाब रहे। इसे आडवाणी खेमे के नेताओं ने अपनी ताकत बतौर मीडिया में प्रचारित करवाया। खबरें आती रहीं कि आडवाणी संघ पर हावी हैं। इससे उनकी लॉबी के नेताओं में उत्साह भी भरता रहा। पर लोकसभा चुनावों के बाद आडवाणी खेमे के नेताओं को लगने लगा है कि उनपर एक सोची समझी साजिश के तहत हमले किए जा रहे हैं। उन्हें कमजोर करने के दृष्टिगत, ताकि पार्टी पर दूसरे घडे के लोग काबिज हो सकें। उत्तराखंड में खंडूरी को मुख्यमंत्री पद से हटाया जाना और अब राजस्थान में विपक्ष की नेता वसुंधरा को हटाने को लेकर हुए तमाशे को इसी साजिश का हिस्सा माना गया। इसने भाजपा में गुटबाजी की राजनीति को नया मोड दे दिया है। आडवाणी भले ही सार्वजनिक तौर पर संघ और अपने विरोधियों की मुहिम की मुखालफत न कर रहे हों, पर खतरे को वह भी भांप रहे हैं। यही वजह है कि अंदर ही अंदर वह अपने दबदबे को बरकरार रखने के प्रति गंभीर हो गए हैं। उनकी इसी गंभीरता से संघ विचलित है।
एक तरफ संघ भाजपा में नई पीढी को आगे बढाने की कवायद कर रहा है, तो वहीं आडवाणी पार्टी को पूरी तरह अपने नियंत्रण में करने की रणनीति पर चल रहे हैं। इससे दोनों के बीच तलवारें खिंचनी स्वाभाविक है। जिस तरह आडवाणी अडे हुए हैं, उससे इस लडाई के और खतरनाक रूप अख्तियार करने की संभावना है। संघ अब हर जगह अपने वफादारों को बिठाना चाह रहा है, चाहे वह प्रदेश इकाई की बात हो चाहे केंद्र में। वहीं आडवाणी के खेमे में अब ज्यादातर वैसे लोग हैं, जिन्हें संघ पसंद नहीं करता। हिंदुत्व के रथ पर सवार होकर राजनीति के अहम मुकाम पर पहुंचे आडवाणी की हिंदुत्व से बढती दूरी भी संघ को रास नहीं आ रही। यही वजह है कि संघ आडवाणी की विदाई कर भाजपा में नए सिरे से ऊर्जा भरने की कोशिश कर रहा है और आडवाणी उदारवादी छवि के सहारे सियासत के अपने आखिरी सपने को पूरा करने की। इसके लिए वह संघ से भी दो-दो हाथ करने से पीछे नहीं रहेंगे। इसका संकेत उन्होंने भागवत से हुई मुलाकात के बाद दिया भी। यह कहते हुए कि प्रतिपक्ष के नेता के तौर पर उनका इरादा पूरे पांच साल तक काम करने का है।
गौरतलब है कि आडवाणी का ऐसा रुख वर्ष 2005 में भी देखने को मिला था, जब पाकिस्तान में उन्होंने जिन्ना की घर्मनिरपेक्ष छवि की प्रशंसा की थी। तब संघ ने उन्हें सीघा संदेश दिया था कि वह अध्यक्ष का पद छोड दें। आडवाणी तब भी आसानी से हार मानने को तैयार नहीं हुए थे। लेकिन, अंतत: 6 महीने बाद संघ के दबाव में उन्हें पद छोडना पडा था। अब संघ ने उन्हें फिर फरमान सुनाया है, नेता प्रतिपक्ष का पद छोडें और अपने उत्तराधिकारी का नाम बताएं। और इस बार भी आडवाणी हार नहीं मानने का संकेत दे रहे हैं। तो क्या, इस बार भी आखिरकार आडवाणी ही हार मानेंगे या फिर बदले हालात में संघ को झुकना पडेगा। फिलहाल दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। हां, लडाई जरूर आर-पार की बनती दिख रही है। अंजाम जो भी हो, रोचक होगा। इंतजार करें।
लौह पुरुष का चिंतन चक्र
लोकसभा चुनावों में हार के बाद से ही आडवाणी पार्टी में अपने विरोधियों के निशाने पर हैं। जून में जब पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होने वाली थी, तब भी आडवाणी विरोधी खेमे के नेताओं ने इसमें हार की समीक्षा करने की मांग की थी। लेकिन, तब असंतोष के उभरे स्वर को यह कह कर शांत कर दिया गया था कि इसपर 21 जुलाई से शिमला में होने वाली चिंतन बैठक में चर्चा होगी। अब जब चिंतन बैठक का वक्त आया, तो आडवाणी चुनावी हार की जगह आगे की रणनीति पर विचार करने की बात कहने लगे। समीक्षा की मांग करने वाले यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी जैसे नेताओं को तो बैठक में बुलाया भी नहीं गया। इसने आडवाणी के खिलाफ पार्टी नेताओं में उबल रहे गुस्से को और भडका दिया है। वे आरोप लगा रहे हैं कि चूंकि लोकसभा चुनाव के लिए रणनीति बनाने का काम आडवाणी और उनके करीबी नेताओं ने किया था, इसलिए वे हार पर चर्चा करने से कतरा रहे हैं। कारण, हार पर चर्चा हुई तो उनकी असफलता उजागर हो जाएगी।
वहीं आडवाणी खेमे के नेताओं का मानना है कि हार पर चर्चा करने से अब कोई फायदा नहीं। उल्टे इससे टकराव ही बढेगा। वे तो चिंतन बैठक की जरूरत पर ही सवाल उठा रहे हैं। यह कहते हुए कि जब देश में स्वाइन फलू और जबरदस्त सूखे की स्थिति पैदा हो रही है और आम चुनाव भी अभी काफी दूर हैं, तो चिंतन बैठक का क्या औचित्य है। लेकिन, संघ ने इस बैठक के लिए एजेंडा तय कर दिया है। इस हिदायत के साथ कि हार पर समीक्षा जरूर हो। यही वजह है कि आडवाणी के विरोधी इस बैठक को लौह पुरुष पर हमला तेज करने का मंच मान रहे हैं। भले ही यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे नेता इसमें हिस्सा नहीं ले रहे, लेकिन मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह और विनय कटियार जैसे लोग आडवाणी की परेशानी बढा सकते हैं। इस चिंतन बैठक में पार्टी उपाध्यक्ष बाल आप्टे हार के कारणों पर रिपोर्ट भी पेश करेंगे। बताया जाता है कि इसमें उन्होंने राष्ट्रीय नेताओं की नाकामी, चुनाव प्रबंधन की गडबडी और शीर्ष पर कलह को प्रमुख वजह बताया है। स्वाभाविक है कि इसकी गाज आडवाणी पर ही गिरेगी।
बताया जाता है कि भाजपा की बीमारी को दूर करने का जो फार्मूला संघ ने खोजा है, उससे न सिर्फ आडवाणी बल्कि उनके करीबियों को भी अपने लिए खतरा महसूस हो रहा है। इसी को देखते हुए वे अब आर-पार को तैयार हो रहे हैं। हालांकि कुछ लोग वक्त की नजाकत और संघ की ताकत के मद्देनजर पाला बदलने पर भी विचार कर रहे हैं। राजनाथ सिंह को भी संघ के इलाज में अपने लिए मुसीबतें नजर आ रही हैं। लेकिन, वह संघभक्ती के सहारे उससे पार पाने की चेष्टा कर रहे हैं।
आज से करीब पांच साल पहले तत्कालीन संघ प्रमुख के.एस.सुदर्शन ने सार्वजनिक तौर पर इस बात की वकालत की थी कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व युवा हाथों को सौंप देना चाहिए। लेकिन, तब नेतृत्व को लेकर दूसरी पंक्ति के नेताओं में सिर-फुटव्वल की स्थिति ने इस कवायद को आगे बढने से रोक दिया। इस मुद्दे पर पार्टी में गुटबाजी के दृष्टिगत भी संघ को लगा कि अगर वह इस मामले में विशेष पहल करेगा, तो स्थिति और विस्फोटक हो सकती है। लिहाजा, सुदर्शन की सोच पर खास कवायद नहीं हो पाई। पर लोकसभा चुनावों में हार के बाद उपजी परिस्थितियों में संघ अब एक बार फिर भाजपा को अटल-आडवाणी युग से निकाल कर नए युग की ओर ले जाने के लिए सक्रिय हो गया है। चूंकि वाजपेयी तो अस्वस्थता का शिकार होकर पहले ही सक्रिय राजनीति से खुद को अलग कर चुके हैं, लिहाजा निशाने पर हैं लौह पुरुष आडवाणी। वही आडवाणी, जो लोकसभा चुनावों से पहले और बाद भी यह एलान कर चुके थे कि भाजपा के हारने पर वह सक्रिय राजनीति को अलविदा कह देंगे। लेकिन, चुनावों में भाजपा की हार के बावजूद न तो उन्होंने राजनीति से संन्यास लिया और न ही कुर्सी का मोह त्याग पाए। अब भी वह लोकसभा में विपक्ष के नेता के पद से चिपके बैठे हैं। यही वजह है कि संघ को उन्हें अब यह कहना पड रहा है कि बहुत हुआ, अब सिंहासन खाली करने की तैयारी करिए। पर लौह पुरुष इस मूड में नहीं दिखाई दे रहे। वह अब भी पार्टी में अपना दबदबा बरकरार रखना चाहते हैं। और साथ ही पीएम इन वेटिंग की तमन्ना भी। उनकी इस अदा ने संघ को कुपित कर दिया है।
पिछले दिनों दिल्ली आए संघ प्रमुख मोहन भागवत को बाकायदा आडवाणी को बुलाकर उन्हें जल्द से जल्द अपना उत्तराधिकारी चुनने का फरमान सुनाना पडा। हालांकि इसके लिए कोई समय-सीमा तो नहीं तय की गई है, लेकिन कहा गया है कि अब इस संबंध में और हीला-हवाली बर्दाश्त नहीं की जा सकती। अब यह आडवाणी पर निर्भर है कि इस संबंध में वह अपना निर्णय कब सुनाते हैं। लेकिन, अंदर की खबर यह है कि आडवाणी आसानी से हाथ खडा करने को तैयार नहीं। वह अब भी प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले हुए हैं। उन्हें लगता है कि अगर उत्तराधिकारी की घोषणा हो गई, तो उनके हाथ से यह मौका निकल जाएगा। यही वजह है कि वह ठोंक बजाकर नेता विपक्ष के रूप में पांच साल का कार्यकाल पूरा करने का इरादा जता रहे हैं। संघ के दबाव के बावजूद। इतना ही नहीं वह अपनी लॉबी के लोगों को पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर काबिज करवाकर अपने बचाव के लिए घेराबंदी की कोशिशों में भी जुटे हुए हैं। इसमें संघ आडे आते दिखा, तो उसे पार्टी से दूर रहने की अप्रत्यक्ष चेतावनी भी दे दी गई। विदित है कि भाजपा को संघ के नियंत्रण से आजाद करने के स्वर भी उन्हीं नेताओं ने छेडे हैं, जिन्हें आडवाणी का करीबी माना जाता है। ऐसे नेता नहीं चाहते कि आडवाणी कमजोर पडें। कारण, इससे उनके हित भी प्रभावित होंगे। लिहाजा वे आडवाणी पर भी हथियार न डालने का दबाव बना रहे हैं। पर संघ भाजपा को खुला छोडने को तैयार नहीं। न ही वह इस मामले में अब और इंतजार करने को राजी है। वह हर हाल में इस मुद्दे पर शीघ्रातिशीघ्र अंतिम निर्णय तक पहुंचना चाह रहा है। ऐसी परिस्थिति में हाल तक भाजपा और संघ के बीच चल रहा द्वंद्व अब आडवाणी बनाम संघ में तब्दील हो गया है। संभव है कि आने वाले दिनों में यह लडाई खुलकर भी सामने आए।
हालांकि संघ प्रमुख मोहन भागवत इस मामले का अमर्यादित ढंग से हल निकालने से बचना चाहतेे हैं। वह चाहते हैं कि आडवाणी खुद ही सम्मानजनक ढंग से अपना निर्णय सुना दें। कारण, भागवत के आडवाणी से हमेशा से अच्छे रिश्ते रहे हैं। उनके पिता ही कभी आडवाणी को संघ में लेकर आए थे। लेकिन, संघ के दूसरे नेताओं के दबाव के आगे भागवत भी मजबूर हैं। वह ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकते, जो संघ के प्रतिकूल हो। लिहाजा, उन्हें भी आडवाणी को दो टूक कहना पड रहा है कि वह युवा नेताओं को आगे आने के लिए रास्ता साफ करें। और वह भी जितनी जल्दी हो सके उतनी। वर्ना संघ को मजबूर होकर अपने सिरे से कदम उठाने होंगे। यहां दोनों पक्षों की अपनी-अपनी मजबूरियां हैं। इसी मजबूरी ने संघ और आडवाणी को एक-दूसरे के सामने ला खडा किया है। संघ भाजपा को स्वतंत्र नहीं छोडना चाहता और आडवाणी संघ का दबाव नहीं सहना चाहते। दोनों पक्षों की इसी सोच से तलवारें तनने वाली स्थिति पैदा हुई है। वहीं संघ और आडवाणी के बिच छिडी इस लडाई से भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेताओं के दरम्यान नेतृत्व को लेकर चल रहा घमासान भी फिर से सतह पर आता नजर आने लगा है। आडवाणी का उत्तराधिकारी बनने को लेकर पार्टी के नेताओं में दांव-पेंच तेज हो गए हैं। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह का कार्यकाल दिसंबर में खत्म हो रहा है। इसे देखते हुए आडवाणी समर्थक नेताओं ने इस पद पर भी अपनी नजरें गडा दी हैं। संसद के अहम पदों पर तो आडवाणी समर्थक नेताओं ने पहले से ही कब्जा जमाया हुआ है। अब अध्यक्ष पद की कुर्सी को लेकर भी उन्होंने अपनी चालें चलनी शुरू कर दी हैं। इसने आडवाणी विरोधी नेताओं के कान खडे कर दिए हैं। वे संघ को मोहरा बनाकर जवाबी चालें चल रहेे हैं। सूत्र बताते हैं कि संघ के कई बडे नेता भी चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने खेमे में बंटे भाजपा नेताओं की राजनीति में शामिल हो गए हैं। कोई आडवाणी के हिसाब से दांव चल रहा है, तो कोई राजनाथ के साथ चल रहा है। अपने-अपने पसंद के नेता के लिए सभी बिसात बिछाने में लग गए हैं। संघ बनाम आडवाणी की जंग में अगर आडवाणी खेमा राजनाथ की कुर्सी पर नजरें जमा रहा है, तो राजनाथ घडे की नजर लोकसभा में आडवाणी के पद पर है। इससे भाजपा में नेतृत्व की लडाई के निकट भविष्य में और भडकने की संभावना है।
बताया जाता है कि आडवाणी विरोधी खेमा संघ बनाम आडवाणी की जंग को और हवा देने में लगा है। इसके लिए बाकायदा मीडिया का सहारा भी लिया जा रहा है। ऐसी खबरें छपवाई जा रही हैं, जिससे लगे कि आडवाणी संघ को मुंह चिढाने में लगे हैं। ताकि आडवाणी और संघ के नेताओं में खटास बढे। आडवाणी विरोधी नेताओं को लग रहा है कि यह लडाई जितनी धार पकडेगी, उनके लिए रास्ते उतने ही आसान होंगे। कारण, अंत में वही होगा जो संघ चाहेगा। और संघ फिलहाल आडवाणी की विदाई चाह रहा है। पर्दे के पीछे चल रहे इस खेल से भाजपा में जारी गुटबाजी के और गहराने की आशंकाएं तैरने लगी हैं। राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष के पद से वसुंधरा राजे की विदाई को लेकर जैसा तमाशा हुआ, वह इसी की कडी है। हालांकि अब तक आडवाणी संघ पर भारी ही पडे हैं। भले ही जिन्ना प्रकरण के बाद उन्हें अध्यक्ष की कुर्सी छोडनी पडी, लेकिन खुद को पीएम इन वेटिंग घोषित करवाने में वह कामयाब रहे। इसे आडवाणी खेमे के नेताओं ने अपनी ताकत बतौर मीडिया में प्रचारित करवाया। खबरें आती रहीं कि आडवाणी संघ पर हावी हैं। इससे उनकी लॉबी के नेताओं में उत्साह भी भरता रहा। पर लोकसभा चुनावों के बाद आडवाणी खेमे के नेताओं को लगने लगा है कि उनपर एक सोची समझी साजिश के तहत हमले किए जा रहे हैं। उन्हें कमजोर करने के दृष्टिगत, ताकि पार्टी पर दूसरे घडे के लोग काबिज हो सकें। उत्तराखंड में खंडूरी को मुख्यमंत्री पद से हटाया जाना और अब राजस्थान में विपक्ष की नेता वसुंधरा को हटाने को लेकर हुए तमाशे को इसी साजिश का हिस्सा माना गया। इसने भाजपा में गुटबाजी की राजनीति को नया मोड दे दिया है। आडवाणी भले ही सार्वजनिक तौर पर संघ और अपने विरोधियों की मुहिम की मुखालफत न कर रहे हों, पर खतरे को वह भी भांप रहे हैं। यही वजह है कि अंदर ही अंदर वह अपने दबदबे को बरकरार रखने के प्रति गंभीर हो गए हैं। उनकी इसी गंभीरता से संघ विचलित है।
एक तरफ संघ भाजपा में नई पीढी को आगे बढाने की कवायद कर रहा है, तो वहीं आडवाणी पार्टी को पूरी तरह अपने नियंत्रण में करने की रणनीति पर चल रहे हैं। इससे दोनों के बीच तलवारें खिंचनी स्वाभाविक है। जिस तरह आडवाणी अडे हुए हैं, उससे इस लडाई के और खतरनाक रूप अख्तियार करने की संभावना है। संघ अब हर जगह अपने वफादारों को बिठाना चाह रहा है, चाहे वह प्रदेश इकाई की बात हो चाहे केंद्र में। वहीं आडवाणी के खेमे में अब ज्यादातर वैसे लोग हैं, जिन्हें संघ पसंद नहीं करता। हिंदुत्व के रथ पर सवार होकर राजनीति के अहम मुकाम पर पहुंचे आडवाणी की हिंदुत्व से बढती दूरी भी संघ को रास नहीं आ रही। यही वजह है कि संघ आडवाणी की विदाई कर भाजपा में नए सिरे से ऊर्जा भरने की कोशिश कर रहा है और आडवाणी उदारवादी छवि के सहारे सियासत के अपने आखिरी सपने को पूरा करने की। इसके लिए वह संघ से भी दो-दो हाथ करने से पीछे नहीं रहेंगे। इसका संकेत उन्होंने भागवत से हुई मुलाकात के बाद दिया भी। यह कहते हुए कि प्रतिपक्ष के नेता के तौर पर उनका इरादा पूरे पांच साल तक काम करने का है।
गौरतलब है कि आडवाणी का ऐसा रुख वर्ष 2005 में भी देखने को मिला था, जब पाकिस्तान में उन्होंने जिन्ना की घर्मनिरपेक्ष छवि की प्रशंसा की थी। तब संघ ने उन्हें सीघा संदेश दिया था कि वह अध्यक्ष का पद छोड दें। आडवाणी तब भी आसानी से हार मानने को तैयार नहीं हुए थे। लेकिन, अंतत: 6 महीने बाद संघ के दबाव में उन्हें पद छोडना पडा था। अब संघ ने उन्हें फिर फरमान सुनाया है, नेता प्रतिपक्ष का पद छोडें और अपने उत्तराधिकारी का नाम बताएं। और इस बार भी आडवाणी हार नहीं मानने का संकेत दे रहे हैं। तो क्या, इस बार भी आखिरकार आडवाणी ही हार मानेंगे या फिर बदले हालात में संघ को झुकना पडेगा। फिलहाल दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। हां, लडाई जरूर आर-पार की बनती दिख रही है। अंजाम जो भी हो, रोचक होगा। इंतजार करें।
लौह पुरुष का चिंतन चक्र
लोकसभा चुनावों में हार के बाद से ही आडवाणी पार्टी में अपने विरोधियों के निशाने पर हैं। जून में जब पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होने वाली थी, तब भी आडवाणी विरोधी खेमे के नेताओं ने इसमें हार की समीक्षा करने की मांग की थी। लेकिन, तब असंतोष के उभरे स्वर को यह कह कर शांत कर दिया गया था कि इसपर 21 जुलाई से शिमला में होने वाली चिंतन बैठक में चर्चा होगी। अब जब चिंतन बैठक का वक्त आया, तो आडवाणी चुनावी हार की जगह आगे की रणनीति पर विचार करने की बात कहने लगे। समीक्षा की मांग करने वाले यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी जैसे नेताओं को तो बैठक में बुलाया भी नहीं गया। इसने आडवाणी के खिलाफ पार्टी नेताओं में उबल रहे गुस्से को और भडका दिया है। वे आरोप लगा रहे हैं कि चूंकि लोकसभा चुनाव के लिए रणनीति बनाने का काम आडवाणी और उनके करीबी नेताओं ने किया था, इसलिए वे हार पर चर्चा करने से कतरा रहे हैं। कारण, हार पर चर्चा हुई तो उनकी असफलता उजागर हो जाएगी।
वहीं आडवाणी खेमे के नेताओं का मानना है कि हार पर चर्चा करने से अब कोई फायदा नहीं। उल्टे इससे टकराव ही बढेगा। वे तो चिंतन बैठक की जरूरत पर ही सवाल उठा रहे हैं। यह कहते हुए कि जब देश में स्वाइन फलू और जबरदस्त सूखे की स्थिति पैदा हो रही है और आम चुनाव भी अभी काफी दूर हैं, तो चिंतन बैठक का क्या औचित्य है। लेकिन, संघ ने इस बैठक के लिए एजेंडा तय कर दिया है। इस हिदायत के साथ कि हार पर समीक्षा जरूर हो। यही वजह है कि आडवाणी के विरोधी इस बैठक को लौह पुरुष पर हमला तेज करने का मंच मान रहे हैं। भले ही यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे नेता इसमें हिस्सा नहीं ले रहे, लेकिन मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह और विनय कटियार जैसे लोग आडवाणी की परेशानी बढा सकते हैं। इस चिंतन बैठक में पार्टी उपाध्यक्ष बाल आप्टे हार के कारणों पर रिपोर्ट भी पेश करेंगे। बताया जाता है कि इसमें उन्होंने राष्ट्रीय नेताओं की नाकामी, चुनाव प्रबंधन की गडबडी और शीर्ष पर कलह को प्रमुख वजह बताया है। स्वाभाविक है कि इसकी गाज आडवाणी पर ही गिरेगी।
बताया जाता है कि भाजपा की बीमारी को दूर करने का जो फार्मूला संघ ने खोजा है, उससे न सिर्फ आडवाणी बल्कि उनके करीबियों को भी अपने लिए खतरा महसूस हो रहा है। इसी को देखते हुए वे अब आर-पार को तैयार हो रहे हैं। हालांकि कुछ लोग वक्त की नजाकत और संघ की ताकत के मद्देनजर पाला बदलने पर भी विचार कर रहे हैं। राजनाथ सिंह को भी संघ के इलाज में अपने लिए मुसीबतें नजर आ रही हैं। लेकिन, वह संघभक्ती के सहारे उससे पार पाने की चेष्टा कर रहे हैं।
इस दवा से दुआ भली
जिंदगी देने वाली दवाइयों के नाम पर बेची जा रही है मौत। पूरे देशभर में दवा माफिया धडल्ले से कर रहे हैं नकली दवाओं का धंधा। सालाना अरबों रुपए का है मौत के सौदागरों का यह कारोबार। पर प्रशासन व सरकारें इस पर अंकुश लगाने में हैं नाकाम। आखिर क्यों फल-फूल रहा है यह काला धंधा, कौन दे रहा है इस घिनौने कारोबार को शह और कैसे चल रहा है पूरा खेल, सनसनीखेज पडताल।
बुलंदशहर के राकेश शर्मा को शरीर में कैल्सियम की कमी की शिकायत थी। इसकी वजह से उसे कई तरह की परेशानियां हो रही थीं। उसने दिल्ली के जयप्रकाश नारायण अस्पताल में डॉक्टरों को दिखाया, तो उन्होंने परीक्षण के बाद उसे कुछ दवाइयां लिख दीं और इसे पाबंदी के साथ खाने की हिदायत दी। राकेश ने दिल्ली के ही एक बाजार से दवाई खरीदी और उसका नियमित सेवन करने लगा। लेकिन, ठीक होने की बजाए उसकी हालत और खराब होने लगी। उल्टे उसे कुछ नई बीमारियों ने जकड लिया। जब दोबारा डॉक्टरों ने उसकी और खाई जा रही दवाइयों की जांच की, तो पाया कि वे सब की सब नकली हैं। उन्हीं की वजह से राकेश की बीमारी और ज्यादा गंभीर हो गई थी। दरअसल, देश के बाजारों में जीवनरक्षक दवाओं के नाम पर जो मौत बांटी जा रही है, यह घटना उसका महज एक उदाकरण है। ऐसे न जाने कितने लोग जिंदगी देने वाली दवाइयों के नाम पर बाजार में बिक रही नकली दवाइयां खा कर असमय मौत के गाल में समा रहे हैं। जी हां, सुनने में आपको यह अटपटा जरूर लगेगा। पर यह सौ फीसद सच है। एक कडवा सच। आंखें खोल देने वाला सच।
बताया जाता है कि भारत के बाजारों में बिक रही दवाओं में करीब 40 प्रतिशत दवाएं नकली व घटिया हैं। लाखों-करोडों लोग हर रोज ऐसी ही दवाइयों का सेवन कर रहे हैं। यह सोचकर कि इसे खाकर वे तंदुरुस्त बनेंगे। पर हकीकत यह है कि इन नकली और घटिया दवाइयों को खाकर वे और बीमार हो रहे हैं। यानी एक रोग के उपचार के बदले दूसरे रोग को न्योता। इस बात की पुष्टि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी की है। केंद्र सरकार को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में उसने दावा किया है कि देश में नकली व मिलावटी दवाओं का कारोबार कुल दवाओं के कारोबार का करीब 35 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इतना ही नहीं, कानून प्रवर्तन एजेंसियों की खामियां, जांच प्रयोगशालाओं की कमी व राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण नकली दवाओं का धंधा सालाना 25 प्रतिशत की दर से बढता ही जा रहा है। मौत के सौदागरों ने अपना जाल देश के लगभग सभी महत्वपूर्ण राज्यों में फैला लिया है। यही वजह है कि नकली दवाओं का कारोबार सालाना 7 हजार करोड रुपए को पार कर चुका है। दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान, प. बंगाल, महाराष्ट्र, झारखंड जैसे राज्यों को तो इसने पूरी तरह अपनी चपेट में ले ही लिया है, नए इलाकों में भी यह लगातार फैलता जा रहा है। हैरत तो यह है कि केंद्र सरकार भी यह स्वीकार कर रही है कि बाजार में नकली दवाएं बिक रही हैं। लेकिन, इस दिशा में विशेष कदम नहीं उठाए जा रहे।
शुक्रवार ने जब इस काले धंधे की तह में जाने की कोशिश की, तो पता चला कि सारा खेल बडे ही सुनियोजित और संगठित तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। इसमें दवा माफियाओं के साथ सरकारी तंत्र और राजनेताओं की भी संलिप्तता है। देश की राजधानी दिल्ली नकली दवा के कारोबार के कॉकस का केंद्र है। यहां से इसका नेटवर्क देश के अन्य राज्यों के साथ-साथ विदेशों तक फैला हुआ है। यही वजह है कि अक्सर विदेशों में नकली दवाओं की खेप के पकडे जाने पर भारत का नाम उछलता है। लेकिन बावजूद इसके इस नेटवर्क को ध्वस्त करने की खास कोशिश न तो सरकारी स्तर पर हो रही है और न ही प्रशासनिक स्तर पर। हालांकि इस मुद्दे पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद का कहना है कि नकली दवाओं के कारोबार से जुडे लोगों पर नकेल कसने के लिए जल्दी ही एक कडा कानून लाया जा रहा है। इसके तहत नकलीी दवा के धंधे से जुडे मामलों की शीघ्र सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन के साथ-साथ दोषियों को उम्रकैद की सजा का प्रावधान किया गया है। साथ ही खुफिया तंत्र को भी मजबूत किया जा रहा है। इस कारोबार की सूचना देने वाले मुखबिरों को भी पुरस्कृत करने की योजना है, ताकि इस काले धंधे पर अंकुश लगाने की दिशा में कोई कमी न रहे। सरकार ड्रग्स और कॉस्मेटिक्स कानून 1940 को और कडा बनाने की कवायद भी कर रही है।
लेकिन, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन से जुडे अधिकारियों को सरकार की इस पहल को लेकर अभी भी शंका है। कारण, पहले भी इस कारोबार पर शिकंजा कसने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ।
वर्ष 2003 में भी एनडीए के शासनकाल में नकली दवाओं के कारोबार पर रोक लगाने की पहल की गई थी। आरए माशेलकर समिति का गठन कर। इसने मौत का कारोबार करने वालों को मौत की सजा की सिफारिश की थी। लेकिन, यह प्रस्ताव संसद में पास नहीं हो पाया। कहा जाता है कि तब इसके खिलाफ कई दवा कंपनियां और राजनेता ही खडे हो गए थे। वैसे नकली दवाओं के खेल में कई दवा कंपनियों, राजनेताओं, संबंधित सरकारी विभागों के लोगों और पुलिस प्रशासन पर अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि वे मोटी कमाई के चलते इस नेटवर्क को तोडने की जहमत नहीं करते। कार्रवाई के नाम पर महज खानापूर्ति होती है। कहने को तो नकली दवाओं पर नकेल कसने के लिए केंद्र सरकार में एक ड्रग कंट्रोलर विभाग और राज्य स्तर पर ड्रग्स कंट्रोलर व ड्रग्स निरीक्षक होते हैं, लेकिन ये भी इस धंधे से काली कमाई में ही जुटे हैं। लिहाजा यह मर्ज बढता ही जा रहा है।
दिल्ली से सटे गाजियाबाद, मेरठ, फरीदाबाद, नोएडा, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में ही नकली दवाओं की कई छोटी-छोटी इकाइयां काम कर रही हैं। जहां बडी कंपनियों के लेबल लगाकर नकली व घटिया दवाएं बनाई जाती हैं। इसे बडे ही सुव्यवस्थित तरीके से देश के बाजारों में बेचने के लिए उतार दिया जाता है। चूंकि बडी कंपनियों की दवाओं और छोटी कंपनियों की दवा की कीमतों में 300 से 400 फीसदी तक का अंतर होता है। ऐसे में दवाओं के डिस्ट्रीब्युटर छोटी कंपनियों की दवाईयों पर बडी कंपनियों का लेबल लगा माल ले लेते हैं और उसे खुदरा विक्रेताओं के माध्यम से ग्राहकों को असली कंपनी के रेट पर बेचते हैं। इस धंधे में औषधि निरीक्षक से लेकर डिस्ट्रब्युटर और रिटेलर से लेकर एजेंट तक शामिल होते हैं। इसमें हर किसी का अपना-अपना मुनाफा तय होता है। गौरतलब है कि दवाओं के निर्माण में भारत का दुनिया में 10 वां स्थान है। लेकिन, नकली दवाओं के निर्माण में यह सबसे ऊंचे पायदान पर पहुंच चुका है।
जानकार कहते हैं कि दरअसल देश में दवाओं की कंपनियों को लाइसेंस देने की प्रक्रिया बहेद लचीली है। जबकि उनकी जांच के संसाधन बहुत थोडे। इस वजह से भी नकली दवाओं के कारोबार पर अंकुश लगाने में नाकामी हाथ लग रही है। गौरतलब है कि इस वक्त दवाओं की जांच के लिए पूरे देश में मात्र 37 सरकारी प्रयोगशालाएं हैं। उनमें से भी महज 7 इस समय काम कर रही हैं। ठीक उसी प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर केवल 35 औषधि निरीक्षक हैं, जबकि प्रदेशों में कुल 1000 निरीक्षक। इस तथ्य के बावजूद कि देशभर में खुदरा दवाइयां बेचने की दुकानें 6 लाख से ज्यादा हैं और आबादी एक अरब से अधिक। दिल्ली में ही दवा बनाने की छोटी-बडी 139 फैक्ट्रियां और लगभग 10 हजार दवा की दुकानें हैं। लेकिन ड्रग कंट्रोला विभाग के पास सिर्फ 28 निरीक्षक और दो सदस्यीय एक इंटेलिजेंस टीम है। ऐसे में दवा कंपनियों के नमूनों की जांच कैसे होती होगी, आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। जांच के नाम पर महज खानापूर्ति होती है। सारी प्रक्रियाएं कागजों पर होती हैं। इससे दवाओं की गुणवत्ता क्या होती होगी, समझा जा सकता है। ड्रग्स कंट्रोलर व निरीक्षकों के काम करने के तरीके से भी लोग अच्छी तरह वाकिफ हैं। हैरत की बात तो यह है कि दवाओं की असली फैक्ट्री में ही नकली दवाएं बनाई जा रही हैं। दवा निर्ताता कंपनी के रूप में पंजीकृत छोटी कंपनियां बडी कंपनियों का लेबल लगाकर अपने घटिया माल बाजार में उतार रही हैं। उन्हें किसी बात का भी खौफ नहीं। इन दवाइयों की पेकेजिंग भी ऐसेकी जाती है कि देखकर कोई भी इसे नकली नहीं बता सकता। यहां तक कि डॉक्टर भी इसमें धोखा खा जाते हैं। कारण, ये देखने में बिल्कुल असली दवाइयों जैसे होते हैं। फर्क होता है, तो सिर्फ कच्चे माल में। इस तरीके से बनी दवाइयां मर्ज तो ठीक नहीं करतीं, उल्टे रोगी को और बीमार बना डालती है। इन दवाइयों से मोत की खबर भी अक्सर आती रहती है।
नकली दवाओं के कारोबार में बेहिसाब काली कमाई का ही नतीजा है कि दिल्ली और पंजाब के कई बडे दवाई डिस्ट्रीब्युटरों ने अब अपनी खुद की इकाइयां लगा ली हैं। दिल्ली से लगे बहादुरगढ और पंजाब के कई कस्बों में इन लोगों की फैक्ट्रियां चल रही हैं, जहां नामचीन कंपनियों के ब्रांडों को बनाया जा रहा है। भारत न सिर्फ नकली दवाओं के एक बडे उत्पादक देश के रूप में बदनाम हो रहा है, बल्कि ऐसी दवाओं को खपाने का बडा अड्डा भी बनता जा रहा है। यही वजह है कि चीन, नेपाल और बर्मा से भी बडी संख्या में नकली दवाएं भारत आ रही हैं। इन्हें प्राइवेट नर्सिंगहोम और निजी अस्पतालों के जरिए खपाया जा रहा है। इस धंधे में सरकारी अधिकारियों के लिप्त होने की बात तो पता चली ही है, साथ ही बडी कंपनियों में कार्यरत लोग भी पैसों के लालच में लोगों के जीवन से खिलवाड कर रहे हैं। दिल्ली के भगीरथ पैलेस को राजधानी का सबसे बडा दवा बाजार कहा जाता है। इस बाजार में देश की नामी कंपनियों के डीलर तो हैं ही, साथ ही नकली दवाईयां बेचने वाले कारोबारी भी बडी संख्या में हैं। दवाइयों की इस मंडी में रोज करोडों रुपयों का कारोबार होता है, जिसमें से पचास फीसदी नकली या डुप्लीकेट दवाईयों की सप्लाई से जुडा होता है। भगीरथ पैलेस से जुडे एक कारोबारी का कहना है कि अब हमने अपने ग्राहकों को हर दवाई पर साइन करके देना शुरू कर दिया है। अगर ग्राहक को लगे कि वह नकली है, तो वह जांच करवा सकता है। लेकिन, महज इतने भर से इस काले कारोबार को फलने-फूलने से नहीं रोका जा सकता। देश में नकली दवाओं का नासूर कडे कानून से ही रोका जा सकता है, वरना मौत के सौदागर लोगों के जीवन से इसी तरह की खिलवाड करते रहेंगे। और जिंदगी के नाम पर बांटी जाती रहेगी मौत।
जरूरी है सावधानी
दवाईयां अपने किसी विश्वसनीय कैमिस्ट से ही खरीदें और उसकी रसीद जरूर लें। संभव हो तो विक्रता से दवाई के रैपर पर हस्ताक्षर करवा लें। अगर दवाई से फायदा न हो, तो उसे डॉक्टर को जरूर दिखाएं। दवा के नकली होने के संदेह की स्थिति में औषधि नियंत्रक से इसकी शिकायत कर सकते हैं। अगर आपके रिहायश के स्थान पर जांच प्रयोगशाला हो, तो आप वहां भी दवाई की शुद्घता की जांच करा सकते हैं। नकली साबित होने पर पुलिस में शिकायत कर सकते हैं। खासकर क्रोसिन, वोवेरनएसआर-100, स्लो डिक्लोफेनिक, बीटाडीन, एसबीएस की पीसी-200, सिपला की एमटी पिल, फाइजर की वियाग्रा, इनवास की ओमेज, मैथरजिन, कैल्सियम की गोलियां या इंजेक्शन, एनालजेसिक टैबलेट, एंटासिड और कोसाविल सिरप खरीदते वक्त विशेष सावधानी बरतें।
बुलंदशहर के राकेश शर्मा को शरीर में कैल्सियम की कमी की शिकायत थी। इसकी वजह से उसे कई तरह की परेशानियां हो रही थीं। उसने दिल्ली के जयप्रकाश नारायण अस्पताल में डॉक्टरों को दिखाया, तो उन्होंने परीक्षण के बाद उसे कुछ दवाइयां लिख दीं और इसे पाबंदी के साथ खाने की हिदायत दी। राकेश ने दिल्ली के ही एक बाजार से दवाई खरीदी और उसका नियमित सेवन करने लगा। लेकिन, ठीक होने की बजाए उसकी हालत और खराब होने लगी। उल्टे उसे कुछ नई बीमारियों ने जकड लिया। जब दोबारा डॉक्टरों ने उसकी और खाई जा रही दवाइयों की जांच की, तो पाया कि वे सब की सब नकली हैं। उन्हीं की वजह से राकेश की बीमारी और ज्यादा गंभीर हो गई थी। दरअसल, देश के बाजारों में जीवनरक्षक दवाओं के नाम पर जो मौत बांटी जा रही है, यह घटना उसका महज एक उदाकरण है। ऐसे न जाने कितने लोग जिंदगी देने वाली दवाइयों के नाम पर बाजार में बिक रही नकली दवाइयां खा कर असमय मौत के गाल में समा रहे हैं। जी हां, सुनने में आपको यह अटपटा जरूर लगेगा। पर यह सौ फीसद सच है। एक कडवा सच। आंखें खोल देने वाला सच।
बताया जाता है कि भारत के बाजारों में बिक रही दवाओं में करीब 40 प्रतिशत दवाएं नकली व घटिया हैं। लाखों-करोडों लोग हर रोज ऐसी ही दवाइयों का सेवन कर रहे हैं। यह सोचकर कि इसे खाकर वे तंदुरुस्त बनेंगे। पर हकीकत यह है कि इन नकली और घटिया दवाइयों को खाकर वे और बीमार हो रहे हैं। यानी एक रोग के उपचार के बदले दूसरे रोग को न्योता। इस बात की पुष्टि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी की है। केंद्र सरकार को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में उसने दावा किया है कि देश में नकली व मिलावटी दवाओं का कारोबार कुल दवाओं के कारोबार का करीब 35 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इतना ही नहीं, कानून प्रवर्तन एजेंसियों की खामियां, जांच प्रयोगशालाओं की कमी व राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण नकली दवाओं का धंधा सालाना 25 प्रतिशत की दर से बढता ही जा रहा है। मौत के सौदागरों ने अपना जाल देश के लगभग सभी महत्वपूर्ण राज्यों में फैला लिया है। यही वजह है कि नकली दवाओं का कारोबार सालाना 7 हजार करोड रुपए को पार कर चुका है। दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान, प. बंगाल, महाराष्ट्र, झारखंड जैसे राज्यों को तो इसने पूरी तरह अपनी चपेट में ले ही लिया है, नए इलाकों में भी यह लगातार फैलता जा रहा है। हैरत तो यह है कि केंद्र सरकार भी यह स्वीकार कर रही है कि बाजार में नकली दवाएं बिक रही हैं। लेकिन, इस दिशा में विशेष कदम नहीं उठाए जा रहे।
शुक्रवार ने जब इस काले धंधे की तह में जाने की कोशिश की, तो पता चला कि सारा खेल बडे ही सुनियोजित और संगठित तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। इसमें दवा माफियाओं के साथ सरकारी तंत्र और राजनेताओं की भी संलिप्तता है। देश की राजधानी दिल्ली नकली दवा के कारोबार के कॉकस का केंद्र है। यहां से इसका नेटवर्क देश के अन्य राज्यों के साथ-साथ विदेशों तक फैला हुआ है। यही वजह है कि अक्सर विदेशों में नकली दवाओं की खेप के पकडे जाने पर भारत का नाम उछलता है। लेकिन बावजूद इसके इस नेटवर्क को ध्वस्त करने की खास कोशिश न तो सरकारी स्तर पर हो रही है और न ही प्रशासनिक स्तर पर। हालांकि इस मुद्दे पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद का कहना है कि नकली दवाओं के कारोबार से जुडे लोगों पर नकेल कसने के लिए जल्दी ही एक कडा कानून लाया जा रहा है। इसके तहत नकलीी दवा के धंधे से जुडे मामलों की शीघ्र सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन के साथ-साथ दोषियों को उम्रकैद की सजा का प्रावधान किया गया है। साथ ही खुफिया तंत्र को भी मजबूत किया जा रहा है। इस कारोबार की सूचना देने वाले मुखबिरों को भी पुरस्कृत करने की योजना है, ताकि इस काले धंधे पर अंकुश लगाने की दिशा में कोई कमी न रहे। सरकार ड्रग्स और कॉस्मेटिक्स कानून 1940 को और कडा बनाने की कवायद भी कर रही है।
लेकिन, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन से जुडे अधिकारियों को सरकार की इस पहल को लेकर अभी भी शंका है। कारण, पहले भी इस कारोबार पर शिकंजा कसने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ।
वर्ष 2003 में भी एनडीए के शासनकाल में नकली दवाओं के कारोबार पर रोक लगाने की पहल की गई थी। आरए माशेलकर समिति का गठन कर। इसने मौत का कारोबार करने वालों को मौत की सजा की सिफारिश की थी। लेकिन, यह प्रस्ताव संसद में पास नहीं हो पाया। कहा जाता है कि तब इसके खिलाफ कई दवा कंपनियां और राजनेता ही खडे हो गए थे। वैसे नकली दवाओं के खेल में कई दवा कंपनियों, राजनेताओं, संबंधित सरकारी विभागों के लोगों और पुलिस प्रशासन पर अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि वे मोटी कमाई के चलते इस नेटवर्क को तोडने की जहमत नहीं करते। कार्रवाई के नाम पर महज खानापूर्ति होती है। कहने को तो नकली दवाओं पर नकेल कसने के लिए केंद्र सरकार में एक ड्रग कंट्रोलर विभाग और राज्य स्तर पर ड्रग्स कंट्रोलर व ड्रग्स निरीक्षक होते हैं, लेकिन ये भी इस धंधे से काली कमाई में ही जुटे हैं। लिहाजा यह मर्ज बढता ही जा रहा है।
दिल्ली से सटे गाजियाबाद, मेरठ, फरीदाबाद, नोएडा, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में ही नकली दवाओं की कई छोटी-छोटी इकाइयां काम कर रही हैं। जहां बडी कंपनियों के लेबल लगाकर नकली व घटिया दवाएं बनाई जाती हैं। इसे बडे ही सुव्यवस्थित तरीके से देश के बाजारों में बेचने के लिए उतार दिया जाता है। चूंकि बडी कंपनियों की दवाओं और छोटी कंपनियों की दवा की कीमतों में 300 से 400 फीसदी तक का अंतर होता है। ऐसे में दवाओं के डिस्ट्रीब्युटर छोटी कंपनियों की दवाईयों पर बडी कंपनियों का लेबल लगा माल ले लेते हैं और उसे खुदरा विक्रेताओं के माध्यम से ग्राहकों को असली कंपनी के रेट पर बेचते हैं। इस धंधे में औषधि निरीक्षक से लेकर डिस्ट्रब्युटर और रिटेलर से लेकर एजेंट तक शामिल होते हैं। इसमें हर किसी का अपना-अपना मुनाफा तय होता है। गौरतलब है कि दवाओं के निर्माण में भारत का दुनिया में 10 वां स्थान है। लेकिन, नकली दवाओं के निर्माण में यह सबसे ऊंचे पायदान पर पहुंच चुका है।
जानकार कहते हैं कि दरअसल देश में दवाओं की कंपनियों को लाइसेंस देने की प्रक्रिया बहेद लचीली है। जबकि उनकी जांच के संसाधन बहुत थोडे। इस वजह से भी नकली दवाओं के कारोबार पर अंकुश लगाने में नाकामी हाथ लग रही है। गौरतलब है कि इस वक्त दवाओं की जांच के लिए पूरे देश में मात्र 37 सरकारी प्रयोगशालाएं हैं। उनमें से भी महज 7 इस समय काम कर रही हैं। ठीक उसी प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर केवल 35 औषधि निरीक्षक हैं, जबकि प्रदेशों में कुल 1000 निरीक्षक। इस तथ्य के बावजूद कि देशभर में खुदरा दवाइयां बेचने की दुकानें 6 लाख से ज्यादा हैं और आबादी एक अरब से अधिक। दिल्ली में ही दवा बनाने की छोटी-बडी 139 फैक्ट्रियां और लगभग 10 हजार दवा की दुकानें हैं। लेकिन ड्रग कंट्रोला विभाग के पास सिर्फ 28 निरीक्षक और दो सदस्यीय एक इंटेलिजेंस टीम है। ऐसे में दवा कंपनियों के नमूनों की जांच कैसे होती होगी, आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। जांच के नाम पर महज खानापूर्ति होती है। सारी प्रक्रियाएं कागजों पर होती हैं। इससे दवाओं की गुणवत्ता क्या होती होगी, समझा जा सकता है। ड्रग्स कंट्रोलर व निरीक्षकों के काम करने के तरीके से भी लोग अच्छी तरह वाकिफ हैं। हैरत की बात तो यह है कि दवाओं की असली फैक्ट्री में ही नकली दवाएं बनाई जा रही हैं। दवा निर्ताता कंपनी के रूप में पंजीकृत छोटी कंपनियां बडी कंपनियों का लेबल लगाकर अपने घटिया माल बाजार में उतार रही हैं। उन्हें किसी बात का भी खौफ नहीं। इन दवाइयों की पेकेजिंग भी ऐसेकी जाती है कि देखकर कोई भी इसे नकली नहीं बता सकता। यहां तक कि डॉक्टर भी इसमें धोखा खा जाते हैं। कारण, ये देखने में बिल्कुल असली दवाइयों जैसे होते हैं। फर्क होता है, तो सिर्फ कच्चे माल में। इस तरीके से बनी दवाइयां मर्ज तो ठीक नहीं करतीं, उल्टे रोगी को और बीमार बना डालती है। इन दवाइयों से मोत की खबर भी अक्सर आती रहती है।
नकली दवाओं के कारोबार में बेहिसाब काली कमाई का ही नतीजा है कि दिल्ली और पंजाब के कई बडे दवाई डिस्ट्रीब्युटरों ने अब अपनी खुद की इकाइयां लगा ली हैं। दिल्ली से लगे बहादुरगढ और पंजाब के कई कस्बों में इन लोगों की फैक्ट्रियां चल रही हैं, जहां नामचीन कंपनियों के ब्रांडों को बनाया जा रहा है। भारत न सिर्फ नकली दवाओं के एक बडे उत्पादक देश के रूप में बदनाम हो रहा है, बल्कि ऐसी दवाओं को खपाने का बडा अड्डा भी बनता जा रहा है। यही वजह है कि चीन, नेपाल और बर्मा से भी बडी संख्या में नकली दवाएं भारत आ रही हैं। इन्हें प्राइवेट नर्सिंगहोम और निजी अस्पतालों के जरिए खपाया जा रहा है। इस धंधे में सरकारी अधिकारियों के लिप्त होने की बात तो पता चली ही है, साथ ही बडी कंपनियों में कार्यरत लोग भी पैसों के लालच में लोगों के जीवन से खिलवाड कर रहे हैं। दिल्ली के भगीरथ पैलेस को राजधानी का सबसे बडा दवा बाजार कहा जाता है। इस बाजार में देश की नामी कंपनियों के डीलर तो हैं ही, साथ ही नकली दवाईयां बेचने वाले कारोबारी भी बडी संख्या में हैं। दवाइयों की इस मंडी में रोज करोडों रुपयों का कारोबार होता है, जिसमें से पचास फीसदी नकली या डुप्लीकेट दवाईयों की सप्लाई से जुडा होता है। भगीरथ पैलेस से जुडे एक कारोबारी का कहना है कि अब हमने अपने ग्राहकों को हर दवाई पर साइन करके देना शुरू कर दिया है। अगर ग्राहक को लगे कि वह नकली है, तो वह जांच करवा सकता है। लेकिन, महज इतने भर से इस काले कारोबार को फलने-फूलने से नहीं रोका जा सकता। देश में नकली दवाओं का नासूर कडे कानून से ही रोका जा सकता है, वरना मौत के सौदागर लोगों के जीवन से इसी तरह की खिलवाड करते रहेंगे। और जिंदगी के नाम पर बांटी जाती रहेगी मौत।
जरूरी है सावधानी
दवाईयां अपने किसी विश्वसनीय कैमिस्ट से ही खरीदें और उसकी रसीद जरूर लें। संभव हो तो विक्रता से दवाई के रैपर पर हस्ताक्षर करवा लें। अगर दवाई से फायदा न हो, तो उसे डॉक्टर को जरूर दिखाएं। दवा के नकली होने के संदेह की स्थिति में औषधि नियंत्रक से इसकी शिकायत कर सकते हैं। अगर आपके रिहायश के स्थान पर जांच प्रयोगशाला हो, तो आप वहां भी दवाई की शुद्घता की जांच करा सकते हैं। नकली साबित होने पर पुलिस में शिकायत कर सकते हैं। खासकर क्रोसिन, वोवेरनएसआर-100, स्लो डिक्लोफेनिक, बीटाडीन, एसबीएस की पीसी-200, सिपला की एमटी पिल, फाइजर की वियाग्रा, इनवास की ओमेज, मैथरजिन, कैल्सियम की गोलियां या इंजेक्शन, एनालजेसिक टैबलेट, एंटासिड और कोसाविल सिरप खरीदते वक्त विशेष सावधानी बरतें।
उतरी या उतारी
शाहरुख खान ऐसे पहले व्यक्ति नहीं हैं, जिन्होंने मुसलमान होने के कारण अपने साथ बदसलूकी की शिकायत की हो। इससे पहले भी कई नामचीन हस्तियां मुस्लिम होने की वजह से अपने साथ भेदभाव के आरोप लगा चुकी हैं। तो क्या वाकई इनके साथ जो होता है, वह सिर्फ इसलिए कि ये मुसलमान हैं? या फिर एक धर्म विशेष के साथ घटना को जोडकर उनकी मंशा कुछ और हासिल करने की होती है?
शाहरुख खान एक बेहतरीन अदाकार हैं। देश-विदेश में उनके लाखों-करोडों प्रशंसक हैं। उस अमेरिका में भी, जहां के नेवार्क हवाई अड्डे पर आपजन (इमीग्रेशन) अधिकारियों ने उन्हें हिरासत में लेकर दो घंटे तक पूछताछ की। बकौल शाहरुख इस दरम्यान वह लगातार उनसे यह कहते रहे कि वह एक फिल्म स्टार हैं और अमेरिका अक्सर आते-जाते रहते हैं। यहां उनके कई बडे जानने-पहचानने वाले लोग हैं। लेकिन, उनकी एक नहीं सुनी गई। उल्टे उनसे कडी पूछताछ की जाती रही। अधिकारियों की इस बेरुखी पर शाहरुख का कहना है कि उन्हें इसलिए परेशान किया गया, क्योंकि उनके नाम के साथ खान जुडा हुआ है। यानी उनके नाम से साफ तौर पर झलकता है कि वह एक मुसलमान हैं। और यही वजह है कि उनसे आतंकवादियों की तरह जिरह की गई। खैर....शाहरुख की इस शिकायत पर हर तरफ से प्रतिक्रियाएं आईं। लोगों ने अमरीका के ऐसे व्यवहार पर खूब हमले बोले। यह कहते हुए कि उनकी हमेशा से यह आदत रही है, बाहर मुल्क के लोगों की बेइज्जती करने की। केंद्र सरकार ने तो बाकायदा इसे लेकर अमरीकी सरकार से जवाब-तलब करने का भी फैसला किया है। लेकिन, एक तबका ऐसा भी है जो इस मुद्दे पर मचे कोहराम को बेजा बता रहा है। उनकी राय है कि अमरीका में इस तरह की जांच प्रक्रिया एक आम बात है, इस पर हाय-तौबा नहीं मचाना चाहिए।
ऐसी सोच रखने वालों में बॉलीवुड के ही एक और सुपरस्टार सलमान खान भी हैं। क्रिकेटर हरभजन सिंह और जनता पार्टी सुप्रीमो सुब्रमण्यम स्वामी भी इस राय से इत्तेफाक रखते हैं। इनका मानना है कि धर्म का रंग देकर बेवजह इस मामले को तील का ताड बनाया जा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि अमरीका में हर धर्म के लोगों को इस तरह की परेशानियों से गुजरना पडा है। सलमान खान तो यहां तक कह गए कि जब वह अमरीका जाते हैं, तो उन्हें भी ऐसी जांच से गुजरना पडता है। और यह पूरी तरह से उचित है। इस कडे सुरक्षा उपाय के कारण ही तो 9/11 के बाद अमरीका में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ। गौरतलब है कि रक्षा मंत्री रहते जार्ज फर्नांडीस, विदेश मंत्री रहते प्रणव मुखर्जी, लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी, भूतपूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम समेत कई और बडी हस्तियों को भी कभी न कभी हवाई अड्डों पर ऐसी जांच प्रक्रिया का सामना करना पडा है। कलाम का मामला तो पिछले दिनों संसद में भी गूंजा। लेकिन, इसे न तो भूतपूर्व राष्ट्रपति ने धर्म से जोडा और न ही सियासी दलों के नेताओं ने। शाहरुख ने जरूर अपने साथ हुई घटना को मजहब के साथ जोडकर उस पुराने सवाल को जिंदा कर दिया है कि मुसलमान होने का खामियाजा लोगों को भुगतना पडता है। कभी ऐसा ही आरोप क्रिकेटर अजहरुद्दीन ने लगाया था। मैच फिक्सिंग के आरोपों से घिरने के बाद अजहर ने कहा था कि उन्हें मुसलमान होने के नाते निशाना बनाया गया। हालांकि यह सभी जानते हैं कि इस प्रकरण की भेंट मनोज प्रभाकर और अजय जडेजा जैसे लोगों का करिअर भी चढा, जो मुसलमान नहीं थे। अजहरुद्दीन को अगर मुसलमान होने की वजह से भेदभाव का सामना करना पडता, तो वह हरगिज कभी भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान नहीं बनाए जाते। और न ही देश की अधिसंख्य हिंदू जनता उन्हें अपने सिर-आंखों बिठाती।
अभी हाल ही में अभिनेता इमरान हाशमी ने भी यह कह कर लोगों को सकते में डाल दिया था कि मुसलमान होने की वजह से ही उन्हें मुंबई में घर नहीं मिल रहा। इस पर खूब बवाल भी मचा। अंतत: ऐसी टिप्पणी के लिए उन्हें माफी भी मांगनी पडी। मुस्लिम होने के नाते अपने साथ भेदभाव होने के आरोप और भी कई लोग लगा चुके हैं। खुद को सेक्यूलर विचारधारा की सबसे बडीी पैरोकार होने का दावा करने वाली अभिनेत्री शबाना आजमी ने भी कभी कुछ ऐसी ही बातें कही थीं। तब भी सवाल उठे थे कि ऐसे आरोप कितने जायज हैं? शाहरुख का नया मामला जरूर देश से बाहर का है, लेकिन विरोध की प्रकृति वही पुरानीी है। अब तो मुस्लिम लोग ही खुलेआम यह कहने लगे हैं कि यह ऐसे लोगों का हथकंडा है। प्रचार पाने या फिर मुसीबत में पं*सने पर अपने लिए उन्माद पैदा करवाने के लिए। ऐसी राय रखने वाले एक पढे-लिखे मुसलमान युवक की टिप्पणी थी, सेलिब्रिटीज के लिए धर्म तभी मुद्दा बनता है, जब उन्हें परेशानियों से घिरना पडता है। और परेशानियां भी उनकी अपनी वजह से, न कि मुसलमान होने के कारण। जब हम जैसे आम मुसलमान को धर्म की वजह से कहीं कोई दिक्कत नहीं आती, तो इन जैसे बडे लोगों को क्या दिक्कत आएगी। जब इनके सितारे गर्दिश में हों या अपने बुरे कर्मों की वजह से इनपर आफत आती है, तो ये सहानुभूति बटोरने और अपने बचाव के लिए मुसलमान होने का मुद्दा उठा देते हैं। जबकि हकीकत यह है कि इनमें से शायद ही कोई नमाज पढने की भी जहमत करता होगा।
वहीं कई बुद्घिजीवियों का कहना है कि शाहरुख खान जैसे स्टेटस वाले लोगों को हवाई अड्डे पर अधिकारियों द्वारा परेशान किए जाने पर विरोध तो जताना चाहिए, पर इसे धर्म के साथ जोडना गलत है। यह कहीं न कहीं सांप्रदायिक भावनाओं को ही हवा देती है और समाज में एक विभाजन की लकीर खिंचती है। भारत में भी कई मुस्लिम हस्तियां अक्सर ऐसे आरोप लगाती रही हैं, इससे तो सामाजिक ताने-बाने और धार्मिक सद्भावना को ही चोट पहुंचती है। जबकि सच्चाई यह है कि भारत में धर्म को लेकर सियासतदानों की कुचेष्टा के बावजूद आज भी वह दरार पैदा नहीं हो पाई है, जो एक दूसरे को नफरत के दलदल में उतार सके। फिलहाल शाहरुख मामले ने धार्मिक भेदभाव के मुद्दे को एक नए मोड पर जरूर ला खडा किया है, जहां यह तय होना है कि यह हमला है या हथियार? किंग खान की नई फिल्म माई नेम इज खान में शायद इस का जवाब मिल जाए।
शाहरुख खान एक बेहतरीन अदाकार हैं। देश-विदेश में उनके लाखों-करोडों प्रशंसक हैं। उस अमेरिका में भी, जहां के नेवार्क हवाई अड्डे पर आपजन (इमीग्रेशन) अधिकारियों ने उन्हें हिरासत में लेकर दो घंटे तक पूछताछ की। बकौल शाहरुख इस दरम्यान वह लगातार उनसे यह कहते रहे कि वह एक फिल्म स्टार हैं और अमेरिका अक्सर आते-जाते रहते हैं। यहां उनके कई बडे जानने-पहचानने वाले लोग हैं। लेकिन, उनकी एक नहीं सुनी गई। उल्टे उनसे कडी पूछताछ की जाती रही। अधिकारियों की इस बेरुखी पर शाहरुख का कहना है कि उन्हें इसलिए परेशान किया गया, क्योंकि उनके नाम के साथ खान जुडा हुआ है। यानी उनके नाम से साफ तौर पर झलकता है कि वह एक मुसलमान हैं। और यही वजह है कि उनसे आतंकवादियों की तरह जिरह की गई। खैर....शाहरुख की इस शिकायत पर हर तरफ से प्रतिक्रियाएं आईं। लोगों ने अमरीका के ऐसे व्यवहार पर खूब हमले बोले। यह कहते हुए कि उनकी हमेशा से यह आदत रही है, बाहर मुल्क के लोगों की बेइज्जती करने की। केंद्र सरकार ने तो बाकायदा इसे लेकर अमरीकी सरकार से जवाब-तलब करने का भी फैसला किया है। लेकिन, एक तबका ऐसा भी है जो इस मुद्दे पर मचे कोहराम को बेजा बता रहा है। उनकी राय है कि अमरीका में इस तरह की जांच प्रक्रिया एक आम बात है, इस पर हाय-तौबा नहीं मचाना चाहिए।
ऐसी सोच रखने वालों में बॉलीवुड के ही एक और सुपरस्टार सलमान खान भी हैं। क्रिकेटर हरभजन सिंह और जनता पार्टी सुप्रीमो सुब्रमण्यम स्वामी भी इस राय से इत्तेफाक रखते हैं। इनका मानना है कि धर्म का रंग देकर बेवजह इस मामले को तील का ताड बनाया जा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि अमरीका में हर धर्म के लोगों को इस तरह की परेशानियों से गुजरना पडा है। सलमान खान तो यहां तक कह गए कि जब वह अमरीका जाते हैं, तो उन्हें भी ऐसी जांच से गुजरना पडता है। और यह पूरी तरह से उचित है। इस कडे सुरक्षा उपाय के कारण ही तो 9/11 के बाद अमरीका में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ। गौरतलब है कि रक्षा मंत्री रहते जार्ज फर्नांडीस, विदेश मंत्री रहते प्रणव मुखर्जी, लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी, भूतपूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम समेत कई और बडी हस्तियों को भी कभी न कभी हवाई अड्डों पर ऐसी जांच प्रक्रिया का सामना करना पडा है। कलाम का मामला तो पिछले दिनों संसद में भी गूंजा। लेकिन, इसे न तो भूतपूर्व राष्ट्रपति ने धर्म से जोडा और न ही सियासी दलों के नेताओं ने। शाहरुख ने जरूर अपने साथ हुई घटना को मजहब के साथ जोडकर उस पुराने सवाल को जिंदा कर दिया है कि मुसलमान होने का खामियाजा लोगों को भुगतना पडता है। कभी ऐसा ही आरोप क्रिकेटर अजहरुद्दीन ने लगाया था। मैच फिक्सिंग के आरोपों से घिरने के बाद अजहर ने कहा था कि उन्हें मुसलमान होने के नाते निशाना बनाया गया। हालांकि यह सभी जानते हैं कि इस प्रकरण की भेंट मनोज प्रभाकर और अजय जडेजा जैसे लोगों का करिअर भी चढा, जो मुसलमान नहीं थे। अजहरुद्दीन को अगर मुसलमान होने की वजह से भेदभाव का सामना करना पडता, तो वह हरगिज कभी भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान नहीं बनाए जाते। और न ही देश की अधिसंख्य हिंदू जनता उन्हें अपने सिर-आंखों बिठाती।
अभी हाल ही में अभिनेता इमरान हाशमी ने भी यह कह कर लोगों को सकते में डाल दिया था कि मुसलमान होने की वजह से ही उन्हें मुंबई में घर नहीं मिल रहा। इस पर खूब बवाल भी मचा। अंतत: ऐसी टिप्पणी के लिए उन्हें माफी भी मांगनी पडी। मुस्लिम होने के नाते अपने साथ भेदभाव होने के आरोप और भी कई लोग लगा चुके हैं। खुद को सेक्यूलर विचारधारा की सबसे बडीी पैरोकार होने का दावा करने वाली अभिनेत्री शबाना आजमी ने भी कभी कुछ ऐसी ही बातें कही थीं। तब भी सवाल उठे थे कि ऐसे आरोप कितने जायज हैं? शाहरुख का नया मामला जरूर देश से बाहर का है, लेकिन विरोध की प्रकृति वही पुरानीी है। अब तो मुस्लिम लोग ही खुलेआम यह कहने लगे हैं कि यह ऐसे लोगों का हथकंडा है। प्रचार पाने या फिर मुसीबत में पं*सने पर अपने लिए उन्माद पैदा करवाने के लिए। ऐसी राय रखने वाले एक पढे-लिखे मुसलमान युवक की टिप्पणी थी, सेलिब्रिटीज के लिए धर्म तभी मुद्दा बनता है, जब उन्हें परेशानियों से घिरना पडता है। और परेशानियां भी उनकी अपनी वजह से, न कि मुसलमान होने के कारण। जब हम जैसे आम मुसलमान को धर्म की वजह से कहीं कोई दिक्कत नहीं आती, तो इन जैसे बडे लोगों को क्या दिक्कत आएगी। जब इनके सितारे गर्दिश में हों या अपने बुरे कर्मों की वजह से इनपर आफत आती है, तो ये सहानुभूति बटोरने और अपने बचाव के लिए मुसलमान होने का मुद्दा उठा देते हैं। जबकि हकीकत यह है कि इनमें से शायद ही कोई नमाज पढने की भी जहमत करता होगा।
वहीं कई बुद्घिजीवियों का कहना है कि शाहरुख खान जैसे स्टेटस वाले लोगों को हवाई अड्डे पर अधिकारियों द्वारा परेशान किए जाने पर विरोध तो जताना चाहिए, पर इसे धर्म के साथ जोडना गलत है। यह कहीं न कहीं सांप्रदायिक भावनाओं को ही हवा देती है और समाज में एक विभाजन की लकीर खिंचती है। भारत में भी कई मुस्लिम हस्तियां अक्सर ऐसे आरोप लगाती रही हैं, इससे तो सामाजिक ताने-बाने और धार्मिक सद्भावना को ही चोट पहुंचती है। जबकि सच्चाई यह है कि भारत में धर्म को लेकर सियासतदानों की कुचेष्टा के बावजूद आज भी वह दरार पैदा नहीं हो पाई है, जो एक दूसरे को नफरत के दलदल में उतार सके। फिलहाल शाहरुख मामले ने धार्मिक भेदभाव के मुद्दे को एक नए मोड पर जरूर ला खडा किया है, जहां यह तय होना है कि यह हमला है या हथियार? किंग खान की नई फिल्म माई नेम इज खान में शायद इस का जवाब मिल जाए।
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