रविवार, 30 अगस्त 2009
मेजर साहब के बहाने
बताया जाता है कि संघ के नेता चिंतन बैठक में पार्टी की हार पर हर हाल में समीक्षा पर आमादा थे। लेकिन, भाजपा के कुछ नेताओं को इसमें अपने लिए मुश्किलें नजर आ रही थीं। कारण, हार के लिए कहीं न कहीं उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना था। लिहाजा, शुरू से ही वे इससे बचने की कोशिशों में लगे थे। आडवाणी ने खुद भी बैठक से पहले कहा था कि इसमें हार की समीक्षा के बजाए आगे की रणनीति पर चर्चा करना बेहतर होगा। उनकी लॉबी के नेता तो इस बैठक को ही रद्द करवाने में लगे थे। लेकिन, संघ ने इस पर कडा रवैया अपनाते हुए अपना रुख स्पष्ट कर दिया था कि बैठक भी होगी और हार पर समीक्षा भी। यह उन नेताओं के लिए झटके की तरह था, जो अब तक हार की जिम्मेवारियों से बचने की कोशिश कर रहे थे।
गौरतलब है कि लोकसभा चुनावों में पार्टी की हार के लिए मुख्य रूप से आडवाणी और उनके रणनीतिकारों को ही कठघरे में खडा किया जा रहा था। इसके बहाने उनके विरोधी पार्टी में आडवाणी लॉबी को कमजोर करने की बाकायदा चालें भी चल रहे थे। वहीं राजनाथ सिंह द्वारा इस मुद्दे पर हीला-हवाली ने उन्हें भी आडवाणी विरोधी नेताओं के निशाने पर ला खडा किया था। पार्टी का अध्यक्ष होने के नाते उन पर भी इसकी जिम्मेवारी कबूल करने का दबाव बनाया जा रहा था। यानी राजनाथ और आडवाणी दोनों के लिए हार पर समीक्षा का मतलब था, संकट को बुलावा। लिहाजा, दोनों ही इससे बचने की कोशिश कर रहे थे। उन्हें लगा कि चिंतन बैठक में अगर हार पर चर्चा हुई, तो विरोधी खुल कर उन पर निशाना साधेंगे। यही वजह है कि बैठक में हार की समीक्षा के बजाए आगे की रणनीति पर चर्चा की जरूरत जताई जाने लगी थी। लेकिन, संघ के इस एलान से कि भाजपा चिंतन बैठक में हार की समीक्षा से नहीं बच सकती, इसे ठंडे बस्ते में डालने की इन नेताओं की कोशिश नाकाम होती दिखने लगीी थी। तभी जसवंत सिंह के मुद्दे के रूप में उन्हें वह हथियार मिल गया, जिसने उन्हें हलाल होने से बचा लिया। वैसे भी पत्र के माध्यम से हार के लिए राजनाथ को जिम्मेदार बताने से जसवंत पार्टी अध्यक्ष की नजरों में चढे हुए थे।
जिन्ना के गुणगाण के कारण संघ तो मेजर साहब से नाखुश था ही, लेकिन उनके खिलाफ किसी कार्रवाई की पहल भाजपा द्वारा ही होनी थी। लिहाजा, भाजपा आलाकमान ने एक तीर से दो निशाने साधने की योजना बना ली। जसवंत को चिंतन बैठक से महज एक दिन पहले पार्टी से निकाल कर एक तरफ संघ को भी खुश कर दिया और दूसरी तरफ चिंतन बैठक में अनुशासन जैसे मुद्दे की हवा बनाकर हार की समीक्षा के मुद्दे को भी नेपथ्य में पटकने में कामयाबी पा ली। अपने मतलब साधने के लिए जसवंत को बलि का बकरा बनाने से किसी तरह की परेशानियों से भी सामना नहीं करना पडा और चिंतन बैठक के मंच को आडवाणी-राजनाथ के खिलाफ इस्तेमाल करने की योजना बना रहे असंतुष्ट नेता भी शांत पड गए। तभी बैठक में हार को लेकर बाल आप्टे की रिपोर्ट रखे जाने के बावजूद उसपर कोई खास चर्चा नहीं हो पाई। सारा फोकस पार्टी में अनुशासन और संघ की विचारधारा के प्रति भाजपा नेताओं की आस्था को मजबूत बनाने पर ही रहा। यही वजह है कि फजीहत से बच जाने की खुशी में राजनाथ ने पहली बार अपने मुंह से यह घोषणा की कि आडवाणी पांच वर्षों तक प्रतिपक्ष के नेता के अपने पद पर बने रहेंगे। जबकि इससे पहले राजनाथ खेमे के लोग ही लौह पुरुष के लिए मुश्किलें पैदा करने में लगे थे।
भाजपा के सूत्रों का कहना है कि संभावित मुसीबत के मद्देनजर ही राजनाथ और आडवाणी फिलहाल अपनी-अपनी हैसियत बचाए रखने की कवायद में जुटे हुए हैं। इस वक्त उनकी प्राथमिकता एक-दूसरे के लिए गड्ढा खोदने की बजाए किसी तरह खुद को टिकाए रखने की है। वर्ना विरोधी भी मजबूत हो सकते हैं और संघ भी उनपर हावी हो सकता है। और अपनी इसी चाल के आगे उन्होंनेे जसवंत को अपने अभियान का बकरा बना दिया।
जनसंघ से जसवंत तक
प्रारंभ से ही भाजपा राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकता एवं संस्कृति की अलमबरदार संस्था के रूप में अपने को प्रचारित करती आई है। यही वजह है कि उसने हमेशा खुद को अन्य सियासी दलों से अलग माना और जताया। तभी भाजपा के लिए पार्टी विद डिफरेंस जैसी उपमाएं दी जाती रहीं। यह अलग बात कि सत्ता से नजदीकी और वक्त के साथ अब यह पार्टी विद डिफरेंसेस के तौर पर सामने है। संघ ने भले ही आज तक खुद को सक्रिय राजनीति से अलग रखा हो, पर भाजपा को हमेशा से उसका -पॉलिटिकल विंग ही माना गया। भाजपा के नेता भी इस संगठन को पिछले कुछ समय तक संघ परिवार नामक वटवृक्ष की प्रमुख शाखा के रूप में निरूपित करते थे। लेकिन, पार्टी में गैरसंघी पृष्ठभूमि वाले नेताओं ने हाल में भाजपा की चुनावी हार के बाद इसे संघ से पूरी तरह आजाद करवाने का स्वर छेड रखा है। इसे लेकर पार्टी में घमासान भी मचा हुआ है। जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता की भाजपा से छुट्टी को भी इसी घमासयान का नतीजा बताया जाता है।
जहां तक भाजपा के सियासी सफर की बात है, तो इसने अपना पहला चुनाव 1984 में लडा था। तब उसे महज लोकसभा की 2 सीटें हासिल हुई थीं। लेकिन, 89 में अयोध्या में शिलान्यास कार्यक्रम ने जबर्दस्त जोर पकडा और भाजपा को इसका काफी सियासी लाभ मिला। नतीजतन, 89 के लोकसभा चुनाव में उसके सीटों की संख्या बढकर 88 हो गई। मंदिर मुद्दे पर मिली इस सफलता से उत्साहित भाजपा ने फिर इस मुद्दे को अपना प्रमुख सियासी हथियार ही बना लिया। 1990 में आडवाणी ने इसी मुद्दे को लेकर रथ यात्रा शुरू की। हिुदंत्व के रथ पर सवार पार्टी ने 91 के चुनाव में 119 सीटें जीतीं और प्रमुख विपक्षी पार्टी बन बैठी। 96 के चुनाव में तो वह लोकसभा में सबसे बडी पार्टी के तौर पर उभरी। तब 161 सीटों के साथ भाजपा ने केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार तक बनाने में कामयाबी हासिल की। लेकिन, बहुमत हासिल न कर पाने की वजह से सरकार 13 दिनों में ही गिर गई। इसके बाद 98 के चुनाव में भाजपा एनडीए गठबंधन के तौर पर केंद्र में आई। लेकिन, इस बार भी घटक दलों में फूट ने सरकार को 13 महीने में ही जमीन पर ला पटका। इसके बाद 99 में चुनाव हुए, जिसमें भाजपा के नेतृत्व में एनडीए को जबर्दस्त जीत हासिल हुई। उसने सरकार भी बनाई और पूरे पांच साल शासन भी किया। इसके बाद 2004 से लगातार दूसरी बार कांग्रेस नीत यूपीए सरकार दिल्ली के तख्त पर काबिज है। हार और सत्ता से दूरी ने भाजपा के अंदर आंतरिक कलह को पूरी तरह सतह पर ला दिया है। जसवंत सिंह जैसे लोग लगातार सार्वजनिक तौर पर पार्टी और इसकी विचारधारा को कठघरे में खडा कर रहे हैं। ऐसे में कइयों का कहना है कि कहीं जनसंघ से शुरू हुई यह सियासी पारी यहीं आकर न खतम हो जाए।
एक था सर्कस
मशहूर फिल्मकार राज कपूर ने कभी सर्कस और इसके कलाकारों को लेकर एक फिल्म बनाई थी। मेरा नाम जोकर। इस फिल्म में सर्कस के कलाकारों की व्यक्तिगत जिंदगी और उनके जज्बातों का बडा ही मार्मिक चित्रण किया गया था। उस वक्त यह फिल्म सुपर फलॉप साबित हुई थी। लेकिन, राज कपूर की मौत के बाद जब दोबारा इसे प्रदर्शित किया गया, तो इसे बेजोड सफलता हासिल हुई। तब लोगों की टिप्पणी थी कि अक्सर लोग किसी की मौत के बाद ही उसकी असली अहमियत समझते हैं। जब राज कपूर जिंदा थे, तो अपनी सारी कमाई दांव पर लगा कर बनाई गई उनकी इस ड्रीम प्रोजेक्ट को लोगों ने नकार दिया। लेकिन, जब वह इस दुनिया में नहीं रहे, तो दर्शकों-आलोचकों सभी ने इसे हाथों-हाथ लिया। कुछ ऐसा ही इस फिल्म का विषय-वस्तु रहे सर्कस के साथ दोहराया जा रहा है। बदले हालात और सरकार की बेरुखी के कारण यह फिलहाल अपने सबसे दुख भरे दौर से गुजर रहा है। मुमकिन है कि मनोरंजन की इस विधा का अस्तित्व ही खत्म हो जाए। और शायद तभी इस ओर लोगों का ध्यान जाए। लेकिन, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।
सर्कस इंडस्ट्री की दुर्दशा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कभी देश में 300 से ज्यादा सर्कस थे, आज इनकी संख्या सैकडे को भी पार नहीं करती। बमुश्किल 70-80 सर्कस कंपनियां ही बची हैं। उनमें भी महज 11 ही इंडियन सर्कस फेडरेशन में दर्ज हैं। बाकी किसी तरह अपना नाम जिंदा रखने की लडाई लड रही हंै। लेकिन, मनोरंजन के नए-नए साधनों के आगे आज उनकी भी हालत इतनी दयनीय हो चुकी है कि करीब 20 हजार लोगों को रोजी-रोटी मुहैया कराने वाली इस दिलचस्प कला की आखिरी सांसें कभी भी उखड सकती हैं। इंडियन सर्कस फेडरेशन के चेयरमैन अशोक शंकर को हालांकि पूरी उम्मीद है कि यह कला मरेगी नहीं, जिंदा रहेगी। लेकिन वह भी मानते हैं कि टेलीविजन और इंटरनेट के दौर में सर्कस को भारत में अपने सबसे बुरे दौर से गुजरना पड रहा है। इसके पीछे वह इस क्षेत्र के प्रति सरकार की बेरुखी को बडी वजह मानते हैं। वह कहते हैं, सरकार को सर्कस अकादमी का गठन करना चाहिए, ताकि विदेशों की तरह यहां भी सर्कस से जुडने की इच्छा रखने वाले नए कलाकारों की प्रतिभा को निखारा जा सके। साथ ही रिटायरमेंट के बाद कलाकारों को नौकरियों में आरक्षण दिया जाना चाहिए क्योंकि इस क्षेत्र में करिअर बहुत लंबा नहीं होता। ट्रेनिंग सेंटर के गठन से सर्कस में लोगों का मनोरंजन करके अपनी जिंदगी का बडा हिस्सा गुजार देने वालों को प्रशिक्षक के तौर पर रोजगार भी मुहैया हो पाएगा। आज सरकारी उपेक्षा और समुचित मंच नहीं होने के कारण ही प्रतिभाशाली कलाकार सर्कस से दूर होते जा रहे हैं।
जेमिनी सर्कस के मालिक अजय शंकर की भी कुछ ऐसी ही राय है। उनका कहना है कि सरकार का समुचित सहयोग न मिलने के कारण सर्कस खत्म हो रहे हैं। इसके साथ ही सर्कस के कलाकारों की खानाबदोश जिंदगी और मौजूदा वक्त में जरूरी स्थायित्व की कमी के कारण भी स्थिति बहुत विषम हो गई है। इस ओर सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है। उल्टे कभी बच्चों-जानवरों के शोषण या कभी कोई और आरोप लगा कर वह सर्कस वालों को परेशान ही करने का काम करती है। लिहाजा, देश में सर्कस की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। सर्कस से जुडे अन्य लोगों का भी मानना है कि सरकार की अदूरदर्शी नीतियों ने सर्कस के समक्ष अस्तित्व का संकट खडा किया है। पहले जब मनोरंजन के बहुत ज्यादा साधन नहीं हुआ करते थे, तब सर्कस में दर्शकों की अपार भीड जुटा करती थी। गांव-कस्बों ही नहीं, बडे शहरों व महानगरों में भी सर्कस खूब चलते थे। लोग दूर-दूर से सर्कस देखने आया करते थे। लेकिन आज टीवी, इंटरनेट के जमाने में लोगों की मनोरंजन की आदतों और रुचियों में बदलाव के कारण सर्कस को अपना अस्तित्व बचाने के लिए कठिन लडाई लडनी पड रही है। ऊपर से सरकार द्वारा सर्कस में जानवरों और बच्चों से काम कराने पर रोक ने सर्कस के ताबूत में अंतिम कील ठोंकने का काम किया है। इसकी आड में सर्कस वालों को तो परेशान किया ही जा रहा है, दर्शकों खासकर बच्चों की इसमें रुचि भी बिल्कुल खत्म हो गई है। नतीजतन, सर्कस का बिजनेस 50 प्रतिशत से भी ज्यादा कम हो गया है। अपोलो सर्कस के मैनेजर आर के यादव कहते हैं, सरकार का समर्थन तो सर्कस को नहीं ही मिल रहा है। ऊपर से उसने इतने नियम-कायदे हम पर थोप दिए हैं कि काम करना मुश्किल हो रहा है। बच्चों से हम काम करा नहीं सकते, जबकि हकीकत यह है कि कम उम्र में ही इस विधा को सीखा जा सकता है। 14 साल की उम्र तक तो शरीर इतना परिपक्व हो जाता है कि जिम्नाज्म सीखा ही नहीं जा सकता। जानवरों के खेल पर भी रोक लगा दिया गया है। इन वजहों से ही सर्कस को दिक्कतों का सामना करना पड रहा है।
सरकार की सख्ती का असर सर्कस की गुणवत्ता पर भी पड रहा है। पहले जहां एक बडे सर्कस में शेर-चीते, घोडे, हाथी, बाघ और अनेक जानवरों के अलावा 400-500 लोग इसके सदस्य होते थे, आज सौ लोग भी बमुश्किल ही होते हैं। स्वाभाविक है कि जब खर्च के मुकाबले आमदनी कम से कमतर हो जाएगी, तो भला कौन लाव-लश्कर के साथ सर्कस चलाना चाहेगा। यही वजह है कि आज अधिकांश सर्कस मजबूरी में ही गाडी खींच रहे हैं। और वह भी सर्कस के लिए अपनी पूरी जिंदगी झोंक चुके प्रौढ कलाकारों के बूते। जिनके लिए सर्कस के तंबुओं से अलग जिंदगी की ख्वाहिश भी मौत के समान है। वे जाएं, तो जाएं कहां। इसके अलावा वे कर भी क्या सकते हैं। करिअर की अनिश्चतता के कारण हीी इस इंडस्ट्री से नए लोग नहीं जुड रहे। जो यहां काम कर रहे हैं, वे भी अपने बच्चों को इससे दूर ही रखना चाहते हैं। नई लडकियों को खेल सिखाने वाली ऐसी ही एक प्रौढ कलाकार मोना विश्वास कहती हैं, मैंने अपनी पूरी जिंदगी सर्कस और इस कला के नाम समर्पित कर दी। लेकिन अनिश्चतताओं से भरी यहां की जिंदगी को देखते हुए मैंने अपनी दोनों बेटियों को इससे दूर रखा। आज मेरी एक बेटी नर्स है और दूसरी टीचर। बहुत संघर्ष से मैंने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है। सबके साथ ऐसा नहीं हो पाता है। मैं खुशकिस्मत थी कि अपने बच्चों को बेहतर जिंदगी दे पाई, वर्ना वे भी इन्हीं तंबुओं में कैद होकर रह जातीं।
40 वर्षीय मोहम्मद रशीद भी उन लोगों में हैं, जिन्हें सर्कस विरासत में मिली। उनके मां-बाप दोनों सर्कस में ढेर सारा पानी पीने और फिर उसे निकालने का करतब दिखाते थे। रशीद भी खुशी-खुशी इसका हिस्सा बन गए। लेकिन आज उम्र के इस पडाव पर आकर उनकी सोच बदल गई है। वह अपने बच्चों को इससे दूर रखना चाहते हैं। वह कहते हैं, मैं अपने बच्चों को खानाबदोशी की जिंदगी नहीं देना चाहता। आज वक्त बदल गया है। जरूरतें बदल गई हैं। इस क्षेत्र में रहकर अब कोई कुछ हासिल नहीं कर सकता। सर्कस मर रहा है। इस मरती हुई कला का हाथ थाम कर कोई जिंदा रहने का आखिर सोच भी कैसे सकता है। बदले दौर में सर्कस के लिए ऐसी सोच रखने वाले कलाकार ढेरों हैं। ग्रेजुएट हरी बाबू से लेकर मैनेजर बालाकृष्णन, झूले पर खेल दिखाने वाले जयराम, शूटर गजानंद व सीमा पंडा और रिंग मास्टर एस मोहम्मद तक। ये वे लोग हैं, जिन्होंने सर्कस के सुनहरे दिन देखे हैं। वे दिन, जब इसके कलाकारों को पैसा भी मिलता था और प्रसिद्घी भी। भारत में सर्कस का घर कहे जाने वाले केरल के कन्नूर जिले से कई ऐसे सर्कस कलाकार आए, जिन्हें दुनिया भर में प्रसिद्घी मिली। मार्शल आर्ट ट्रेनर और जिमनास्ट कीलेरी कुन्हिकन्नन गुरुक्कल न सिर्फ भारत में सर्कस की महान हस्ती थे, बल्कि सात समंदर पार भी उनके प्रशंसक हुए। लेकिन, आज के दौर में पुराने लोग भी सर्कस के भविष्य को लेकर अनिश्चित हैं। यही वजह है कि प्रतिभाशाली लोग अब इस क्षेत्र में नहीं आ रहे। जो नए लोग आ रहे हैं, वे गैर प्रशिक्षित और अकुशल होते हैं। जिनके लिए सर्कस में आना उनके लिए मजबूरी होती है। महज किसी तरह पेट भरने की मजबूरी। लिहाजा, जिंदगी को लेकर स्थायित्व की अनिश्चतता से असली कलाकार सर्कस से दूर होते जा रहे हैं। और साथ ही दर्शक भी। इससे सर्कस दम तोड रहा है।
हालांकि केरल में सरकार द्वारा सर्कस के कलाकारों को पेंशन दी जाती है। दक्षिण में सर्कस के कद्रदान भी हैं, पर सिर्फ चंद प्रशंसकों के बूते सर्कस जैसी विस्तृत कला को जिंदा रख पाना आसान नहीं है। कलाकारों को भी अब यहां अपने वजूद की संभावनाओं की कल्पना बेमानी सी लगती है। तभी तमिलनाडु के पुष्पा चक्रवर्ती कहते हैं, आज जवान हैं, काम कर रहे हैं। सर्कस की जिंदगी तब तक है, जब तक शरीर में दम। आगे क्या होगा, कुछ नहीं मालूम। अभी पिछले दिनों गाजियाबाद में एक सर्कस शो के दौरान एक कलाकार झूले पर खेल दिखाते गिर कर अपनी जान गंवा बैठा। इस घटना ने वृताकार क्षेत्र में ऊंचे तने शामियाने के भीतर चकाचौंध कर देने वाली रोशनी और आर्केस्ट्रा की तेज धुनों के बीच अपना गम भुला कर लोगों के जीवन में रस घोलने वाले मजबूर कलाकारों की जिंदगी के अंधेरे को बयां कर दिया। वह दर्द, जो इन तंबुओं में ही कैद होकर रह जाता है। लोग इन कलाकारों को हंसते-गाते, दूसरों को मनोरंजन करते तो देखते हैं, लेकिन इस हंसी के पीछे छिपे उनके दर्द को शायद ही कोई महसूस कर पाता है। न ही उसे महसूस करने की जरूरत ही समझी जाती है। सरकारें भी उनकी ओर नहीं देखती। सर्कस और इसके कलाकारों की यही दर्दे दास्तां है। खेल के दौरान उन्हें मिलने वाली हर दाद के पीछे एक दर्द। कराहते करतब शायद जल्द ही दम तोड दें।
ऐ मियां टेढा, हम तुमसे डेढा
आज से करीब पांच साल पहले तत्कालीन संघ प्रमुख के.एस.सुदर्शन ने सार्वजनिक तौर पर इस बात की वकालत की थी कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व युवा हाथों को सौंप देना चाहिए। लेकिन, तब नेतृत्व को लेकर दूसरी पंक्ति के नेताओं में सिर-फुटव्वल की स्थिति ने इस कवायद को आगे बढने से रोक दिया। इस मुद्दे पर पार्टी में गुटबाजी के दृष्टिगत भी संघ को लगा कि अगर वह इस मामले में विशेष पहल करेगा, तो स्थिति और विस्फोटक हो सकती है। लिहाजा, सुदर्शन की सोच पर खास कवायद नहीं हो पाई। पर लोकसभा चुनावों में हार के बाद उपजी परिस्थितियों में संघ अब एक बार फिर भाजपा को अटल-आडवाणी युग से निकाल कर नए युग की ओर ले जाने के लिए सक्रिय हो गया है। चूंकि वाजपेयी तो अस्वस्थता का शिकार होकर पहले ही सक्रिय राजनीति से खुद को अलग कर चुके हैं, लिहाजा निशाने पर हैं लौह पुरुष आडवाणी। वही आडवाणी, जो लोकसभा चुनावों से पहले और बाद भी यह एलान कर चुके थे कि भाजपा के हारने पर वह सक्रिय राजनीति को अलविदा कह देंगे। लेकिन, चुनावों में भाजपा की हार के बावजूद न तो उन्होंने राजनीति से संन्यास लिया और न ही कुर्सी का मोह त्याग पाए। अब भी वह लोकसभा में विपक्ष के नेता के पद से चिपके बैठे हैं। यही वजह है कि संघ को उन्हें अब यह कहना पड रहा है कि बहुत हुआ, अब सिंहासन खाली करने की तैयारी करिए। पर लौह पुरुष इस मूड में नहीं दिखाई दे रहे। वह अब भी पार्टी में अपना दबदबा बरकरार रखना चाहते हैं। और साथ ही पीएम इन वेटिंग की तमन्ना भी। उनकी इस अदा ने संघ को कुपित कर दिया है।
पिछले दिनों दिल्ली आए संघ प्रमुख मोहन भागवत को बाकायदा आडवाणी को बुलाकर उन्हें जल्द से जल्द अपना उत्तराधिकारी चुनने का फरमान सुनाना पडा। हालांकि इसके लिए कोई समय-सीमा तो नहीं तय की गई है, लेकिन कहा गया है कि अब इस संबंध में और हीला-हवाली बर्दाश्त नहीं की जा सकती। अब यह आडवाणी पर निर्भर है कि इस संबंध में वह अपना निर्णय कब सुनाते हैं। लेकिन, अंदर की खबर यह है कि आडवाणी आसानी से हाथ खडा करने को तैयार नहीं। वह अब भी प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले हुए हैं। उन्हें लगता है कि अगर उत्तराधिकारी की घोषणा हो गई, तो उनके हाथ से यह मौका निकल जाएगा। यही वजह है कि वह ठोंक बजाकर नेता विपक्ष के रूप में पांच साल का कार्यकाल पूरा करने का इरादा जता रहे हैं। संघ के दबाव के बावजूद। इतना ही नहीं वह अपनी लॉबी के लोगों को पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर काबिज करवाकर अपने बचाव के लिए घेराबंदी की कोशिशों में भी जुटे हुए हैं। इसमें संघ आडे आते दिखा, तो उसे पार्टी से दूर रहने की अप्रत्यक्ष चेतावनी भी दे दी गई। विदित है कि भाजपा को संघ के नियंत्रण से आजाद करने के स्वर भी उन्हीं नेताओं ने छेडे हैं, जिन्हें आडवाणी का करीबी माना जाता है। ऐसे नेता नहीं चाहते कि आडवाणी कमजोर पडें। कारण, इससे उनके हित भी प्रभावित होंगे। लिहाजा वे आडवाणी पर भी हथियार न डालने का दबाव बना रहे हैं। पर संघ भाजपा को खुला छोडने को तैयार नहीं। न ही वह इस मामले में अब और इंतजार करने को राजी है। वह हर हाल में इस मुद्दे पर शीघ्रातिशीघ्र अंतिम निर्णय तक पहुंचना चाह रहा है। ऐसी परिस्थिति में हाल तक भाजपा और संघ के बीच चल रहा द्वंद्व अब आडवाणी बनाम संघ में तब्दील हो गया है। संभव है कि आने वाले दिनों में यह लडाई खुलकर भी सामने आए।
हालांकि संघ प्रमुख मोहन भागवत इस मामले का अमर्यादित ढंग से हल निकालने से बचना चाहतेे हैं। वह चाहते हैं कि आडवाणी खुद ही सम्मानजनक ढंग से अपना निर्णय सुना दें। कारण, भागवत के आडवाणी से हमेशा से अच्छे रिश्ते रहे हैं। उनके पिता ही कभी आडवाणी को संघ में लेकर आए थे। लेकिन, संघ के दूसरे नेताओं के दबाव के आगे भागवत भी मजबूर हैं। वह ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकते, जो संघ के प्रतिकूल हो। लिहाजा, उन्हें भी आडवाणी को दो टूक कहना पड रहा है कि वह युवा नेताओं को आगे आने के लिए रास्ता साफ करें। और वह भी जितनी जल्दी हो सके उतनी। वर्ना संघ को मजबूर होकर अपने सिरे से कदम उठाने होंगे। यहां दोनों पक्षों की अपनी-अपनी मजबूरियां हैं। इसी मजबूरी ने संघ और आडवाणी को एक-दूसरे के सामने ला खडा किया है। संघ भाजपा को स्वतंत्र नहीं छोडना चाहता और आडवाणी संघ का दबाव नहीं सहना चाहते। दोनों पक्षों की इसी सोच से तलवारें तनने वाली स्थिति पैदा हुई है। वहीं संघ और आडवाणी के बिच छिडी इस लडाई से भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेताओं के दरम्यान नेतृत्व को लेकर चल रहा घमासान भी फिर से सतह पर आता नजर आने लगा है। आडवाणी का उत्तराधिकारी बनने को लेकर पार्टी के नेताओं में दांव-पेंच तेज हो गए हैं। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह का कार्यकाल दिसंबर में खत्म हो रहा है। इसे देखते हुए आडवाणी समर्थक नेताओं ने इस पद पर भी अपनी नजरें गडा दी हैं। संसद के अहम पदों पर तो आडवाणी समर्थक नेताओं ने पहले से ही कब्जा जमाया हुआ है। अब अध्यक्ष पद की कुर्सी को लेकर भी उन्होंने अपनी चालें चलनी शुरू कर दी हैं। इसने आडवाणी विरोधी नेताओं के कान खडे कर दिए हैं। वे संघ को मोहरा बनाकर जवाबी चालें चल रहेे हैं। सूत्र बताते हैं कि संघ के कई बडे नेता भी चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने खेमे में बंटे भाजपा नेताओं की राजनीति में शामिल हो गए हैं। कोई आडवाणी के हिसाब से दांव चल रहा है, तो कोई राजनाथ के साथ चल रहा है। अपने-अपने पसंद के नेता के लिए सभी बिसात बिछाने में लग गए हैं। संघ बनाम आडवाणी की जंग में अगर आडवाणी खेमा राजनाथ की कुर्सी पर नजरें जमा रहा है, तो राजनाथ घडे की नजर लोकसभा में आडवाणी के पद पर है। इससे भाजपा में नेतृत्व की लडाई के निकट भविष्य में और भडकने की संभावना है।
बताया जाता है कि आडवाणी विरोधी खेमा संघ बनाम आडवाणी की जंग को और हवा देने में लगा है। इसके लिए बाकायदा मीडिया का सहारा भी लिया जा रहा है। ऐसी खबरें छपवाई जा रही हैं, जिससे लगे कि आडवाणी संघ को मुंह चिढाने में लगे हैं। ताकि आडवाणी और संघ के नेताओं में खटास बढे। आडवाणी विरोधी नेताओं को लग रहा है कि यह लडाई जितनी धार पकडेगी, उनके लिए रास्ते उतने ही आसान होंगे। कारण, अंत में वही होगा जो संघ चाहेगा। और संघ फिलहाल आडवाणी की विदाई चाह रहा है। पर्दे के पीछे चल रहे इस खेल से भाजपा में जारी गुटबाजी के और गहराने की आशंकाएं तैरने लगी हैं। राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष के पद से वसुंधरा राजे की विदाई को लेकर जैसा तमाशा हुआ, वह इसी की कडी है। हालांकि अब तक आडवाणी संघ पर भारी ही पडे हैं। भले ही जिन्ना प्रकरण के बाद उन्हें अध्यक्ष की कुर्सी छोडनी पडी, लेकिन खुद को पीएम इन वेटिंग घोषित करवाने में वह कामयाब रहे। इसे आडवाणी खेमे के नेताओं ने अपनी ताकत बतौर मीडिया में प्रचारित करवाया। खबरें आती रहीं कि आडवाणी संघ पर हावी हैं। इससे उनकी लॉबी के नेताओं में उत्साह भी भरता रहा। पर लोकसभा चुनावों के बाद आडवाणी खेमे के नेताओं को लगने लगा है कि उनपर एक सोची समझी साजिश के तहत हमले किए जा रहे हैं। उन्हें कमजोर करने के दृष्टिगत, ताकि पार्टी पर दूसरे घडे के लोग काबिज हो सकें। उत्तराखंड में खंडूरी को मुख्यमंत्री पद से हटाया जाना और अब राजस्थान में विपक्ष की नेता वसुंधरा को हटाने को लेकर हुए तमाशे को इसी साजिश का हिस्सा माना गया। इसने भाजपा में गुटबाजी की राजनीति को नया मोड दे दिया है। आडवाणी भले ही सार्वजनिक तौर पर संघ और अपने विरोधियों की मुहिम की मुखालफत न कर रहे हों, पर खतरे को वह भी भांप रहे हैं। यही वजह है कि अंदर ही अंदर वह अपने दबदबे को बरकरार रखने के प्रति गंभीर हो गए हैं। उनकी इसी गंभीरता से संघ विचलित है।
एक तरफ संघ भाजपा में नई पीढी को आगे बढाने की कवायद कर रहा है, तो वहीं आडवाणी पार्टी को पूरी तरह अपने नियंत्रण में करने की रणनीति पर चल रहे हैं। इससे दोनों के बीच तलवारें खिंचनी स्वाभाविक है। जिस तरह आडवाणी अडे हुए हैं, उससे इस लडाई के और खतरनाक रूप अख्तियार करने की संभावना है। संघ अब हर जगह अपने वफादारों को बिठाना चाह रहा है, चाहे वह प्रदेश इकाई की बात हो चाहे केंद्र में। वहीं आडवाणी के खेमे में अब ज्यादातर वैसे लोग हैं, जिन्हें संघ पसंद नहीं करता। हिंदुत्व के रथ पर सवार होकर राजनीति के अहम मुकाम पर पहुंचे आडवाणी की हिंदुत्व से बढती दूरी भी संघ को रास नहीं आ रही। यही वजह है कि संघ आडवाणी की विदाई कर भाजपा में नए सिरे से ऊर्जा भरने की कोशिश कर रहा है और आडवाणी उदारवादी छवि के सहारे सियासत के अपने आखिरी सपने को पूरा करने की। इसके लिए वह संघ से भी दो-दो हाथ करने से पीछे नहीं रहेंगे। इसका संकेत उन्होंने भागवत से हुई मुलाकात के बाद दिया भी। यह कहते हुए कि प्रतिपक्ष के नेता के तौर पर उनका इरादा पूरे पांच साल तक काम करने का है।
गौरतलब है कि आडवाणी का ऐसा रुख वर्ष 2005 में भी देखने को मिला था, जब पाकिस्तान में उन्होंने जिन्ना की घर्मनिरपेक्ष छवि की प्रशंसा की थी। तब संघ ने उन्हें सीघा संदेश दिया था कि वह अध्यक्ष का पद छोड दें। आडवाणी तब भी आसानी से हार मानने को तैयार नहीं हुए थे। लेकिन, अंतत: 6 महीने बाद संघ के दबाव में उन्हें पद छोडना पडा था। अब संघ ने उन्हें फिर फरमान सुनाया है, नेता प्रतिपक्ष का पद छोडें और अपने उत्तराधिकारी का नाम बताएं। और इस बार भी आडवाणी हार नहीं मानने का संकेत दे रहे हैं। तो क्या, इस बार भी आखिरकार आडवाणी ही हार मानेंगे या फिर बदले हालात में संघ को झुकना पडेगा। फिलहाल दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। हां, लडाई जरूर आर-पार की बनती दिख रही है। अंजाम जो भी हो, रोचक होगा। इंतजार करें।
लौह पुरुष का चिंतन चक्र
लोकसभा चुनावों में हार के बाद से ही आडवाणी पार्टी में अपने विरोधियों के निशाने पर हैं। जून में जब पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होने वाली थी, तब भी आडवाणी विरोधी खेमे के नेताओं ने इसमें हार की समीक्षा करने की मांग की थी। लेकिन, तब असंतोष के उभरे स्वर को यह कह कर शांत कर दिया गया था कि इसपर 21 जुलाई से शिमला में होने वाली चिंतन बैठक में चर्चा होगी। अब जब चिंतन बैठक का वक्त आया, तो आडवाणी चुनावी हार की जगह आगे की रणनीति पर विचार करने की बात कहने लगे। समीक्षा की मांग करने वाले यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी जैसे नेताओं को तो बैठक में बुलाया भी नहीं गया। इसने आडवाणी के खिलाफ पार्टी नेताओं में उबल रहे गुस्से को और भडका दिया है। वे आरोप लगा रहे हैं कि चूंकि लोकसभा चुनाव के लिए रणनीति बनाने का काम आडवाणी और उनके करीबी नेताओं ने किया था, इसलिए वे हार पर चर्चा करने से कतरा रहे हैं। कारण, हार पर चर्चा हुई तो उनकी असफलता उजागर हो जाएगी।
वहीं आडवाणी खेमे के नेताओं का मानना है कि हार पर चर्चा करने से अब कोई फायदा नहीं। उल्टे इससे टकराव ही बढेगा। वे तो चिंतन बैठक की जरूरत पर ही सवाल उठा रहे हैं। यह कहते हुए कि जब देश में स्वाइन फलू और जबरदस्त सूखे की स्थिति पैदा हो रही है और आम चुनाव भी अभी काफी दूर हैं, तो चिंतन बैठक का क्या औचित्य है। लेकिन, संघ ने इस बैठक के लिए एजेंडा तय कर दिया है। इस हिदायत के साथ कि हार पर समीक्षा जरूर हो। यही वजह है कि आडवाणी के विरोधी इस बैठक को लौह पुरुष पर हमला तेज करने का मंच मान रहे हैं। भले ही यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे नेता इसमें हिस्सा नहीं ले रहे, लेकिन मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह और विनय कटियार जैसे लोग आडवाणी की परेशानी बढा सकते हैं। इस चिंतन बैठक में पार्टी उपाध्यक्ष बाल आप्टे हार के कारणों पर रिपोर्ट भी पेश करेंगे। बताया जाता है कि इसमें उन्होंने राष्ट्रीय नेताओं की नाकामी, चुनाव प्रबंधन की गडबडी और शीर्ष पर कलह को प्रमुख वजह बताया है। स्वाभाविक है कि इसकी गाज आडवाणी पर ही गिरेगी।
बताया जाता है कि भाजपा की बीमारी को दूर करने का जो फार्मूला संघ ने खोजा है, उससे न सिर्फ आडवाणी बल्कि उनके करीबियों को भी अपने लिए खतरा महसूस हो रहा है। इसी को देखते हुए वे अब आर-पार को तैयार हो रहे हैं। हालांकि कुछ लोग वक्त की नजाकत और संघ की ताकत के मद्देनजर पाला बदलने पर भी विचार कर रहे हैं। राजनाथ सिंह को भी संघ के इलाज में अपने लिए मुसीबतें नजर आ रही हैं। लेकिन, वह संघभक्ती के सहारे उससे पार पाने की चेष्टा कर रहे हैं।
इस दवा से दुआ भली
बुलंदशहर के राकेश शर्मा को शरीर में कैल्सियम की कमी की शिकायत थी। इसकी वजह से उसे कई तरह की परेशानियां हो रही थीं। उसने दिल्ली के जयप्रकाश नारायण अस्पताल में डॉक्टरों को दिखाया, तो उन्होंने परीक्षण के बाद उसे कुछ दवाइयां लिख दीं और इसे पाबंदी के साथ खाने की हिदायत दी। राकेश ने दिल्ली के ही एक बाजार से दवाई खरीदी और उसका नियमित सेवन करने लगा। लेकिन, ठीक होने की बजाए उसकी हालत और खराब होने लगी। उल्टे उसे कुछ नई बीमारियों ने जकड लिया। जब दोबारा डॉक्टरों ने उसकी और खाई जा रही दवाइयों की जांच की, तो पाया कि वे सब की सब नकली हैं। उन्हीं की वजह से राकेश की बीमारी और ज्यादा गंभीर हो गई थी। दरअसल, देश के बाजारों में जीवनरक्षक दवाओं के नाम पर जो मौत बांटी जा रही है, यह घटना उसका महज एक उदाकरण है। ऐसे न जाने कितने लोग जिंदगी देने वाली दवाइयों के नाम पर बाजार में बिक रही नकली दवाइयां खा कर असमय मौत के गाल में समा रहे हैं। जी हां, सुनने में आपको यह अटपटा जरूर लगेगा। पर यह सौ फीसद सच है। एक कडवा सच। आंखें खोल देने वाला सच।
बताया जाता है कि भारत के बाजारों में बिक रही दवाओं में करीब 40 प्रतिशत दवाएं नकली व घटिया हैं। लाखों-करोडों लोग हर रोज ऐसी ही दवाइयों का सेवन कर रहे हैं। यह सोचकर कि इसे खाकर वे तंदुरुस्त बनेंगे। पर हकीकत यह है कि इन नकली और घटिया दवाइयों को खाकर वे और बीमार हो रहे हैं। यानी एक रोग के उपचार के बदले दूसरे रोग को न्योता। इस बात की पुष्टि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी की है। केंद्र सरकार को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में उसने दावा किया है कि देश में नकली व मिलावटी दवाओं का कारोबार कुल दवाओं के कारोबार का करीब 35 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इतना ही नहीं, कानून प्रवर्तन एजेंसियों की खामियां, जांच प्रयोगशालाओं की कमी व राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण नकली दवाओं का धंधा सालाना 25 प्रतिशत की दर से बढता ही जा रहा है। मौत के सौदागरों ने अपना जाल देश के लगभग सभी महत्वपूर्ण राज्यों में फैला लिया है। यही वजह है कि नकली दवाओं का कारोबार सालाना 7 हजार करोड रुपए को पार कर चुका है। दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान, प. बंगाल, महाराष्ट्र, झारखंड जैसे राज्यों को तो इसने पूरी तरह अपनी चपेट में ले ही लिया है, नए इलाकों में भी यह लगातार फैलता जा रहा है। हैरत तो यह है कि केंद्र सरकार भी यह स्वीकार कर रही है कि बाजार में नकली दवाएं बिक रही हैं। लेकिन, इस दिशा में विशेष कदम नहीं उठाए जा रहे।
शुक्रवार ने जब इस काले धंधे की तह में जाने की कोशिश की, तो पता चला कि सारा खेल बडे ही सुनियोजित और संगठित तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। इसमें दवा माफियाओं के साथ सरकारी तंत्र और राजनेताओं की भी संलिप्तता है। देश की राजधानी दिल्ली नकली दवा के कारोबार के कॉकस का केंद्र है। यहां से इसका नेटवर्क देश के अन्य राज्यों के साथ-साथ विदेशों तक फैला हुआ है। यही वजह है कि अक्सर विदेशों में नकली दवाओं की खेप के पकडे जाने पर भारत का नाम उछलता है। लेकिन बावजूद इसके इस नेटवर्क को ध्वस्त करने की खास कोशिश न तो सरकारी स्तर पर हो रही है और न ही प्रशासनिक स्तर पर। हालांकि इस मुद्दे पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद का कहना है कि नकली दवाओं के कारोबार से जुडे लोगों पर नकेल कसने के लिए जल्दी ही एक कडा कानून लाया जा रहा है। इसके तहत नकलीी दवा के धंधे से जुडे मामलों की शीघ्र सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन के साथ-साथ दोषियों को उम्रकैद की सजा का प्रावधान किया गया है। साथ ही खुफिया तंत्र को भी मजबूत किया जा रहा है। इस कारोबार की सूचना देने वाले मुखबिरों को भी पुरस्कृत करने की योजना है, ताकि इस काले धंधे पर अंकुश लगाने की दिशा में कोई कमी न रहे। सरकार ड्रग्स और कॉस्मेटिक्स कानून 1940 को और कडा बनाने की कवायद भी कर रही है।
लेकिन, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन से जुडे अधिकारियों को सरकार की इस पहल को लेकर अभी भी शंका है। कारण, पहले भी इस कारोबार पर शिकंजा कसने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ।
वर्ष 2003 में भी एनडीए के शासनकाल में नकली दवाओं के कारोबार पर रोक लगाने की पहल की गई थी। आरए माशेलकर समिति का गठन कर। इसने मौत का कारोबार करने वालों को मौत की सजा की सिफारिश की थी। लेकिन, यह प्रस्ताव संसद में पास नहीं हो पाया। कहा जाता है कि तब इसके खिलाफ कई दवा कंपनियां और राजनेता ही खडे हो गए थे। वैसे नकली दवाओं के खेल में कई दवा कंपनियों, राजनेताओं, संबंधित सरकारी विभागों के लोगों और पुलिस प्रशासन पर अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि वे मोटी कमाई के चलते इस नेटवर्क को तोडने की जहमत नहीं करते। कार्रवाई के नाम पर महज खानापूर्ति होती है। कहने को तो नकली दवाओं पर नकेल कसने के लिए केंद्र सरकार में एक ड्रग कंट्रोलर विभाग और राज्य स्तर पर ड्रग्स कंट्रोलर व ड्रग्स निरीक्षक होते हैं, लेकिन ये भी इस धंधे से काली कमाई में ही जुटे हैं। लिहाजा यह मर्ज बढता ही जा रहा है।
दिल्ली से सटे गाजियाबाद, मेरठ, फरीदाबाद, नोएडा, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में ही नकली दवाओं की कई छोटी-छोटी इकाइयां काम कर रही हैं। जहां बडी कंपनियों के लेबल लगाकर नकली व घटिया दवाएं बनाई जाती हैं। इसे बडे ही सुव्यवस्थित तरीके से देश के बाजारों में बेचने के लिए उतार दिया जाता है। चूंकि बडी कंपनियों की दवाओं और छोटी कंपनियों की दवा की कीमतों में 300 से 400 फीसदी तक का अंतर होता है। ऐसे में दवाओं के डिस्ट्रीब्युटर छोटी कंपनियों की दवाईयों पर बडी कंपनियों का लेबल लगा माल ले लेते हैं और उसे खुदरा विक्रेताओं के माध्यम से ग्राहकों को असली कंपनी के रेट पर बेचते हैं। इस धंधे में औषधि निरीक्षक से लेकर डिस्ट्रब्युटर और रिटेलर से लेकर एजेंट तक शामिल होते हैं। इसमें हर किसी का अपना-अपना मुनाफा तय होता है। गौरतलब है कि दवाओं के निर्माण में भारत का दुनिया में 10 वां स्थान है। लेकिन, नकली दवाओं के निर्माण में यह सबसे ऊंचे पायदान पर पहुंच चुका है।
जानकार कहते हैं कि दरअसल देश में दवाओं की कंपनियों को लाइसेंस देने की प्रक्रिया बहेद लचीली है। जबकि उनकी जांच के संसाधन बहुत थोडे। इस वजह से भी नकली दवाओं के कारोबार पर अंकुश लगाने में नाकामी हाथ लग रही है। गौरतलब है कि इस वक्त दवाओं की जांच के लिए पूरे देश में मात्र 37 सरकारी प्रयोगशालाएं हैं। उनमें से भी महज 7 इस समय काम कर रही हैं। ठीक उसी प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर केवल 35 औषधि निरीक्षक हैं, जबकि प्रदेशों में कुल 1000 निरीक्षक। इस तथ्य के बावजूद कि देशभर में खुदरा दवाइयां बेचने की दुकानें 6 लाख से ज्यादा हैं और आबादी एक अरब से अधिक। दिल्ली में ही दवा बनाने की छोटी-बडी 139 फैक्ट्रियां और लगभग 10 हजार दवा की दुकानें हैं। लेकिन ड्रग कंट्रोला विभाग के पास सिर्फ 28 निरीक्षक और दो सदस्यीय एक इंटेलिजेंस टीम है। ऐसे में दवा कंपनियों के नमूनों की जांच कैसे होती होगी, आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। जांच के नाम पर महज खानापूर्ति होती है। सारी प्रक्रियाएं कागजों पर होती हैं। इससे दवाओं की गुणवत्ता क्या होती होगी, समझा जा सकता है। ड्रग्स कंट्रोलर व निरीक्षकों के काम करने के तरीके से भी लोग अच्छी तरह वाकिफ हैं। हैरत की बात तो यह है कि दवाओं की असली फैक्ट्री में ही नकली दवाएं बनाई जा रही हैं। दवा निर्ताता कंपनी के रूप में पंजीकृत छोटी कंपनियां बडी कंपनियों का लेबल लगाकर अपने घटिया माल बाजार में उतार रही हैं। उन्हें किसी बात का भी खौफ नहीं। इन दवाइयों की पेकेजिंग भी ऐसेकी जाती है कि देखकर कोई भी इसे नकली नहीं बता सकता। यहां तक कि डॉक्टर भी इसमें धोखा खा जाते हैं। कारण, ये देखने में बिल्कुल असली दवाइयों जैसे होते हैं। फर्क होता है, तो सिर्फ कच्चे माल में। इस तरीके से बनी दवाइयां मर्ज तो ठीक नहीं करतीं, उल्टे रोगी को और बीमार बना डालती है। इन दवाइयों से मोत की खबर भी अक्सर आती रहती है।
नकली दवाओं के कारोबार में बेहिसाब काली कमाई का ही नतीजा है कि दिल्ली और पंजाब के कई बडे दवाई डिस्ट्रीब्युटरों ने अब अपनी खुद की इकाइयां लगा ली हैं। दिल्ली से लगे बहादुरगढ और पंजाब के कई कस्बों में इन लोगों की फैक्ट्रियां चल रही हैं, जहां नामचीन कंपनियों के ब्रांडों को बनाया जा रहा है। भारत न सिर्फ नकली दवाओं के एक बडे उत्पादक देश के रूप में बदनाम हो रहा है, बल्कि ऐसी दवाओं को खपाने का बडा अड्डा भी बनता जा रहा है। यही वजह है कि चीन, नेपाल और बर्मा से भी बडी संख्या में नकली दवाएं भारत आ रही हैं। इन्हें प्राइवेट नर्सिंगहोम और निजी अस्पतालों के जरिए खपाया जा रहा है। इस धंधे में सरकारी अधिकारियों के लिप्त होने की बात तो पता चली ही है, साथ ही बडी कंपनियों में कार्यरत लोग भी पैसों के लालच में लोगों के जीवन से खिलवाड कर रहे हैं। दिल्ली के भगीरथ पैलेस को राजधानी का सबसे बडा दवा बाजार कहा जाता है। इस बाजार में देश की नामी कंपनियों के डीलर तो हैं ही, साथ ही नकली दवाईयां बेचने वाले कारोबारी भी बडी संख्या में हैं। दवाइयों की इस मंडी में रोज करोडों रुपयों का कारोबार होता है, जिसमें से पचास फीसदी नकली या डुप्लीकेट दवाईयों की सप्लाई से जुडा होता है। भगीरथ पैलेस से जुडे एक कारोबारी का कहना है कि अब हमने अपने ग्राहकों को हर दवाई पर साइन करके देना शुरू कर दिया है। अगर ग्राहक को लगे कि वह नकली है, तो वह जांच करवा सकता है। लेकिन, महज इतने भर से इस काले कारोबार को फलने-फूलने से नहीं रोका जा सकता। देश में नकली दवाओं का नासूर कडे कानून से ही रोका जा सकता है, वरना मौत के सौदागर लोगों के जीवन से इसी तरह की खिलवाड करते रहेंगे। और जिंदगी के नाम पर बांटी जाती रहेगी मौत।
जरूरी है सावधानी
दवाईयां अपने किसी विश्वसनीय कैमिस्ट से ही खरीदें और उसकी रसीद जरूर लें। संभव हो तो विक्रता से दवाई के रैपर पर हस्ताक्षर करवा लें। अगर दवाई से फायदा न हो, तो उसे डॉक्टर को जरूर दिखाएं। दवा के नकली होने के संदेह की स्थिति में औषधि नियंत्रक से इसकी शिकायत कर सकते हैं। अगर आपके रिहायश के स्थान पर जांच प्रयोगशाला हो, तो आप वहां भी दवाई की शुद्घता की जांच करा सकते हैं। नकली साबित होने पर पुलिस में शिकायत कर सकते हैं। खासकर क्रोसिन, वोवेरनएसआर-100, स्लो डिक्लोफेनिक, बीटाडीन, एसबीएस की पीसी-200, सिपला की एमटी पिल, फाइजर की वियाग्रा, इनवास की ओमेज, मैथरजिन, कैल्सियम की गोलियां या इंजेक्शन, एनालजेसिक टैबलेट, एंटासिड और कोसाविल सिरप खरीदते वक्त विशेष सावधानी बरतें।
उतरी या उतारी
शाहरुख खान एक बेहतरीन अदाकार हैं। देश-विदेश में उनके लाखों-करोडों प्रशंसक हैं। उस अमेरिका में भी, जहां के नेवार्क हवाई अड्डे पर आपजन (इमीग्रेशन) अधिकारियों ने उन्हें हिरासत में लेकर दो घंटे तक पूछताछ की। बकौल शाहरुख इस दरम्यान वह लगातार उनसे यह कहते रहे कि वह एक फिल्म स्टार हैं और अमेरिका अक्सर आते-जाते रहते हैं। यहां उनके कई बडे जानने-पहचानने वाले लोग हैं। लेकिन, उनकी एक नहीं सुनी गई। उल्टे उनसे कडी पूछताछ की जाती रही। अधिकारियों की इस बेरुखी पर शाहरुख का कहना है कि उन्हें इसलिए परेशान किया गया, क्योंकि उनके नाम के साथ खान जुडा हुआ है। यानी उनके नाम से साफ तौर पर झलकता है कि वह एक मुसलमान हैं। और यही वजह है कि उनसे आतंकवादियों की तरह जिरह की गई। खैर....शाहरुख की इस शिकायत पर हर तरफ से प्रतिक्रियाएं आईं। लोगों ने अमरीका के ऐसे व्यवहार पर खूब हमले बोले। यह कहते हुए कि उनकी हमेशा से यह आदत रही है, बाहर मुल्क के लोगों की बेइज्जती करने की। केंद्र सरकार ने तो बाकायदा इसे लेकर अमरीकी सरकार से जवाब-तलब करने का भी फैसला किया है। लेकिन, एक तबका ऐसा भी है जो इस मुद्दे पर मचे कोहराम को बेजा बता रहा है। उनकी राय है कि अमरीका में इस तरह की जांच प्रक्रिया एक आम बात है, इस पर हाय-तौबा नहीं मचाना चाहिए।
ऐसी सोच रखने वालों में बॉलीवुड के ही एक और सुपरस्टार सलमान खान भी हैं। क्रिकेटर हरभजन सिंह और जनता पार्टी सुप्रीमो सुब्रमण्यम स्वामी भी इस राय से इत्तेफाक रखते हैं। इनका मानना है कि धर्म का रंग देकर बेवजह इस मामले को तील का ताड बनाया जा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि अमरीका में हर धर्म के लोगों को इस तरह की परेशानियों से गुजरना पडा है। सलमान खान तो यहां तक कह गए कि जब वह अमरीका जाते हैं, तो उन्हें भी ऐसी जांच से गुजरना पडता है। और यह पूरी तरह से उचित है। इस कडे सुरक्षा उपाय के कारण ही तो 9/11 के बाद अमरीका में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ। गौरतलब है कि रक्षा मंत्री रहते जार्ज फर्नांडीस, विदेश मंत्री रहते प्रणव मुखर्जी, लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी, भूतपूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम समेत कई और बडी हस्तियों को भी कभी न कभी हवाई अड्डों पर ऐसी जांच प्रक्रिया का सामना करना पडा है। कलाम का मामला तो पिछले दिनों संसद में भी गूंजा। लेकिन, इसे न तो भूतपूर्व राष्ट्रपति ने धर्म से जोडा और न ही सियासी दलों के नेताओं ने। शाहरुख ने जरूर अपने साथ हुई घटना को मजहब के साथ जोडकर उस पुराने सवाल को जिंदा कर दिया है कि मुसलमान होने का खामियाजा लोगों को भुगतना पडता है। कभी ऐसा ही आरोप क्रिकेटर अजहरुद्दीन ने लगाया था। मैच फिक्सिंग के आरोपों से घिरने के बाद अजहर ने कहा था कि उन्हें मुसलमान होने के नाते निशाना बनाया गया। हालांकि यह सभी जानते हैं कि इस प्रकरण की भेंट मनोज प्रभाकर और अजय जडेजा जैसे लोगों का करिअर भी चढा, जो मुसलमान नहीं थे। अजहरुद्दीन को अगर मुसलमान होने की वजह से भेदभाव का सामना करना पडता, तो वह हरगिज कभी भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान नहीं बनाए जाते। और न ही देश की अधिसंख्य हिंदू जनता उन्हें अपने सिर-आंखों बिठाती।
अभी हाल ही में अभिनेता इमरान हाशमी ने भी यह कह कर लोगों को सकते में डाल दिया था कि मुसलमान होने की वजह से ही उन्हें मुंबई में घर नहीं मिल रहा। इस पर खूब बवाल भी मचा। अंतत: ऐसी टिप्पणी के लिए उन्हें माफी भी मांगनी पडी। मुस्लिम होने के नाते अपने साथ भेदभाव होने के आरोप और भी कई लोग लगा चुके हैं। खुद को सेक्यूलर विचारधारा की सबसे बडीी पैरोकार होने का दावा करने वाली अभिनेत्री शबाना आजमी ने भी कभी कुछ ऐसी ही बातें कही थीं। तब भी सवाल उठे थे कि ऐसे आरोप कितने जायज हैं? शाहरुख का नया मामला जरूर देश से बाहर का है, लेकिन विरोध की प्रकृति वही पुरानीी है। अब तो मुस्लिम लोग ही खुलेआम यह कहने लगे हैं कि यह ऐसे लोगों का हथकंडा है। प्रचार पाने या फिर मुसीबत में पं*सने पर अपने लिए उन्माद पैदा करवाने के लिए। ऐसी राय रखने वाले एक पढे-लिखे मुसलमान युवक की टिप्पणी थी, सेलिब्रिटीज के लिए धर्म तभी मुद्दा बनता है, जब उन्हें परेशानियों से घिरना पडता है। और परेशानियां भी उनकी अपनी वजह से, न कि मुसलमान होने के कारण। जब हम जैसे आम मुसलमान को धर्म की वजह से कहीं कोई दिक्कत नहीं आती, तो इन जैसे बडे लोगों को क्या दिक्कत आएगी। जब इनके सितारे गर्दिश में हों या अपने बुरे कर्मों की वजह से इनपर आफत आती है, तो ये सहानुभूति बटोरने और अपने बचाव के लिए मुसलमान होने का मुद्दा उठा देते हैं। जबकि हकीकत यह है कि इनमें से शायद ही कोई नमाज पढने की भी जहमत करता होगा।
वहीं कई बुद्घिजीवियों का कहना है कि शाहरुख खान जैसे स्टेटस वाले लोगों को हवाई अड्डे पर अधिकारियों द्वारा परेशान किए जाने पर विरोध तो जताना चाहिए, पर इसे धर्म के साथ जोडना गलत है। यह कहीं न कहीं सांप्रदायिक भावनाओं को ही हवा देती है और समाज में एक विभाजन की लकीर खिंचती है। भारत में भी कई मुस्लिम हस्तियां अक्सर ऐसे आरोप लगाती रही हैं, इससे तो सामाजिक ताने-बाने और धार्मिक सद्भावना को ही चोट पहुंचती है। जबकि सच्चाई यह है कि भारत में धर्म को लेकर सियासतदानों की कुचेष्टा के बावजूद आज भी वह दरार पैदा नहीं हो पाई है, जो एक दूसरे को नफरत के दलदल में उतार सके। फिलहाल शाहरुख मामले ने धार्मिक भेदभाव के मुद्दे को एक नए मोड पर जरूर ला खडा किया है, जहां यह तय होना है कि यह हमला है या हथियार? किंग खान की नई फिल्म माई नेम इज खान में शायद इस का जवाब मिल जाए।
सोमवार, 20 जुलाई 2009
‘नवाबी शौक’ के पीछे
दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल के अपने फैसले में समलैंगिक रिश्तों को वैध ठहराने के पीछे जो तर्क दिया है, उसके अनुसार समलैंगिकता कोई बीमारी नहीं, बल्कि मनुष्य की ‘काम’ इच्छा की एक अन्य अभिव्यक्ति भर है। लिहाजा, इसे कोई अपराध नहीं माना जा सकता। कुछ इन्हीं तर्कों के साथ विश्व के अन्य देशों की सरकारों ने भी इस रिश्ते को मान्यता दी है। हालांकि, यह अलग बात है कि आज भी अधिकांश लोगों के लिए यह एक पाप है, जिसे मान्यता देना समाज के मुंह पर कलंक थोपने के समान है। लेकिन, समाज में इसका समर्थन करने वाले भी अब खुलकर सामने आते दिख रहे हैं। कई बडी-बडी हस्तियों, मसलन महेश भट्ट, जॉन अब्राहम, सेलिना जेटली ने तो बाकायदा इसे लोकतंत्र में व्यक्ति को मिलने वाले स्वतंत्रता के अधिकार के साथ जोडकर देखा है। वैधता मिलने पर हर्ष भी जताया है।
दरअसल, समलैंगिकता को कानूनी मान्यता देने की प्रक्रिया १९८९ में डेनमार्क से शुरू हुई थी। वह पहला देश था, जिसने समलैंगिक जोडों को विवाहित दंपति के बराबर का दर्जा दिया था। इसके बाद अन्य देशों में ऐसे संबंध रखने वाले और इसका समर्थन करने वाले तो जैसे खुलकर सामने आ गए। १९६० के दशक के अंत में अमरीका के स्टोनवाल पब से शुरू हुए दंगों से जन्मा ‘गर्व से कहो कि हम गे हैं’ का नारा पश्चिमी समाज में एक मानवाधिकार आंदोलन में तब्दील हो गया। तभी, चंद वर्षों में नार्वे, स्वीडन, आइसलैंड, फिनलैंड, नीदरलैंड, कई अमरीकी राज्यों, दक्षिण अफीक्रा, नेपाल जैसे १२० से ज्यादा देशों में इसे वैधानिकता का आवरण मिल गया। लडाई अब भी जारी है। कहीं कानूनी मान्यता के लिए, तो कहीं सामाजिक मान्यता के लिए। कहने वाले लाख कहते रहें कि ऐसी सोच रखने वाले उंगलियों पर गिनती के लोग हैं और समाज को गलत दिशा दे रहे हैं, लेकिन यह सोच लगातार अपना दायरा बढा रही है। देश-दुनिया सब जगह।
पहले यह परदे के पीछे था, आज खुलेआम। इसके पीछे कई लोग पश्चिमी देशों के एक खास वर्ग द्वारा चलाई जा रहीी साजिश तक करार देते हैं। उनका कहना है कि एड्स नियंत्रण के नाम पर बंटने वाले माल और ब्लू फिल्मों के अलग-अलग रूप के माध्यम से धन बटोरने वाले इसे अपने लिए संभावना बतौर देख रहे हैं। यही वजह है कि वे इसे विश्वव्यापी बनाने पर तुले हैं। जबकि ऐसे संबंध रखने वाले लोगों की तादाद न के बराबर है। वहीं ऐसे तर्कों को समलैंगिकता के पैरोकार यह कहकर ठुकराते हैं कि क्या इतिहास में दर्ज नवाबों, सुकरात, टेनिस खिलाडी मार्टिना नवरातिलोवा, हिटलर जैसे अनेकानेक लोग इसी दृष्टिगत ऐसे संबंध बनाते रहे। क्या आज लाखों-लाख आम समलैंगिक लोग वैधता मिलने पर इसीलिए जश्न मना रहे हैं? नहीं, ये उनकी खुशी का इजहार है। लंबे समय से उन्हें दोयम दर्जे का क्यों माना जाता रहा है। उनके कृत्य को अपराध की संज्ञा क्यो दी जाती रही है। इससे मुक्ति पर हर्ष तो स्वाभाविक है।
याद आता है कि कभी भारत में भी लोग ऐसे व्यक्तियों के लिए उपहासस्वरूप आंख मारकर कहते थे, ‘इनके शौक जरा अलग हैं’, ‘इन्हें नवाबी शौक है’ या फिर ‘पटरी से उतरी गाडी’ और ‘राह से भटका मुसाफिर’। इन जुमलों में तंज तो था, पर कहीं न कहीं तिरस्कार की जगह एक तरह की स्वीकार्यता भी। यह कि ऐसे भी होते हैं। समलिंगी यही समझाना चाहते हैं, हां ऐसे होते हैं। होते रहे हैं। स्वाभाविक और सामान्य लोगों की तरह। उनके शारीरिक संबंध का दायरा जरूर थेडा अलग है। लेकिन वे अपराधी नहीं। समाज ने उन्हें मान्यता नहीं दी थी। पर अब उसके लिए भी लडाई लडी जा रही है। आखिर अगर लोग अद्र्घनारीश्वर की पूजा करते हैं, किन्नरों का आशिर्वाद लेते हैं, तो फिर समलैंगिकों को मान्यता देने से गुरेज क्यों? यह धारा सडकों पर उतर चुकी है। अपनी राह बनाने के लिए। और वह बन भी रही है। हम-आप लाख हाय तौबा मचाएं।
बदलो बिहार
लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस अब बिहार में अपनी खोई जमीन को वापस पाने में जुट गई है। राहुल गांधी ने इसके लिए बाकायदा एक रणनीति बनाई है। आखिर क्या है वह रणनीति? और क्या इसके बूते पार्टी प्रदेश में अपनी वापसी में कामयाब हो सकती है? एक आकलन।
पटना के कुर्जी रोड स्थित बिहार प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में कभी सन्नाटा पसरा हुआ करता था। लेकिन, इन दिनों यहां खूब चहल-पहल नजर आती है। लोकसभा चुनावों के बाद संगठन में जो नई ऊर्जा का संचार हुआ है, वह यहां आने वाले नेताओं, कार्यकर्ताओं के चेहरे पर और उनके हाव-भाव से स्पष्ट झलकता है। भले ही चुनावों में कांग्रेस ने महज दो ही सीटें जीती हों, पर पार्टी के लोगों को लगता है कि उन्होंने एक लंबी और महत्वपूर्ण लडाई जीत ली है। और वह है वर्षों से लालू प्रसाद यादव की बंधक बनी कांग्रेस को उस कैद से मुक्ति दिलाने की लडाई। उन्हें लग रहा है कि इसके बाद अब पार्टी के लिए आगे की राह बहुत मुश्किल नहीं होगी। यही वजह है कि अब दोगुने जोश के साथ पार्टी बिहार में अपनी खोई हुई जमीन को दोबारा हासिल करने में जुट गई है।
इस दिशा में पार्टी के महासचिव राहुल गांधी गंभीरता से रणनीतियां बनाने में लगे हैं। उनकी नजर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों पर है। वह चाहते हैं कि चुनावों से पूर्व संगठन को इतना मजबूत कर दिया जाए कि अकेले बूते कांग्रेस दूसरी पार्टियों को चुनौती दे सके। यही वजह है कि लालू की राजनैतिक बेडियों से पार्टी को आजाद कराने के बाद वह संगठन को मजबूत बनाने का खाका बनाने में लगे हैं। इसके तहत पूरी पारदर्शिता के साथ युवा कांग्रेस का सांगठनिक चुनाव कराना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। बाकायदा इसके लिए जल्द ही सदस्यता अभियान भी शुरू किया जा रहा है। हालांकि यह अभियान अन्य प्रदेशों में भी चलाए जा रहे हैं, लेकिन बिहार पर राहुल की खास नजर है। दरअसल, राहुल प्रदेश में अपने लिए ऐसे युवा नेताओं की टीम चाहते हैं, जो किसी लॉबी में न रहते हुए निष्ठा से संगठन के प्रति काम करें। हवा-हवाई नेताओं की जगह वह उन लोगों को तरजीह देना चाहते हैं, जिनमें वाकई क्षमता हो। ऐसे युवाओं की तलाश में जुटे राहुल की संभावित टीम में विनोद शर्मा, सरदार गुरूजीत सिंह, कुमार आशीष, मनोज शर्मा जैसे युवा कांग्रेसियों का नाम लिया जा रहा है। समीर सिंह को भी आने वाले दिनों में खास तवज्जो मिलनी तय है।
विनोद शर्मा लंबे अरसे से कांग्रेस से जुडे रहे हैं। सीताराम केसरी के कार्यकाल के दौरान वह पार्टी की टिकट पर विधानसभा चुनाव भी लड चुके हैं। लोकसभा चुनावों के दौरान उन्होंने महाराजगंज में मीडिया का कार्यभार भली-भांति अंजाम दिया। साथ ही पटना साहिब में कांग्रेस उम्मीदवार शेखर सुमन के साथ भी सक्रियता के साथ चुनाव मैदान में काम करते रहे। अब चुनावों के बाद वह पटना में नीतीश सरकार की नाकामियों से जनता को रूबरू करा रहे हैं। कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष समीर सिंह के साथ कदम से कदम मिलाते हुए वह पार्टी का जनाधार बढाने की कोशिशों में लगे हैं। बताया जाता है कि उनकी इच्छा पालीगंज से विधानसभा का चुनाव लडने की है। सरदार गुरूजीत सिंह भी मोकामा से विधानसभा का चुनाव लड चुके हैं और सक्रिय युवा नेता के तौर पर जाने जाते हैं। मनोज शर्मा युवा कांग्रेस के महासचिव बतौर एक ऊर्जावान और कर्तव्यनिष्ठ यूथ लीडर की पहचान रखते हैं। इन युवा कांग्रेसियों को आने वाले दिनों में राहुल की तरफ से तरजीह दी जा सकती है। गौरतलब है कि कांग्रेस के युवराज ने सन २०१० तक देश के सभी राज्यों में युवा कांग्रेस के चुनाव कराने का लक्ष्य निर्धारित कर रखा है। इसका मकसद क्षमतावान युवा नेताओं को मुख्यधारा में लाना है, ताकि संगठन की मजबूती बढ सके।
युवा कांग्रेस के सांगठनिक चुनाव के साथ ही कांग्रेस महासचिव ने अपने विस्तृत बिहार दौरे का कार्यक्रम भी तय किया है। बाढ प्रभावित कोशी प्रक्षेत्र के उनके दौरे के बाद पार्टी को इस इलाके में उल्लेखनीय सफलता मिली थी। कहा जाने लगा कि कांग्रेस यहां अपने पुराने सुनहरे दिन की ओर लौटने लगी है। इसने अन्य पार्टियों की चिंताएं बढा दी हैं। तभी नीतीश इन दिनों यहां कांग्रेस को जमने से रोकने के लिए अपना विशेष ध्यान लगा रहे हैं। इस इलाके के लिए घोषणाएं और उनके दौरे को इसी से जोडकर देखा जा रहा है। कोशी प्रक्षेत्र के अलावे लोकसभा चुनावों के दौरान राहुल अन्य क्षेत्रों का दौरा नहीं कर पाए थे। अब संसद के बजट सत्र के बाद वह बिहार की यात्रा पर फिर से निकलने वाले हैं। अपने प्रदेश दौरे में वह युवाओं, दलितों और मुसलमानों को पार्टी से जोडने की विशेष पहल करते नजर आएंगे। हालांकि हालिया लोकसभा चुनावों में मुसलमान वोटरों का पार्टी की तरफ रुझान देखने को मिला है, लेकिन कांग्रेस अपने इस परंपरागत वोटबैंक को पूरी तरह अपने पाले में लाने की योजना बना रही है। फिलहाल लालू की पार्टी राजद से छिटके मुस्लिम मतदाता कांग्रेस और कुछ हद तक नीतीश की पार्टी जद (यू) के पक्ष में नजर आ रहे हैं। शायद इसी के मद्देनजर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शर्मा दिवंगत राजीव गांधी के जन्मदिन पर २१ अगस्त से दलितों और मुसलमानों की बस्तियों की पदयात्रा की अपनी योजना का शुभारंभ करने वाले हैं। इस कार्यक्रम की शुरुआत राहुल गांधी ही करेंगे। अनिल शर्मा ने राहुल गांधी के साथ गांव-गांव भ्रमण का भी कार्यक्रम रखा है। प्रदेश के युवा वोटरों को कांग्रेस से जोडने के लिए राहुल सम्मेलनों और विश्वविद्यालयों के दौरे के माध्यम से उनसे संवाद स्थापित करेंगे। कहने का तात्पर्य कि कांग्रेस बपने इस पुराने गढ में दोबारा अपनी पहचान वापस पाने के लिए पूरी तरह बेचैन दिख रही है। राहुल और प्रदेश के नेताओं के साथ-साथ आलाकमान भी इस दिशा में माथापच्ची में उलझा है कि किस तरह कांग्रेस को बिहार में एक मजबूत दल के रूप में खडा किया जाए।
सूत्र बताते हैं कि दिल्ली में भी पार्टी के बडे नेता बिहार में कांग्रेस के लिए उम्मीद देख रहे हैं। यही वजह है कि नई परिस्थितियों में राज्य के सामाजिक और राजनैतिक समीकरण के मद्देनजर वे भी नए सिरे से पार्टी को खडा करने की कवायद में जुट गए हैं। इसके लिए लोकसभा में पार्टी के प्रदर्शन की समीक्षा की जा रही है। देखा जा रहा है कि कहां और क्या पार्टी के लिए फायदेमंद रहा और क्या नुकसानदेह साबित हुआ। केंद्रीय स्तर पर इस हलचल को देखते हुए ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शर्मा व प्रभारी इकबाल सिंह की मुखालफत करने वाले नेता भी सक्रिय हो गए हैं। वे संगठन में बदलाव की जरूरत जता रहे हैं। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष व प्रभारी ने बाहर से आए दल-बदलुओं को टिकट की सिफारिश कर पार्टी का बंटाधार करवाया वर्ना लोकसभा चुनावों में पार्टी कई सीटें जीत सकती थी। गौरतलब है कि इस बार ३७ में से २२ सीटों पर कांग्रेस ने बाहर से आए लोगों को अपना उम्मीदवार बनाया था। जहां तक चुनावों में उसके प्रदर्शन की बात है, तो कुल ३७ सीटों में से सिर्फ २ पर कांग्रेस की जीत हुई और दो पर ही वह दूसरे नंबर पर रही। ३० जगहों पर उसके उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए। एक दर्जन सीटों पर तो कांग्रेस के प्रत्याशियों को २५ हजार से भी कम वोट मिले। इन आंकडों का हवाला देते हुए आलाकमान से संगठन का चेहरा बदलने की मांग की जा रही है। कहा जा रहा है कि अगर कांग्रेस को बचाना है, तो किसी युवा दमदार चेहरे को पार्टी अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए। इसके लिए जिन नामों का सुर्रा छोडा जा रहा है, उनमें अधिकांश अनिल शर्मा के विरोधी के रूप में जाने जाते हैं। मसलन सदानंद सिंह, राम जतन सिन्हा, महाचंद्र सिंह, डॉ अशोक कुमार, विजय शंकर दूबे। विदित हो कि अनिल शर्मा के अध्यक्ष बनने के वक्त इनमें से कई नेता इस पद की दौड में शामिल थे। जब उनकी दाल नहीं गली, तो उन्होंने अनिल शर्मा के खिलाफ एक तरह से मोर्चा खोल दिया। मोर्चेबाजी अब भी जारी है।
हालांकि इससे बेफिक्र अनिल शर्मा लगातार संगठन में अपना कद बढाने में लगे हैं। लालू के साथ मिलकर चुनाव न लडने की वकालत वह पहले से ही करते रहे हैं। राहुल भी ऐसा ही चाहते थे, इसलिए उनकी बात मानी भी गई। यह अलग बात है कि चुनावी नतीजों में इस फैसले का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं आया। लेकिन, लालू की जद से बाहर आकर कांग्रेस में एक उम्मीद जरूर जगी। लोगों के भी इस पार्टी के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव देखा गया। यह बदलाव कांग्रेस के लिए उत्साहजनक है। लेकिन जिस तरह पार्टी में खेमेबाजी चल रही है, उससे उसकी भविष्य की उम्मीदों को पलीता भी लग सकता है। इसी कारण अब जब नए हालात में उसके पुराने वोटबैंक वापस लौटते दिख रहे हैं, तो पार्टी हर कदम फूंक-फूंक कर रखना चाह रही है। शायद यही कारण है कि अनिल शर्मा के खिलाफ विरोधियों की चाल अभी तक कामयाब नहीं हो पाई है। हां, पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व बिहार में जुझारू और युवा नेताओं को भी आगे लाने के पक्ष में जरूर है। शायद इसी को देखते हुए शकील अहमद को बिहार कांग्रेस का नेतृत्व सौंपने की बातें भी उठ रही हैं।
जहां तक शकील अहमद का सवाल है, तो उनके लोकसभा चुनाव में हारने व केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह न मिलने पर इस चर्चा को बल भी मिला था। लेकिन बताया जाता है कि शकील खुद बिहार की राजनीति से दूर रहना चाहते हैं। अपनी यह इच्छा उन्होंने आलाकमान तक पहुंचा दी है। लिहाजा, गांधी परिवार से उनकी नजदीकी के मद्देनजर अब उन्हें एआईसीसी में जगह देने की बात चल रही है। फिलहाल वह प्रवक्ता का दायित्व निभा रहे हैं। लेकिन, आलाकमान बिहार में कांग्रेस के लिए रणनीतियां बनाने में उनकी मदद ले रहा है। शकील भी लालू से संबंधविच्छेद कर चुनावी मैदान में उतरने की वकालत करने वाले प्रमुख लोगों में शामिल रहे थे। शायद यही कारण है कि अब उनकी राय को तवज्जो दी जा रही है, ताकि प्रदेश में कांग्रेस को दोबारा खडा किया जा सके। बताया जाता है कि कांग्रेस आलाकमान दलित, मुसलमानों के साथ ही ब्राह्मण, भूमिहार जैसी उच्च जातियों और पिछडे वर्ग के मतदाताओं को भी पार्टी से जोडने की रणनीति पर काम कर रहा है। संभव है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस संगठन में इन वर्ग के नेताओं को भी उचित प्रतिनिधित्व मिले।
ऐसे में एक सवाल यह भी कि क्या इन रणनीतियों से कांग्रेस प्रदेश में अपनी लोकप्रियता का परचम लहरा पाने में कामयाब होगी। विश्लेषकों का मानना है कि इस वक्त मौका और दस्तूर, दोनों कांग्रेस के साथ है। अगर वह इसे चतुराई से भुनाती है, तो वह प्रदेश में बेहतर भविष्य की उम्मीद कर सकती है। लालू के चंगुल से बाहर आकर पार्टी ने एक सकारात्मक पहल की है, उस पहल को सावधानी से बढाने की जरूरत है। लेकिन इसमें उसे यह ध्यान रखना होगा कि अति-उत्साह में लालू-पासवान की राजनैतिक धारा का अनुसरण न करे। पार्टी में खेमेबाजी पर अंकुश लगाकर ऊर्जावान और क्षमताशाली लोगों को आगे लाना ही कांग्रेस की उम्मीदों को लौ दे सकता है। चाटुकारिता और तानाशाही ने ही कभी यहां कांग्रेस की मिट्टी पलीद कराई थी। अदूरदर्शी फैसले की आग में तभी पार्टी आज तक झुलसती रही। अब जब उसके कार्यकर्ताओं और नेताओं में उत्साह जागा है, तो उस ऊर्जा को बिहार के साथ कांग्रेस की तस्वीर बदलने में इस्तेमाल किया जा सकता है।
टारगेट लालू
बीते ५ वर्षों के दौरान रेलवे के कामकाज, परिचालन और वित्तीय हालत पर श्वेतपत्र लाने का एलान कर ममता बनर्जी ने पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद की मुश्किलें बढा दी हैं। कहा जा रहा है कि यह कदम कांग्रेस की एक सोची-समझी राजनीति का हिस्सा है। आखिर क्या है सच्चाई?
ममता बनर्जी। केंद्र सरकार की रेल मंत्री। लोकसभा में रेल बजट पेश करते हुए जब उन्होंने बंगाल के लिए परियोजनाओं की झडी लगाई, तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। कारण, केंद्र की सत्ता में भागीदार होने के बावजूद बंगाल की शेरनी की नजरें तो राइटर्स बिल्डिंग पर ही टिकी हुई हैं। यानी पश्चिम बंगाल की सत्ता के संचालन का केंद्र राइटर्स बिल्डिंग पर। जहां इस वक्त कॉमरेडों का कब्जा है। लेकिन, जब उन्होंने अपने भाषण में पूर्व रेलमंत्री और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव पर निशाना साधा, तो लोगों को जरूर इस पर हैरानी हुई। यह समझ से परे था कि आखिर ममता इस बिहारी क्षत्रप को क्यों घेर रही हैं? लालू पर हमला बोलकर उन्हें क्या हासिल होगा? हैरानी स्वाभाविक है, पर इसके पीछे एक अनकही कहानी है। और उस कहानी का स्क्रिप्ट तैयार किया है कांग्रेस ने। ममता ने तो सिर्फ उसे आवाज देने का काम किया है। पर इस आवाज की गूंज में लालू का राजनैतिक भविष्य जरूर हिचकोले खाता दिख रहा है।
गौरतलब है कि रेल मंत्री ममता बनर्जी ने एलान किया है कि वह अपने पूर्ववर्ती रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल में रेलवे के परिचालन, संगठनात्मक स्थिति और वित्तीय हालात पर श्वेतपत्र लाएंगी। बीते ५ वर्षों में रेलवे के आय-व्यय का ब्योरा संसद में पेश करने के उनके इस फैसले से अचानक लालू की पेशानी पर बल पड गए हैं। रेलमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल को अपने सियासी जीवन की एक बडी उपलब्धि बतौर प्रचार करते रहे लालू के लिए अब वही दौर भूत की तरह उनके पीछे लग गया है। ममता ने अपने भाषण में जिस तरह लालू की उपलब्धियों की हवा निकाली और उस पर गंभीर सवाल खडे किए, उसने संकेत दे दिया है कि आगे इस मुद्दे पर लालू की परेशानियां और बढने वाली हैं। संकेत दिखने भी लगे हैं। अचानक उनके विरोधी सक्रिय हो गए हैं। बिहार में उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो बाकायदा इस मुद्दे पर लालू से राष्ट्र की जनता से माफी मांगने को कहा है। नीतीश कहते हैं कि ‘लालू जिस वित्तीय जादूगरी की बात करते थे, वह दरअसल वित्तीय घपलेबाजी थी। उसकी पोल अब खुलने लगी है और श्वेतपत्र आने के बाद तो कई और राज खुलेंगे।’
रेल मंत्री के तौर पर लालू की काबिलियत पर नीतीश ही नहीं, कई लोगों ने सवाल उठाया है। उनका साफ कहना है कि अपने कार्यकाल के दौरान लालू रेलवे की गलत तस्वीर पेश करते रहे। मुनाफे का जो आंकडा वह मीडिया के समक्ष दिखा रहे थे, वह झूठ का पुलींदा था। हल्ला मचाते रहे कि ७७.५० रुपए खर्च कर सौ रुपए कमाई हो रही है। जबकि असलियत में ९२.५० रुपए खर्च किए जा रहे थे। यही वजह है कि जो लक्ष्य पिछले साल रखे गए थे, वह हासिल नहीं हो पाए। अंतरिम बजट का टारगेट भी पूरा नहीं हो पाया। इसी का नतीजा है कि नई रेल मंत्री ममता बनर्जी को इसका भांडा फोडने को विवश होना पडा। ममता ने अपने भाषण में लालू पर कई तीर छोडे। उनकी हर बाजीगरी की पोल खोली। बाकायदा आंकडों को साक्ष्य बतौर रखते हुए। साथ ही यह भी एलान कर दिया कि आगे रेलवे के बीते पांच वर्षों के कार्यकाल पर श्वेतपत्र भी लाया जाएगा। ममता की इस घोषणा की राजनैतिक हलकों में तरह-तरह से व्याख्या की जा रही है।
कहा जा रहा है कि श्वेतपत्र के माध्यम से कांग्रेस लालू पर लगाम कसने की कोशिश कर रही है। हाल के दिनों में जिस तरह लालू केंद्र की यूपीए सरकार के समर्थक होने के बावजूद लगातार उस पर हमले बोल रहे हैं, उससे कांग्रेस में नाराजगी है। खासकर, लोकसभा चुनावों के बाद नए हालात में भी कांग्रेस लालू को अपने लिए दोस्त कम दुश्मन ज्यादा समझ रही है। बिहार में अपनी खोई जमीन को वापस हासिल करने में जुटी कांग्रेस को लग रहा है कि लालू को कमजोर कर ही उसे फायदा हो सकता है। कारण, कांग्रेस के वोटबैंक में लालू ने ही सेंध लगाई है। यही वजह है कि पहले कांग्रेस ने लालू के चंगुल से खुद को आजाद किया और अब अपने खोए जनाधार को प्राप्त करने की कवायद कर रही है। वह लालू को संभलने या दोबारा खडा होने का मौका नहीं देना चाहती। फिलहाल कांग्रेस का लालू का हाथ थामने का कोई मूड नहीं है। वह लालू की परेशानी में ही अपना हित देख रही है। रेलमंत्री के रूप में उनकी उपलब्धियों पर चोट को भी इसी से जोड कर देखा जा रहा है।
सूत्र बताते हैं कि रेल बजट के दौरान लालू के खिलाफ ममता ने जो तेवर दिखाए, वह उनकी अपनी सोच या राजनीति-रणनीति का हिस्सा नहीं था। दरअसल, उसके पीछे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की रणनीति काम कर रही थी। मतलब, एक सोची-समझी सियासी योजना। इसके सूत्रधारों में प्रणव मुखर्जी, दिग्विजय सिंह जैसे लोगों के नाम बताए जाते हैं। कहीं न कहीं इसमें नीतीश कुमार की भूमिका के भी चर्चे हैं। वह चाहे जद (यू) की भाजपा से बढती दूरियों और कांग्रेस से परदे पीछे गलबहियों की खबरों को लेकर हो, चाहे सूबे में होने वाले आगामी चुनाव की तैयारियों के दृष्टिगत। लिब्रहान रिपोर्ट संसद पटल पर रखे जाने के बाद संभव है कि भाजपा के कई बडे नेताओं की परेशानियां बढें। ऐसी स्थिति में जद (यू) भाजपा से रिश्ते तोडकर कांग्रेस के साथ हाथ मिला सकता है। पार्टी के अंदर पिछले कुछ दिनों से ऐसी बातें चल भी रही हैं कि उसे भाजपा से संबंध-विच्छेद कर कांग्रेस से हाथ मिला लेना चाहिए। इससे जदयू को मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर लाने में मदद मिलेगी। साथ ही केंद्र सरकार में शामिल होकर वह बिहार में अपने विकास कार्यों को और गति दे पाएगा। ऐसे में कांग्रेस के श्वेतपत्र संबंधी कदम से राजद से उसके रिश्तों का नया समीकरण उभर सकता है। साथ ही यह पहला मौका होगा कि किसी राजनैतिक गठबंधन की सरकार अपने बीते कार्यकाल के दौरान किसी खास मंत्रालय के कामकाज पर श्वेतपत्र लाएगी।
ममता की इस घोषणा के पीछे कांग्रेस की भूमिका की पुष्टि इस बात से भी होती है कि आमतौर पर ऐसे फैसले सरकार के शीर्ष नेतृत्व से सलाह-मश्विरे के बाद ही लिए जाते हैं। यह किसी मंत्री का निजी फैसला नहीं होता। कहने का तात्पर्य कि ममता ने अगर यह एलान किया, तो इससे पहले कांग्रेस आलाकमान व इसके वरिष्ठ नेेताओं से इस पर चर्चा हो चुकी थी। सूत्र बताते हैं कि श्वेतपत्र लाने की दिशा में इन दिनों जोर-शोर से तैयारियां भी चल रही हैं। सरकार के कुछ प्रमुख वित्तीय सलाहकार और सांख्यिकी-व्याख्याकार लालूराज के दौरान रेलवे के वित्तीय आंकडों को खंगालते हुए उसका अध्ययन कर रहे हैं। ताकि लालू के दावे की पोल खोल कर उन्हें पूरी तरह बेनकाब किया जा सके। इसकी भनक लालू को भी लग चुकी है। तभी इन दिनों राजनीति के बियाबान में भटक रहे लालू कांग्रेस आलाकमान से इस मुद्दे पर बातचीत के लिए संपर्क साधने में लगे हैं। लेकिन, कांग्रेस की तरफ से उन्हें कोई भाव नहीं दिया जा रहा। उल्टे वह सार्वजनिक रूप से इस श्वेतपत्र की वकालत कर रही है।
कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी कहते हैं, ‘यदि रेलमंत्री द्वारा श्वेतपत्र जारी करने से पारदर्शिता बढती है, तो इसमें बुरा क्या है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी को देखते हुए समीक्षा जरूरी भी है।’ पार्टी इसके पीछे किसी साजिश से साफ इंकार करती है। लेकिन हकीकत यह है कि कांग्रेस ममता के मार्फत लालू की हालत पतली करने में लगी है। आखिर बिहार में कांग्रेस को लालू से ही तो वोट छीनने हैं। नीतीश से तो उसके बाद निपटने की जरूरत होगी। बदले हालात में रेलवे के कई बडे अधिकारी भी बढ-चढकर लालू की फजीहत का सामान जुटाने में लगे हैं। लालूराज में खुद को उपेक्षित महसूस करते रहे ऐसे अधिकारी इन दिनों ममता बनर्जी को लालू की बाजीगरी की बारीकियां समझाने में जुटे हैं। उनकी हसरत है कि वे लालू को परेशानहाल में देखें। लालू परेशान हैं भी। पर वह ऐसा दिखाना नहीं चाहते। एक तरफ वह कांग्रेस से मिल-बैठकर इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ हर जांच का सामना करने की बात कहकर खुद को पाक साफ दिखाने का जतन भी। कांग्रेस इस मुद्दे पर कहां तक जा सकती है, उसका अंदाजा लगाना लालू को भारी पड रहा है। इसी डर से वह अभी से ही अपने वोटबैंक को यह संकेत देने में लग गए हैं कि उनके खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही है। वह कहते भी हैं, ‘चाहे जिससे जांच करा लो, कमी ढूंढे नहीं मिलेगी। अगर मिली, तो मैं कान पकडकर माफी मांगने को तैयार हूं। मुझसे ईष्र्या करने वाले मेरे कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं। मुझे सब मालूम है कि यह किसके इशारे पर हो रहा है।’
वहीं ममता कांग्रेस और लालू के बीच की इस राजनीति में खामोशी के साथ अपना रोल अदा करने में लगी हैं। कांग्रेस से मिलकर चलने में ही वह अपना हित समझ रही हैं। कारण, पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद वह खुद को बतौर सीएम देख रही हैं। कांग्रेस को भी पूरा यकीन है कि इस बार कॉमरेडों का सूबे की सत्ता से उखडना तय है। उस हालत में निश्चित तौर पर ममता ही सीएम बनेंगी। तब रेलमंत्री कोई कांग्रेसी होगा और पार्टी अपने मनमुताबिक श्वेतपत्र का इस्तेमाल करेगी। यानी दूर-दूर तक इस मुद्दे पर सियासी गोटें बिछी हुई हैं। देखना शेष है कि इस बिसात पर लालू कैसी गोटें चलते हैं। फिलहाल बिना शोर मचाए अपना सियासी लक्ष्य साधने में माहिर कांग्रेस के मुकाबले उनकी हालत बेहद पतली नजर आ रही है।
आंकडों की बाजीगरी
रेलवे को भारी मुनाफे वभाग में बदलने का ढिंढोरा पीटने वाले लालू पर अब आंकडों के साथ खिलवाड करने का दोष मढा जा रहा है। जिस सरकार के वह रेल मंत्री रहे, बदले हालात में आज वही उनके खिलाफ श्वेतपत्र ला रही है। रेल मंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि सन २००८-०९ में लालू ने अपने बजट में ११,७८६ करोड की आमदनी का जो आंकडा पेश किया था, वह फरवरी में चुनाव से पहले अंतरिम बजट तक आते-आते महज ५५७२ करोड रह गया। और अब यह मात्र २६४२ करोड है। अंतरिम बजट के दौरान लालू ने ८० हजार करोड रुपए के कैश सरप्लस की बात कही थी, लेकिन यह महज १७,४०० करोड रुपए है। साथ ही उन्होंने वार्षिक योजना में ३४०० करोड रुपए के संसाधन निजी क्षेत्र की भागीदारी के जरिए जुटाने की व्यवस्था की थी, जिनमें ३३०० करोड तो कभी जुटाए ही नहीं जा सकते थे।
लालगढ के पीछे
३२ वर्षों से बंगाल की सत्ता पर एकछत्र राज। लेकिन, अब अपने ही गढ में गंभीर चुनौतियों का सामना करने को मजबूर। बंगाल की वाम मोर्चा सरकार की आज यही हकीकत है। उसे अपने ही कामरेडों को आतंकवादी करार देकर वजूद की लडाई लडनी पड रही है। बाकायदा उनपर प्रतिबंध लगाकर। पर इस दमन की कार्रवाई से उसके विरोधी दलों की जमीन जरूर मजबूत हो रही है। वे इसे अपने लिए जागती संभावनाओं के तौर पर देख रहे हैं। आखिर क्यों पैदा हुए ऐसे हालात? माओवादियों के नाम पर खेला जा रहा है कौन सा सियासी खेल?
२०-३० के दशक में चीनी कम्युनिस्ट नेता माओ ने कहा था- ‘पावर फ्लोज फॉर्म द बैरल ऑफ ए गन’ यानी सत्ता बंदूक की नली से होकर निकलती है। उनका मत था कि हक मांगा नहीं जाता, छीना जाता है। और इसके लिए हिंसा करनी पडे, तो वह भी वाजिब है। उन्होंने जब यह राय प्रकट की थी, तब चीन में गृहयुद्घ का दौर था। अपनी इसी सोच और रणनीति के सहारे आगे चलकर वह चीन की सत्ता तक हासिल करने में सफल रहे। आज २१ वीं सदी के पहले दशक में बंगाल में कुछ ऐसा ही प्रयोग हो रहा है। कहें तो नए सिरे से यह प्रयोग दोहराया जा रहा है। बंदूक के सहारे सत्ता छीनने और सत्ता बचाए रखने की जद्दोजहद के तौर पर। प्रत्यक्षत: एक तरफ माक्र्स के सिद्घांतों से प्रभावित सत्तारूढ वामपंथी सरकार है और दूसरी तरफ माओ त्से-तूंग की विचारधारा को आत्मसात कर हाथों में हथियार उठाए माओवादी। लेकिन, अप्रत्यक्षत: कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस भी अपने -अपने हित साधने में व्यस्त। और इस खेल में प्रयोगशाला बना है प्रदेश के मिदनापुर जिले का लालगढ इलाका। वह क्षेत्र, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि इसके अंतर्गत आने वाले ४४ गांवों को माओवादियों ने अपने कब्जे में ले लिया है। और सरकार उसे मुक्त कराने का प्रयास कर रही है। इस संघर्ष में दोनों ओर से गोलियां बरस रही हैं, धमाके हो रहे हैं। लेकिन, इन धमाकों में कुछ शोर खामोश पड गए हैं। बेहतर कहें, तो खामोश कर दिए गए हैं। क्योंकि वह आवाज है आम आदमी की। निर्दोष, निर्धन और असहाय ग्रामीणों की। यानी पूरा का पूरा प्रकरण सियासी ताने-बाने में उलझा है। ऐसा मकडजाल, जिसे समझना और समझाना जरूरी है।
दरअसल, लालगढ में आज जो हो रहा है, वह अचानक नहीं। इसकी पृष्ठभूमि बहुत पहले से तैयार हो रही थी। सिंगुर और नंदीग्राम ने इसे गति दी और एक दिशा भी। और जो दिशा मिली, वह वाम मोर्चा खासकर माकपा के लिए एक बडा धक्का था। हो भी क्यों न। आखिर तीन दशक से ज्यादा वक्त तक जो कैडर उसके एक इशारे पर कुछ भी करने का तैयार रहते थे, वे उसकी खुली मुखालफत पर उतर चुके थे। इसी का नतीजा था कि लोकसभा चुनावों में वामपंथी पार्टियां अपने सबसे मजबूत गढ से ही उखड गईं। बुरी तरह। इसके बाद से ही उसे यह खतरा और भी सताने लगा है कि कहीं आगामी विधानसभा चुनावों के बाद राज्य से उसकी हुकूमत ही न उखड जाए। राजनैतिक जानकारों का भी आकलन रहा है कि जैसी गतिविधियां इस प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में चल रही है, उसके बरकरार रहने का मतलब है तीन दशकों से लगातार सत्ता पर कुंडली मार कर बैठी वाम सरकार का अंत। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर बंगाल के गांवों में ऐसा क्या हो रहा है, जो वाम सरकार के खात्मे की इबारत लिख रहा है।
इसे जानने के लिए हमें तीन दशक पीछे मुडना होगा, जब वामपंथी पार्टियां इस प्रदेश की सत्ता पर आसीन हुई थीं। ७० के दशक में तब बंगाल में नक्सलबाडी आंदोलन अपनी गति में था। कानू सान्याल, चारू मजूमदार और कनाई चटर्जी जैसे नक्सल नेताओं ने जमींदारों और भू-स्वामियों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल पूं*का हुआ था। साम्यवाद और शोषणहीन समाज की बुनियाद के लिए। आर्थिक समानता लाने के लिए। उस वक्त कम्युनिस्ट पार्टियों को लगा कि इस आंदोलन का समर्थन कर वे सत्ता हथिया सकती हैं। उन्होंने ऐसा किया भी। तत्कालीन कांग्रेस सरकार के खिलाफ नक्सल आंदोलन का इस्तेमाल कर वह सत्ता में पहुंचने में कामयाब हो गर्ई। लेकिन हुकूमत पाने के बाद इस समस्या की जड में पहुंचने से वह बचती रही। सरकार को खतरे से बचाने के लिए तब नक्सली नेताओं को साधने की कोशिश हुई। उन्हें किसी न किसी तरह उपकृत कर आंदोलन की गति को कुंद किया गया। बदले में नक्सली नेता सत्ता के दलाल बन गए। वे सत्ताधारी दल के लिए वोट का जुगाड करते रहे और सरकार उनके आराम का ख्याल करने लगी। इसी अन्योनाश्रय संबंध की परिणति है कि देश में दूसरी पार्टियों की लहर के बावजूद बंगाल में वाम का डंका बजता रहा। आंदोलन के नाम पर नक्सली नेता माकपा के कैडर बन कर काम करते रहे। और वह भी इतनी सक्रियता से कि गांवों में माकपा का एक मजबूत किला कायम हो गया। इसी अभेद्य दुर्ग के कारण तब से अब तक माकपा एण्ड एसोसिएट्स बंगाल में एकछत्र राज करती रही है। साथ ही साथ माकपा इस बीच अलग से अपने कैडर खडा करने की भी कोशिशें करती रहीं। वैसे कैडर, जो गांव-देहात में उसके लिए वोट मैनेज करें। उसके कैडर ऐसा करते भी रहे।
हालांकि इसका मतलब यह कतई नहीं कि राज्य की ग्रामीण जनता वामपंथी पार्टियों की मुरीद बनी रही। उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। उन्हें तो सरकार आज तक खाद्यान्न और पेयजल तक मुहैया नहीं करा पाई है। सरकारी योजनाओं का लाभ भी इन गरीब आदिवासियों को कभी नहीं मिला। उनके पास रोजगार के साधन नहीं। जिंदा रहने के लिए आज के दौर में भी वे पैसे की बजाए सामानों की अदला-बदली करते हैं। और ये हालात इस तथ्य के बावजूद हैं कि इनके वोटों के सहारे माकपा लगातार सत्ता पाती रही है, जमीन-जंगल और गरीब गांववालों की बात करती रही है। दरअसल यहां सेहत सुधरी, तो माकपा कैडरों की। उन्हें सरकार से वोटबैंक इक_ा करने और उसे कायम रखने के एवज में हर सुविधा उपलब्ध होती रही। इसका प्रमाण है गांवों में उनकी लंबी-चौडी इमारतें। उनके जीने का अंदाज। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिन दूरदराज गांवों में विकास की हवा जरा भी नहीं पहुंची, वहां माकपा कैडर कैसे और क्यों कर पुष्पित-पल्लवित होते रहे। लालगढ में माकपा कैडर तो वर्गभेद की जीती जागती मिसाल हैं। जबकि वे आर्थिक समानता का नारा बुलंद करते रहे हैं। उनके पास सब कुछ है- गाडी, हथियार, पैसा-पहुंच सब। कईयों के घरों में तो एयरकंडीशनर तक। लेकिन ग्रामीण बदहाल। इन्हीं संसाधनों के सहारे सालोंसाल से माकपा कैडर ग्रामीणों का शोषण करते रहे हैं, उन्हें अपनी जागीर बनाए रखा है। पार्टी को सत्ता में पहुंचाने के लिए। शहरी इलाकों से परे बंगाल के ग्रामीण इलाकों में हमेशा से इन्हीं माकपा कैडर की ही हुकूमत चलती रही है। उनका फरमान ही प्रशासन का फरमान होता था। राशन कार्ड हो या कोई दूसरी जरूरत, प्रशासन माकपा यूनिट के निर्देश पर ही काम करता था। स्थानीय स्तर पर जन-वितरण प्रणाली की दूकानों का लाइसेंस हो या कोई और ठेका, सब माकपा के इन्हीं कैडरों के हिस्से आते थे। इस सुविधा को भोगने के बदले माकपा के कैडर गांव के लोगों, आदिवासी जनता को येन-केन-प्रकारेन पार्टी से जोडे रखने का काम करते थे। डराना-धमकाना, उनके परिवार पर अत्याचार और उन्हें मूलभूत सुविधाओं से कोसों दूर रखना भी इसमें शामिल है। माकपा के कैडर जानते थे कि अगर ग्रामीण जनता जागरूक हुई, तो उनका बोरिया-बिस्तर उखड सकता है। लिहाजा वे उन्हें आदिम युग में ही जिंदा रखते रहे। विकास और आधुनिकता की बयार से मीलों दूर। सरकार पर आरोप भी लगते रहे कि उसके कैडर गांवों में लोगों को वोट नहीं डालने देते, बल्कि खुद ही बूथ अपने नियंत्रण में लेकर मत डाल देते हैं। कहने का मतलब कि एक सोची समझी रणनीति के तहत माकपा नक्सलियों की मदद से सत्ता का स्वाद चखती रही। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सभी नक्सली नेताओं ने माकपा की चरणवंदना स्वीकार कर ली। लेकिन ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा जरूर रही। जो आंदोलन के साथ रहे, वे जनसमर्थन के अभाव में शिथिल पड गए। उन्होंने गाहे-बगाहे इस पर आवाज भी उठाई कि माकपा सरकार नक्सल आंदोलन के सहारे सत्ता में आई, लेकिन बाद में उसे ही नकार दिया। अपना खुद का कैडर स्थापित करने लगी, जिन्हें आंदोलन से कोई सरोकार नहीं था। और ये कैडर वही थे, जो आंदोलन से उपजे और सत्ता का हिस्सा बन गए।
लेकिन तस्वीर इधर कुछ वर्षों में बदलने लगी थी। ग्रामीणों के बीच कुछ ऐसे संगठन पहुंचने लगे थे, जो उन्हें उनकी दास्तां की असली वजह समझाने और उन्हें एकजुट करने में कामयाबी हासिल करने लगे थे। इन संगठनों को कहीं न कहीं राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था। कहें तो नक्सली नेताओं का एक बडा तबका धीरे-धीरे माकपा के विरोध में उतरता जा रहा था। और ममता बनर्जी इन्हें अप्रत्यक्ष समर्थन देकर राज्य की सियासी तस्वीर बदलने की कोशिश कर रही थी। सिंगुर, नंदीग्राम जैसे इलाकों में ममता ने अगर वाम सरकार की नींदें उडाने में सफलता पाई, तो यह उन माओवादियों की मदद के फलस्वरूप ही संभव हुआ। प्रदेश की राजनीति पर बारीक नजर रखने वाले जानकार भी कहते हैं कि तृणमूल नेता ममता बनर्जी माकपा को उसके ही हथियार से घायल करने का काम बडी खामोश रणनीति के तहत कर रही थीं। एक तरफ वह माकपा के ग्रामीण वोटबैंक पर निशाना साधने में लगी थीं, तो दूसरी तरफ माकपा कैडर में भी सेंध लगाने की जुगत भिडा रही थीं। इसी का नतीजा है लोकसभा का चुनाव परिणाम।
लेकिन ममता यहीं नहीं रुकना चाहतीं। कारण, उनकी नजर प्रदेश की सत्ता पर है। वह विधानसभा चुनाव के दृष्टिगत ही सारे उपाय कर रही हैं। इसीलिए एक-एक कर वह माकपा के प्रभाव वाले सभी इलाकों में उसकी जडों में म_ा डालने का काम कर रही हैं। नंदीग्राम, सिंगुर, खेजुरी के बाद नंबर आया लालगढ का। माकपा के बडे गढ मिदनापुर का केंद्र लालगढ। अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर एक नंदीग्राम की वजह से माकपा को इतना सियासी नुकसान उठाना पडा, तो मिदनापुर पर कब्जा कर ममता उसकी क्या हश्र करा सकती है। कभी मिदनापुर माकपा का गढ होता था। लेकिन बदली परिस्थितियों में आज पूर्वी मिदनापुर में तृणमूल की तूती बोलती है और पश्चिमी मिदनापुर में लालगढ के माध्यम से वह इसे धरातल पर उतारने का प्रयास कर रही है। मिदनापुर में करीब १६ हजार गांव हैं। और यहां ममता सिंगुर दोहराने में लगी है। यही माकपा की परेशानी का सबब है। और इसी से निपटने के लिए वह लालगढ में अपना नया प्रयोग कर रही है। ताकत के बल पर अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को शांत करने का। उसे खतरा है कि ये आवाजें न सिर्फ उसके विरोधियों को मजबूत कर सकती है, बल्कि उसकी कहानी का ‘द एंड’ भी कर सकती है। और इसकी आहट हो भी चुकी है।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष नवंबर महीने में जब मुख्यमंत्री बुद्घदेव भट्टाचार्य व तत्कालीन केंद्रीय इस्पात मंत्री राम विलास पासवान लालगढ-झारग्राम-शालबनी इलाके में प्रस्तावित जिंदल के कारखाने का शिलान्यास करने गए थे, तो उनके काफिले पर हमला किया गया था। लैंडमाइन ब्लास्ट के माध्यम से। वह तो गनीमत थी कि चूहों के तार कुतरने की वजह से विस्फोट तय समय के कुछ देर बाद हुआ, वर्ना कुछ भी अनिष्ट हो सकता था। इसके बाद बंगाल की पुलिस ने यहां माओवादियों के खिलाफ सख्त अभियान छेड दिया था। आरोप लगाए जाते हैं कि पुलिस ने बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं पर अत्याचार किए, जिसकी वजह से ग्रामीण माकपा की मुखालफत पर उतर आए। इस स्थिति को भुनाया तृणमूल कांग्रेस ने। पुलिसिया अत्याचार के खिलाफ आदिवासियों ने तृणमूल नेता छत्रधर महतो के नेतृत्व में पुलिस अत्याचार प्रतिरोध समिति का गठन किया और इलाके को पुलिस के लिए बैन कर दिया। इससे सहम कर माकपा सरकार ने अंतत: वहां बल का प्रयोग करने का फैसला किया। कारण, उसे इस विद्रोह से अपनी जमीन खिसकने का खतरा था। उसे यह भी ज्ञात हो चुका था कि कभी उनके लिए काम करने वाले लोग अब उनके खिलाफ हो गए हैं। ऐसे में खिसियाई माकपा से बदले की कार्रवाई अपेक्षित थी। साथ ही वह उन विद्रोहियों को यह भी संदेश देना चाह रही थी कि इस लडाई का अंजाम उनके लिए ठीक नहीं होगा। बेहतर होगा कि वे माकपा के साथ बने रहें, तृणमूल के बहकावे में न आएं। कारण, पूर्वी मिदनापुर में नंदीग्राम ने ममता का नियंत्रण स्थापित किया। तब माओवादियों का भी उन्हें समर्थन हासिल हुआ था। पश्चिमी मिदनापुर में लालगढ यही काम कर सकता है, क्योंकि यहां भी कभी माकपा का साथ देते रहे माओवादी अब तृणमूल के करीब आते दिख रहे हैं। यही माकपा की छटपटाहट की वजह है। लेकिन, इस बीच केंद्र सरकार ने माओवादियों पर प्रतिबंध लगाकर अपनी चाल चल दी। दरअसल, कांग्रेस इस कदम से बदहाल ग्रामीणों की सहानुभूति बटोरना चाहती है। वह जान रही है कि प्रतिबंध से माकपा के बागी कैडरों में यह संदेश जाएगा कि यह सब बंगाल सरकार की वजह से हो रहा है। इससे माकपा की सियासी राह और मुश्किल होगी। वहीं इस मुद्दे पर माकपा कुछ कहने से परहेज कर रही है। अगर वह इसकी वकालत करती है, तो उसके कैडरों में व्याप्त गुस्सा और बढेगा। अगर मुखालफत करती है, तो विरोधी उसपर माओवादियों का समर्थन करने का आरोप मढेंगे। यानी माकपा के लिए इस वक्त इधर कुआं, उधर खाई वाली स्थिति है। इसी बेचैनी में वह अपने वजूद को बचाए रखने की कोशिश कर रही है। अपने कैडरों के और बिखराव को रोकने के लिए ही वह लालगढ में शक्ति का प्रयोग कर रही है। लेकिन ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या लालगढ एक और नक्सलबाडी आंदोलन की तरफ बढ रहा है? नक्सलबाडी ने ७० में कांग्रेस को सत्ता से उखाडकर वाम पार्टियों को बंगाल की सत्ता में पहुंचाया था, कहीं लालगढ वाम मोर्चा को सत्ता से उतारने का बायस न बन जाए।
भाजपा का शुद्घिकरण
लोकसभा चुनावों में हार से हलकान भाजपा अब नए सिरे से संगठन को चाक-चौबंद करने के अभियान में जुटी है। इसके लिए नए-नए नुस्खे भी आजमाए जा रहे हैं। बदले हालात में जहां पार्टी की दुर्गति कराने वाले हवा-हवाई नेताओं के पर कतरे जा रहे हैं, वहीं जनाधार वाले कर्मठ नेताओं को खास तरजीह दी जा रही है। और क्या चल रहा है भगवा खेमे में, जायजा लेती रिपोर्ट।
कहा जाता है कि गंभीर प्रयास के बावजूद अगर आपको अपेक्षित नतीजा नहीं मिल पा रहा हो, तो निराश होने की बजाए नए सिरे से अपनी रणनीतियां तैयार करें। इससे सफलता की उम्मीद बढ जाएगी। लोकसभा चुनावों में बुरी तरह पिटने के बाद भाजपा में भी इन दिनों कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। वह अपनी हार और इससे उपजी निराशा-हताशा से ऊपर उठकर बदली रणनीतियों के साथ अपने भविष्य को सुनहरा बनाने की कोशिशों में जुट गई है। इसके तहत पार्टी अपनी उन खामियों को दूर करने में जुटी है, जिसने चुनावों में उसकी संभावनाओं को पलीता लगाने का काम किया। हार के पश्चात कारणों की समीक्षा में लगे पार्टी नेताओं को जो संकेत मिल रहे हैं, उसके अनुसार कई मोर्चों पर संगठन को लेकर बेजारी ने भाजपा का काम खराब किया है। यही वजह है कि संगठन को दोबारा नए सिरे से खडा करने की जरूरत महसूस हो रही है। और इसी के दृष्टिगत पार्टी के पितृ पुरुष श्यामाप्रसाद मुखर्जी के जन्मदिन छह जुलाई से पूरे देशभर में एकसाथ भाजपा ने सदस्यता अभियान शुरू किया है। इसका मकसद सांगठनिक चुनाव से पहले मजबूत और पारदर्शी तरीके से सदस्यों का एक नया नेटवर्क बनाना है, ताकि सही तरीके से सही लोग चुन कर पार्टी पदों पर आ पाएं।
हालांकि सांगठनिक चुनाव का तरीका पहले जैसा ही होगा, लेकिन इस बार सदस्यता अभियान का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया गया है। नए फार्मूले के तहत पार्टी के राष्ट्रीय स्तर से लेकर निचले स्तर तक के सभी नेता व कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्रों में सदस्यता अभियान चलाएंगे। पर, नए तरीके से। विभिन्न स्तरों पर नियुक्त सदस्यता अभियान प्रमुखों को निर्देश दिया गया है कि वे एक परिवार से दो से ज्यादा सदस्य नहीं बनाएं। पहले यह देखा जाता रहा है कि अभियान की जिम्मेदारी लेने वाले पार्टी कार्यकर्ता एक ही घर के सभी लोगों को सदस्य बनाकर अपना लक्ष्य पूरा कर देते थे। लेकिन, अब ऐसा नहीं हो पाएगा। सदस्यता अभियान में फर्जीवाडे को रोकने के लिए ही पार्टी ने प्रावधान किया है कि अभियान प्रमुखों को अलग-अलग घरों से सदस्य बनाने होंगे। इसमें महिलाओं, युवाओं को भी जोडने को कहा गया है। साथ ही बसपा की तरह जातीय गणित का ख्याल रखने की हिदायत भी दी गई है। इतना ही नहीं, सदस्यों की जो सूची बनाई जाएगी, उसमें उनका पूरा विवरण और उनका फोन नंबर देना अनिवार्य बनाया गया है। कहा जा रहा है कि इसी के आधार पर बाद में सूचियों का निरीक्षण भी किया जाएगा। विधानसभा, बूथ और सेक्टर स्तर पर सदस्यता अभियान प्रमुखों की नियुक्ति भी भाजपा में पहली बार हुई है। कहने का तात्पर्य कि नए नियम को भाजपा अपने लिए परिवार नियोजन मंत्र के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। ज्यादा से ज्यादा और वास्तविक सदस्य बनाने की पहल के साथ।
बताया जाता है कि पार्टी आलाकमान को विभिन्न प्रदेशों से सदस्यता अभियानों में भारी फर्जीवाडे की शिकायतें मिलती रही हैं। पहले कुछ स्वयंभू किस्म के लोग अपने लोगों के या फर्जी नाम एक सोची-समझी रणनीति के तहत सदस्यता सूची में डलवा देते थे। इससे सदस्य बनाने का उनका कोटा भी पूरा हो जाता था और मनमाफिक सदस्य भी बन जाते थे। बाद में सूची में दर्ज इन्हीं नामों के आधार पर वे पार्टी पदों पर आसीन होने में सफल हो जाया करते थे। यानी नीचे के स्तर से ही संगठन के चुनाव में अनियमितता का बोलबाला चल रहा था। इससे काम करने वाले, जमीन से जुडे लोगों में असंतोष पैदा होता था। अलग-अलग प्रदेशों में असंतोष की ज्वाला कई बार धधक भी चुकी है। इससे पार्टी को नुकसान भी हुआ है। लेकिन, अब भाजपा ने इस बीमारी की जड में पहुंचकर इसे दुरुस्त करने का काम शुरू किया है। सदस्यता अभियान के स्वरूप में बदलाव को इसी कडी में देखा जा सकता है।
सुगठित संगठन की यह कला भाजपा ने बसपा से प्रभावित हो अपनाने की पहल की है। सदस्यता अभियान को पारदर्शी ढंग से संपन्न कराने के बाद ही संगठन के चुनाव की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इसके अक्टूबर से दिसंबर तक पूरे होने की उम्मीद है। सबसे पहले वार्ड स्तर पर चुनाव होंगे। इसके बाद मंडल, जिला व प्रदेश स्तर पर। और अंत में राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होगा। बताया जाता है कि राजनाथ सिंह इस पद पर दोबारा आसीन होने की इच्छा रखते हैं, लेकिन इसकी संभावना नगण्य है। कारण, इसके लिए पार्टी का संविधान बदलने की जरूरत होगी, जो संभव नहीं दिखता। लिहाजा इस पद के लिए अभी से ही कई नाम उभरने या उभारे जाने लगे हैं। अरुण जेतली, सुषमा स्वराज और अनंत कुमार इस दौड में मुख्य चेहरे हैं। पर इस रेस में जिस तरह अपनी-अपनी लॉबी के हितों को साधने की पहल हो रही है, वह संगठन को दुरुस्त करने की भाजपाई पहल की सफलता को लेकर जरूर संशय पैदा कर रही है।
बहरहाल, भाजपा में नई जान फूंकने की कवायद जोर-शोर से चल रही है। इसी के अंतर्गत विभिन्न प्रदेशों में पार्टी अध्यक्षों को बदला गया है या फिर बदले जाने की तैयारी हो रही है। राजस्थान, हरियाणा व हिमाचल प्रदेश में पुराने अध्यक्षों की छुट्टी करते हुए नए चेहरों को कमान सौंप भी दी गई है। आगे पंजाब, उत्तराखंड, दिल्ली आर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के अध्यक्षों की छुट्टी की बारी है। उनकी जगह नए लोगों को मौका दिया जाएगा। विदित है कि ओम प्रकाश माथुर की जगह अरुण चतुर्वेदी को राजस्थान में, आत्मा राम मनचंदा के स्थान पर कृष्णपाल गुर्जर को हरियाणा में और हिमाचल में जयराम ठाकुर की जगह खीमीराम को पार्टी का नेतृत्व सौंपकर उसकी सेहत सुधारने का जिम्मा सौंपा गया है। ये सभी नेता ६० वर्ष से कम उम्र के हैं। पार्टी ने तय किया है कि भविष्य में किसी भी प्रदेश में ६० वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति को अध्यक्ष नहीं बनाया जाएगा। उनकी जगह युवा और ऊर्जावान लोगों को तरजीह दी जाएगी। साथ ही भाजपा इस बात का भी ख्याल रख रही है कि इन पदों पर आने वाले लोग संघ के भी गुडबुक में शामिल हों। इससे संघ से भी उन्हें अपनी मजबूती के अभियान में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मदद मिलती रहेगी। हाल के दिनों में भाजपा-संघ रिश्तों को लेकर दोनों संगठनों के बीच जो खटास पैदा हुई है, भाजपा उसका सम्मानजनक हल निकालना चाहती है। वह संघ को एकबारगी अपने से अलग नहीं करना चाहती। शायद इसीलिए वह ऐसा रास्ता निकाल रही है, जिससे संघ भी तुष्ट रहे और भाजपा की गाडी भी पटरी पर रहे। हां, संघ में जरूर भाजपा से रिश्ते पर विचार-मंथन का दौर जारी है।
भाजपा में अब इस बात की महत्ता को समझने की कोशिश की जा रही है कि जमीन से जुडे, जनाधार वाले नेताओं को हर हाल में तवज्जो दिया जाना चाहिए। कारण, बहुत हद तक इसकी अनदेखी ही पार्टी की दुर्गति का बायस बनी है। लिहाजा, अब काम करने वाले क्षमतावान लोगों को मुख्यधारा में लाया जा रहा है। इसमें सभी वर्गों का ख्याल रखा जाएगा। युवाओं, महिलाओं के साथ ही जातीय समीकरण का भी। बताया जाता है कि भाजयुमो अध्यक्ष अमित ठाकर को केंद्रीय राजनीति में लाने की तैयारी हो रही है। पार्टी की युवा इकाई के अध्यक्ष बतौर ठाकर ने बेहतर काम किया है। उन्हें लोकसभा में टिकट देने की भी चर्चा थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे यह संदेश गया कि युवा-युवा की रट लगाने वाली भाजपा में भी उन्हीं युवाओं की पूछ होती है, जो परिवारवाद के प्रतीक हैं। पार्टी उस भ्रम को तोडने की पहल करना चाहती है। इसीलिए अमित ठाकर के साथ ही कई और युवा नेताओं को अहम जिम्मेदारी सौंपने पर विचार किया जा रहा है। सुभाष यदुवंश, पूनम महाजन, अनुराग ठाकुर जैसे युवा नेताओं को भविष्य में तरजीह मिलने की उम्मीद है। प्रदेशाध्यक्षों से भी राज्यों में युवा नेतृत्वकर्ताओं को आगे लाने को कहा गया है। पार्टी के इस फैसले से प्रदेशों में युवा नेताओं में उत्साह देखा भी जा रहा है।
इन कवायदों के बीच लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों के अध्यक्षों की छुट्टी कर यह संदेश भी देने की कोशिश की जा रही है कि प्रदर्शन नहीं करने वालों को खामियाजा भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। संकेत साफ है- जो करेगा, वह पाएगा। जो नहीं करेगा, वह भोगेगा। राजस्थान में ओम माथुर विधानसभा चुनावों के बाद लोकसभा चुनाव में भी पार्टी की हालत नहीं सुधार सके। लिहाजा, उन्हें अपनी सेहत सुधारने के लिए पद से छुट्टी दे दी गई। हरियाणा में मनचंदा का मन चंगा नहीं था, तभी पार्टी का सूपडा साफ हो गया। हिमाचल में भाजपा की सरकार होने के बावजूद जयराम ठाकुर पार्टी की ‘जय हो’ नहीं करा पाए। इसलिए इन सभी को सजास्वरूप बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। पंजाब में राजिंदर भंडारी, दिल्ली में ओपी कोहली, उत्तराखंड में बच्ची सिंह रावत को भी चुनावों में भाजपा की दुर्गति के लिए दंड मिलना तय है। सूत्र बताते हैं कि कई प्रदेशाध्यक्षों ने तो खुद ही इस्तीफे की पेशकश की हुई है। संभव है उनपर आगे निर्णय की मुहर लगा दी जाए।
संगठन को चुस्त-दुरुस्त करने में लगी भाजपा अब अपने पुराने वफादारों की तरफ भी नजरें इनायत कर रही है। संकेत है कि भाजपा छोड कर गए कुछ प्रमुख नेताओं को आने वाले दिनों में पार्टी में वापस लेने की औपचारिक घोषणा की जा सकती है। साथ ही असंतुष्ट नेताओं की समस्या पर भी अब ध्यान देकर उनकी नाराजगी दूर करने की कोशिशें हो रही हैं। यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ पार्टी नेताओं के गिले-शिकवे दूर किए जाने की खबरें इसका प्रमाण हैं। आडवाणी खुद भी पार्टी नेताओं को संगठन की संभावनाएं जिंदा करने के लिए मार्गदर्शन दे रहे हैं। पार्टी नेताओं को प्रवक्ता बनने से परहेज करने की हिदायत देकर उन्होंने इसी का परिचय दिया है। शायद लौहपुरुष को लगता है कि उम्मीदें अभी मरी नहीं हैं, सिर्फ सोई हैं। बस उसे जगाने की जरूरत है, पीएम की वेटिंग तो खुद ही कन्फर्म हो जाएगी। तभी वह अपने अरमानों के बिखरने के बाद भी ‘एक बार और’ की तर्ज पर समर में बने रहना चाहते हैं। कहने का मतलब, अपने आगे के सफर को सुलभ बनाने के लिए भाजपा गंभीरता से प्रयासों में जुट गई है। गंभीरता दिख भी रही है। लेकिन, उपलब्धियों के लिहाज से यह गंभीरता हकीकत के धरातल पर कितना उतर पाती है, देखना दिलचस्प होगा। वैसे आने वाले कुछ महीनों में महाराष्ट्र समेत अन्य प्रदेशों में होने वाले विधानसभा चुनाव इसकी झलक तो दे ही देंगे। दिल्ली की दूरी नापने का असली खेल तभी शुरू होगा।
सोमवार, 29 जून 2009
भाजपाई खेत, कांग्रेसी फसल
राम मंदिर आंदोलन के रथ पर सवार होकर कभी भाजपा ने सत्ताशीर्ष का सफर तक तय किया था। तब अयोध्या और इससे सटे इलाकों में भगवा पार्टी की फसल लहलहाती थी। लेकिन, आज बदले हालात में अपने इस गढ़ में वह ठूंठ नजर आती है। जबकि कांग्रेस यहां लगातार अपना दबदबा बढ़ाती जा रही है। आखिर क्यों? बीजेपी के सिकु$ड़ते और कांग्रेस के फैलते जनाधार के पीछे के कारणों की तह में झांकती रिपोर्ट।
गौरतलब है कि 90 के शुरुआती दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन की लहर ने यहां भगवा पार्टी का मजबूत जनाधार कायम कर दिया था। इसी पर सवार होकर उसके उम्मीदवार विनय कटियार ने यहां से तीन-तीन बार संसद का सफर तय किया। लेकिन, आंदोलन की धीमी पड़ती आंच ने धीरे-धीरे भाजपा के जनाधार में सेंध लगाना शुरू कर दिया। आज की तारीख में वहां पूरी तरह कांग्रेस की घुसपैठ हो चुकी है। उसने अपनी खोई जमीन वापस पा ली है। तभी फैजाबाद में उसके उम्मीदवार को जीत मिली और भाजपा के प्रत्याशी लल्लू सिंह को चौथे स्थान से ही संतोष करना पड़ा। इतना ही नहीं इस संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले छह विधानसभा सीटों पर भी भाजपा की हालत पतली हो चुकी है। उसके कब्जे में सिर्फ अयोध्या की सीट है। यहां पिछले असेंबली इलेक्शन में लल्लू सिंह विजयी हुए थे, जो इस बार संसदीय चुनाव में खेत रहे। उन्हें कुल 7,57,238 मतों में महज 1,51,558 वोट ही मिले। इस हार के कई मायने निकाले जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि राम नाम की राजनीति करने वाले दल की भगवान राम की जन्मभूमि पर ही जमीन खिसक चुकी है। अब उसके खेत में कांग्रेस की फसल झूमती-लहराती नजर आ रही है। विधानसभाई इलाकों में भी कांग्रेस की स्थिति में काफी बदलाव दृष्टिगोचर हो रहे हैं। हालांकि पिछले चुनाव में यहां कांग्रेस को पांच सीटों में से एक भी सीट प्राप्त नहीं हुई थी। लेकिन, बताया जाता है कि अगर आज वहां चुनाव होते हैं, तो भाजपा को अपनी एकमात्र अयोध्या सीट से भी हाथ धोना पड़ेगा और कांग्रेस को उल्लेखनीय सफलता प्राप्त होगी।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर भाजपा की अपने इस महत्वपूर्ण गढ़ में ऐसी दुर्गति क्यों हो रही है? क्यों साधू-संतों और मंदिरों की इस नगरी में उसका बोरिया-बिस्तर सिमटता जा रहा है? इसी राम जन्मभूमि को अपनी सियासत का ककहरा बनाकर भाजपा ने सत्ता सुख भोगा। इसी राम मंदिर आंदोलन से उसकी पहचान कायम हुई। इसी ने उसे जनाधार दिया। लेकिन, आज इसी जगह उसकी पहचान खो रही है। अयोध्या को मंदिरों का शहर कहा जाता है, जहां करीब 4 हजार मंदिर हैं। हर मंदिर में कम से कम 5-10 साधू, महंत रहते हैं और ये मंदिर आंदोलन के दौर से ही भाजपा का समर्थन करते रहे हैं। लेकिन, कभी भाजपा के साथ कदम दर कदम मिलाने वाले ये साधू-संत भी अब उसके साथ नहीं दिखते। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर है कि जिस पार्टी को उन्होंने उसकी विचारधारा और हिंदुत्व की प्रखर वकालत की वजह से समर्थन दिया था, उसने उन्हें पूरी तरह छला। अयोध्या में राम मंदिर बनाने की कसमें खाने वाले उसके नेताओं ने सत्ता में पहुंचकर अपने वादे को भुला दिया। मंदिर की याद उन्हें तब-तब ही आई, जब चुनावों का वक्त आया। इस बार तो फैजाबाद में चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे नरेंद्र मोदी ने भी राम मंदिर मुद्दे पर अपनी जुबान नहीं खोली। इस मुद्दे पर कुछ न बोलकर रामभक्तों को तो उन्होंने निराश किया ही, भाजपा के ऐसे रवैए ने आज धर्माचार्यों को भी उससे दूर कर दिया है। कल तक उसे दिल्ली की सत्ता पर आसीन कराने के लिए पूरा जोर जगाने वाले ये संत-महात्मा आज उसे जी भर-भर कर कोसते हैं।
अयोध्या की पावन धरती पर वास करने वाले संत देवराम दास वेदांती गुस्से में कहते हैं, 'भाजपा ने लाखों-करोड़ों हिंदुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ किया है। जिस मुद्दे पर हमलोगों ने केंद्र में उसकी सरकार बनाने के लिए समर्थन दिया, उस मुद्दे को सत्ता में पहुंचकर वह भूल गई। राम नाम की याद उसे केवल चुनावों में आती है। चुनावी सभाओं में गला फाड़-फाड़कर राम मंदिर का नारा लगाने वाले भाजपा के बड़े नेताओं को तो भगवान राम का दर्शन करने की भी फुर्सत नहीं है। लोकसभा चुनाव में फैजाबाद से पार्टी के उम्मीदवार रहे लल्लू सिंह संतों के निमंत्रण की भी लगातार अनदेखी करते रहे। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी निर्मल खत्री हमेशा से संतों की भावनाओं का ख्याल रखते रहे। उनके निमंत्रण पर कार्यक्रमों में हाजिर होते रहे। हारते रहने के बावजूद लोगों के बीच रहने की वजह से ही उन्हें जीत मिली और लल्लू को हार। संतों और हिंदू समाज की अवहेलना भाजपा की हार का कारण बन रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद वह सबक सीखने को तैयार नहीं।' भाजपा को लेकर संतों में नाराजगी इस कदर बढ़ चुकी है कि वे किसी भी हालत में अब उसपर विश्वास नहीं करना चाहते। न ही चुनावों में वे पार्टी की मदद करने आगे आ रहे हैं। इसी का नतीजा है कि अयोध्या जैसे स्थान और उससे लगे क्षेत्रों में भी भाजपा का जनाधार लगातार खत्म होता जा रहा है। हालांकि संघ और उसके आनुषंगिक संगठन लाख नाराजगी के बावजूद अभी भी भाजपा के लिए काम कर रहे हैं, पर उसका आर नहीं दिखता। जनता इन सबकी मंशा जान चुकी है। शायद यही कारण है कि अयोध्या और फैजाबाद जैसे उसके प्रतिकात्मक स्थल में भी भाजपा कमजोर हुई है और देश के अन्य हिस्सों में भी धीरे-धीरे ही सही, कुछ ऐसा ही हो रहा है।
मंदिर आंदोलन के बाद फैजाबाद पर भाजपा का लगातार परचम लहराता रहा, लेकिन अब ऐसा नहीं है। पिछले दो बार से यहां दूसरी पार्टियों के उम्मीदवार मैदान मार रहे हैं। और बदले परिवेश में अब कांग्रेस अपने इस पुराने गढ़ में वापसी कर रही है। फैजाबाद में उसकी जीत इसका संकेत है। इस संसदीय सीट के अंतर्गत आने वाले अयोध्या, मिल्कीपुर, सोहावल, बीकापुर, दरियाबाद व रुदोली विधानसभा सीटों में भी महज अयोध्या में ही भाजपा का कब्जा है। लेकिन यह सीट भी उसने आज से करीब ढाई साल पहले जीती थी। तब लल्लू सिंह ने यहां से विजय पताका फहराई भी। लेकिन, इस बार संसदीय चुनाव में वह जीत नहीं पाए। उनके वोटों के प्रतिशत में भी गिरावट दर्ज की गई है, जो संकेत है कि भाजपा की जमीन खिसक चुकी है। अन्य विधानसभा सीटों पर इस समय बसपा या सपा का कब्जा है। पर लोकसभा चुनावों के आंकड़ों पर गौर किया जाए, तो साफ होता है कि कांग्रेस अब इन जगहों पर वापसी कर रही है। यानी भाजपा के खेत में कांग्रेस की फसल लहलहाने को तैयार है। बाबरी विध्वंस के बाद कांग्रेस से मुंह मोडऩे वाले मुसलमानों की अब उससे नाराजगी दूर हो गई है। कहने का मतलब सालों बाद कांग्रेस की सूखी डालों पर हरियाली लौट रही है। तो क्या अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए प्रदेश में उम्मीदें पूरी तरह दम तोड़ रही हैं?
राजनैतिक जानकारों की इस सवाल पर एकमत राय है कि भाजपा की हालत बहुत हद तक पतली हो चुकी है। फैजाबाद समेत उत्तर प्रदेश के लोकसभा चुनाव परिणाम इसका संकेत हैं। अब भाजपा कोशिश भी करे, तो वह 90 के दशक वाली स्थिति में नहीं लौट सकती। कारण, उसका दोमुंहापन पूरी तरह से एक्सपोज हो चुका है। हिंदू समाज की नजरों में भी उसकी विचारधारा की पोल खुल चुकी है और साधू-संतों के समक्ष भी वह बेपर्दा हो चुकी है। इसी का नतीजा है कि संत भाजपा से नाराज हैं। वे अब किसी भी हालत में उसकी मदद को तैयार नहीं। हालांकि लोकसभा चुनावों में बुरी पराजय के बाद पार्टी में एक बार फिर अपने मूल एजेंडे पर लौटने पर विचार-विमर्श हो रहे हैं, लेकिन इसका फायदा अब शायद ही मिले। संत समाज में भाजपा को समर्थन करने को लेकर भारी विरोधाभाष है। अधिकांश की राय है कि अब भाजपा को चुनावों में मदद न की जाए। भाजपा के प्रति सॉफट कॉर्नर रखने वाले संतों की गिनती अब नगण्य रह गई है और वे भी जन-भावनाओं और दूसरे संतों की सोच के मद्देनजर खुलकर भाजपा प्रेम का इजहार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। ऐसे में पार्टी के लिए चुनावों में उत्प्रेरक साबित होते रहे इस वर्ग से उम्मीद बेमानी है। हार के बाद भाजपा के नेताओं में भी हिंदुत्व को लेकर भारी मतभेद उभर आए हैं। एक गुट आलाकमान पर इस बात का दबाव डाल रहा है कि अब पार्टी को विवादास्पद मुद्दों से तौबा कर विकास की अग्रगामी राजनीति करनी चाहिए। वहीं दूसरी तरफ कट्टर संघी बैकग्राउंड वाले भाजपाई नेता हार के बाद पार्टी को अपने मूल मुद्दों पर लौटने की वकालत कर रहे हैं। ऐसे में संभव नहीं कि आसानी से भाजपा इस मुद्दे पर ठोस निर्णय ले सके। राष्ट्रीय कार्यकारिणी से पहले पदाधिकारियों की बैठक में जिस तरह मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज हुसैन ने हिंदुत्व को लेकर तीखे सवाल चस्पा किए, उससे साफ है कि इस मुद्दे पर संगठन में सिर-फुटव्वल की स्थिति पैदा हो चुकी है। इस बात को लेकर जबरदस्त मतभेद हैं कि हिंदुत्व की कौन सी धारा अपनाई जाए। दीन दयाल की राष्ट्रवाद वाली या वरुण मार्का हिंदुत्व।
जहां तक देश की 80 प्रतिशत हिंदू जनता का सवाल है, तो वह भी भाजपा की सियासी चाल को समझ चुकी है। कहें तो बहुत पहले से ही वह इसे समझती रही है। वर्ना क्या कारण है कि भाजपा हिंदुत्व की विचारधारा पर चलते हुए भी 18 प्रतिशत वोट पाने वाली पार्टी ही बनी रही। और वह भी उस दौर में, जब इस विचारधारा की लहर चलने की बात की जाती थी। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। ऐसे में 18 प्रतिशत कहां लुढ़कता है, देखना होगा। सहयोगी दल भी इस बात को भांप कर ही उससे दामन छुड़ा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ गंभीर और विकासपरक राजनीति के रथ पर सवार कांग्रेस दोबारा से अपने सुनहरे दिन वापस पाने की कोशिशों में लगी है। इसका सकारात्मक परिणाम भी उसे हासिल हो रहा है। अयोध्या जैसे राम नाम के प्रतीक वाले इलाके में भी उसने भाजपा को मात देकर अपनी उम्मीदें जिंदा कर दी हैं। फैजाबाद से सटे सुल्तानपुर, अमेठी, बाराबंकी, गोंडा जैसे संसदीय क्षेत्रों में भी इस बार कांग्रेस ने ही जीत का शंखनाद किया है। भाजपा यहां भी उसके विजय रथ को रोकने में कामयाब नहीं हो पाई। कहने का मतलब भाजपा खो रही है और कांग्रेस जिंदा हो रही है। उत्तर प्रदेश में भी और राम जन्मभूमि में भी। इसी जगह ने उससे कभी उसकी उम्मीदें छीनी थीं, अब इसी जगह से उसकी उम्मीदें जाग रही हैं।
ये कैसी मुश्किल है
हाजीपुर से सांसद बनते रहे पासवान को अब अपना राजनैतिक वजूद खतरे में दिख रहा है। लिहाजा, वह अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखने के लिए बेतरह हाथ-पैर मार रहे हैं। हार के बाद अब वह किसी तरह संसद का सफर तय करनेे की भी ताक में हैं। लेकिन, इसके लिए भी उन्हें लालू-मुलायम के साथ की दरकार है। तो, क्या मिल पाएगा उन्हें यह दयादान? और इस दान की राजनीति से कितनी फलेगी-फूलेगी उनकी सियासत? एक समीक्षा।
कहा जाता है कि 'डेमोक्रेसी' में 'परमानेंसी' की किसी सियासी व्यक्ति को उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। पर बहुतेरे ऐसी उम्मीद रखते हैं। राम विलास पासवान भी उनमें से एक हैं। शायद परिस्थितियां भी अब तक उन्हें ऐसी उम्मीद रखने की वजह देती रही हैं। अल्पकालिक व्यवधान को छोड़ दिया जाए, तो लगातार करीब तीन दशकों से वह सत्ता और संसद का हिस्सा रहे हैं। लेकिन, इस बार परिस्थितियां बदली हुई हैं। और वह भी पूरी तरह। अब वह किसी सदन या सरकार का हिस्सा नहीं हैं। लोकसभा चुनाव में जनता ने उनके साथ उनकी पूरी पार्टी को बिहार से उखाड़ फेंका है। कोई नहीं जीत पाया। न पासवान, न ही उनके परिवार का कोई और सदस्य। आज उनका ओहदा महज लोक जनशक्ति पार्टी का अध्यक्ष होना भर रह गया है। ऐसे में उनकी राजनैतिक प्रासंगिकता को लेकर सियासी गलियारों में सवाल उठ रहे हैं। और ये सवाल पासवान को भी अंदर तक मथने लगे हैं। तभी तो सियासत में घाट-घाट का पानी पी चुके दलित नेता रामविलास पासवान इन दिनों अपनी आगे की सियासी रणनीति पर विचार करने में व्यस्त हैं। नए सिरे से वह अपनी राजनैतिक धरातल की समीक्षा कर रहे हैं। साथ ही लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी का सूपड़ा साफ होने के बावजूद सांसद बनने के रास्ते भी तलाश रहे हैं। यह सोचकर कि सियासी परिदृश्य में किसी तरह उनका नाम बना रहे। पर इसके लिए वह चौथे मोर्चे के अपने दोनों साथी (लालू और मुलायम) के रहमो-करम पर निर्भर दिखते हैं।
बताया जाता है कि सियासत में अपने नए दोस्तों की मदद से ही पासवान संसद में पहुंचने का जुगाड़ करने में लगे हैं। उनके उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद सीट से लोकसभा उपचुनाव लडऩे की बातें भी कही जा रही हैं। गौरतलब है कि सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की दो लोकसभा सीटों- फिरोजाबाद और कन्नौज से चुनाव लड़ा था। इन दोनों ही जगहों पर उन्हें जीत मिली। अब उन्होंने फिरोजाबाद सीट खाली करते हुए कन्नौज सीट कायम रखने का फैसला किया है। लिहाजा, फिरोजाबाद में आने वाले दिनों में उपचुनाव होना है। पासवान इसी सीट पर सपा समर्थित लोजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं। अगर वह यहां से चुनाव लड़ते हैं और जीत दर्ज करते हैं, तो अपने दोनों साथियों की तरह वह भी लोकसभा के सदस्य बन जाएंगे। सूत्र बताते हैं कि सपा मुखिया मुलायम भी इसके लिए तैयार हैं। लेकिन, कल्याण सिंह यहां पासवान के अरमानों के आड़े आ रहे हैं। वह इस सीट से अपने बेटे राजवीर सिंह को चुनाव लड़वाना चाहतेे हैं। वैसे भी चुनावों से पहले मुलायम ने खुद भी राजवीर को संसद भेजने का वादा किया था। उस वक्त सभी टिकट बंट जाने के कारण राजवीर को पार्टी महासचिव बना दिया गया था। अब कल्याण फिरोजाबाद सीट पर अपने बेटे को लड़ाने का दबाव बना रहे हैं। ऐसे में पासवान की यहां से लड़कर संसद पहुंचने की संभावना छिन्न हो सकती है। शायद तभी वह दूसरे विकल्पों की तरफ भी नजरें गड़ाए हुए हैं।
ऐसे ही एक विकल्प के तहत वह झारखंड के मार्फत राज्यसभा पहुंचने की भी संभावना को खंगालने में लगे हैं। अगर चूडिय़ों के शहर फिरोजाबाद में उनके अरमान टूटे, तो वह झारखंड में अपनी उम्मीदें उगा लेंगे। राजद के एक बड़े नेता भी अनौपचारिक बातचीत में ऐसी संभावना की पुष्टि करते हैं। लेकिन यहां भी उन्हें लालू व अन्य की मदद की दरकार होगी। शायद इसी के दृष्टिगत वह इन दिनों कांग्रेस के साथ अपने मधुर रिश्तों की याद दिलाना नहीं भूलते। अगर पासवान झारखंड से राज्यसभा आते हैं, तो उनका कार्यकाल करीब एक साल का ही रहेगा। इसके बावजूद वह इस उम्मीद को नहीं छोडऩा चाहते। कम से कम संसद में इंट्री तो मिलेगी। बाद में और कोई जुगाड़ हो जाएगा। जुगाड़ के तो वैसे भी पासवान महारथी हैं। सो, इस वक्त पासवान को संसद में अपनी उपस्थिति तय करने की सबसे ज्यादा दरकार महसूस हो रही है। उनकी ऐसी इच्छा स्वाभाविक भी है। सांसद नहीं रहने की वजह से उनको लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। उनके राजनैतिक वजूद खत्म होने की संभावना तक जताने लगे हैं लोग। आज की तारीख में वह न तो सत्ता में हैं और न ही सत्ता में रहने वाली पार्टी के साथ। तभी केंद्रीय मंत्री के रूप में दिल्ली में मिले मकान को भी खाली करने का फरमान आ गया।
जानकार भी मानते हैं कि बदले सियासी हालात में अगर पासवान अगले पांच साल राष्ट्रीय परिदृश्य से गायब रहे, तो उनके गुमनामी में खो जाने का खतरा है। कांग्रेस ने अपनी दलित नेता मीरा कुमार को लोकसभा स्पीकर बनाकर भी पासवान के सामने राजनैतिक रूप से अस्तित्व का सवाल पैदा कर दिया है। ऐसे में पासवान की चिंता और बढ़ गई है। वह हरसंभव कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह उनकी राजनैतिक प्रासंगिकता कायम रहे। इस बेचैनी का नतीजा ही है कि देश में रिकार्ड मतों से चुनाव जीतने वाले यह स्वयंभू दलित मसीहा इन दिनों सपा-कांग्रेस जैसी पार्टियों के समर्थन से बिहार से बाहर फिरोजाबाद सीट से संसद पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। और इस सहयोग के लिए याचना तक की जा रही है। उत्तर प्रदेश में पासवान की पार्टी के प्रवक्ता राज कुमार ओझा कहते हैं, 'राम विलास पासवान का यहां से चुनाव लडऩा लगभग तय है। सपा से तो हमारा पहले से ही राजनैतिक गठजोड़ है। लालू-मुलायम-पासवान जैसे दिग्गजों ने पहले से ही उत्तर प्रदेश और बिहार में मिलकर राजनैतिक लड़ाई लडऩे का एलान किया हुआ है। कांग्रेस से भी पासवान के हमेशा मधुर रिश्ते रहे हैं। हमारे नेता उस दौर में सोनिया गांधी के पक्ष में खड़े होन वाले पहले शख्स थे, जब उनके विदेशी मूल का मुद्दा जोर पकड़ा हुआ था। ऐसे में हमें पूरी उम्मीद है कि कांग्रेस फिरोजाबाद में हमारे खिलाफ प्रत्याशी नहीं खड़ा करेगी।'
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या लालू और मुलायम भी पासवान की चिंता को लेकर गंभीर हैं।
इस पर सियासी जानकारों का मानना है कि इस वक्त तीनों नेताओं की एक-दूसरे की मदद करना मजबूरी है। कारण, बिहार में नई परिस्थितियों में लालू भी काफी कमजोर हुए हैं। उन्हें नीतीश का मुकाबला करने के लिए पासवान के साथ-साथ कांग्रेस की भी जरूरत है। लिहाजा पासवान को अगले विधानसभा चुनाव तक बांधे रखने के लिए वह उनकी हरसंभव मदद करेंगे। यही हाल उत्तर प्रदेश में मुलायम का है। भले ही चुनावों में उनकी बहुत दुगर्ति न हुई हो, लेकिन नुकसान तो बड़ा हुआ ही है। कांग्रेस के बढऩे और मायावती के बरकरार रहने से उन्हें आगे अपने लिए खतरा बढ़ता नजर आ रहा है। सो, वह पासवान के बहाने मायावती के दलित वोटबैंक की काट खोज रहे हैं। लेकिन, यह इतना आसान भी नहीं। फिरोजाबाद में पासवान कांग्रेस के समर्थन के बगैर जीत जाएंगे, यह यकीन के साथ नहीं कहा जा सकता। इसका इल्म पासवान को भी है। ठीक उसी तरह झारखंड में केवल लालू के बूते पासवान का सपना पूरा नहीं हो सकता। यही वजह है कि पासवान और उनके नेता कांग्रेस प्रेम का राग भी गाने में लगे हैं। वहीं दूसरी तरफ नए सिरे से पार्टी की जमीन मजबूत करने की भी कोशिशें की जा रही हैं।
अपनी राजनैतिक प्रासंगिकता के गुम होने के खतरे को देखते हुए ही पासवान भी अचानक सक्रिय हो गए हैं। इन दिनों वह लगातार बिहार के दौरे पर हैं। अपनी सियासी जमीन का अंदाजा लगा रहे हैं। और उन्हें जो नजर आ रहा है, वहां उनकी जमीन ही खिसकी है। दलित वोटों के अकेले ठेकेदार रहे पासवान को बिहार में निराशा ही हाथ लग रही है। नीतीश ने दलितों में भी महादलित कार्ड खेलकर पासवान को बड़ा झटका दिया है। यह झटका चुनावी नतीजों के रूप में अपना संकेत पहले ही दे चुका था। हाजीपुर से लगातार आठ बार से लोकसभा चुनाव जीत रहे पासवान को इस बार हार का मुंह देखना पड़ा। उनकी पार्टी का खाता तक नहीं खुला इस राज्य में। लालू-मुलायम को भी नतीजों से धक्का लगा, पर इसके बावजूद वे संसद पहुंचने में कामयाब रहे। ऐसे में पासवान आज सियासी बियाबान में भटकते दिख रहे हैं। बिल्कुल अकेले। उन्हें लालू-मुलायम के रूप में सहयोगी जरूर नजर आ रहे हैं, पर उनके सहयोग से शायद ही कुछ भला हो। उनकी तो खुद की सियासी दुनिया उजड़ चुकी है। बावजूद इसके पासवान उनके सहारे अपनी सियासी राह के सुनहरा होने की उम्मीद पाल रहे हैं। तभी पासवान से क्षुब्ध उनके एक करीबी कहते हैं, 'पासवान जी हैं तो दलित नेता, पर उन्हें कंटहा ब्राह्मण (महाब्राह्मण) कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। ये वो ब्राह्मण होते हैं, जो मरे लोगों का दान लेते हैं। पासवान वही कर रहे हैं। क्या बचा रह गया है उनके पास। सब खत्म हो चुका है। लोग उन्हें पूरी तरह समझ चुके हैं। सत्ता के साथ रहकर इतने वर्षों तक मलाई खाने में व्यस्त रहे। पार्टी और जनाधार की चिंता नहीं की। और अब भी सबक लेना नहीं चाहते। भगवान सद्बुद्घि दे उन्हें।'
पासवान के प्रति रोष पाले ऐसे कई लोग हैं। उनकी पार्टी में भी। लंबे समय से उनमें असंतोष की आग पल रही थी। अब नई परिस्थितियों में वह खुल कर भड़क रही है। पासवान के कई करीबी लोकसभा चुनावों के बाद उनका साथ छोड़कर नीतीश का हाथ थाम चुके हैं। बिहार में लोजपा के एकमात्र एमएलसी और पासवान के पीछे साए की तरह लगे रहने वाले संजय सिंह जैसे उनके सिपहसालार भी। सत्ता से दूर होने का खामियाजा पासवान झेल रहे हैं। इसके लिए उनकी पार्टी के कई लोग लालू को कारण मानते हैं, जो पासवान के सबसे बड़े दोस्त बने हुए हैं। लिहाजा, अब पार्टी में नीतीश का हाथ थामने की मांग भी दबे स्वरों में उठने लगी है। बताया जाता है कि सुशासन सरकार के मुखिया भी पासवान को अपने साथ देखना चाहते हैं। ऐसी कोशिश वह पहले भी कर चुके हैं। तब जब रामाश्रय सिंह, नागमणि, नरेंद्र सिंह जैसे लोग उनका साथ छोड़ गए थे। आज भी नीतीश का पासवान के प्रति सॉफ्ट कॉरनर है। जबकि लालू से छत्तीस का आंकड़ा। ऐसे में संभव है कि अगर पासवान लालू मोह त्याग दें, तो नीतीश से उनका गठबंधन कायम हो सकता है। इस कदम से पासवान संसद भी पहुंच सकते हैं और आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अपनी संभावनाएं भी जिंदा रख सकते हैं। पार्टी में व्याप्त निराशा से भी इससे आसानी से निपटने में मदद मिलेगी। इसी समीकरण के मद्देनजर लोजपा के नेता पासवान को यह राह पकडऩे की सलाह दे रहे हैं।
देखना शेष है कि अपने सियासी जीवन के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे पासवान की अगली रणनीति क्या होती है। फिलवक्त वह लालू-मुलायम के सामने दानपात्र लिए नजर आ रहे हैं। अपनी राजनैतिक प्रासंगिकता को कायम रखने के लिए। मुश्किल की इस घड़ी में वह दान लेने-देने की सियासत में उलझे रहेंगे या सफलता की असली सीढ़ी की तरफ कदम बढ़ाएंगे, इंतजार रहेगा।
