सोमवार, 22 जून 2009

भाजपा का गृहयुद्घ


भगवा खेमे में मची है भारी उथल-पुथल। हालात बेहद गंभीर। पार्टी कई मोर्चों में बंट चुकी है। सबका मकसद एक, संगठन पर अपना दबदबा कायम करना। और इसके लिए रची जा रही है रणनीतियां। किस धड़े में क्या चल रहा है, हकीकत को बेपर्दा करती रिपोर्ट।
लोकसभा चुनावों में हार के बाद भाजपा में हाहाकार मचा हुआ है। हर कोई एक-दूसरे के सिर हार का ठीकरा फोड़ने की कोशिश कर रहा है। और आरोपों-प्रत्यारोपों की तलवार भी ऐसे भांजी जा रही है, मानो दुश्मनों पर वार किया जा रहा हो। अपने-पराये की सारी हदें तोड़ कर। लिहाजा, सबसे अलग सियासी पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा के भविष्य को लेकर भी तरह-तरह के सवाल उठने लगे हैं। पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से पहले जिस तरह इसके नेताओं के बीच तीखी नोंकझोंक हुई, उसने अनुशासित पार्टी होने के उसके भ्रम को भी दूर कर दिया। विनय कटियार वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह से भिड़े, तो मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज ने अध्यक्ष राजनाथ पर ही हमला बोल दिया। चुनाव में हार की समीक्षा के लिए बुलाई गई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भी जमकर हंगामा बरपा। गरमागरम बहस की आड़ में पार्टी की गुटबाजी भी खुलकर सतह पर आ गई। वैसे अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह, प्यारे लाल खंडेलवाल जैसे नेताओं ने पहले ही हार को लेकर जवाबदेही तय करने की मांग कर संकेत दे दिया था कि कार्यकारिणी की बैठक में बवाल मचना तय है। अब यह बवंडर कहां जाकर थमेगा, कोई भी दावे के साथ कुछ कहने की हालत में नहीं।
दरअसल, भाजपा के भीतर मचा घमासान संगठन में पद-प्रतिष्ठा की लड़ाई का परिणाम है। हर नेता आडवाणी के बाद पार्टी में अपनी शहंशाही चाहता है। इसके लिए बाकायदा रणनीतियों के तहत संगठन में अपनी स्थिति मजबूत बनाने की कोशिशें की जा रही हैं। बताया जाता है कि अध्यक्ष पद से रिटायर होने की स्थिति में राजनाथ सिंह की नजर आडवाणी के स्थान पर है। लेकिन, साथ ही वह इस कोशिश में भी हैं कि अध्यक्ष पद पर उनका कार्यकाल किसी तरह बढ़ जाए। हालांकि ऐसी संभावना अब कम ही दिख रही है। सो, पहले विकल्प को लेकर भी वह भीतरखाने अपनी तिकड़म भिड़ाने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी में ठाकुर लॉबी को बढ़ावा देने के आरोप उनपर इसी के दृष्टिगत मढ़े जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ आडवाणी अब भी पार्टी पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहते हैं। यही वजह है कि लाख दबाव के बावजूद वह लोकसभा में विपक्ष का नेता बनने का मोह नहीं छोड़ पाए। आगे पीएम इन वेटिंग बने रहने की चाहत भी उनकी बरकरार है। ऐसे में संघ ने दबाव बनाया, तो अरुण जेतली को राज्यसभा में विपक्ष का नेता और लोकसभा में सुषमा स्वराज को उपनेता घोषित करवाकर एक सधी चाल चल दी। इस मकसद से कि अपनी टीम के नेताओं के माध्यम से संगठन पर आगे भी अपना अघोषित कब्जा जमाए रखें।
वैसे उनके ऊपर बढ़ रहे हमलों के मद्देनजर संभावनाएं जताई जाती हैं कि वर्षांत आडवाणी विपक्ष के नेता का पद छोड़ देंगे। इसी के दृष्टिगत दूसरी पंक्ति के नेता पहले ही यह इंतजाम कर लेना चाहते हैं कि आडवाणी का स्थान लेने वाला मनोनीत नेता न होकर चुना हुआ नेता हो। चूंकि इस बार पार्टी के सभी दिग्गज लोकसभा पहुंच गए हैं, इसलिए नंबर दो की लड़ाई में और तीखापन आ गया है। जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और मुरली मनोहर जोशी जैसे लोगों को यह दर्द साल रहा है कि पार्टी की बुरी हार के बावजूद आडवाणी विपक्ष के नेता पद पर कैसे बैठे हैं। वे हार की जिम्मेदारी तय करने की बात कर रहे हैं, जबकि आडवाणी गुट हार के लिए सामूहिक दायित्व के सिद्घांत पर जोर दे रहा है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में आडवाणी विरोधी ऐसे ही नेताओं की मांग पर हार के लिए समीक्षा समिति बनाने का एलान किया गया। इस घोषणा के पीछे भी गुटों की अपनी-अपनी राजनीति है। कोशिश की जा रही है कि किसी न किसी स्तर पर हार का ठीकरा कहीं फोड़ा जाए। लेकिन, लड़ते हुए नेताओं की वजह से पार्टी जरूर थरथराने लगी है। एकता तार-तार हो रही है और अनुशासन बेपर्दा। इससे आडवाणी की छवि पर भी असर पड़ रहा है।
दबी जुबान में पार्टी के ही कुछ नेता यह कहते पाए जाते हैं कि आडवाणी और वाजपेयी की बराबरी कभी नहीं हो सकती। वाजपेयी ने वक्त रहते बड़ी शालीनता से सियासत को अलविदा कह दिया, लेकिन आडवाणी पार्टी की दुर्गति के बावजूद कुर्सी का मोह पाले बैठे हैं। उन्हें लग रहा है कि अभी भी प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं जिंदा है, जो कभी पूरी नहीं हो सकतीं। कम से कम उन्हें पीएम प्रोजेक्ट कर तो कतई नहीं। संघ भी इस बात को समझकर नए सिरे से रणनीतियां बनाने में लगा है, लेकिन आडवाणी ब्रिगेड के लोग यहां भी सवाल उठा रहे हैं। सुधींद्र कुलकर्णी, स्वप्न दास, अरुण जेतली जैसे लोग भाजपा और संघ के रिश्तों पर पुनर्विचार की जरूरत जता रहे हैं। इस मकसद से कि संघ के प्रभुत्व को चुनौती देकर पार्टी पर अपना नियंत्रण कायम कर सकें। इसे खतरे बतौर देखकर ही आडवाणी विरोधी खेमे के लोग लगातार लौहपुरुष पर हमले बोल रहे हैं। उनका मकसद है हार के लिए आडवाणी को जिम्मेदार साबित करना। ताकि संगठन में उन्हें तवज्जो मिल सके और उनका दबदबा कायम हो। हिंदुत्व को लेकर चल रही बहस इसी रणनीति का हिस्सा है। जहां आडवाणी समर्थक हिंदुत्व से दूरी के पक्ष में हैं, वहीं विरोधी संघ के बगैर भाजपा के अस्तित्व पर ही सवाल उठा रहे हैं। उनका मानना है कि भाजपा आरएसएस के बगैर रह ही नहीं सकती। इसके पीछे ठोस तर्क भी दिए जा रहे हैं कि ऐसी कोशिशें पहले भी हुईं, पर नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। 50 के दशक में जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष मौलीचंद शर्मा और फिर बलराज मधोक ने संघ से दूरी की बात की थी, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया।
खुद राजनाथ सिंह ने यह कहकर कि संघ से रिश्ता खत्म करने का सवाल ही पैदा नहीं होता, आडवाणी खेमे पर निशाना साधने का ही काम किया है। कहने का मतलब कि भाजपा के भविष्य के नेता को लेकर पूरी पार्टी बंट गई है। अलग-अलग खेमों से अपने हित के अनुरूप कवायदें हो रही हैं। और इससे संगठन की चूलें हिल रही हैं। बाहर से भले ही हार को सामान्य ढंग से लेने का दिखावा किया जा रहा हो, लेकिन अंदर का गरम लावा बार-बार फूट रहा है। संघ इससे चिंतित है और वह अपने तरीके से इससे निपटने की कोशिश कर रहा है। पर लगता नहीं कि इस घमासान पर आसानी से नियंत्रण पाया जा सकेगा। भाजपा के नेताओं के बीच अहं, संदेह और स्वार्थ की ऊंची दीवार खड़ी हो चुकी है। कोई किसी को नेता मानने को तैयार नहीं। हर कोई कमांडर की बोली बोल रहा है। चाहे वह आडवाणी, राजनाथ हों या फिर अरुण जेतली, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू, जसवंत सिंह, मुरली मनोहर जोशी, नरेंद्र मोदी, हर कोई भाजपा का चेहरा बने रहना या बनना चाहता है। हां, अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कोई लॉबी का सहारा लेना चाहता है, तो कोई अकेले ही समर में कूद पड़ा है। इस लड़ाई से कार्यकर्ताओं का पार्टी से मोहभंग होने लगा है।
दिल्ली में भाजपा में मची इस मारकाट से अन्य प्रदेशों में भी संगठन की बुनियाद हिलने लगी है। वहां भी गुटबाजी और असंतोष खुल कर सतह पर आ गए हैं। उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन की मांग फिर से जोर पकड़ रही है, तो कर्नाटक में मुख्यमंत्री येदुरप्पा के लिए मुश्किलें मुंह बा रही है। राजस्थान में वसुंधरा राजे के खिलाफ भी हमले बढ़ गए हैं। अन्य प्रदेशों से भी ऐसी ही खबरें आ रही हैं। अरुण जेतली को राज्यसभा में पार्टी का नेता बनाए जाने पर तो जैसे चारों तरफ से हमले हो रहे हैं। इन हमलों के पीछे आडवाणी को ही निशाना बनाया जा रहा है। और इन हमलों के निहितार्थ सभी समझ भी रहे हैं। तभी राजनाथ को हार की जिम्मेवारी लेने के लिए खुद आगे आना पड़ा। दुनिया को यह दिखाने के लिए कि वह पार्टी के शुभचिंतक हैं और संगठन की बेहतरी के लिए हर बलिदान को तैयार हैं। लेकिन बलिदान के बदले वह पद मोह नहीं छोड़ रहे। इसपर उनकी पार्टी के ही नेता चुटकी लेते कहते हैं, 'अगर अध्यक्ष के नाते वह हार की जिम्मेवारी ले रहे हैं, तो उन्हें पद भी छोड़ देना चाहिए। दरअसल, राजनाथ तो खुद ही पार्टी में मचे घमासान के लिए जिम्मेवार हैं। वह पार्टी में सबकुछ अपने मन-मुताबिक चलाना चाहते हैं। इस बात की परवाह उन्हें नहीं कि इससे संगठन का आंतरिक लोकतंत्र तार-तार हो रहा है। उनकी नजर आडवाणी की जगह पर है। जबकि वह इसके काबिल नहीं।'
राजनाथ पर ऐसे आरोप मढ़ने वाले पार्टी में कई लोग हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आडवाणी के सारे प्रशंसक हों। उनपर हमले बोलने वाले भी कई हैं। उनका सीधा-सीधा कहना है कि आडवाणी पदलोलुप व्यक्ति हैं। वाजपेयी जी के समय में भी वह पीठ पीछे उनके लिए मुश्किलें खड़ी करने की साजिश रचते रहते थे। उन्हें बर्दाश्त नहीं होता था कि वाजपेयी प्रधानमंत्री बनने में सफल हो गए। हार के बावजूद वह अब भी पीएम बनने का सपना पाले हुए हैं। रथ यात्रा निकालने का फैसला तो उन्होंने कर लिया है, पर अब इससे सत्ता तक पहुंचने में वह कामयाब नहीं हो सकते। कहने का तात्पर्य कि भाजपा में आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर जोरशोर से चल रहा है और चलाया जा रहा है। हार की व्यापक समीक्षा भले ही बाद में हो, पर हार का ठीकरा अभी से ही एक-दूसरे के सिर फोड़ने की कोशिश हो रही है। और इसके लिए सभी सीमाएं लांघ दी गई हैं। कहें तो एक तरह से गृहयुद्घ की स्थिति है भाजपा में। पद के लिए छिड़ी इस लड़ाई में हर पैंतरे खेले जा रहे हैं। विरोधी लॉबी के खिलाफ मीडिया में खबरें छपवाने से लेकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने तक। इस घमासान में भाजपा के 'पार्टी विथ डिफरेंस' के दावे की पोल परत दर परत खुलती जा रही है। और साथ ही उसकी सियासी राह भी कंटीली होती जा रही है। देखना शेष है आगे यह गृहयुद्घ और कैसी-कैसी शक्लें अख्तियार करता है। फिलहाल हार पर हाहाकार है।

2 टिप्पणियाँ:

  1. भाजपा के कारनामों को देखकर तो लगता है कि वह जहां से शुरू हुई वहीं पहुंचना चाहती है, यानी दो सीटों वाली पार्टी। यदि नेताओं के बीच इसी तरह से सिर फुटव्‍वल जारी रही तो यह दिन भी दूर नहीं है।

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  2. आप सही लिखते हैं रईस जी। मुझे लगता है कि अब भाजपा का कुछ नहीं हो सकता है। आडवाणी अपना कब्जा छोड़ना ही नहीं चाहते। जिस तरह उन्होंने अपने लोगों को स्थापित कर दिया है और खुद रथयात्रा पर निकलना चाहते हैं, उससे तो यही इशारा मिलता है।

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