कांग्रेस को सत्ता में पहुंचाने के बाद राहुल अब अपने नए मिशन पर जुट गए हैं। मिशन है संगठन को मजबूत बनाना। इसके तहत पारंपरिक वोटरों को वापस पार्टी से जोडऩे की कवायद हो रही है। और साथ ही पुराने गढ़ों में कांग्रेसी पताका लहराने की गंभीर पहल।
मंत्रिमंडल में शामिल न होकर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने संकेत दे दिया था कि उनका इरादा फिलहाल सत्तासुख भोगने का नहीं, संगठन के लिए काम करते रहने का है। और अब वह नजर आने लगा है। सरकार गठन के बाद एक बार फिर राहुल अपने पुराने मिशन पर जुट गए हैं। पार्टी को मजबूत बनाने की गंभीर पहल के मद्देनजर गांधी-नेहरू परिवार की चौथी पीढ़ी के इस युवराज ने अब उन इलाकों पर ध्यान केंद्रित किया है, जो कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करते थे। जहां उसके परंपरागत वोटर हुआ करते थे और एक मजबूत कैडर बेस। राहुल ने इन क्षेत्रों को अपनी प्राथमिकता में शामिल करते हुए वहां पार्टी को पुनर्जीवित करने का प्रयास शुरू कर दिया है। चुनावी नतीजों का अध्ययन करने के बाद राहुल गांधी की टीम आदिवासी बहुल क्षेत्रों पर खासतौर पर फोकस कर रही है। कारण, यहां पार्टी का जनाधार पिछले वर्षों में सिकुड़ता देखा गया है। हालांकि पिछले दो साल से राहुल की टीम छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में जमीनी स्तर पर काम करती रही है, लेकिन उसका कोई सकारात्मक परिणाम चुनावों में देखने को नहीं मिला। लिहाजा अब नए सिरे से, नए फार्मूले के तहत काम करने की जरूरत महसूस की जा रही है।
बताया जाता है कि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी लोकसभा चुनावों में युवा कार्ड के चलने से खासे उत्साहित हैं। उसी जोश से लबरेज अब वह आदिवासी वोटरों का विश्वास जीतने में लगे हैं। छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में राहुल और उनकी टीम आदिवासी वोटरों के बिखराव की वजहों का पता लगाने की कोशिश कर रही है। जो रुझान मिले हैं, उसके अनुसार आदिवासी मतदाताओं में अपनी गहरी पैठ के कारण ही कांग्रेस पहले मध्य प्रदेश में एकछत्र राज करती रही थी। लेकिन इससे कटकर छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद मध्य प्रदेश में पार्टी की हालत पतली हो गई। अब यहां भाजपा का वर्चस्व कायम है। सूबे में लगातार उसकी सरकार ही सत्तासीन हो रही है। इस तथ्य के बावजूद कि भाजपा में आंतरिक गुटबाजी अपने चरम पर है। जिस छत्तीसगढ़ क्षेत्र की वजह से कांग्रेस की मध्य प्रदेश में तूती बोलती थी, उस आदिवासी बहुल राज्य में भी पार्टी 11 में से महज एक लोकसभा सीट ही जीत पाई। रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा की प्रदेश सरकार की पुनर्वापसी ने भी कांग्रेस के खिसके जनाधार का ही आभास कराया है। ऐसे में इस प्रदेश को राहुल ने अपनी नई प्रयोगशाला बना कर काम शुरू कर दिया है। इसके तहत संगठन को चाक-चौबंद बनानी की कोशिश की जा रही है।
राहुल की टीम ने विभिन्न प्रदेशों में पार्टी के जनाधार खिसकने के पीछे जो कारण ढूंढ़े हैं, उसके मुताबिक संगठन के भीतर खींचतान सबसे ब$ड़ी वजह है। इसके अतिरिक्त युवा संगठनों की नजरअंदाजी और चापलूसों की कोटरी भी पार्टी की छवि खराब करने का काम करती रही है। इन वजहों से पार्टी की नीतियों व कार्यक्रमों को जनता के बीच सही तरीके से पहुंचाने में नाकामी हाथ लग रही है। नेताओं के बीच गुटबाजी से कार्यकर्ताओं का उत्साह भी ठंढा पड़ा है। जहां पार्टी सत्ता में हैं, वहां सत्ता के लिए कांग्रेसियों में धमाचौकड़ी मची हुई है और जहां सत्ता से दूरी, वहां एक-दूसरे गुटों को नीचा दिखाने की कसरत। ऐसे में अनुशासनहीनता भी जोर पकड़ रही है। मतदाताओं में इससे पार्टी के प्रति एक आक्रोश पैदा हो रहा है। लिहाजा, राहुल अब संगठन के अंदर के इस दोष को दूर करने का जतन कर रहे हैं। पार्टी की विश्वसनीयता बढ़ाने के साथ ही संगठन में अनुशासन कायम करने की दिशा में भी काम हो रहा है। युवाओं को प्रतिनिधित्व देना इसी का एक हिस्सा है। ताकि उनमें रोष की स्थिति पैदा न हो। अक्सर युवाओं को यह शिकायत करते देखा गया है कि काम तो वे करते हैं, पर सत्ता की मलाई क्षत्रप चाटते हैं। अब ऐसी शिकायत को दूर करने की कोशिश की जा रही है। मंत्रिमंडल में जगह से लेकर सांगठनिक फेरबदल की कवायद इसी के दृष्टिगत हो रही है।
उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात में प्रयोग के तौर पर राहुल ने कांग्रेस के युवा संगठनों में व्याप्त खामियों को दूर करने के लिए जो कदम उठाए थे, उसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। इससे सबक लेते हुए अब राहुल ने पूरे देश में युवक कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन के ढांचे में बदलाव के संकेत दिए हैं। इसके तहत साफ सुथरी प्रक्रिया से सांगठनिक चुनाव कराने की तैयारियों को अमलीजामा पहनाया जा रहा है। साथ ही युवक कांग्रेस की संसद बनाने का भी अनूठा प्रयोग करने की तैयारी हो रही है। सूत्र बताते हैं कि राहुल गांधी और उनकी ब्रिगेड के सदस्य देश भर से प्राप्त आंकड़ों को लैपटॉप पर स्टोर कर दिन-रात इसका विश्लेषण कर रहे हैं। वे पार्टी को ब्लॉक स्तर से लेकर संसद तक अपने पैरों पर खड़ा करवाने की रूपरेखा बना रहे हैं। उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों में चिंतन शिविर का आयोजन कर राहुल ने पहले ही इस संबंध में अपना इरादा स्पष्ट कर दिया था। ऐसे शिविरों के माध्यम से युवाओं, महिलाओं, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को पार्टी से जोडऩे की कोशिशें की जा रही हैं। उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और उड़ीसा जैसे प्रदेशों में कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में इसका फायदा भी नजर आया है। अब इन शिविरों का दायरा बढ़ाया जा रहा है। विशेषकर उन इलाकों में, जहां कांग्रेस के परंपरागत वोटरों की बहुतायत है।
झारखंड, उड़ीसा, आंध्र्र प्रदेश में आदिवासी वोटरों की बेरुखी से ही चुनावों में कई सियासी सूरमा धूल चाट चुके हैं। मसलन उड़ीसा में वरिष्ठ आदिवासी नेता गिरिधर गमांग, उनकी पत्नी और बेटे को हार का सामना करना पड़ा, तो आंध्र में रेणुका चौधरी जीत दर्ज कराने में नाकाम रहीं। विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस भले ही सत्ता में पुनर्वापसी करने में कामयाब रही, लेकिन आदिवासी बाहुल्य इलाकों में मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी का करिश्मा नहीं दिखा। झारखंड में भी पिछली बार पार्टी के पास 6 सांसद थे, जबकि इस बार सिर्फ सुबोध कांत सहाय ही संसद का सफर तय करने में कामयाब हुए। इसके पीछे कहीं न कहीं कांग्रेस के परंपरागत आदिवासी वोटरों की उससे बेरुखी मुख्य वजह है। इसे देखते हुए राहुल इस वर्ग को पार्टी की मुख्यधारा से जोडऩे की विशेष पहल कर रहे हैं। युवा व अल्पसंख्यक वोटरों के साथ ही इस वर्ग पर भी खासा ध्यान दिया जा रहा है। राहुल गांधी के दिशानिर्देश पर युवक कांग्रेस के पदाधिकारी इन दिनों अपने-अपने इलाकों में जोर-शोर से पार्टी के सुनहरे दिन वापस लाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं।
पंजाब और उत्तराखंड में युवक कांग्रेस व एनएसयूआई के प्रदेश स्तरीय चुनाव पूर्व चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह की देखरेख में करवाकर राहुल ने एक उल्लेखनीय पहल की थी। अब इस पद्घति से अलग हटकर राहुल ने गुजरात में विधानसभा व लोकसभा क्षेत्र स्तर पर चुनाव शुरू करवाए हैं। संगठनात्मक सुधार की दिशा में इस पहल को बहुत अहम माना जा रहा है। इस चुनाव में पूरी पारदर्शिता के साथ पदाधिकारियों का चयन किया जाता है। आठ सदस्यों की समिति में जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, उसे समिति का अध्यक्ष चुना जाता है। साथ ही आठ प्रतिनिधि भी चुने जाते हैं। ऐसी प्रक्रिया हर राज्य में चलाई जा रही है। चाहे वह पुडुचेरी हो, चाहे तमिलनाडु। इसका मकसद पूरे देश में संगठन स्तर पर संसद तैयार करना है। और ये सारे काम राहुल बिना शोर-शराबे के खामोशी के साथ कर रहे हैं। पार्टी के अग्रिम संगठनों में लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव करवाकर उन्होंने एक बेहतरीन शुरुआत की है। इसका फायदा कुछ हद तक लोकसभा चुनावों में मिला। इसके बाद इसे और विस्तार दिया जा रहा है। राहुल का मानना है कि इसी से संगठन की नींव मजबूत होगी और कांग्रेस अपनी पुरानी स्थिति में लौट पाएगी।
राहुल के करीबियों का कहना है कि उन्होंने कांग्रेस को पुनर्जीवित करने के लिए दो से तीन साल का समय तय कर रखा है। इस दरम्यान वह पूरी मेहनत और रणनीति के साथ कांग्रेस के अग्रिम संगठनों को मजबूत बनाएंगे। ताकि अगले लोकसभा चुनाव में पार्टी अकेले बूते बहुमत प्राप्त कर सके। देखना शेष है कि राहुल की इस कवायद का क्या परिणाम निकल कर आता है। वैसे बहुत हद तक इसकी झलक इस वर्ष उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनावों में दिख जाएगी।
कांग्रेस का कायाकल्प
कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद अब पार्टी का सांगठनिक चेहरा भी बदलने की तैयारी हो रही है। इसके लिए विचार-मंथन का दौर जारी है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने दरबारियों से इस मुत्तलिक लगातार चर्चा कर रही हैं। हालांकि फरमान सोनिया के जरिए ही सुनाया जाना है, लेकिन निर्णय प्रक्रिया में राहुल के सुझावों को खासा सम्मान दिया जा रहा है।
सूत्र बताते हैं कि राहुल गांधी ने पार्टी आलाकमान को अपनी पसंद और अगले लोकसभा चुनाव के लिए की जा रही तैयारियों से भली-भांति अवगत करा दिया है। सोनिया ने भी राहुल की हर सलाह को माना है और उन्हें अपनी योजनाओं को कार्यान्वित करने की खुली छूट दी है। कई वरिष्ठ नेताओं के मनमोहन मंत्रिमंडल का हिस्सा बनने के उपरांत अब संगठन में नए चेहरों को लाने की तैयारी की जा रही है। ये नए चेहरे कौन हों, इस पर भी सोनिया राहुल की पसंद का ख्याल रख रही हैं। संगठन को मजबूत बनाने के लिए राहुल न सिर्फ विस्तृत सदस्यता अभियान शुरू करने पर जोर दे रहे हैं, बल्कि संगठन के चेहरे को भी धारदार बनाने की वकालत कर रहे हैं। साथ ही वह पार्टी में एक व्यक्ति, एक पद के फार्मूले का भी सख्ती से पालन होते देखना चाहते हैं। यही वजह है कि मंत्रिमंडल में शामिल होन से इंकार करते हुए उन्होंने कहा था कि किसी व्यक्ति को एक वक्त में एक ही काम करना चाहिए। इससे ही वह अपने काम से न्याय कर पाता है। माना जा रहा है कि उनकी इस सोच को संगठन के पुनर्गठन में खास तवज्जो दी जाएगी।
पार्टी संगठन में महासचिव मुकुल वासनिक, गुलाम नबी आजाद व पृथ्वीराज चौहान तथा कार्यसमिति सदस्य वी नारायणसामी के मंत्री बनने से संगठन में उनकी जगह काम करने वाले नए लोगों को मौका दिया जाना है। ये सभी संगठन के काम बेहतर ढंग से करते रहे हैं। लिहाजा इनके विकल्प की तलाश भी गंभीरता से हो रही है। प्रणव मुखर्जी, एके एंटोनी, अजय माकन व वीरप्पा मोइली के पास अलग-अलग राज्यों के प्रभार हैं और ये सरकार में मंत्री भी बनाए गए हैं। इन्हें भी राज्यों के प्रभार से मुक्ति मिल सकती है। सीपी जोशी से भी राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष का पद वापस लिया जा सकता है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार इस बार संगठन में ऑस्कर फर्नांडीस, पीजे कूरियन, अशोक तंवर, मनीष तिवारी, मारग्रेट अल्वा, सुरेश कोडीकुन्नील जैसे नए चेेहरे शामिल किए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्यों से भी कांग्रेस संगठन में पदाधिकारी बनाए जा सकते हैं। यह भी तय माना जा रहा है कि सांगठनिक बदलाव में उन राज्यों को अहमियत दी जा सकती है, जहां से अब तक प्रतिनिधित्व का अभाव रहा है। साथ ही विधानसभा चुनाव के लिए तैयार राज्यों का भी ख्याल रखा जाएगा।

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