सोमवार, 29 जून 2009

माल तुम्हारा, मान हमारा


कांग्रेस ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत केंद्र व राज्य सरकारों की लगभग 450 योजनाओं, कार्यक्रमों संस्थानों आदि के नामकरण नेहरू-गांधी के नाम पर कर डाले हैं। इन योजनाओं में देश की जनता के 4 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा लगे हुए हैं, लेकिन नाम व प्रचार हो रहा है पार्टी व परिवार विशेष का।

आप हिंदुस्तान के किसी कोने में चले जाइए, वहां आपको गांधी-नेहरू परिवार के नाम पर कुछ न कुछ देखने-सुनने को जरूर मिल जाएगा। मसलन जवाहरलाल नेहरू उद्यान, इंदिरा गांधी स्टेडियम, राजीव गांधी मार्ग आदि-आदि। लेकिन, यह तो बानगी भर है। दरअसल, देश भर में पिछले लगभग दो दशकों में लगभग 450 ऐसी सरकारी योजनाओं की घोषणा की गई है, जिनका नामकरण राजीव गांधी, इंदिरा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के नाम पर किया गया है। इनमें केंद्र व राज्य की कांग्रेसी सरकारों द्वारा घोषित विभिन्न परियोजनाओं के अलावा शिक्षण संस्थानों, सड़कों, बंदरगाहों, हवाई अड्डों, पार्कों, खेल प्रतियोगिताओं, अस्पतालों तक के नाम शामिल हैं। इन योजनाओं, कार्यक्रमों, संस्थानों में आम आदमी के टैक्स का करीब 4 लाख करोड़ रुपया लगा हुआ है। इन्हीं पैसों के बूते कांग्रेस सरकार के ये कार्यक्रम देश और आम आदमी के विकास की सुनहरी तस्वीर बनाने में जुटे हुए हैं। हालांकि यह बहस का अलग मुद्दा है कि देश की जनता की गाढ़ी कमाई से चल रही इन योजनाओं से आम आदमी कितना लाभान्वित हुआ है, लेकिन इससे कांग्रेस और गांधी-नेहरू परिवार का बतौर ब्रांड खूब प्रचार-प्रसार हुआ है। हो रहा है। पर चुनावी मौसम में अब यह कांग्रेस के लिए मुसीबत बन सकता है। संभव है कि आम चुनावों की गहमागहमी के बीच मुद्दों के अभाव से जूझ रहा विपक्ष इसे कांग्रेस के खिलाफ एक सशक्त मुद्दा बनाकर उसे कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करे।

दरअसल, संसदीय मामलों के विशेषज्ञ एवं राजनैतिक विचारक ए सूर्यप्रकाश ने हाल ही में चुनाव आयोग में एक जनहित याचिका दायर कर इस मामले पर से परदा उठाने का प्रयास किया है। साथ ही चुनाव आचार संहिता के तहत आयोग से मांग की है कि तत्काल केंद्र व राज्य सरकारों की ऐसी योजनाओं से पार्टी विशेष के नेताओं के नाम हटाने के निर्देश जारी किए जाएं। अपनी इस मांग के पक्ष में सूर्यप्रकाश ने तर्क दिया है कि योजनाओं में आम आदमी से वसूले गए टैक्स का पैसा इस्तेमाल हो रहा है, जबकि इनसे नाम हो रहा है पार्टी व परिवार विशेष का। इसका लाभ कांग्रेस को चुनावों में भी हो रहा है। लिहाजा, सभी योजनाओं, कार्यक्रमों, संस्थानों आदि से राजीव गांधी, इंदिरा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के नाम को हटाकर कुछ ऐसे न्यूट्रल नाम रखे जाएं, जिसका लाभ किसी भी राजनैतिक दल को न हो। बताया जाता है कि इस याचिका पर चुनाव आयोग के पदाधिकारियों को भी पसीने आ रहे हैं। इस मामले में उनसे न निगलते बन रहा है और न उगलते।

सरकारी योजनाओं के माध्यम से राजनैतिक लाभ कमाने की कोशिशें कोई नई बात नहीं है। लगभग हर राजनैतिक दल की तरफ से सत्ता में रहते हुए ऐसे हथकंडे अपनाए जाते हैं। कई बार तो सियासी दलों के बीच इस मुद्दे पर प्रतिशोधात्म कार्रवाई तक की हालत पैदा हुई है। एक दल की सरकार आई, तो उसने अपने नेता के नाम पर नामकरण कर दिया। जब वह सत्ता से उतरी और दूसरा दल सत्ता में आया, तो उसने पूर्ववर्ती सरकार के फैसले को पलट डाला। फिर सारी योजनाओं और संस्थानों के नामकरण अपनी पसंद के अनुसार किए गए। उत्तर प्रदेश में मायावती और मुलायम सिंह यादव के बीच ऐसे खेल देखे जा चुके हैं। लेकिन, इतनी बड़ी संख्या में योजनाओं का नामकरण किसी एक परिवार के सदस्यों के नाम पर होने का ताजा खुलासा अचंभित करने वाला है। कांग्रेस ने बड़े ही योजनाबद्घ तरीके से पिछले कुछ सालों में तमाम सरकारी योजनाओं-कार्यक्रमों को गांधी-नेहरू परिवार के तीन सदस्यों के नाम कर डाला। हालांकि इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि उक्त तीनों हस्तियों का भारत में विकास को दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है, लेकिन खेल प्रतियोगिताओं, शिक्षण संस्थानों, छात्रवृत्तियों, शोध संस्थानों, पीठों आदि के नामकरण में भी उनके नाम का इस्तेमाल आश्चर्यचकित करता है। भारत जैसे देश में विभूतियों की कभी कमी नहीं रही है। खेल से जुड़े संस्थानों व प्रतियोगिताओं का नामकरण अगर इस क्षेत्र की महान शख्सियतों के नाम पर होता, तो शायद वह ज्यादा न्यायोचित होता। ऐसे ही तर्क अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों, वैज्ञानिक शोध संस्थानों आदि पर भी कायम होते हैं। यह वाकई अचंभित करने वाला है कि कांग्रेस सरकारों ने अपनी महत्वपूर्ण योजनाओं, कार्यक्रमों के नामकरण में सिर्फ तीन नामों को ही तवज्जो दी है। और वे नाम हैं- जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी व राजीव गांधी। अन्य विभूतियों की बात छोड़ भी दें, तो खुद कांग्रेस के अंदर भी कई ऐसे महान चेहरे रहे हैं, जिनके नाम पर विचार किया जा सकता था। लेकिन, शायद कांग्रेस के हुक्मरानों का इन तीन नामों के अलावा किसी के नाम याद नहीं रहे हैं। इक्का-दुक्का योजनाएं गोपाल कृष्ण गोखले, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरोजनी नायडू जैसे दूसरे बड़े नेताओं के नाम पर घोषित हुईं, पर ज्यादातर जगहों पर गांधी-नेहरू परिवार के सदस्यों के ही नाम की पट्टिका लगी नजर आती है।

इस वक्त नेहरू-गांधी के नाम पर 12 परियोजनाएं और राज्य सरकारों के 52 कार्यक्रम चल रहे हैं। इसके अलावा 98 विश्वविद्यालयों व अन्य शिक्षण संस्थानों, 6 हवाई अड्डों व बंदरगाहों, 66 छात्रवृत्तियां व फैलोशिप, 47 खेल प्रतियोगिताएं, पदक व स्टेडियम, 15 राष्ट्रीय पार्क एवं अभयारण्य, 39 अस्पताल व चिकित्सा महाविद्यालय, 37 राष्ट्रीय विज्ञान एवं शोध संस्थान, पीठ व महोत्सव तथा 74 सड़कें, भवन व जगहों का नामकरण नेहरू-इंदिरा-राजीव के नाम पर किया गया है। पेयजल, आवास, रोजगार गारंटी योजना, वृद्घा पेंशन सहित लगभग सभी योजनाएं तीन व्यक्ति जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी व राजीव गांधी के नाम पर ही चल रही हैं। इस पर सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं, जो देश की आम जनता से टैक्स के रूप में वसूली गई हैं। गौरतलब है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना में राजीव गांधी विद्युतिकरण कार्यक्रम पर 28 हजार करोड़ रुपए व राजीव गांधी पेयजल मिशन पर 21 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया था। इसके अतिरिक्त उद्यमी मित्र योजना, श्रमिक कल्याण योजना एवं शिल्पी स्वास्थ्य बीमा योजना राजीव गांधी के नाम पर चल रही है। इंदिरा गांधी और जवाहर लाल नेहरू के नाम पर पहले से ही बड़ी-बड़ी योजनाओं के अलावा बड़े सरकारी और शिक्षण संस्थान चल रहे हैं। इंदिरा आवास योजना के लिए वित्तीय वर्ष 2008-09 में 7919 करोड़ और 2009-10 में 7914।70 करोड़ रुपए जारी किए गए। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्घ पेंशन योजना के लिए 2008-09 में 3443 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं।

यहां यह बात उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी के मूल्यों पर चलने का दावा करने वाली कांग्रेस ने उनके नाम पर सिर्फ एक योजना- पिछड़ा क्षेत्र विकास फंड रखा है। विपक्षी नेता इसे कांग्रेस द्वारा पार्टी व अपने नेताओं की छवि चमकाने के उद्देश्य से की गई कार्रवाई के तौर पर देखते हैं। इस दिशा में पार्टी द्वारा प्रयास अक्सर होते रहते हैं। देश के सबसे नामी मैनेजमेंट संस्थानों में से एक शिलांग के आईआईएम का नाम भी बदलकर पिछले दिनों राजीव गांधी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट कर दिया गया है। इस पर भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी कहते हैं, 'कांग्रेस में परिवारवाद की तो परंपरा ही रही है। उसे नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों के अलावा हिंदुस्तान में किसी की महानता नजर नहीं आती। राजग की जब केंद्र में सरकार थी, तो उसने व्यक्तियों के नाम पर नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के नाम पर योजनाएं शुरू कीं। वर्तमान में भी मध्य प्रदेश में वहां की भाजपा सरकार ने अपनी योजना का नाम मुख्यमंत्री योजना रखा न कि शिवराज योजना। कांग्रेस देश की जनता को लंबे समय से मूर्ख बनाने का प्रयास करती रही है और उसकी यह कोशिश आज भी जारी है।'
गांधी-नेहरू परिवार के प्रति कांग्रेसी सरकारों का प्रेम राज्यों में भी देखा जाता रहा है। जब-जब किसी राज्य में कांग्रेस सत्ता में आई है, उसने जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा व राजीव गांधी के नाम पर ही योजनाओं का पिटारा खोला। इस मकसद से कि इन योजनाओं का जब भी नाम लिया जाए, गांधी-नेहरू परिवार परिदृश्य में रहे। शायद यही वजह है कि इस परिवार की प्रासंगिकता आज भी भारतीय राजनीति और सामाजिक पटल पर कायम है। या कहें कायम रखी गई है। दूसरी महान विभूतियों को भुला कर। स्पष्ट है कि इसके पीछे कांग्रेस ब्रांड को भारतीय मतदाताओं के समझ हमेशा जिंदा रखने का प्रयास ही अहम वजह है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आज नहीं आज से ८० साल पहले भी अगर भारत के किसी भी कोने में गये होते तो नेहरु और गाँधी जी का नाम सुन लेते... संघर्ष किया है उन लोगों...

    जितने चश्में हैं उतने विचार

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  2. जिस की लाठी उसी की भैसं वाली बात है।इन लोगों ने देश की उतनी सेवा नही की जितनी वसूल ली है।पता नही.....कोई क्यों इस बात पर ध्यान नही देता।आप ने बढिया आलेख लिखा है ।बधाई स्वीकारें।

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  3. बहुत सही मुद्दा उठाया है आपने। संघर्ष अवश्य किया होगा किन्तु न उन्होंने अकेले किया था और न अनन्त तक उसे भुनाते रहना चाहिए। इस प्रथा पर रोक लगनी ही चाहिए।
    घुघूती बासूती

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