हाजीपुर से सांसद बनते रहे पासवान को अब अपना राजनैतिक वजूद खतरे में दिख रहा है। लिहाजा, वह अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखने के लिए बेतरह हाथ-पैर मार रहे हैं। हार के बाद अब वह किसी तरह संसद का सफर तय करनेे की भी ताक में हैं। लेकिन, इसके लिए भी उन्हें लालू-मुलायम के साथ की दरकार है। तो, क्या मिल पाएगा उन्हें यह दयादान? और इस दान की राजनीति से कितनी फलेगी-फूलेगी उनकी सियासत? एक समीक्षा।
कहा जाता है कि 'डेमोक्रेसी' में 'परमानेंसी' की किसी सियासी व्यक्ति को उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। पर बहुतेरे ऐसी उम्मीद रखते हैं। राम विलास पासवान भी उनमें से एक हैं। शायद परिस्थितियां भी अब तक उन्हें ऐसी उम्मीद रखने की वजह देती रही हैं। अल्पकालिक व्यवधान को छोड़ दिया जाए, तो लगातार करीब तीन दशकों से वह सत्ता और संसद का हिस्सा रहे हैं। लेकिन, इस बार परिस्थितियां बदली हुई हैं। और वह भी पूरी तरह। अब वह किसी सदन या सरकार का हिस्सा नहीं हैं। लोकसभा चुनाव में जनता ने उनके साथ उनकी पूरी पार्टी को बिहार से उखाड़ फेंका है। कोई नहीं जीत पाया। न पासवान, न ही उनके परिवार का कोई और सदस्य। आज उनका ओहदा महज लोक जनशक्ति पार्टी का अध्यक्ष होना भर रह गया है। ऐसे में उनकी राजनैतिक प्रासंगिकता को लेकर सियासी गलियारों में सवाल उठ रहे हैं। और ये सवाल पासवान को भी अंदर तक मथने लगे हैं। तभी तो सियासत में घाट-घाट का पानी पी चुके दलित नेता रामविलास पासवान इन दिनों अपनी आगे की सियासी रणनीति पर विचार करने में व्यस्त हैं। नए सिरे से वह अपनी राजनैतिक धरातल की समीक्षा कर रहे हैं। साथ ही लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी का सूपड़ा साफ होने के बावजूद सांसद बनने के रास्ते भी तलाश रहे हैं। यह सोचकर कि सियासी परिदृश्य में किसी तरह उनका नाम बना रहे। पर इसके लिए वह चौथे मोर्चे के अपने दोनों साथी (लालू और मुलायम) के रहमो-करम पर निर्भर दिखते हैं।
बताया जाता है कि सियासत में अपने नए दोस्तों की मदद से ही पासवान संसद में पहुंचने का जुगाड़ करने में लगे हैं। उनके उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद सीट से लोकसभा उपचुनाव लडऩे की बातें भी कही जा रही हैं। गौरतलब है कि सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की दो लोकसभा सीटों- फिरोजाबाद और कन्नौज से चुनाव लड़ा था। इन दोनों ही जगहों पर उन्हें जीत मिली। अब उन्होंने फिरोजाबाद सीट खाली करते हुए कन्नौज सीट कायम रखने का फैसला किया है। लिहाजा, फिरोजाबाद में आने वाले दिनों में उपचुनाव होना है। पासवान इसी सीट पर सपा समर्थित लोजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं। अगर वह यहां से चुनाव लड़ते हैं और जीत दर्ज करते हैं, तो अपने दोनों साथियों की तरह वह भी लोकसभा के सदस्य बन जाएंगे। सूत्र बताते हैं कि सपा मुखिया मुलायम भी इसके लिए तैयार हैं। लेकिन, कल्याण सिंह यहां पासवान के अरमानों के आड़े आ रहे हैं। वह इस सीट से अपने बेटे राजवीर सिंह को चुनाव लड़वाना चाहतेे हैं। वैसे भी चुनावों से पहले मुलायम ने खुद भी राजवीर को संसद भेजने का वादा किया था। उस वक्त सभी टिकट बंट जाने के कारण राजवीर को पार्टी महासचिव बना दिया गया था। अब कल्याण फिरोजाबाद सीट पर अपने बेटे को लड़ाने का दबाव बना रहे हैं। ऐसे में पासवान की यहां से लड़कर संसद पहुंचने की संभावना छिन्न हो सकती है। शायद तभी वह दूसरे विकल्पों की तरफ भी नजरें गड़ाए हुए हैं।
ऐसे ही एक विकल्प के तहत वह झारखंड के मार्फत राज्यसभा पहुंचने की भी संभावना को खंगालने में लगे हैं। अगर चूडिय़ों के शहर फिरोजाबाद में उनके अरमान टूटे, तो वह झारखंड में अपनी उम्मीदें उगा लेंगे। राजद के एक बड़े नेता भी अनौपचारिक बातचीत में ऐसी संभावना की पुष्टि करते हैं। लेकिन यहां भी उन्हें लालू व अन्य की मदद की दरकार होगी। शायद इसी के दृष्टिगत वह इन दिनों कांग्रेस के साथ अपने मधुर रिश्तों की याद दिलाना नहीं भूलते। अगर पासवान झारखंड से राज्यसभा आते हैं, तो उनका कार्यकाल करीब एक साल का ही रहेगा। इसके बावजूद वह इस उम्मीद को नहीं छोडऩा चाहते। कम से कम संसद में इंट्री तो मिलेगी। बाद में और कोई जुगाड़ हो जाएगा। जुगाड़ के तो वैसे भी पासवान महारथी हैं। सो, इस वक्त पासवान को संसद में अपनी उपस्थिति तय करने की सबसे ज्यादा दरकार महसूस हो रही है। उनकी ऐसी इच्छा स्वाभाविक भी है। सांसद नहीं रहने की वजह से उनको लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। उनके राजनैतिक वजूद खत्म होने की संभावना तक जताने लगे हैं लोग। आज की तारीख में वह न तो सत्ता में हैं और न ही सत्ता में रहने वाली पार्टी के साथ। तभी केंद्रीय मंत्री के रूप में दिल्ली में मिले मकान को भी खाली करने का फरमान आ गया।
जानकार भी मानते हैं कि बदले सियासी हालात में अगर पासवान अगले पांच साल राष्ट्रीय परिदृश्य से गायब रहे, तो उनके गुमनामी में खो जाने का खतरा है। कांग्रेस ने अपनी दलित नेता मीरा कुमार को लोकसभा स्पीकर बनाकर भी पासवान के सामने राजनैतिक रूप से अस्तित्व का सवाल पैदा कर दिया है। ऐसे में पासवान की चिंता और बढ़ गई है। वह हरसंभव कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह उनकी राजनैतिक प्रासंगिकता कायम रहे। इस बेचैनी का नतीजा ही है कि देश में रिकार्ड मतों से चुनाव जीतने वाले यह स्वयंभू दलित मसीहा इन दिनों सपा-कांग्रेस जैसी पार्टियों के समर्थन से बिहार से बाहर फिरोजाबाद सीट से संसद पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। और इस सहयोग के लिए याचना तक की जा रही है। उत्तर प्रदेश में पासवान की पार्टी के प्रवक्ता राज कुमार ओझा कहते हैं, 'राम विलास पासवान का यहां से चुनाव लडऩा लगभग तय है। सपा से तो हमारा पहले से ही राजनैतिक गठजोड़ है। लालू-मुलायम-पासवान जैसे दिग्गजों ने पहले से ही उत्तर प्रदेश और बिहार में मिलकर राजनैतिक लड़ाई लडऩे का एलान किया हुआ है। कांग्रेस से भी पासवान के हमेशा मधुर रिश्ते रहे हैं। हमारे नेता उस दौर में सोनिया गांधी के पक्ष में खड़े होन वाले पहले शख्स थे, जब उनके विदेशी मूल का मुद्दा जोर पकड़ा हुआ था। ऐसे में हमें पूरी उम्मीद है कि कांग्रेस फिरोजाबाद में हमारे खिलाफ प्रत्याशी नहीं खड़ा करेगी।'
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या लालू और मुलायम भी पासवान की चिंता को लेकर गंभीर हैं।
इस पर सियासी जानकारों का मानना है कि इस वक्त तीनों नेताओं की एक-दूसरे की मदद करना मजबूरी है। कारण, बिहार में नई परिस्थितियों में लालू भी काफी कमजोर हुए हैं। उन्हें नीतीश का मुकाबला करने के लिए पासवान के साथ-साथ कांग्रेस की भी जरूरत है। लिहाजा पासवान को अगले विधानसभा चुनाव तक बांधे रखने के लिए वह उनकी हरसंभव मदद करेंगे। यही हाल उत्तर प्रदेश में मुलायम का है। भले ही चुनावों में उनकी बहुत दुगर्ति न हुई हो, लेकिन नुकसान तो बड़ा हुआ ही है। कांग्रेस के बढऩे और मायावती के बरकरार रहने से उन्हें आगे अपने लिए खतरा बढ़ता नजर आ रहा है। सो, वह पासवान के बहाने मायावती के दलित वोटबैंक की काट खोज रहे हैं। लेकिन, यह इतना आसान भी नहीं। फिरोजाबाद में पासवान कांग्रेस के समर्थन के बगैर जीत जाएंगे, यह यकीन के साथ नहीं कहा जा सकता। इसका इल्म पासवान को भी है। ठीक उसी तरह झारखंड में केवल लालू के बूते पासवान का सपना पूरा नहीं हो सकता। यही वजह है कि पासवान और उनके नेता कांग्रेस प्रेम का राग भी गाने में लगे हैं। वहीं दूसरी तरफ नए सिरे से पार्टी की जमीन मजबूत करने की भी कोशिशें की जा रही हैं।
अपनी राजनैतिक प्रासंगिकता के गुम होने के खतरे को देखते हुए ही पासवान भी अचानक सक्रिय हो गए हैं। इन दिनों वह लगातार बिहार के दौरे पर हैं। अपनी सियासी जमीन का अंदाजा लगा रहे हैं। और उन्हें जो नजर आ रहा है, वहां उनकी जमीन ही खिसकी है। दलित वोटों के अकेले ठेकेदार रहे पासवान को बिहार में निराशा ही हाथ लग रही है। नीतीश ने दलितों में भी महादलित कार्ड खेलकर पासवान को बड़ा झटका दिया है। यह झटका चुनावी नतीजों के रूप में अपना संकेत पहले ही दे चुका था। हाजीपुर से लगातार आठ बार से लोकसभा चुनाव जीत रहे पासवान को इस बार हार का मुंह देखना पड़ा। उनकी पार्टी का खाता तक नहीं खुला इस राज्य में। लालू-मुलायम को भी नतीजों से धक्का लगा, पर इसके बावजूद वे संसद पहुंचने में कामयाब रहे। ऐसे में पासवान आज सियासी बियाबान में भटकते दिख रहे हैं। बिल्कुल अकेले। उन्हें लालू-मुलायम के रूप में सहयोगी जरूर नजर आ रहे हैं, पर उनके सहयोग से शायद ही कुछ भला हो। उनकी तो खुद की सियासी दुनिया उजड़ चुकी है। बावजूद इसके पासवान उनके सहारे अपनी सियासी राह के सुनहरा होने की उम्मीद पाल रहे हैं। तभी पासवान से क्षुब्ध उनके एक करीबी कहते हैं, 'पासवान जी हैं तो दलित नेता, पर उन्हें कंटहा ब्राह्मण (महाब्राह्मण) कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। ये वो ब्राह्मण होते हैं, जो मरे लोगों का दान लेते हैं। पासवान वही कर रहे हैं। क्या बचा रह गया है उनके पास। सब खत्म हो चुका है। लोग उन्हें पूरी तरह समझ चुके हैं। सत्ता के साथ रहकर इतने वर्षों तक मलाई खाने में व्यस्त रहे। पार्टी और जनाधार की चिंता नहीं की। और अब भी सबक लेना नहीं चाहते। भगवान सद्बुद्घि दे उन्हें।'
पासवान के प्रति रोष पाले ऐसे कई लोग हैं। उनकी पार्टी में भी। लंबे समय से उनमें असंतोष की आग पल रही थी। अब नई परिस्थितियों में वह खुल कर भड़क रही है। पासवान के कई करीबी लोकसभा चुनावों के बाद उनका साथ छोड़कर नीतीश का हाथ थाम चुके हैं। बिहार में लोजपा के एकमात्र एमएलसी और पासवान के पीछे साए की तरह लगे रहने वाले संजय सिंह जैसे उनके सिपहसालार भी। सत्ता से दूर होने का खामियाजा पासवान झेल रहे हैं। इसके लिए उनकी पार्टी के कई लोग लालू को कारण मानते हैं, जो पासवान के सबसे बड़े दोस्त बने हुए हैं। लिहाजा, अब पार्टी में नीतीश का हाथ थामने की मांग भी दबे स्वरों में उठने लगी है। बताया जाता है कि सुशासन सरकार के मुखिया भी पासवान को अपने साथ देखना चाहते हैं। ऐसी कोशिश वह पहले भी कर चुके हैं। तब जब रामाश्रय सिंह, नागमणि, नरेंद्र सिंह जैसे लोग उनका साथ छोड़ गए थे। आज भी नीतीश का पासवान के प्रति सॉफ्ट कॉरनर है। जबकि लालू से छत्तीस का आंकड़ा। ऐसे में संभव है कि अगर पासवान लालू मोह त्याग दें, तो नीतीश से उनका गठबंधन कायम हो सकता है। इस कदम से पासवान संसद भी पहुंच सकते हैं और आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अपनी संभावनाएं भी जिंदा रख सकते हैं। पार्टी में व्याप्त निराशा से भी इससे आसानी से निपटने में मदद मिलेगी। इसी समीकरण के मद्देनजर लोजपा के नेता पासवान को यह राह पकडऩे की सलाह दे रहे हैं।
देखना शेष है कि अपने सियासी जीवन के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे पासवान की अगली रणनीति क्या होती है। फिलवक्त वह लालू-मुलायम के सामने दानपात्र लिए नजर आ रहे हैं। अपनी राजनैतिक प्रासंगिकता को कायम रखने के लिए। मुश्किल की इस घड़ी में वह दान लेने-देने की सियासत में उलझे रहेंगे या सफलता की असली सीढ़ी की तरफ कदम बढ़ाएंगे, इंतजार रहेगा।

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