सोमवार, 29 जून 2009

भाजपाई खेत, कांग्रेसी फसल


राम मंदिर आंदोलन के रथ पर सवार होकर कभी भाजपा ने सत्ताशीर्ष का सफर तक तय किया था। तब अयोध्या और इससे सटे इलाकों में भगवा पार्टी की फसल लहलहाती थी। लेकिन, आज बदले हालात में अपने इस गढ़ में वह ठूंठ नजर आती है। जबकि कांग्रेस यहां लगातार अपना दबदबा बढ़ाती जा रही है। आखिर क्यों? बीजेपी के सिकु$ड़ते और कांग्रेस के फैलते जनाधार के पीछे के कारणों की तह में झांकती रिपोर्ट।


90 के दशक के आस-पास राम मंदिर का मुद्दा भारतीय जनता पार्टी के लिए संजीवनी बन कर उभरा था। तब भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या और इससे लगे इलाकों में उसका अपना एक गढ़ कायम हो चुका था। राज्य में भी उसका जनाधार अचानक इतना बढ़ा कि वह प्रदेश की सत्ता तक पर विराजमान हो गई। तत्पश्चात इस लहर के कारण ही दिल्ली के सिंहासन पर भी उसका कब्जा हुआ। पर आज करीब दो दशकों के बाद वह तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। न ही उत्तर प्रदेश में भाजपा सत्ता में है और न ही केंद्र में उसकी हालत अच्छी है। गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही। ये वे प्रदेश हैं, जो भाजपा के हिंदुत्व ब्रांड राजनीति की प्रयोगशाला के तौर पर जाने जाते थे। कहने का तात्पर्य कि अपने गढ़ में ही उसकी दुर्गति हो रही है। हालिया लोकसभा चुनाव में फैजाबाद संसदीय सीट पर भाजपा प्रत्याशी लल्लू सिंह की बुरी हार ने भी संकेत दे दिया कि भगवा किला अपने मजबूत आधार वाले स्थानों में भी दरक चुका है। भाजपा के ऊर्वर खेत पर कांग्रेस की फसल लहलहाने लगी है। यहां उसके उम्मीदवार निर्मल खत्री की जीत इसका जीता-जागता उदाहरण है।


गौरतलब है कि 90 के शुरुआती दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन की लहर ने यहां भगवा पार्टी का मजबूत जनाधार कायम कर दिया था। इसी पर सवार होकर उसके उम्मीदवार विनय कटियार ने यहां से तीन-तीन बार संसद का सफर तय किया। लेकिन, आंदोलन की धीमी पड़ती आंच ने धीरे-धीरे भाजपा के जनाधार में सेंध लगाना शुरू कर दिया। आज की तारीख में वहां पूरी तरह कांग्रेस की घुसपैठ हो चुकी है। उसने अपनी खोई जमीन वापस पा ली है। तभी फैजाबाद में उसके उम्मीदवार को जीत मिली और भाजपा के प्रत्याशी लल्लू सिंह को चौथे स्थान से ही संतोष करना पड़ा। इतना ही नहीं इस संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले छह विधानसभा सीटों पर भी भाजपा की हालत पतली हो चुकी है। उसके कब्जे में सिर्फ अयोध्या की सीट है। यहां पिछले असेंबली इलेक्शन में लल्लू सिंह विजयी हुए थे, जो इस बार संसदीय चुनाव में खेत रहे। उन्हें कुल 7,57,238 मतों में महज 1,51,558 वोट ही मिले। इस हार के कई मायने निकाले जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि राम नाम की राजनीति करने वाले दल की भगवान राम की जन्मभूमि पर ही जमीन खिसक चुकी है। अब उसके खेत में कांग्रेस की फसल झूमती-लहराती नजर आ रही है। विधानसभाई इलाकों में भी कांग्रेस की स्थिति में काफी बदलाव दृष्टिगोचर हो रहे हैं। हालांकि पिछले चुनाव में यहां कांग्रेस को पांच सीटों में से एक भी सीट प्राप्त नहीं हुई थी। लेकिन, बताया जाता है कि अगर आज वहां चुनाव होते हैं, तो भाजपा को अपनी एकमात्र अयोध्या सीट से भी हाथ धोना पड़ेगा और कांग्रेस को उल्लेखनीय सफलता प्राप्त होगी।


ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर भाजपा की अपने इस महत्वपूर्ण गढ़ में ऐसी दुर्गति क्यों हो रही है? क्यों साधू-संतों और मंदिरों की इस नगरी में उसका बोरिया-बिस्तर सिमटता जा रहा है? इसी राम जन्मभूमि को अपनी सियासत का ककहरा बनाकर भाजपा ने सत्ता सुख भोगा। इसी राम मंदिर आंदोलन से उसकी पहचान कायम हुई। इसी ने उसे जनाधार दिया। लेकिन, आज इसी जगह उसकी पहचान खो रही है। अयोध्या को मंदिरों का शहर कहा जाता है, जहां करीब 4 हजार मंदिर हैं। हर मंदिर में कम से कम 5-10 साधू, महंत रहते हैं और ये मंदिर आंदोलन के दौर से ही भाजपा का समर्थन करते रहे हैं। लेकिन, कभी भाजपा के साथ कदम दर कदम मिलाने वाले ये साधू-संत भी अब उसके साथ नहीं दिखते। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर है कि जिस पार्टी को उन्होंने उसकी विचारधारा और हिंदुत्व की प्रखर वकालत की वजह से समर्थन दिया था, उसने उन्हें पूरी तरह छला। अयोध्या में राम मंदिर बनाने की कसमें खाने वाले उसके नेताओं ने सत्ता में पहुंचकर अपने वादे को भुला दिया। मंदिर की याद उन्हें तब-तब ही आई, जब चुनावों का वक्त आया। इस बार तो फैजाबाद में चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे नरेंद्र मोदी ने भी राम मंदिर मुद्दे पर अपनी जुबान नहीं खोली। इस मुद्दे पर कुछ न बोलकर रामभक्तों को तो उन्होंने निराश किया ही, भाजपा के ऐसे रवैए ने आज धर्माचार्यों को भी उससे दूर कर दिया है। कल तक उसे दिल्ली की सत्ता पर आसीन कराने के लिए पूरा जोर जगाने वाले ये संत-महात्मा आज उसे जी भर-भर कर कोसते हैं।


अयोध्या की पावन धरती पर वास करने वाले संत देवराम दास वेदांती गुस्से में कहते हैं, 'भाजपा ने लाखों-करोड़ों हिंदुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ किया है। जिस मुद्दे पर हमलोगों ने केंद्र में उसकी सरकार बनाने के लिए समर्थन दिया, उस मुद्दे को सत्ता में पहुंचकर वह भूल गई। राम नाम की याद उसे केवल चुनावों में आती है। चुनावी सभाओं में गला फाड़-फाड़कर राम मंदिर का नारा लगाने वाले भाजपा के बड़े नेताओं को तो भगवान राम का दर्शन करने की भी फुर्सत नहीं है। लोकसभा चुनाव में फैजाबाद से पार्टी के उम्मीदवार रहे लल्लू सिंह संतों के निमंत्रण की भी लगातार अनदेखी करते रहे। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी निर्मल खत्री हमेशा से संतों की भावनाओं का ख्याल रखते रहे। उनके निमंत्रण पर कार्यक्रमों में हाजिर होते रहे। हारते रहने के बावजूद लोगों के बीच रहने की वजह से ही उन्हें जीत मिली और लल्लू को हार। संतों और हिंदू समाज की अवहेलना भाजपा की हार का कारण बन रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद वह सबक सीखने को तैयार नहीं।' भाजपा को लेकर संतों में नाराजगी इस कदर बढ़ चुकी है कि वे किसी भी हालत में अब उसपर विश्वास नहीं करना चाहते। न ही चुनावों में वे पार्टी की मदद करने आगे आ रहे हैं। इसी का नतीजा है कि अयोध्या जैसे स्थान और उससे लगे क्षेत्रों में भी भाजपा का जनाधार लगातार खत्म होता जा रहा है। हालांकि संघ और उसके आनुषंगिक संगठन लाख नाराजगी के बावजूद अभी भी भाजपा के लिए काम कर रहे हैं, पर उसका आर नहीं दिखता। जनता इन सबकी मंशा जान चुकी है। शायद यही कारण है कि अयोध्या और फैजाबाद जैसे उसके प्रतिकात्मक स्थल में भी भाजपा कमजोर हुई है और देश के अन्य हिस्सों में भी धीरे-धीरे ही सही, कुछ ऐसा ही हो रहा है।


मंदिर आंदोलन के बाद फैजाबाद पर भाजपा का लगातार परचम लहराता रहा, लेकिन अब ऐसा नहीं है। पिछले दो बार से यहां दूसरी पार्टियों के उम्मीदवार मैदान मार रहे हैं। और बदले परिवेश में अब कांग्रेस अपने इस पुराने गढ़ में वापसी कर रही है। फैजाबाद में उसकी जीत इसका संकेत है। इस संसदीय सीट के अंतर्गत आने वाले अयोध्या, मिल्कीपुर, सोहावल, बीकापुर, दरियाबाद व रुदोली विधानसभा सीटों में भी महज अयोध्या में ही भाजपा का कब्जा है। लेकिन यह सीट भी उसने आज से करीब ढाई साल पहले जीती थी। तब लल्लू सिंह ने यहां से विजय पताका फहराई भी। लेकिन, इस बार संसदीय चुनाव में वह जीत नहीं पाए। उनके वोटों के प्रतिशत में भी गिरावट दर्ज की गई है, जो संकेत है कि भाजपा की जमीन खिसक चुकी है। अन्य विधानसभा सीटों पर इस समय बसपा या सपा का कब्जा है। पर लोकसभा चुनावों के आंकड़ों पर गौर किया जाए, तो साफ होता है कि कांग्रेस अब इन जगहों पर वापसी कर रही है। यानी भाजपा के खेत में कांग्रेस की फसल लहलहाने को तैयार है। बाबरी विध्वंस के बाद कांग्रेस से मुंह मोडऩे वाले मुसलमानों की अब उससे नाराजगी दूर हो गई है। कहने का मतलब सालों बाद कांग्रेस की सूखी डालों पर हरियाली लौट रही है। तो क्या अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए प्रदेश में उम्मीदें पूरी तरह दम तोड़ रही हैं?


राजनैतिक जानकारों की इस सवाल पर एकमत राय है कि भाजपा की हालत बहुत हद तक पतली हो चुकी है। फैजाबाद समेत उत्तर प्रदेश के लोकसभा चुनाव परिणाम इसका संकेत हैं। अब भाजपा कोशिश भी करे, तो वह 90 के दशक वाली स्थिति में नहीं लौट सकती। कारण, उसका दोमुंहापन पूरी तरह से एक्सपोज हो चुका है। हिंदू समाज की नजरों में भी उसकी विचारधारा की पोल खुल चुकी है और साधू-संतों के समक्ष भी वह बेपर्दा हो चुकी है। इसी का नतीजा है कि संत भाजपा से नाराज हैं। वे अब किसी भी हालत में उसकी मदद को तैयार नहीं। हालांकि लोकसभा चुनावों में बुरी पराजय के बाद पार्टी में एक बार फिर अपने मूल एजेंडे पर लौटने पर विचार-विमर्श हो रहे हैं, लेकिन इसका फायदा अब शायद ही मिले। संत समाज में भाजपा को समर्थन करने को लेकर भारी विरोधाभाष है। अधिकांश की राय है कि अब भाजपा को चुनावों में मदद न की जाए। भाजपा के प्रति सॉफट कॉर्नर रखने वाले संतों की गिनती अब नगण्य रह गई है और वे भी जन-भावनाओं और दूसरे संतों की सोच के मद्देनजर खुलकर भाजपा प्रेम का इजहार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। ऐसे में पार्टी के लिए चुनावों में उत्प्रेरक साबित होते रहे इस वर्ग से उम्मीद बेमानी है। हार के बाद भाजपा के नेताओं में भी हिंदुत्व को लेकर भारी मतभेद उभर आए हैं। एक गुट आलाकमान पर इस बात का दबाव डाल रहा है कि अब पार्टी को विवादास्पद मुद्दों से तौबा कर विकास की अग्रगामी राजनीति करनी चाहिए। वहीं दूसरी तरफ कट्टर संघी बैकग्राउंड वाले भाजपाई नेता हार के बाद पार्टी को अपने मूल मुद्दों पर लौटने की वकालत कर रहे हैं। ऐसे में संभव नहीं कि आसानी से भाजपा इस मुद्दे पर ठोस निर्णय ले सके। राष्ट्रीय कार्यकारिणी से पहले पदाधिकारियों की बैठक में जिस तरह मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज हुसैन ने हिंदुत्व को लेकर तीखे सवाल चस्पा किए, उससे साफ है कि इस मुद्दे पर संगठन में सिर-फुटव्वल की स्थिति पैदा हो चुकी है। इस बात को लेकर जबरदस्त मतभेद हैं कि हिंदुत्व की कौन सी धारा अपनाई जाए। दीन दयाल की राष्ट्रवाद वाली या वरुण मार्का हिंदुत्व।


जहां तक देश की 80 प्रतिशत हिंदू जनता का सवाल है, तो वह भी भाजपा की सियासी चाल को समझ चुकी है। कहें तो बहुत पहले से ही वह इसे समझती रही है। वर्ना क्या कारण है कि भाजपा हिंदुत्व की विचारधारा पर चलते हुए भी 18 प्रतिशत वोट पाने वाली पार्टी ही बनी रही। और वह भी उस दौर में, जब इस विचारधारा की लहर चलने की बात की जाती थी। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। ऐसे में 18 प्रतिशत कहां लुढ़कता है, देखना होगा। सहयोगी दल भी इस बात को भांप कर ही उससे दामन छुड़ा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ गंभीर और विकासपरक राजनीति के रथ पर सवार कांग्रेस दोबारा से अपने सुनहरे दिन वापस पाने की कोशिशों में लगी है। इसका सकारात्मक परिणाम भी उसे हासिल हो रहा है। अयोध्या जैसे राम नाम के प्रतीक वाले इलाके में भी उसने भाजपा को मात देकर अपनी उम्मीदें जिंदा कर दी हैं। फैजाबाद से सटे सुल्तानपुर, अमेठी, बाराबंकी, गोंडा जैसे संसदीय क्षेत्रों में भी इस बार कांग्रेस ने ही जीत का शंखनाद किया है। भाजपा यहां भी उसके विजय रथ को रोकने में कामयाब नहीं हो पाई। कहने का मतलब भाजपा खो रही है और कांग्रेस जिंदा हो रही है। उत्तर प्रदेश में भी और राम जन्मभूमि में भी। इसी जगह ने उससे कभी उसकी उम्मीदें छीनी थीं, अब इसी जगह से उसकी उम्मीदें जाग रही हैं।

3 टिप्‍पणियां:

  1. हिंदी भाषा को इन्टरनेट जगत मे लोकप्रिय करने के लिए आपका साधुवाद |

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  2. कुछ और तथ्य इकठ्ठे कीजिए भाई साहब। इतना तो सभी जानते हैं।

    भाजपा के हाथी में से राम मन्दिर का मस्तक काट लीजिए तो वहाँ क्या बचेगा? सिर्फ़ एक मुर्दा लाश। आज वही मुर्दनी छायी है वहाँ। अक्षम शीर्ष नेतृत्व, अपनी कुर्सी बचाने की फिराक में बौराया हुआ घूमता अध्यक्ष, कुछ प्रतिभाशाली प्रतिद्वन्द्वियों को हताश करने की उसकी नीति, गु्टबाजी को हवा देती परम्परा, जातिवादी खेमों में बटी दूसरी पंक्ति और सबसे प्रमुख अटलबिहारी बाजपेयी जैसे विशाल व्यक्तित्व के अवकाशग्रहण करने से उत्पन्न शून्य को भर पाने वाले नेता का अभाव। ये सब कारण हैं इनके अवसान के।

    मीडिया ने भी इस पार्टी को प्रायोजित कार्यक्रमों द्वारा खूब गाली दी है। किसी समाचार समूह द्वारा इनके पक्ष में समाचार नहीं दिये जाते क्योंकि ऐसा करके वे बाकी सारे दरवाजों से अपना बिजनेस बन्द नहीं करा सकते।

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