लोकसभा चुनावों में हार से हलकान भाजपा अब नए सिरे से संगठन को चाक-चौबंद करने के अभियान में जुटी है। इसके लिए नए-नए नुस्खे भी आजमाए जा रहे हैं। बदले हालात में जहां पार्टी की दुर्गति कराने वाले हवा-हवाई नेताओं के पर कतरे जा रहे हैं, वहीं जनाधार वाले कर्मठ नेताओं को खास तरजीह दी जा रही है। और क्या चल रहा है भगवा खेमे में, जायजा लेती रिपोर्ट।
कहा जाता है कि गंभीर प्रयास के बावजूद अगर आपको अपेक्षित नतीजा नहीं मिल पा रहा हो, तो निराश होने की बजाए नए सिरे से अपनी रणनीतियां तैयार करें। इससे सफलता की उम्मीद बढ जाएगी। लोकसभा चुनावों में बुरी तरह पिटने के बाद भाजपा में भी इन दिनों कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। वह अपनी हार और इससे उपजी निराशा-हताशा से ऊपर उठकर बदली रणनीतियों के साथ अपने भविष्य को सुनहरा बनाने की कोशिशों में जुट गई है। इसके तहत पार्टी अपनी उन खामियों को दूर करने में जुटी है, जिसने चुनावों में उसकी संभावनाओं को पलीता लगाने का काम किया। हार के पश्चात कारणों की समीक्षा में लगे पार्टी नेताओं को जो संकेत मिल रहे हैं, उसके अनुसार कई मोर्चों पर संगठन को लेकर बेजारी ने भाजपा का काम खराब किया है। यही वजह है कि संगठन को दोबारा नए सिरे से खडा करने की जरूरत महसूस हो रही है। और इसी के दृष्टिगत पार्टी के पितृ पुरुष श्यामाप्रसाद मुखर्जी के जन्मदिन छह जुलाई से पूरे देशभर में एकसाथ भाजपा ने सदस्यता अभियान शुरू किया है। इसका मकसद सांगठनिक चुनाव से पहले मजबूत और पारदर्शी तरीके से सदस्यों का एक नया नेटवर्क बनाना है, ताकि सही तरीके से सही लोग चुन कर पार्टी पदों पर आ पाएं।
हालांकि सांगठनिक चुनाव का तरीका पहले जैसा ही होगा, लेकिन इस बार सदस्यता अभियान का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया गया है। नए फार्मूले के तहत पार्टी के राष्ट्रीय स्तर से लेकर निचले स्तर तक के सभी नेता व कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्रों में सदस्यता अभियान चलाएंगे। पर, नए तरीके से। विभिन्न स्तरों पर नियुक्त सदस्यता अभियान प्रमुखों को निर्देश दिया गया है कि वे एक परिवार से दो से ज्यादा सदस्य नहीं बनाएं। पहले यह देखा जाता रहा है कि अभियान की जिम्मेदारी लेने वाले पार्टी कार्यकर्ता एक ही घर के सभी लोगों को सदस्य बनाकर अपना लक्ष्य पूरा कर देते थे। लेकिन, अब ऐसा नहीं हो पाएगा। सदस्यता अभियान में फर्जीवाडे को रोकने के लिए ही पार्टी ने प्रावधान किया है कि अभियान प्रमुखों को अलग-अलग घरों से सदस्य बनाने होंगे। इसमें महिलाओं, युवाओं को भी जोडने को कहा गया है। साथ ही बसपा की तरह जातीय गणित का ख्याल रखने की हिदायत भी दी गई है। इतना ही नहीं, सदस्यों की जो सूची बनाई जाएगी, उसमें उनका पूरा विवरण और उनका फोन नंबर देना अनिवार्य बनाया गया है। कहा जा रहा है कि इसी के आधार पर बाद में सूचियों का निरीक्षण भी किया जाएगा। विधानसभा, बूथ और सेक्टर स्तर पर सदस्यता अभियान प्रमुखों की नियुक्ति भी भाजपा में पहली बार हुई है। कहने का तात्पर्य कि नए नियम को भाजपा अपने लिए परिवार नियोजन मंत्र के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। ज्यादा से ज्यादा और वास्तविक सदस्य बनाने की पहल के साथ।
बताया जाता है कि पार्टी आलाकमान को विभिन्न प्रदेशों से सदस्यता अभियानों में भारी फर्जीवाडे की शिकायतें मिलती रही हैं। पहले कुछ स्वयंभू किस्म के लोग अपने लोगों के या फर्जी नाम एक सोची-समझी रणनीति के तहत सदस्यता सूची में डलवा देते थे। इससे सदस्य बनाने का उनका कोटा भी पूरा हो जाता था और मनमाफिक सदस्य भी बन जाते थे। बाद में सूची में दर्ज इन्हीं नामों के आधार पर वे पार्टी पदों पर आसीन होने में सफल हो जाया करते थे। यानी नीचे के स्तर से ही संगठन के चुनाव में अनियमितता का बोलबाला चल रहा था। इससे काम करने वाले, जमीन से जुडे लोगों में असंतोष पैदा होता था। अलग-अलग प्रदेशों में असंतोष की ज्वाला कई बार धधक भी चुकी है। इससे पार्टी को नुकसान भी हुआ है। लेकिन, अब भाजपा ने इस बीमारी की जड में पहुंचकर इसे दुरुस्त करने का काम शुरू किया है। सदस्यता अभियान के स्वरूप में बदलाव को इसी कडी में देखा जा सकता है।
सुगठित संगठन की यह कला भाजपा ने बसपा से प्रभावित हो अपनाने की पहल की है। सदस्यता अभियान को पारदर्शी ढंग से संपन्न कराने के बाद ही संगठन के चुनाव की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इसके अक्टूबर से दिसंबर तक पूरे होने की उम्मीद है। सबसे पहले वार्ड स्तर पर चुनाव होंगे। इसके बाद मंडल, जिला व प्रदेश स्तर पर। और अंत में राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होगा। बताया जाता है कि राजनाथ सिंह इस पद पर दोबारा आसीन होने की इच्छा रखते हैं, लेकिन इसकी संभावना नगण्य है। कारण, इसके लिए पार्टी का संविधान बदलने की जरूरत होगी, जो संभव नहीं दिखता। लिहाजा इस पद के लिए अभी से ही कई नाम उभरने या उभारे जाने लगे हैं। अरुण जेतली, सुषमा स्वराज और अनंत कुमार इस दौड में मुख्य चेहरे हैं। पर इस रेस में जिस तरह अपनी-अपनी लॉबी के हितों को साधने की पहल हो रही है, वह संगठन को दुरुस्त करने की भाजपाई पहल की सफलता को लेकर जरूर संशय पैदा कर रही है।
बहरहाल, भाजपा में नई जान फूंकने की कवायद जोर-शोर से चल रही है। इसी के अंतर्गत विभिन्न प्रदेशों में पार्टी अध्यक्षों को बदला गया है या फिर बदले जाने की तैयारी हो रही है। राजस्थान, हरियाणा व हिमाचल प्रदेश में पुराने अध्यक्षों की छुट्टी करते हुए नए चेहरों को कमान सौंप भी दी गई है। आगे पंजाब, उत्तराखंड, दिल्ली आर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के अध्यक्षों की छुट्टी की बारी है। उनकी जगह नए लोगों को मौका दिया जाएगा। विदित है कि ओम प्रकाश माथुर की जगह अरुण चतुर्वेदी को राजस्थान में, आत्मा राम मनचंदा के स्थान पर कृष्णपाल गुर्जर को हरियाणा में और हिमाचल में जयराम ठाकुर की जगह खीमीराम को पार्टी का नेतृत्व सौंपकर उसकी सेहत सुधारने का जिम्मा सौंपा गया है। ये सभी नेता ६० वर्ष से कम उम्र के हैं। पार्टी ने तय किया है कि भविष्य में किसी भी प्रदेश में ६० वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति को अध्यक्ष नहीं बनाया जाएगा। उनकी जगह युवा और ऊर्जावान लोगों को तरजीह दी जाएगी। साथ ही भाजपा इस बात का भी ख्याल रख रही है कि इन पदों पर आने वाले लोग संघ के भी गुडबुक में शामिल हों। इससे संघ से भी उन्हें अपनी मजबूती के अभियान में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मदद मिलती रहेगी। हाल के दिनों में भाजपा-संघ रिश्तों को लेकर दोनों संगठनों के बीच जो खटास पैदा हुई है, भाजपा उसका सम्मानजनक हल निकालना चाहती है। वह संघ को एकबारगी अपने से अलग नहीं करना चाहती। शायद इसीलिए वह ऐसा रास्ता निकाल रही है, जिससे संघ भी तुष्ट रहे और भाजपा की गाडी भी पटरी पर रहे। हां, संघ में जरूर भाजपा से रिश्ते पर विचार-मंथन का दौर जारी है।
भाजपा में अब इस बात की महत्ता को समझने की कोशिश की जा रही है कि जमीन से जुडे, जनाधार वाले नेताओं को हर हाल में तवज्जो दिया जाना चाहिए। कारण, बहुत हद तक इसकी अनदेखी ही पार्टी की दुर्गति का बायस बनी है। लिहाजा, अब काम करने वाले क्षमतावान लोगों को मुख्यधारा में लाया जा रहा है। इसमें सभी वर्गों का ख्याल रखा जाएगा। युवाओं, महिलाओं के साथ ही जातीय समीकरण का भी। बताया जाता है कि भाजयुमो अध्यक्ष अमित ठाकर को केंद्रीय राजनीति में लाने की तैयारी हो रही है। पार्टी की युवा इकाई के अध्यक्ष बतौर ठाकर ने बेहतर काम किया है। उन्हें लोकसभा में टिकट देने की भी चर्चा थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे यह संदेश गया कि युवा-युवा की रट लगाने वाली भाजपा में भी उन्हीं युवाओं की पूछ होती है, जो परिवारवाद के प्रतीक हैं। पार्टी उस भ्रम को तोडने की पहल करना चाहती है। इसीलिए अमित ठाकर के साथ ही कई और युवा नेताओं को अहम जिम्मेदारी सौंपने पर विचार किया जा रहा है। सुभाष यदुवंश, पूनम महाजन, अनुराग ठाकुर जैसे युवा नेताओं को भविष्य में तरजीह मिलने की उम्मीद है। प्रदेशाध्यक्षों से भी राज्यों में युवा नेतृत्वकर्ताओं को आगे लाने को कहा गया है। पार्टी के इस फैसले से प्रदेशों में युवा नेताओं में उत्साह देखा भी जा रहा है।
इन कवायदों के बीच लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों के अध्यक्षों की छुट्टी कर यह संदेश भी देने की कोशिश की जा रही है कि प्रदर्शन नहीं करने वालों को खामियाजा भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। संकेत साफ है- जो करेगा, वह पाएगा। जो नहीं करेगा, वह भोगेगा। राजस्थान में ओम माथुर विधानसभा चुनावों के बाद लोकसभा चुनाव में भी पार्टी की हालत नहीं सुधार सके। लिहाजा, उन्हें अपनी सेहत सुधारने के लिए पद से छुट्टी दे दी गई। हरियाणा में मनचंदा का मन चंगा नहीं था, तभी पार्टी का सूपडा साफ हो गया। हिमाचल में भाजपा की सरकार होने के बावजूद जयराम ठाकुर पार्टी की ‘जय हो’ नहीं करा पाए। इसलिए इन सभी को सजास्वरूप बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। पंजाब में राजिंदर भंडारी, दिल्ली में ओपी कोहली, उत्तराखंड में बच्ची सिंह रावत को भी चुनावों में भाजपा की दुर्गति के लिए दंड मिलना तय है। सूत्र बताते हैं कि कई प्रदेशाध्यक्षों ने तो खुद ही इस्तीफे की पेशकश की हुई है। संभव है उनपर आगे निर्णय की मुहर लगा दी जाए।
संगठन को चुस्त-दुरुस्त करने में लगी भाजपा अब अपने पुराने वफादारों की तरफ भी नजरें इनायत कर रही है। संकेत है कि भाजपा छोड कर गए कुछ प्रमुख नेताओं को आने वाले दिनों में पार्टी में वापस लेने की औपचारिक घोषणा की जा सकती है। साथ ही असंतुष्ट नेताओं की समस्या पर भी अब ध्यान देकर उनकी नाराजगी दूर करने की कोशिशें हो रही हैं। यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ पार्टी नेताओं के गिले-शिकवे दूर किए जाने की खबरें इसका प्रमाण हैं। आडवाणी खुद भी पार्टी नेताओं को संगठन की संभावनाएं जिंदा करने के लिए मार्गदर्शन दे रहे हैं। पार्टी नेताओं को प्रवक्ता बनने से परहेज करने की हिदायत देकर उन्होंने इसी का परिचय दिया है। शायद लौहपुरुष को लगता है कि उम्मीदें अभी मरी नहीं हैं, सिर्फ सोई हैं। बस उसे जगाने की जरूरत है, पीएम की वेटिंग तो खुद ही कन्फर्म हो जाएगी। तभी वह अपने अरमानों के बिखरने के बाद भी ‘एक बार और’ की तर्ज पर समर में बने रहना चाहते हैं। कहने का मतलब, अपने आगे के सफर को सुलभ बनाने के लिए भाजपा गंभीरता से प्रयासों में जुट गई है। गंभीरता दिख भी रही है। लेकिन, उपलब्धियों के लिहाज से यह गंभीरता हकीकत के धरातल पर कितना उतर पाती है, देखना दिलचस्प होगा। वैसे आने वाले कुछ महीनों में महाराष्ट्र समेत अन्य प्रदेशों में होने वाले विधानसभा चुनाव इसकी झलक तो दे ही देंगे। दिल्ली की दूरी नापने का असली खेल तभी शुरू होगा।

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