सोमवार, 20 जुलाई 2009

बदलो बिहार


लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस अब बिहार में अपनी खोई जमीन को वापस पाने में जुट गई है। राहुल गांधी ने इसके लिए बाकायदा एक रणनीति बनाई है। आखिर क्या है वह रणनीति? और क्या इसके बूते पार्टी प्रदेश में अपनी वापसी में कामयाब हो सकती है? एक आकलन।

पटना के कुर्जी रोड स्थित बिहार प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में कभी सन्नाटा पसरा हुआ करता था। लेकिन, इन दिनों यहां खूब चहल-पहल नजर आती है। लोकसभा चुनावों के बाद संगठन में जो नई ऊर्जा का संचार हुआ है, वह यहां आने वाले नेताओं, कार्यकर्ताओं के चेहरे पर और उनके हाव-भाव से स्पष्ट झलकता है। भले ही चुनावों में कांग्रेस ने महज दो ही सीटें जीती हों, पर पार्टी के लोगों को लगता है कि उन्होंने एक लंबी और महत्वपूर्ण लडाई जीत ली है। और वह है वर्षों से लालू प्रसाद यादव की बंधक बनी कांग्रेस को उस कैद से मुक्ति दिलाने की लडाई। उन्हें लग रहा है कि इसके बाद अब पार्टी के लिए आगे की राह बहुत मुश्किल नहीं होगी। यही वजह है कि अब दोगुने जोश के साथ पार्टी बिहार में अपनी खोई हुई जमीन को दोबारा हासिल करने में जुट गई है।
इस दिशा में पार्टी के महासचिव राहुल गांधी गंभीरता से रणनीतियां बनाने में लगे हैं। उनकी नजर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों पर है। वह चाहते हैं कि चुनावों से पूर्व संगठन को इतना मजबूत कर दिया जाए कि अकेले बूते कांग्रेस दूसरी पार्टियों को चुनौती दे सके। यही वजह है कि लालू की राजनैतिक बेडियों से पार्टी को आजाद कराने के बाद वह संगठन को मजबूत बनाने का खाका बनाने में लगे हैं। इसके तहत पूरी पारदर्शिता के साथ युवा कांग्रेस का सांगठनिक चुनाव कराना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। बाकायदा इसके लिए जल्द ही सदस्यता अभियान भी शुरू किया जा रहा है। हालांकि यह अभियान अन्य प्रदेशों में भी चलाए जा रहे हैं, लेकिन बिहार पर राहुल की खास नजर है। दरअसल, राहुल प्रदेश में अपने लिए ऐसे युवा नेताओं की टीम चाहते हैं, जो किसी लॉबी में न रहते हुए निष्ठा से संगठन के प्रति काम करें। हवा-हवाई नेताओं की जगह वह उन लोगों को तरजीह देना चाहते हैं, जिनमें वाकई क्षमता हो। ऐसे युवाओं की तलाश में जुटे राहुल की संभावित टीम में विनोद शर्मा, सरदार गुरूजीत सिंह, कुमार आशीष, मनोज शर्मा जैसे युवा कांग्रेसियों का नाम लिया जा रहा है। समीर सिंह को भी आने वाले दिनों में खास तवज्जो मिलनी तय है।
विनोद शर्मा लंबे अरसे से कांग्रेस से जुडे रहे हैं। सीताराम केसरी के कार्यकाल के दौरान वह पार्टी की टिकट पर विधानसभा चुनाव भी लड चुके हैं। लोकसभा चुनावों के दौरान उन्होंने महाराजगंज में मीडिया का कार्यभार भली-भांति अंजाम दिया। साथ ही पटना साहिब में कांग्रेस उम्मीदवार शेखर सुमन के साथ भी सक्रियता के साथ चुनाव मैदान में काम करते रहे। अब चुनावों के बाद वह पटना में नीतीश सरकार की नाकामियों से जनता को रूबरू करा रहे हैं। कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष समीर सिंह के साथ कदम से कदम मिलाते हुए वह पार्टी का जनाधार बढाने की कोशिशों में लगे हैं। बताया जाता है कि उनकी इच्छा पालीगंज से विधानसभा का चुनाव लडने की है। सरदार गुरूजीत सिंह भी मोकामा से विधानसभा का चुनाव लड चुके हैं और सक्रिय युवा नेता के तौर पर जाने जाते हैं। मनोज शर्मा युवा कांग्रेस के महासचिव बतौर एक ऊर्जावान और कर्तव्यनिष्ठ यूथ लीडर की पहचान रखते हैं। इन युवा कांग्रेसियों को आने वाले दिनों में राहुल की तरफ से तरजीह दी जा सकती है। गौरतलब है कि कांग्रेस के युवराज ने सन २०१० तक देश के सभी राज्यों में युवा कांग्रेस के चुनाव कराने का लक्ष्य निर्धारित कर रखा है। इसका मकसद क्षमतावान युवा नेताओं को मुख्यधारा में लाना है, ताकि संगठन की मजबूती बढ सके।
युवा कांग्रेस के सांगठनिक चुनाव के साथ ही कांग्रेस महासचिव ने अपने विस्तृत बिहार दौरे का कार्यक्रम भी तय किया है। बाढ प्रभावित कोशी प्रक्षेत्र के उनके दौरे के बाद पार्टी को इस इलाके में उल्लेखनीय सफलता मिली थी। कहा जाने लगा कि कांग्रेस यहां अपने पुराने सुनहरे दिन की ओर लौटने लगी है। इसने अन्य पार्टियों की चिंताएं बढा दी हैं। तभी नीतीश इन दिनों यहां कांग्रेस को जमने से रोकने के लिए अपना विशेष ध्यान लगा रहे हैं। इस इलाके के लिए घोषणाएं और उनके दौरे को इसी से जोडकर देखा जा रहा है। कोशी प्रक्षेत्र के अलावे लोकसभा चुनावों के दौरान राहुल अन्य क्षेत्रों का दौरा नहीं कर पाए थे। अब संसद के बजट सत्र के बाद वह बिहार की यात्रा पर फिर से निकलने वाले हैं। अपने प्रदेश दौरे में वह युवाओं, दलितों और मुसलमानों को पार्टी से जोडने की विशेष पहल करते नजर आएंगे। हालांकि हालिया लोकसभा चुनावों में मुसलमान वोटरों का पार्टी की तरफ रुझान देखने को मिला है, लेकिन कांग्रेस अपने इस परंपरागत वोटबैंक को पूरी तरह अपने पाले में लाने की योजना बना रही है। फिलहाल लालू की पार्टी राजद से छिटके मुस्लिम मतदाता कांग्रेस और कुछ हद तक नीतीश की पार्टी जद (यू) के पक्ष में नजर आ रहे हैं। शायद इसी के मद्देनजर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शर्मा दिवंगत राजीव गांधी के जन्मदिन पर २१ अगस्त से दलितों और मुसलमानों की बस्तियों की पदयात्रा की अपनी योजना का शुभारंभ करने वाले हैं। इस कार्यक्रम की शुरुआत राहुल गांधी ही करेंगे। अनिल शर्मा ने राहुल गांधी के साथ गांव-गांव भ्रमण का भी कार्यक्रम रखा है। प्रदेश के युवा वोटरों को कांग्रेस से जोडने के लिए राहुल सम्मेलनों और विश्वविद्यालयों के दौरे के माध्यम से उनसे संवाद स्थापित करेंगे। कहने का तात्पर्य कि कांग्रेस बपने इस पुराने गढ में दोबारा अपनी पहचान वापस पाने के लिए पूरी तरह बेचैन दिख रही है। राहुल और प्रदेश के नेताओं के साथ-साथ आलाकमान भी इस दिशा में माथापच्ची में उलझा है कि किस तरह कांग्रेस को बिहार में एक मजबूत दल के रूप में खडा किया जाए।
सूत्र बताते हैं कि दिल्ली में भी पार्टी के बडे नेता बिहार में कांग्रेस के लिए उम्मीद देख रहे हैं। यही वजह है कि नई परिस्थितियों में राज्य के सामाजिक और राजनैतिक समीकरण के मद्देनजर वे भी नए सिरे से पार्टी को खडा करने की कवायद में जुट गए हैं। इसके लिए लोकसभा में पार्टी के प्रदर्शन की समीक्षा की जा रही है। देखा जा रहा है कि कहां और क्या पार्टी के लिए फायदेमंद रहा और क्या नुकसानदेह साबित हुआ। केंद्रीय स्तर पर इस हलचल को देखते हुए ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शर्मा व प्रभारी इकबाल सिंह की मुखालफत करने वाले नेता भी सक्रिय हो गए हैं। वे संगठन में बदलाव की जरूरत जता रहे हैं। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष व प्रभारी ने बाहर से आए दल-बदलुओं को टिकट की सिफारिश कर पार्टी का बंटाधार करवाया वर्ना लोकसभा चुनावों में पार्टी कई सीटें जीत सकती थी। गौरतलब है कि इस बार ३७ में से २२ सीटों पर कांग्रेस ने बाहर से आए लोगों को अपना उम्मीदवार बनाया था। जहां तक चुनावों में उसके प्रदर्शन की बात है, तो कुल ३७ सीटों में से सिर्फ २ पर कांग्रेस की जीत हुई और दो पर ही वह दूसरे नंबर पर रही। ३० जगहों पर उसके उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए। एक दर्जन सीटों पर तो कांग्रेस के प्रत्याशियों को २५ हजार से भी कम वोट मिले। इन आंकडों का हवाला देते हुए आलाकमान से संगठन का चेहरा बदलने की मांग की जा रही है। कहा जा रहा है कि अगर कांग्रेस को बचाना है, तो किसी युवा दमदार चेहरे को पार्टी अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए। इसके लिए जिन नामों का सुर्रा छोडा जा रहा है, उनमें अधिकांश अनिल शर्मा के विरोधी के रूप में जाने जाते हैं। मसलन सदानंद सिंह, राम जतन सिन्हा, महाचंद्र सिंह, डॉ अशोक कुमार, विजय शंकर दूबे। विदित हो कि अनिल शर्मा के अध्यक्ष बनने के वक्त इनमें से कई नेता इस पद की दौड में शामिल थे। जब उनकी दाल नहीं गली, तो उन्होंने अनिल शर्मा के खिलाफ एक तरह से मोर्चा खोल दिया। मोर्चेबाजी अब भी जारी है।
हालांकि इससे बेफिक्र अनिल शर्मा लगातार संगठन में अपना कद बढाने में लगे हैं। लालू के साथ मिलकर चुनाव न लडने की वकालत वह पहले से ही करते रहे हैं। राहुल भी ऐसा ही चाहते थे, इसलिए उनकी बात मानी भी गई। यह अलग बात है कि चुनावी नतीजों में इस फैसले का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं आया। लेकिन, लालू की जद से बाहर आकर कांग्रेस में एक उम्मीद जरूर जगी। लोगों के भी इस पार्टी के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव देखा गया। यह बदलाव कांग्रेस के लिए उत्साहजनक है। लेकिन जिस तरह पार्टी में खेमेबाजी चल रही है, उससे उसकी भविष्य की उम्मीदों को पलीता भी लग सकता है। इसी कारण अब जब नए हालात में उसके पुराने वोटबैंक वापस लौटते दिख रहे हैं, तो पार्टी हर कदम फूंक-फूंक कर रखना चाह रही है। शायद यही कारण है कि अनिल शर्मा के खिलाफ विरोधियों की चाल अभी तक कामयाब नहीं हो पाई है। हां, पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व बिहार में जुझारू और युवा नेताओं को भी आगे लाने के पक्ष में जरूर है। शायद इसी को देखते हुए शकील अहमद को बिहार कांग्रेस का नेतृत्व सौंपने की बातें भी उठ रही हैं।
जहां तक शकील अहमद का सवाल है, तो उनके लोकसभा चुनाव में हारने व केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह न मिलने पर इस चर्चा को बल भी मिला था। लेकिन बताया जाता है कि शकील खुद बिहार की राजनीति से दूर रहना चाहते हैं। अपनी यह इच्छा उन्होंने आलाकमान तक पहुंचा दी है। लिहाजा, गांधी परिवार से उनकी नजदीकी के मद्देनजर अब उन्हें एआईसीसी में जगह देने की बात चल रही है। फिलहाल वह प्रवक्ता का दायित्व निभा रहे हैं। लेकिन, आलाकमान बिहार में कांग्रेस के लिए रणनीतियां बनाने में उनकी मदद ले रहा है। शकील भी लालू से संबंधविच्छेद कर चुनावी मैदान में उतरने की वकालत करने वाले प्रमुख लोगों में शामिल रहे थे। शायद यही कारण है कि अब उनकी राय को तवज्जो दी जा रही है, ताकि प्रदेश में कांग्रेस को दोबारा खडा किया जा सके। बताया जाता है कि कांग्रेस आलाकमान दलित, मुसलमानों के साथ ही ब्राह्मण, भूमिहार जैसी उच्च जातियों और पिछडे वर्ग के मतदाताओं को भी पार्टी से जोडने की रणनीति पर काम कर रहा है। संभव है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस संगठन में इन वर्ग के नेताओं को भी उचित प्रतिनिधित्व मिले।
ऐसे में एक सवाल यह भी कि क्या इन रणनीतियों से कांग्रेस प्रदेश में अपनी लोकप्रियता का परचम लहरा पाने में कामयाब होगी। विश्लेषकों का मानना है कि इस वक्त मौका और दस्तूर, दोनों कांग्रेस के साथ है। अगर वह इसे चतुराई से भुनाती है, तो वह प्रदेश में बेहतर भविष्य की उम्मीद कर सकती है। लालू के चंगुल से बाहर आकर पार्टी ने एक सकारात्मक पहल की है, उस पहल को सावधानी से बढाने की जरूरत है। लेकिन इसमें उसे यह ध्यान रखना होगा कि अति-उत्साह में लालू-पासवान की राजनैतिक धारा का अनुसरण न करे। पार्टी में खेमेबाजी पर अंकुश लगाकर ऊर्जावान और क्षमताशाली लोगों को आगे लाना ही कांग्रेस की उम्मीदों को लौ दे सकता है। चाटुकारिता और तानाशाही ने ही कभी यहां कांग्रेस की मिट्टी पलीद कराई थी। अदूरदर्शी फैसले की आग में तभी पार्टी आज तक झुलसती रही। अब जब उसके कार्यकर्ताओं और नेताओं में उत्साह जागा है, तो उस ऊर्जा को बिहार के साथ कांग्रेस की तस्वीर बदलने में इस्तेमाल किया जा सकता है।

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