सोमवार, 20 जुलाई 2009

‘नवाबी शौक’ के पीछे

मुगल बादशाह बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में समलैंगिक रिश्तों का जिक्र करते हुए ऐसा करने वालों को आडे हाथों लिया था। और कहा था कि कई बडे-बडे लोगों ने अपने घरों में बीस-बीस लौंडों को रख रखा है, जिससे वे अपनी जिस्मानी भूख मिटाते हैं। ऐसे रिश्ते अप्राकृतिक-अनैतिक तो हैं ही, समाज को गलत रास्ते पर भी उतारते हैं। पर, तब ऐसे संबंध रखने वाले गिनती के चंद लोग थे। और उस वक्त शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक समय ऐसा भी आएगा कि बडी तादाद में ऐसे रिश्तों के हिमायती सडकों पर आकर इसे वैधता दिलाने की लडाई लडेंगे। लेकिन, आज ऐसा हो रहा है। दुनिया भर में समलैंगिक रिश्तों को कानूनी और सामाजिक मान्यता दिलाने के लिए आंदोलन चलाए जा रहे हैं। बडे पैमाने पर। और इसी का नतीजा है कि अब तक दुनिया के १२७ मुल्कों में ऐसे रिश्तों को मान्यता मिल चुकी है। भारत भी अब उनमें से एक है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल के अपने फैसले में समलैंगिक रिश्तों को वैध ठहराने के पीछे जो तर्क दिया है, उसके अनुसार समलैंगिकता कोई बीमारी नहीं, बल्कि मनुष्य की ‘काम’ इच्छा की एक अन्य अभिव्यक्ति भर है। लिहाजा, इसे कोई अपराध नहीं माना जा सकता। कुछ इन्हीं तर्कों के साथ विश्व के अन्य देशों की सरकारों ने भी इस रिश्ते को मान्यता दी है। हालांकि, यह अलग बात है कि आज भी अधिकांश लोगों के लिए यह एक पाप है, जिसे मान्यता देना समाज के मुंह पर कलंक थोपने के समान है। लेकिन, समाज में इसका समर्थन करने वाले भी अब खुलकर सामने आते दिख रहे हैं। कई बडी-बडी हस्तियों, मसलन महेश भट्ट, जॉन अब्राहम, सेलिना जेटली ने तो बाकायदा इसे लोकतंत्र में व्यक्ति को मिलने वाले स्वतंत्रता के अधिकार के साथ जोडकर देखा है। वैधता मिलने पर हर्ष भी जताया है।
दरअसल, समलैंगिकता को कानूनी मान्यता देने की प्रक्रिया १९८९ में डेनमार्क से शुरू हुई थी। वह पहला देश था, जिसने समलैंगिक जोडों को विवाहित दंपति के बराबर का दर्जा दिया था। इसके बाद अन्य देशों में ऐसे संबंध रखने वाले और इसका समर्थन करने वाले तो जैसे खुलकर सामने आ गए। १९६० के दशक के अंत में अमरीका के स्टोनवाल पब से शुरू हुए दंगों से जन्मा ‘गर्व से कहो कि हम गे हैं’ का नारा पश्चिमी समाज में एक मानवाधिकार आंदोलन में तब्दील हो गया। तभी, चंद वर्षों में नार्वे, स्वीडन, आइसलैंड, फिनलैंड, नीदरलैंड, कई अमरीकी राज्यों, दक्षिण अफीक्रा, नेपाल जैसे १२० से ज्यादा देशों में इसे वैधानिकता का आवरण मिल गया। लडाई अब भी जारी है। कहीं कानूनी मान्यता के लिए, तो कहीं सामाजिक मान्यता के लिए। कहने वाले लाख कहते रहें कि ऐसी सोच रखने वाले उंगलियों पर गिनती के लोग हैं और समाज को गलत दिशा दे रहे हैं, लेकिन यह सोच लगातार अपना दायरा बढा रही है। देश-दुनिया सब जगह।
पहले यह परदे के पीछे था, आज खुलेआम। इसके पीछे कई लोग पश्चिमी देशों के एक खास वर्ग द्वारा चलाई जा रहीी साजिश तक करार देते हैं। उनका कहना है कि एड्स नियंत्रण के नाम पर बंटने वाले माल और ब्लू फिल्मों के अलग-अलग रूप के माध्यम से धन बटोरने वाले इसे अपने लिए संभावना बतौर देख रहे हैं। यही वजह है कि वे इसे विश्वव्यापी बनाने पर तुले हैं। जबकि ऐसे संबंध रखने वाले लोगों की तादाद न के बराबर है। वहीं ऐसे तर्कों को समलैंगिकता के पैरोकार यह कहकर ठुकराते हैं कि क्या इतिहास में दर्ज नवाबों, सुकरात, टेनिस खिलाडी मार्टिना नवरातिलोवा, हिटलर जैसे अनेकानेक लोग इसी दृष्टिगत ऐसे संबंध बनाते रहे। क्या आज लाखों-लाख आम समलैंगिक लोग वैधता मिलने पर इसीलिए जश्न मना रहे हैं? नहीं, ये उनकी खुशी का इजहार है। लंबे समय से उन्हें दोयम दर्जे का क्यों माना जाता रहा है। उनके कृत्य को अपराध की संज्ञा क्यो दी जाती रही है। इससे मुक्ति पर हर्ष तो स्वाभाविक है।
याद आता है कि कभी भारत में भी लोग ऐसे व्यक्तियों के लिए उपहासस्वरूप आंख मारकर कहते थे, ‘इनके शौक जरा अलग हैं’, ‘इन्हें नवाबी शौक है’ या फिर ‘पटरी से उतरी गाडी’ और ‘राह से भटका मुसाफिर’। इन जुमलों में तंज तो था, पर कहीं न कहीं तिरस्कार की जगह एक तरह की स्वीकार्यता भी। यह कि ऐसे भी होते हैं। समलिंगी यही समझाना चाहते हैं, हां ऐसे होते हैं। होते रहे हैं। स्वाभाविक और सामान्य लोगों की तरह। उनके शारीरिक संबंध का दायरा जरूर थेडा अलग है। लेकिन वे अपराधी नहीं। समाज ने उन्हें मान्यता नहीं दी थी। पर अब उसके लिए भी लडाई लडी जा रही है। आखिर अगर लोग अद्र्घनारीश्वर की पूजा करते हैं, किन्नरों का आशिर्वाद लेते हैं, तो फिर समलैंगिकों को मान्यता देने से गुरेज क्यों? यह धारा सडकों पर उतर चुकी है। अपनी राह बनाने के लिए। और वह बन भी रही है। हम-आप लाख हाय तौबा मचाएं।

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