बीते ५ वर्षों के दौरान रेलवे के कामकाज, परिचालन और वित्तीय हालत पर श्वेतपत्र लाने का एलान कर ममता बनर्जी ने पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद की मुश्किलें बढा दी हैं। कहा जा रहा है कि यह कदम कांग्रेस की एक सोची-समझी राजनीति का हिस्सा है। आखिर क्या है सच्चाई?
ममता बनर्जी। केंद्र सरकार की रेल मंत्री। लोकसभा में रेल बजट पेश करते हुए जब उन्होंने बंगाल के लिए परियोजनाओं की झडी लगाई, तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। कारण, केंद्र की सत्ता में भागीदार होने के बावजूद बंगाल की शेरनी की नजरें तो राइटर्स बिल्डिंग पर ही टिकी हुई हैं। यानी पश्चिम बंगाल की सत्ता के संचालन का केंद्र राइटर्स बिल्डिंग पर। जहां इस वक्त कॉमरेडों का कब्जा है। लेकिन, जब उन्होंने अपने भाषण में पूर्व रेलमंत्री और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव पर निशाना साधा, तो लोगों को जरूर इस पर हैरानी हुई। यह समझ से परे था कि आखिर ममता इस बिहारी क्षत्रप को क्यों घेर रही हैं? लालू पर हमला बोलकर उन्हें क्या हासिल होगा? हैरानी स्वाभाविक है, पर इसके पीछे एक अनकही कहानी है। और उस कहानी का स्क्रिप्ट तैयार किया है कांग्रेस ने। ममता ने तो सिर्फ उसे आवाज देने का काम किया है। पर इस आवाज की गूंज में लालू का राजनैतिक भविष्य जरूर हिचकोले खाता दिख रहा है।
गौरतलब है कि रेल मंत्री ममता बनर्जी ने एलान किया है कि वह अपने पूर्ववर्ती रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल में रेलवे के परिचालन, संगठनात्मक स्थिति और वित्तीय हालात पर श्वेतपत्र लाएंगी। बीते ५ वर्षों में रेलवे के आय-व्यय का ब्योरा संसद में पेश करने के उनके इस फैसले से अचानक लालू की पेशानी पर बल पड गए हैं। रेलमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल को अपने सियासी जीवन की एक बडी उपलब्धि बतौर प्रचार करते रहे लालू के लिए अब वही दौर भूत की तरह उनके पीछे लग गया है। ममता ने अपने भाषण में जिस तरह लालू की उपलब्धियों की हवा निकाली और उस पर गंभीर सवाल खडे किए, उसने संकेत दे दिया है कि आगे इस मुद्दे पर लालू की परेशानियां और बढने वाली हैं। संकेत दिखने भी लगे हैं। अचानक उनके विरोधी सक्रिय हो गए हैं। बिहार में उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो बाकायदा इस मुद्दे पर लालू से राष्ट्र की जनता से माफी मांगने को कहा है। नीतीश कहते हैं कि ‘लालू जिस वित्तीय जादूगरी की बात करते थे, वह दरअसल वित्तीय घपलेबाजी थी। उसकी पोल अब खुलने लगी है और श्वेतपत्र आने के बाद तो कई और राज खुलेंगे।’
रेल मंत्री के तौर पर लालू की काबिलियत पर नीतीश ही नहीं, कई लोगों ने सवाल उठाया है। उनका साफ कहना है कि अपने कार्यकाल के दौरान लालू रेलवे की गलत तस्वीर पेश करते रहे। मुनाफे का जो आंकडा वह मीडिया के समक्ष दिखा रहे थे, वह झूठ का पुलींदा था। हल्ला मचाते रहे कि ७७.५० रुपए खर्च कर सौ रुपए कमाई हो रही है। जबकि असलियत में ९२.५० रुपए खर्च किए जा रहे थे। यही वजह है कि जो लक्ष्य पिछले साल रखे गए थे, वह हासिल नहीं हो पाए। अंतरिम बजट का टारगेट भी पूरा नहीं हो पाया। इसी का नतीजा है कि नई रेल मंत्री ममता बनर्जी को इसका भांडा फोडने को विवश होना पडा। ममता ने अपने भाषण में लालू पर कई तीर छोडे। उनकी हर बाजीगरी की पोल खोली। बाकायदा आंकडों को साक्ष्य बतौर रखते हुए। साथ ही यह भी एलान कर दिया कि आगे रेलवे के बीते पांच वर्षों के कार्यकाल पर श्वेतपत्र भी लाया जाएगा। ममता की इस घोषणा की राजनैतिक हलकों में तरह-तरह से व्याख्या की जा रही है।
कहा जा रहा है कि श्वेतपत्र के माध्यम से कांग्रेस लालू पर लगाम कसने की कोशिश कर रही है। हाल के दिनों में जिस तरह लालू केंद्र की यूपीए सरकार के समर्थक होने के बावजूद लगातार उस पर हमले बोल रहे हैं, उससे कांग्रेस में नाराजगी है। खासकर, लोकसभा चुनावों के बाद नए हालात में भी कांग्रेस लालू को अपने लिए दोस्त कम दुश्मन ज्यादा समझ रही है। बिहार में अपनी खोई जमीन को वापस हासिल करने में जुटी कांग्रेस को लग रहा है कि लालू को कमजोर कर ही उसे फायदा हो सकता है। कारण, कांग्रेस के वोटबैंक में लालू ने ही सेंध लगाई है। यही वजह है कि पहले कांग्रेस ने लालू के चंगुल से खुद को आजाद किया और अब अपने खोए जनाधार को प्राप्त करने की कवायद कर रही है। वह लालू को संभलने या दोबारा खडा होने का मौका नहीं देना चाहती। फिलहाल कांग्रेस का लालू का हाथ थामने का कोई मूड नहीं है। वह लालू की परेशानी में ही अपना हित देख रही है। रेलमंत्री के रूप में उनकी उपलब्धियों पर चोट को भी इसी से जोड कर देखा जा रहा है।
सूत्र बताते हैं कि रेल बजट के दौरान लालू के खिलाफ ममता ने जो तेवर दिखाए, वह उनकी अपनी सोच या राजनीति-रणनीति का हिस्सा नहीं था। दरअसल, उसके पीछे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की रणनीति काम कर रही थी। मतलब, एक सोची-समझी सियासी योजना। इसके सूत्रधारों में प्रणव मुखर्जी, दिग्विजय सिंह जैसे लोगों के नाम बताए जाते हैं। कहीं न कहीं इसमें नीतीश कुमार की भूमिका के भी चर्चे हैं। वह चाहे जद (यू) की भाजपा से बढती दूरियों और कांग्रेस से परदे पीछे गलबहियों की खबरों को लेकर हो, चाहे सूबे में होने वाले आगामी चुनाव की तैयारियों के दृष्टिगत। लिब्रहान रिपोर्ट संसद पटल पर रखे जाने के बाद संभव है कि भाजपा के कई बडे नेताओं की परेशानियां बढें। ऐसी स्थिति में जद (यू) भाजपा से रिश्ते तोडकर कांग्रेस के साथ हाथ मिला सकता है। पार्टी के अंदर पिछले कुछ दिनों से ऐसी बातें चल भी रही हैं कि उसे भाजपा से संबंध-विच्छेद कर कांग्रेस से हाथ मिला लेना चाहिए। इससे जदयू को मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर लाने में मदद मिलेगी। साथ ही केंद्र सरकार में शामिल होकर वह बिहार में अपने विकास कार्यों को और गति दे पाएगा। ऐसे में कांग्रेस के श्वेतपत्र संबंधी कदम से राजद से उसके रिश्तों का नया समीकरण उभर सकता है। साथ ही यह पहला मौका होगा कि किसी राजनैतिक गठबंधन की सरकार अपने बीते कार्यकाल के दौरान किसी खास मंत्रालय के कामकाज पर श्वेतपत्र लाएगी।
ममता की इस घोषणा के पीछे कांग्रेस की भूमिका की पुष्टि इस बात से भी होती है कि आमतौर पर ऐसे फैसले सरकार के शीर्ष नेतृत्व से सलाह-मश्विरे के बाद ही लिए जाते हैं। यह किसी मंत्री का निजी फैसला नहीं होता। कहने का तात्पर्य कि ममता ने अगर यह एलान किया, तो इससे पहले कांग्रेस आलाकमान व इसके वरिष्ठ नेेताओं से इस पर चर्चा हो चुकी थी। सूत्र बताते हैं कि श्वेतपत्र लाने की दिशा में इन दिनों जोर-शोर से तैयारियां भी चल रही हैं। सरकार के कुछ प्रमुख वित्तीय सलाहकार और सांख्यिकी-व्याख्याकार लालूराज के दौरान रेलवे के वित्तीय आंकडों को खंगालते हुए उसका अध्ययन कर रहे हैं। ताकि लालू के दावे की पोल खोल कर उन्हें पूरी तरह बेनकाब किया जा सके। इसकी भनक लालू को भी लग चुकी है। तभी इन दिनों राजनीति के बियाबान में भटक रहे लालू कांग्रेस आलाकमान से इस मुद्दे पर बातचीत के लिए संपर्क साधने में लगे हैं। लेकिन, कांग्रेस की तरफ से उन्हें कोई भाव नहीं दिया जा रहा। उल्टे वह सार्वजनिक रूप से इस श्वेतपत्र की वकालत कर रही है।
कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी कहते हैं, ‘यदि रेलमंत्री द्वारा श्वेतपत्र जारी करने से पारदर्शिता बढती है, तो इसमें बुरा क्या है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी को देखते हुए समीक्षा जरूरी भी है।’ पार्टी इसके पीछे किसी साजिश से साफ इंकार करती है। लेकिन हकीकत यह है कि कांग्रेस ममता के मार्फत लालू की हालत पतली करने में लगी है। आखिर बिहार में कांग्रेस को लालू से ही तो वोट छीनने हैं। नीतीश से तो उसके बाद निपटने की जरूरत होगी। बदले हालात में रेलवे के कई बडे अधिकारी भी बढ-चढकर लालू की फजीहत का सामान जुटाने में लगे हैं। लालूराज में खुद को उपेक्षित महसूस करते रहे ऐसे अधिकारी इन दिनों ममता बनर्जी को लालू की बाजीगरी की बारीकियां समझाने में जुटे हैं। उनकी हसरत है कि वे लालू को परेशानहाल में देखें। लालू परेशान हैं भी। पर वह ऐसा दिखाना नहीं चाहते। एक तरफ वह कांग्रेस से मिल-बैठकर इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ हर जांच का सामना करने की बात कहकर खुद को पाक साफ दिखाने का जतन भी। कांग्रेस इस मुद्दे पर कहां तक जा सकती है, उसका अंदाजा लगाना लालू को भारी पड रहा है। इसी डर से वह अभी से ही अपने वोटबैंक को यह संकेत देने में लग गए हैं कि उनके खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही है। वह कहते भी हैं, ‘चाहे जिससे जांच करा लो, कमी ढूंढे नहीं मिलेगी। अगर मिली, तो मैं कान पकडकर माफी मांगने को तैयार हूं। मुझसे ईष्र्या करने वाले मेरे कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं। मुझे सब मालूम है कि यह किसके इशारे पर हो रहा है।’
वहीं ममता कांग्रेस और लालू के बीच की इस राजनीति में खामोशी के साथ अपना रोल अदा करने में लगी हैं। कांग्रेस से मिलकर चलने में ही वह अपना हित समझ रही हैं। कारण, पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद वह खुद को बतौर सीएम देख रही हैं। कांग्रेस को भी पूरा यकीन है कि इस बार कॉमरेडों का सूबे की सत्ता से उखडना तय है। उस हालत में निश्चित तौर पर ममता ही सीएम बनेंगी। तब रेलमंत्री कोई कांग्रेसी होगा और पार्टी अपने मनमुताबिक श्वेतपत्र का इस्तेमाल करेगी। यानी दूर-दूर तक इस मुद्दे पर सियासी गोटें बिछी हुई हैं। देखना शेष है कि इस बिसात पर लालू कैसी गोटें चलते हैं। फिलहाल बिना शोर मचाए अपना सियासी लक्ष्य साधने में माहिर कांग्रेस के मुकाबले उनकी हालत बेहद पतली नजर आ रही है।
आंकडों की बाजीगरी
रेलवे को भारी मुनाफे वभाग में बदलने का ढिंढोरा पीटने वाले लालू पर अब आंकडों के साथ खिलवाड करने का दोष मढा जा रहा है। जिस सरकार के वह रेल मंत्री रहे, बदले हालात में आज वही उनके खिलाफ श्वेतपत्र ला रही है। रेल मंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि सन २००८-०९ में लालू ने अपने बजट में ११,७८६ करोड की आमदनी का जो आंकडा पेश किया था, वह फरवरी में चुनाव से पहले अंतरिम बजट तक आते-आते महज ५५७२ करोड रह गया। और अब यह मात्र २६४२ करोड है। अंतरिम बजट के दौरान लालू ने ८० हजार करोड रुपए के कैश सरप्लस की बात कही थी, लेकिन यह महज १७,४०० करोड रुपए है। साथ ही उन्होंने वार्षिक योजना में ३४०० करोड रुपए के संसाधन निजी क्षेत्र की भागीदारी के जरिए जुटाने की व्यवस्था की थी, जिनमें ३३०० करोड तो कभी जुटाए ही नहीं जा सकते थे।

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