३२ वर्षों से बंगाल की सत्ता पर एकछत्र राज। लेकिन, अब अपने ही गढ में गंभीर चुनौतियों का सामना करने को मजबूर। बंगाल की वाम मोर्चा सरकार की आज यही हकीकत है। उसे अपने ही कामरेडों को आतंकवादी करार देकर वजूद की लडाई लडनी पड रही है। बाकायदा उनपर प्रतिबंध लगाकर। पर इस दमन की कार्रवाई से उसके विरोधी दलों की जमीन जरूर मजबूत हो रही है। वे इसे अपने लिए जागती संभावनाओं के तौर पर देख रहे हैं। आखिर क्यों पैदा हुए ऐसे हालात? माओवादियों के नाम पर खेला जा रहा है कौन सा सियासी खेल?
२०-३० के दशक में चीनी कम्युनिस्ट नेता माओ ने कहा था- ‘पावर फ्लोज फॉर्म द बैरल ऑफ ए गन’ यानी सत्ता बंदूक की नली से होकर निकलती है। उनका मत था कि हक मांगा नहीं जाता, छीना जाता है। और इसके लिए हिंसा करनी पडे, तो वह भी वाजिब है। उन्होंने जब यह राय प्रकट की थी, तब चीन में गृहयुद्घ का दौर था। अपनी इसी सोच और रणनीति के सहारे आगे चलकर वह चीन की सत्ता तक हासिल करने में सफल रहे। आज २१ वीं सदी के पहले दशक में बंगाल में कुछ ऐसा ही प्रयोग हो रहा है। कहें तो नए सिरे से यह प्रयोग दोहराया जा रहा है। बंदूक के सहारे सत्ता छीनने और सत्ता बचाए रखने की जद्दोजहद के तौर पर। प्रत्यक्षत: एक तरफ माक्र्स के सिद्घांतों से प्रभावित सत्तारूढ वामपंथी सरकार है और दूसरी तरफ माओ त्से-तूंग की विचारधारा को आत्मसात कर हाथों में हथियार उठाए माओवादी। लेकिन, अप्रत्यक्षत: कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस भी अपने -अपने हित साधने में व्यस्त। और इस खेल में प्रयोगशाला बना है प्रदेश के मिदनापुर जिले का लालगढ इलाका। वह क्षेत्र, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि इसके अंतर्गत आने वाले ४४ गांवों को माओवादियों ने अपने कब्जे में ले लिया है। और सरकार उसे मुक्त कराने का प्रयास कर रही है। इस संघर्ष में दोनों ओर से गोलियां बरस रही हैं, धमाके हो रहे हैं। लेकिन, इन धमाकों में कुछ शोर खामोश पड गए हैं। बेहतर कहें, तो खामोश कर दिए गए हैं। क्योंकि वह आवाज है आम आदमी की। निर्दोष, निर्धन और असहाय ग्रामीणों की। यानी पूरा का पूरा प्रकरण सियासी ताने-बाने में उलझा है। ऐसा मकडजाल, जिसे समझना और समझाना जरूरी है।
दरअसल, लालगढ में आज जो हो रहा है, वह अचानक नहीं। इसकी पृष्ठभूमि बहुत पहले से तैयार हो रही थी। सिंगुर और नंदीग्राम ने इसे गति दी और एक दिशा भी। और जो दिशा मिली, वह वाम मोर्चा खासकर माकपा के लिए एक बडा धक्का था। हो भी क्यों न। आखिर तीन दशक से ज्यादा वक्त तक जो कैडर उसके एक इशारे पर कुछ भी करने का तैयार रहते थे, वे उसकी खुली मुखालफत पर उतर चुके थे। इसी का नतीजा था कि लोकसभा चुनावों में वामपंथी पार्टियां अपने सबसे मजबूत गढ से ही उखड गईं। बुरी तरह। इसके बाद से ही उसे यह खतरा और भी सताने लगा है कि कहीं आगामी विधानसभा चुनावों के बाद राज्य से उसकी हुकूमत ही न उखड जाए। राजनैतिक जानकारों का भी आकलन रहा है कि जैसी गतिविधियां इस प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में चल रही है, उसके बरकरार रहने का मतलब है तीन दशकों से लगातार सत्ता पर कुंडली मार कर बैठी वाम सरकार का अंत। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर बंगाल के गांवों में ऐसा क्या हो रहा है, जो वाम सरकार के खात्मे की इबारत लिख रहा है।
इसे जानने के लिए हमें तीन दशक पीछे मुडना होगा, जब वामपंथी पार्टियां इस प्रदेश की सत्ता पर आसीन हुई थीं। ७० के दशक में तब बंगाल में नक्सलबाडी आंदोलन अपनी गति में था। कानू सान्याल, चारू मजूमदार और कनाई चटर्जी जैसे नक्सल नेताओं ने जमींदारों और भू-स्वामियों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल पूं*का हुआ था। साम्यवाद और शोषणहीन समाज की बुनियाद के लिए। आर्थिक समानता लाने के लिए। उस वक्त कम्युनिस्ट पार्टियों को लगा कि इस आंदोलन का समर्थन कर वे सत्ता हथिया सकती हैं। उन्होंने ऐसा किया भी। तत्कालीन कांग्रेस सरकार के खिलाफ नक्सल आंदोलन का इस्तेमाल कर वह सत्ता में पहुंचने में कामयाब हो गर्ई। लेकिन हुकूमत पाने के बाद इस समस्या की जड में पहुंचने से वह बचती रही। सरकार को खतरे से बचाने के लिए तब नक्सली नेताओं को साधने की कोशिश हुई। उन्हें किसी न किसी तरह उपकृत कर आंदोलन की गति को कुंद किया गया। बदले में नक्सली नेता सत्ता के दलाल बन गए। वे सत्ताधारी दल के लिए वोट का जुगाड करते रहे और सरकार उनके आराम का ख्याल करने लगी। इसी अन्योनाश्रय संबंध की परिणति है कि देश में दूसरी पार्टियों की लहर के बावजूद बंगाल में वाम का डंका बजता रहा। आंदोलन के नाम पर नक्सली नेता माकपा के कैडर बन कर काम करते रहे। और वह भी इतनी सक्रियता से कि गांवों में माकपा का एक मजबूत किला कायम हो गया। इसी अभेद्य दुर्ग के कारण तब से अब तक माकपा एण्ड एसोसिएट्स बंगाल में एकछत्र राज करती रही है। साथ ही साथ माकपा इस बीच अलग से अपने कैडर खडा करने की भी कोशिशें करती रहीं। वैसे कैडर, जो गांव-देहात में उसके लिए वोट मैनेज करें। उसके कैडर ऐसा करते भी रहे।
हालांकि इसका मतलब यह कतई नहीं कि राज्य की ग्रामीण जनता वामपंथी पार्टियों की मुरीद बनी रही। उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। उन्हें तो सरकार आज तक खाद्यान्न और पेयजल तक मुहैया नहीं करा पाई है। सरकारी योजनाओं का लाभ भी इन गरीब आदिवासियों को कभी नहीं मिला। उनके पास रोजगार के साधन नहीं। जिंदा रहने के लिए आज के दौर में भी वे पैसे की बजाए सामानों की अदला-बदली करते हैं। और ये हालात इस तथ्य के बावजूद हैं कि इनके वोटों के सहारे माकपा लगातार सत्ता पाती रही है, जमीन-जंगल और गरीब गांववालों की बात करती रही है। दरअसल यहां सेहत सुधरी, तो माकपा कैडरों की। उन्हें सरकार से वोटबैंक इक_ा करने और उसे कायम रखने के एवज में हर सुविधा उपलब्ध होती रही। इसका प्रमाण है गांवों में उनकी लंबी-चौडी इमारतें। उनके जीने का अंदाज। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिन दूरदराज गांवों में विकास की हवा जरा भी नहीं पहुंची, वहां माकपा कैडर कैसे और क्यों कर पुष्पित-पल्लवित होते रहे। लालगढ में माकपा कैडर तो वर्गभेद की जीती जागती मिसाल हैं। जबकि वे आर्थिक समानता का नारा बुलंद करते रहे हैं। उनके पास सब कुछ है- गाडी, हथियार, पैसा-पहुंच सब। कईयों के घरों में तो एयरकंडीशनर तक। लेकिन ग्रामीण बदहाल। इन्हीं संसाधनों के सहारे सालोंसाल से माकपा कैडर ग्रामीणों का शोषण करते रहे हैं, उन्हें अपनी जागीर बनाए रखा है। पार्टी को सत्ता में पहुंचाने के लिए। शहरी इलाकों से परे बंगाल के ग्रामीण इलाकों में हमेशा से इन्हीं माकपा कैडर की ही हुकूमत चलती रही है। उनका फरमान ही प्रशासन का फरमान होता था। राशन कार्ड हो या कोई दूसरी जरूरत, प्रशासन माकपा यूनिट के निर्देश पर ही काम करता था। स्थानीय स्तर पर जन-वितरण प्रणाली की दूकानों का लाइसेंस हो या कोई और ठेका, सब माकपा के इन्हीं कैडरों के हिस्से आते थे। इस सुविधा को भोगने के बदले माकपा के कैडर गांव के लोगों, आदिवासी जनता को येन-केन-प्रकारेन पार्टी से जोडे रखने का काम करते थे। डराना-धमकाना, उनके परिवार पर अत्याचार और उन्हें मूलभूत सुविधाओं से कोसों दूर रखना भी इसमें शामिल है। माकपा के कैडर जानते थे कि अगर ग्रामीण जनता जागरूक हुई, तो उनका बोरिया-बिस्तर उखड सकता है। लिहाजा वे उन्हें आदिम युग में ही जिंदा रखते रहे। विकास और आधुनिकता की बयार से मीलों दूर। सरकार पर आरोप भी लगते रहे कि उसके कैडर गांवों में लोगों को वोट नहीं डालने देते, बल्कि खुद ही बूथ अपने नियंत्रण में लेकर मत डाल देते हैं। कहने का मतलब कि एक सोची समझी रणनीति के तहत माकपा नक्सलियों की मदद से सत्ता का स्वाद चखती रही। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सभी नक्सली नेताओं ने माकपा की चरणवंदना स्वीकार कर ली। लेकिन ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा जरूर रही। जो आंदोलन के साथ रहे, वे जनसमर्थन के अभाव में शिथिल पड गए। उन्होंने गाहे-बगाहे इस पर आवाज भी उठाई कि माकपा सरकार नक्सल आंदोलन के सहारे सत्ता में आई, लेकिन बाद में उसे ही नकार दिया। अपना खुद का कैडर स्थापित करने लगी, जिन्हें आंदोलन से कोई सरोकार नहीं था। और ये कैडर वही थे, जो आंदोलन से उपजे और सत्ता का हिस्सा बन गए।
लेकिन तस्वीर इधर कुछ वर्षों में बदलने लगी थी। ग्रामीणों के बीच कुछ ऐसे संगठन पहुंचने लगे थे, जो उन्हें उनकी दास्तां की असली वजह समझाने और उन्हें एकजुट करने में कामयाबी हासिल करने लगे थे। इन संगठनों को कहीं न कहीं राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था। कहें तो नक्सली नेताओं का एक बडा तबका धीरे-धीरे माकपा के विरोध में उतरता जा रहा था। और ममता बनर्जी इन्हें अप्रत्यक्ष समर्थन देकर राज्य की सियासी तस्वीर बदलने की कोशिश कर रही थी। सिंगुर, नंदीग्राम जैसे इलाकों में ममता ने अगर वाम सरकार की नींदें उडाने में सफलता पाई, तो यह उन माओवादियों की मदद के फलस्वरूप ही संभव हुआ। प्रदेश की राजनीति पर बारीक नजर रखने वाले जानकार भी कहते हैं कि तृणमूल नेता ममता बनर्जी माकपा को उसके ही हथियार से घायल करने का काम बडी खामोश रणनीति के तहत कर रही थीं। एक तरफ वह माकपा के ग्रामीण वोटबैंक पर निशाना साधने में लगी थीं, तो दूसरी तरफ माकपा कैडर में भी सेंध लगाने की जुगत भिडा रही थीं। इसी का नतीजा है लोकसभा का चुनाव परिणाम।
लेकिन ममता यहीं नहीं रुकना चाहतीं। कारण, उनकी नजर प्रदेश की सत्ता पर है। वह विधानसभा चुनाव के दृष्टिगत ही सारे उपाय कर रही हैं। इसीलिए एक-एक कर वह माकपा के प्रभाव वाले सभी इलाकों में उसकी जडों में म_ा डालने का काम कर रही हैं। नंदीग्राम, सिंगुर, खेजुरी के बाद नंबर आया लालगढ का। माकपा के बडे गढ मिदनापुर का केंद्र लालगढ। अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर एक नंदीग्राम की वजह से माकपा को इतना सियासी नुकसान उठाना पडा, तो मिदनापुर पर कब्जा कर ममता उसकी क्या हश्र करा सकती है। कभी मिदनापुर माकपा का गढ होता था। लेकिन बदली परिस्थितियों में आज पूर्वी मिदनापुर में तृणमूल की तूती बोलती है और पश्चिमी मिदनापुर में लालगढ के माध्यम से वह इसे धरातल पर उतारने का प्रयास कर रही है। मिदनापुर में करीब १६ हजार गांव हैं। और यहां ममता सिंगुर दोहराने में लगी है। यही माकपा की परेशानी का सबब है। और इसी से निपटने के लिए वह लालगढ में अपना नया प्रयोग कर रही है। ताकत के बल पर अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को शांत करने का। उसे खतरा है कि ये आवाजें न सिर्फ उसके विरोधियों को मजबूत कर सकती है, बल्कि उसकी कहानी का ‘द एंड’ भी कर सकती है। और इसकी आहट हो भी चुकी है।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष नवंबर महीने में जब मुख्यमंत्री बुद्घदेव भट्टाचार्य व तत्कालीन केंद्रीय इस्पात मंत्री राम विलास पासवान लालगढ-झारग्राम-शालबनी इलाके में प्रस्तावित जिंदल के कारखाने का शिलान्यास करने गए थे, तो उनके काफिले पर हमला किया गया था। लैंडमाइन ब्लास्ट के माध्यम से। वह तो गनीमत थी कि चूहों के तार कुतरने की वजह से विस्फोट तय समय के कुछ देर बाद हुआ, वर्ना कुछ भी अनिष्ट हो सकता था। इसके बाद बंगाल की पुलिस ने यहां माओवादियों के खिलाफ सख्त अभियान छेड दिया था। आरोप लगाए जाते हैं कि पुलिस ने बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं पर अत्याचार किए, जिसकी वजह से ग्रामीण माकपा की मुखालफत पर उतर आए। इस स्थिति को भुनाया तृणमूल कांग्रेस ने। पुलिसिया अत्याचार के खिलाफ आदिवासियों ने तृणमूल नेता छत्रधर महतो के नेतृत्व में पुलिस अत्याचार प्रतिरोध समिति का गठन किया और इलाके को पुलिस के लिए बैन कर दिया। इससे सहम कर माकपा सरकार ने अंतत: वहां बल का प्रयोग करने का फैसला किया। कारण, उसे इस विद्रोह से अपनी जमीन खिसकने का खतरा था। उसे यह भी ज्ञात हो चुका था कि कभी उनके लिए काम करने वाले लोग अब उनके खिलाफ हो गए हैं। ऐसे में खिसियाई माकपा से बदले की कार्रवाई अपेक्षित थी। साथ ही वह उन विद्रोहियों को यह भी संदेश देना चाह रही थी कि इस लडाई का अंजाम उनके लिए ठीक नहीं होगा। बेहतर होगा कि वे माकपा के साथ बने रहें, तृणमूल के बहकावे में न आएं। कारण, पूर्वी मिदनापुर में नंदीग्राम ने ममता का नियंत्रण स्थापित किया। तब माओवादियों का भी उन्हें समर्थन हासिल हुआ था। पश्चिमी मिदनापुर में लालगढ यही काम कर सकता है, क्योंकि यहां भी कभी माकपा का साथ देते रहे माओवादी अब तृणमूल के करीब आते दिख रहे हैं। यही माकपा की छटपटाहट की वजह है। लेकिन, इस बीच केंद्र सरकार ने माओवादियों पर प्रतिबंध लगाकर अपनी चाल चल दी। दरअसल, कांग्रेस इस कदम से बदहाल ग्रामीणों की सहानुभूति बटोरना चाहती है। वह जान रही है कि प्रतिबंध से माकपा के बागी कैडरों में यह संदेश जाएगा कि यह सब बंगाल सरकार की वजह से हो रहा है। इससे माकपा की सियासी राह और मुश्किल होगी। वहीं इस मुद्दे पर माकपा कुछ कहने से परहेज कर रही है। अगर वह इसकी वकालत करती है, तो उसके कैडरों में व्याप्त गुस्सा और बढेगा। अगर मुखालफत करती है, तो विरोधी उसपर माओवादियों का समर्थन करने का आरोप मढेंगे। यानी माकपा के लिए इस वक्त इधर कुआं, उधर खाई वाली स्थिति है। इसी बेचैनी में वह अपने वजूद को बचाए रखने की कोशिश कर रही है। अपने कैडरों के और बिखराव को रोकने के लिए ही वह लालगढ में शक्ति का प्रयोग कर रही है। लेकिन ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या लालगढ एक और नक्सलबाडी आंदोलन की तरफ बढ रहा है? नक्सलबाडी ने ७० में कांग्रेस को सत्ता से उखाडकर वाम पार्टियों को बंगाल की सत्ता में पहुंचाया था, कहीं लालगढ वाम मोर्चा को सत्ता से उतारने का बायस न बन जाए।

बहुत खुबसुरत प्रस्तूती थी इसे पढ़ कर काफी कुछ साफ हो गया ममता , माकपा , कांग्रेस और माओवादी को लेकर जो भ्रांती थी ..
जवाब देंहटाएंआलोक सिंह