शाहरुख खान ऐसे पहले व्यक्ति नहीं हैं, जिन्होंने मुसलमान होने के कारण अपने साथ बदसलूकी की शिकायत की हो। इससे पहले भी कई नामचीन हस्तियां मुस्लिम होने की वजह से अपने साथ भेदभाव के आरोप लगा चुकी हैं। तो क्या वाकई इनके साथ जो होता है, वह सिर्फ इसलिए कि ये मुसलमान हैं? या फिर एक धर्म विशेष के साथ घटना को जोडकर उनकी मंशा कुछ और हासिल करने की होती है?
शाहरुख खान एक बेहतरीन अदाकार हैं। देश-विदेश में उनके लाखों-करोडों प्रशंसक हैं। उस अमेरिका में भी, जहां के नेवार्क हवाई अड्डे पर आपजन (इमीग्रेशन) अधिकारियों ने उन्हें हिरासत में लेकर दो घंटे तक पूछताछ की। बकौल शाहरुख इस दरम्यान वह लगातार उनसे यह कहते रहे कि वह एक फिल्म स्टार हैं और अमेरिका अक्सर आते-जाते रहते हैं। यहां उनके कई बडे जानने-पहचानने वाले लोग हैं। लेकिन, उनकी एक नहीं सुनी गई। उल्टे उनसे कडी पूछताछ की जाती रही। अधिकारियों की इस बेरुखी पर शाहरुख का कहना है कि उन्हें इसलिए परेशान किया गया, क्योंकि उनके नाम के साथ खान जुडा हुआ है। यानी उनके नाम से साफ तौर पर झलकता है कि वह एक मुसलमान हैं। और यही वजह है कि उनसे आतंकवादियों की तरह जिरह की गई। खैर....शाहरुख की इस शिकायत पर हर तरफ से प्रतिक्रियाएं आईं। लोगों ने अमरीका के ऐसे व्यवहार पर खूब हमले बोले। यह कहते हुए कि उनकी हमेशा से यह आदत रही है, बाहर मुल्क के लोगों की बेइज्जती करने की। केंद्र सरकार ने तो बाकायदा इसे लेकर अमरीकी सरकार से जवाब-तलब करने का भी फैसला किया है। लेकिन, एक तबका ऐसा भी है जो इस मुद्दे पर मचे कोहराम को बेजा बता रहा है। उनकी राय है कि अमरीका में इस तरह की जांच प्रक्रिया एक आम बात है, इस पर हाय-तौबा नहीं मचाना चाहिए।
ऐसी सोच रखने वालों में बॉलीवुड के ही एक और सुपरस्टार सलमान खान भी हैं। क्रिकेटर हरभजन सिंह और जनता पार्टी सुप्रीमो सुब्रमण्यम स्वामी भी इस राय से इत्तेफाक रखते हैं। इनका मानना है कि धर्म का रंग देकर बेवजह इस मामले को तील का ताड बनाया जा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि अमरीका में हर धर्म के लोगों को इस तरह की परेशानियों से गुजरना पडा है। सलमान खान तो यहां तक कह गए कि जब वह अमरीका जाते हैं, तो उन्हें भी ऐसी जांच से गुजरना पडता है। और यह पूरी तरह से उचित है। इस कडे सुरक्षा उपाय के कारण ही तो 9/11 के बाद अमरीका में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ। गौरतलब है कि रक्षा मंत्री रहते जार्ज फर्नांडीस, विदेश मंत्री रहते प्रणव मुखर्जी, लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी, भूतपूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम समेत कई और बडी हस्तियों को भी कभी न कभी हवाई अड्डों पर ऐसी जांच प्रक्रिया का सामना करना पडा है। कलाम का मामला तो पिछले दिनों संसद में भी गूंजा। लेकिन, इसे न तो भूतपूर्व राष्ट्रपति ने धर्म से जोडा और न ही सियासी दलों के नेताओं ने। शाहरुख ने जरूर अपने साथ हुई घटना को मजहब के साथ जोडकर उस पुराने सवाल को जिंदा कर दिया है कि मुसलमान होने का खामियाजा लोगों को भुगतना पडता है। कभी ऐसा ही आरोप क्रिकेटर अजहरुद्दीन ने लगाया था। मैच फिक्सिंग के आरोपों से घिरने के बाद अजहर ने कहा था कि उन्हें मुसलमान होने के नाते निशाना बनाया गया। हालांकि यह सभी जानते हैं कि इस प्रकरण की भेंट मनोज प्रभाकर और अजय जडेजा जैसे लोगों का करिअर भी चढा, जो मुसलमान नहीं थे। अजहरुद्दीन को अगर मुसलमान होने की वजह से भेदभाव का सामना करना पडता, तो वह हरगिज कभी भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान नहीं बनाए जाते। और न ही देश की अधिसंख्य हिंदू जनता उन्हें अपने सिर-आंखों बिठाती।
अभी हाल ही में अभिनेता इमरान हाशमी ने भी यह कह कर लोगों को सकते में डाल दिया था कि मुसलमान होने की वजह से ही उन्हें मुंबई में घर नहीं मिल रहा। इस पर खूब बवाल भी मचा। अंतत: ऐसी टिप्पणी के लिए उन्हें माफी भी मांगनी पडी। मुस्लिम होने के नाते अपने साथ भेदभाव होने के आरोप और भी कई लोग लगा चुके हैं। खुद को सेक्यूलर विचारधारा की सबसे बडीी पैरोकार होने का दावा करने वाली अभिनेत्री शबाना आजमी ने भी कभी कुछ ऐसी ही बातें कही थीं। तब भी सवाल उठे थे कि ऐसे आरोप कितने जायज हैं? शाहरुख का नया मामला जरूर देश से बाहर का है, लेकिन विरोध की प्रकृति वही पुरानीी है। अब तो मुस्लिम लोग ही खुलेआम यह कहने लगे हैं कि यह ऐसे लोगों का हथकंडा है। प्रचार पाने या फिर मुसीबत में पं*सने पर अपने लिए उन्माद पैदा करवाने के लिए। ऐसी राय रखने वाले एक पढे-लिखे मुसलमान युवक की टिप्पणी थी, सेलिब्रिटीज के लिए धर्म तभी मुद्दा बनता है, जब उन्हें परेशानियों से घिरना पडता है। और परेशानियां भी उनकी अपनी वजह से, न कि मुसलमान होने के कारण। जब हम जैसे आम मुसलमान को धर्म की वजह से कहीं कोई दिक्कत नहीं आती, तो इन जैसे बडे लोगों को क्या दिक्कत आएगी। जब इनके सितारे गर्दिश में हों या अपने बुरे कर्मों की वजह से इनपर आफत आती है, तो ये सहानुभूति बटोरने और अपने बचाव के लिए मुसलमान होने का मुद्दा उठा देते हैं। जबकि हकीकत यह है कि इनमें से शायद ही कोई नमाज पढने की भी जहमत करता होगा।
वहीं कई बुद्घिजीवियों का कहना है कि शाहरुख खान जैसे स्टेटस वाले लोगों को हवाई अड्डे पर अधिकारियों द्वारा परेशान किए जाने पर विरोध तो जताना चाहिए, पर इसे धर्म के साथ जोडना गलत है। यह कहीं न कहीं सांप्रदायिक भावनाओं को ही हवा देती है और समाज में एक विभाजन की लकीर खिंचती है। भारत में भी कई मुस्लिम हस्तियां अक्सर ऐसे आरोप लगाती रही हैं, इससे तो सामाजिक ताने-बाने और धार्मिक सद्भावना को ही चोट पहुंचती है। जबकि सच्चाई यह है कि भारत में धर्म को लेकर सियासतदानों की कुचेष्टा के बावजूद आज भी वह दरार पैदा नहीं हो पाई है, जो एक दूसरे को नफरत के दलदल में उतार सके। फिलहाल शाहरुख मामले ने धार्मिक भेदभाव के मुद्दे को एक नए मोड पर जरूर ला खडा किया है, जहां यह तय होना है कि यह हमला है या हथियार? किंग खान की नई फिल्म माई नेम इज खान में शायद इस का जवाब मिल जाए।
रविवार, 30 अगस्त 2009
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