जिंदगी देने वाली दवाइयों के नाम पर बेची जा रही है मौत। पूरे देशभर में दवा माफिया धडल्ले से कर रहे हैं नकली दवाओं का धंधा। सालाना अरबों रुपए का है मौत के सौदागरों का यह कारोबार। पर प्रशासन व सरकारें इस पर अंकुश लगाने में हैं नाकाम। आखिर क्यों फल-फूल रहा है यह काला धंधा, कौन दे रहा है इस घिनौने कारोबार को शह और कैसे चल रहा है पूरा खेल, सनसनीखेज पडताल।
बुलंदशहर के राकेश शर्मा को शरीर में कैल्सियम की कमी की शिकायत थी। इसकी वजह से उसे कई तरह की परेशानियां हो रही थीं। उसने दिल्ली के जयप्रकाश नारायण अस्पताल में डॉक्टरों को दिखाया, तो उन्होंने परीक्षण के बाद उसे कुछ दवाइयां लिख दीं और इसे पाबंदी के साथ खाने की हिदायत दी। राकेश ने दिल्ली के ही एक बाजार से दवाई खरीदी और उसका नियमित सेवन करने लगा। लेकिन, ठीक होने की बजाए उसकी हालत और खराब होने लगी। उल्टे उसे कुछ नई बीमारियों ने जकड लिया। जब दोबारा डॉक्टरों ने उसकी और खाई जा रही दवाइयों की जांच की, तो पाया कि वे सब की सब नकली हैं। उन्हीं की वजह से राकेश की बीमारी और ज्यादा गंभीर हो गई थी। दरअसल, देश के बाजारों में जीवनरक्षक दवाओं के नाम पर जो मौत बांटी जा रही है, यह घटना उसका महज एक उदाकरण है। ऐसे न जाने कितने लोग जिंदगी देने वाली दवाइयों के नाम पर बाजार में बिक रही नकली दवाइयां खा कर असमय मौत के गाल में समा रहे हैं। जी हां, सुनने में आपको यह अटपटा जरूर लगेगा। पर यह सौ फीसद सच है। एक कडवा सच। आंखें खोल देने वाला सच।
बताया जाता है कि भारत के बाजारों में बिक रही दवाओं में करीब 40 प्रतिशत दवाएं नकली व घटिया हैं। लाखों-करोडों लोग हर रोज ऐसी ही दवाइयों का सेवन कर रहे हैं। यह सोचकर कि इसे खाकर वे तंदुरुस्त बनेंगे। पर हकीकत यह है कि इन नकली और घटिया दवाइयों को खाकर वे और बीमार हो रहे हैं। यानी एक रोग के उपचार के बदले दूसरे रोग को न्योता। इस बात की पुष्टि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी की है। केंद्र सरकार को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में उसने दावा किया है कि देश में नकली व मिलावटी दवाओं का कारोबार कुल दवाओं के कारोबार का करीब 35 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इतना ही नहीं, कानून प्रवर्तन एजेंसियों की खामियां, जांच प्रयोगशालाओं की कमी व राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण नकली दवाओं का धंधा सालाना 25 प्रतिशत की दर से बढता ही जा रहा है। मौत के सौदागरों ने अपना जाल देश के लगभग सभी महत्वपूर्ण राज्यों में फैला लिया है। यही वजह है कि नकली दवाओं का कारोबार सालाना 7 हजार करोड रुपए को पार कर चुका है। दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान, प. बंगाल, महाराष्ट्र, झारखंड जैसे राज्यों को तो इसने पूरी तरह अपनी चपेट में ले ही लिया है, नए इलाकों में भी यह लगातार फैलता जा रहा है। हैरत तो यह है कि केंद्र सरकार भी यह स्वीकार कर रही है कि बाजार में नकली दवाएं बिक रही हैं। लेकिन, इस दिशा में विशेष कदम नहीं उठाए जा रहे।
शुक्रवार ने जब इस काले धंधे की तह में जाने की कोशिश की, तो पता चला कि सारा खेल बडे ही सुनियोजित और संगठित तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। इसमें दवा माफियाओं के साथ सरकारी तंत्र और राजनेताओं की भी संलिप्तता है। देश की राजधानी दिल्ली नकली दवा के कारोबार के कॉकस का केंद्र है। यहां से इसका नेटवर्क देश के अन्य राज्यों के साथ-साथ विदेशों तक फैला हुआ है। यही वजह है कि अक्सर विदेशों में नकली दवाओं की खेप के पकडे जाने पर भारत का नाम उछलता है। लेकिन बावजूद इसके इस नेटवर्क को ध्वस्त करने की खास कोशिश न तो सरकारी स्तर पर हो रही है और न ही प्रशासनिक स्तर पर। हालांकि इस मुद्दे पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद का कहना है कि नकली दवाओं के कारोबार से जुडे लोगों पर नकेल कसने के लिए जल्दी ही एक कडा कानून लाया जा रहा है। इसके तहत नकलीी दवा के धंधे से जुडे मामलों की शीघ्र सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन के साथ-साथ दोषियों को उम्रकैद की सजा का प्रावधान किया गया है। साथ ही खुफिया तंत्र को भी मजबूत किया जा रहा है। इस कारोबार की सूचना देने वाले मुखबिरों को भी पुरस्कृत करने की योजना है, ताकि इस काले धंधे पर अंकुश लगाने की दिशा में कोई कमी न रहे। सरकार ड्रग्स और कॉस्मेटिक्स कानून 1940 को और कडा बनाने की कवायद भी कर रही है।
लेकिन, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन से जुडे अधिकारियों को सरकार की इस पहल को लेकर अभी भी शंका है। कारण, पहले भी इस कारोबार पर शिकंजा कसने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ।
वर्ष 2003 में भी एनडीए के शासनकाल में नकली दवाओं के कारोबार पर रोक लगाने की पहल की गई थी। आरए माशेलकर समिति का गठन कर। इसने मौत का कारोबार करने वालों को मौत की सजा की सिफारिश की थी। लेकिन, यह प्रस्ताव संसद में पास नहीं हो पाया। कहा जाता है कि तब इसके खिलाफ कई दवा कंपनियां और राजनेता ही खडे हो गए थे। वैसे नकली दवाओं के खेल में कई दवा कंपनियों, राजनेताओं, संबंधित सरकारी विभागों के लोगों और पुलिस प्रशासन पर अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि वे मोटी कमाई के चलते इस नेटवर्क को तोडने की जहमत नहीं करते। कार्रवाई के नाम पर महज खानापूर्ति होती है। कहने को तो नकली दवाओं पर नकेल कसने के लिए केंद्र सरकार में एक ड्रग कंट्रोलर विभाग और राज्य स्तर पर ड्रग्स कंट्रोलर व ड्रग्स निरीक्षक होते हैं, लेकिन ये भी इस धंधे से काली कमाई में ही जुटे हैं। लिहाजा यह मर्ज बढता ही जा रहा है।
दिल्ली से सटे गाजियाबाद, मेरठ, फरीदाबाद, नोएडा, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में ही नकली दवाओं की कई छोटी-छोटी इकाइयां काम कर रही हैं। जहां बडी कंपनियों के लेबल लगाकर नकली व घटिया दवाएं बनाई जाती हैं। इसे बडे ही सुव्यवस्थित तरीके से देश के बाजारों में बेचने के लिए उतार दिया जाता है। चूंकि बडी कंपनियों की दवाओं और छोटी कंपनियों की दवा की कीमतों में 300 से 400 फीसदी तक का अंतर होता है। ऐसे में दवाओं के डिस्ट्रीब्युटर छोटी कंपनियों की दवाईयों पर बडी कंपनियों का लेबल लगा माल ले लेते हैं और उसे खुदरा विक्रेताओं के माध्यम से ग्राहकों को असली कंपनी के रेट पर बेचते हैं। इस धंधे में औषधि निरीक्षक से लेकर डिस्ट्रब्युटर और रिटेलर से लेकर एजेंट तक शामिल होते हैं। इसमें हर किसी का अपना-अपना मुनाफा तय होता है। गौरतलब है कि दवाओं के निर्माण में भारत का दुनिया में 10 वां स्थान है। लेकिन, नकली दवाओं के निर्माण में यह सबसे ऊंचे पायदान पर पहुंच चुका है।
जानकार कहते हैं कि दरअसल देश में दवाओं की कंपनियों को लाइसेंस देने की प्रक्रिया बहेद लचीली है। जबकि उनकी जांच के संसाधन बहुत थोडे। इस वजह से भी नकली दवाओं के कारोबार पर अंकुश लगाने में नाकामी हाथ लग रही है। गौरतलब है कि इस वक्त दवाओं की जांच के लिए पूरे देश में मात्र 37 सरकारी प्रयोगशालाएं हैं। उनमें से भी महज 7 इस समय काम कर रही हैं। ठीक उसी प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर केवल 35 औषधि निरीक्षक हैं, जबकि प्रदेशों में कुल 1000 निरीक्षक। इस तथ्य के बावजूद कि देशभर में खुदरा दवाइयां बेचने की दुकानें 6 लाख से ज्यादा हैं और आबादी एक अरब से अधिक। दिल्ली में ही दवा बनाने की छोटी-बडी 139 फैक्ट्रियां और लगभग 10 हजार दवा की दुकानें हैं। लेकिन ड्रग कंट्रोला विभाग के पास सिर्फ 28 निरीक्षक और दो सदस्यीय एक इंटेलिजेंस टीम है। ऐसे में दवा कंपनियों के नमूनों की जांच कैसे होती होगी, आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। जांच के नाम पर महज खानापूर्ति होती है। सारी प्रक्रियाएं कागजों पर होती हैं। इससे दवाओं की गुणवत्ता क्या होती होगी, समझा जा सकता है। ड्रग्स कंट्रोलर व निरीक्षकों के काम करने के तरीके से भी लोग अच्छी तरह वाकिफ हैं। हैरत की बात तो यह है कि दवाओं की असली फैक्ट्री में ही नकली दवाएं बनाई जा रही हैं। दवा निर्ताता कंपनी के रूप में पंजीकृत छोटी कंपनियां बडी कंपनियों का लेबल लगाकर अपने घटिया माल बाजार में उतार रही हैं। उन्हें किसी बात का भी खौफ नहीं। इन दवाइयों की पेकेजिंग भी ऐसेकी जाती है कि देखकर कोई भी इसे नकली नहीं बता सकता। यहां तक कि डॉक्टर भी इसमें धोखा खा जाते हैं। कारण, ये देखने में बिल्कुल असली दवाइयों जैसे होते हैं। फर्क होता है, तो सिर्फ कच्चे माल में। इस तरीके से बनी दवाइयां मर्ज तो ठीक नहीं करतीं, उल्टे रोगी को और बीमार बना डालती है। इन दवाइयों से मोत की खबर भी अक्सर आती रहती है।
नकली दवाओं के कारोबार में बेहिसाब काली कमाई का ही नतीजा है कि दिल्ली और पंजाब के कई बडे दवाई डिस्ट्रीब्युटरों ने अब अपनी खुद की इकाइयां लगा ली हैं। दिल्ली से लगे बहादुरगढ और पंजाब के कई कस्बों में इन लोगों की फैक्ट्रियां चल रही हैं, जहां नामचीन कंपनियों के ब्रांडों को बनाया जा रहा है। भारत न सिर्फ नकली दवाओं के एक बडे उत्पादक देश के रूप में बदनाम हो रहा है, बल्कि ऐसी दवाओं को खपाने का बडा अड्डा भी बनता जा रहा है। यही वजह है कि चीन, नेपाल और बर्मा से भी बडी संख्या में नकली दवाएं भारत आ रही हैं। इन्हें प्राइवेट नर्सिंगहोम और निजी अस्पतालों के जरिए खपाया जा रहा है। इस धंधे में सरकारी अधिकारियों के लिप्त होने की बात तो पता चली ही है, साथ ही बडी कंपनियों में कार्यरत लोग भी पैसों के लालच में लोगों के जीवन से खिलवाड कर रहे हैं। दिल्ली के भगीरथ पैलेस को राजधानी का सबसे बडा दवा बाजार कहा जाता है। इस बाजार में देश की नामी कंपनियों के डीलर तो हैं ही, साथ ही नकली दवाईयां बेचने वाले कारोबारी भी बडी संख्या में हैं। दवाइयों की इस मंडी में रोज करोडों रुपयों का कारोबार होता है, जिसमें से पचास फीसदी नकली या डुप्लीकेट दवाईयों की सप्लाई से जुडा होता है। भगीरथ पैलेस से जुडे एक कारोबारी का कहना है कि अब हमने अपने ग्राहकों को हर दवाई पर साइन करके देना शुरू कर दिया है। अगर ग्राहक को लगे कि वह नकली है, तो वह जांच करवा सकता है। लेकिन, महज इतने भर से इस काले कारोबार को फलने-फूलने से नहीं रोका जा सकता। देश में नकली दवाओं का नासूर कडे कानून से ही रोका जा सकता है, वरना मौत के सौदागर लोगों के जीवन से इसी तरह की खिलवाड करते रहेंगे। और जिंदगी के नाम पर बांटी जाती रहेगी मौत।
जरूरी है सावधानी
दवाईयां अपने किसी विश्वसनीय कैमिस्ट से ही खरीदें और उसकी रसीद जरूर लें। संभव हो तो विक्रता से दवाई के रैपर पर हस्ताक्षर करवा लें। अगर दवाई से फायदा न हो, तो उसे डॉक्टर को जरूर दिखाएं। दवा के नकली होने के संदेह की स्थिति में औषधि नियंत्रक से इसकी शिकायत कर सकते हैं। अगर आपके रिहायश के स्थान पर जांच प्रयोगशाला हो, तो आप वहां भी दवाई की शुद्घता की जांच करा सकते हैं। नकली साबित होने पर पुलिस में शिकायत कर सकते हैं। खासकर क्रोसिन, वोवेरनएसआर-100, स्लो डिक्लोफेनिक, बीटाडीन, एसबीएस की पीसी-200, सिपला की एमटी पिल, फाइजर की वियाग्रा, इनवास की ओमेज, मैथरजिन, कैल्सियम की गोलियां या इंजेक्शन, एनालजेसिक टैबलेट, एंटासिड और कोसाविल सिरप खरीदते वक्त विशेष सावधानी बरतें।
रविवार, 30 अगस्त 2009
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