जिन्ना का जिन्न फिर बोतल से बाहर निकला। इस बार हसरतें पूरी हुईं आडवाणी और राजनाथ की। और शिकार बने जसवंत सिंह। एक तयशुदा रणनीति के तहत उनकी पार्टी से विदाई की इबारत लिख दी गई। न कोई नोटिस, न सफाई का कोई मौका। चिंतन बैठक से ठीक एक दिन पहले फोन पर फरमान सुना दिया गया, बैठक में आने की जरूरत नहीं। आपको पार्टी से निकाल दिया गया है। ऊपरी तौर पर इस फैसले के पीछे पार्टी का अनुशासन तोडना और संगठन की विचारधारा से परे विचार रखना उनका दोष बताया गया है। लेकिन, सूत्र बताते हैं कि इस फैसले के पीछे कुछ लोगों की अपनी नाक बचाने की कवायद खास वजह है। इसके पीछे राजनाथ सिंह और लाल कृष्ण आडवाणी का नाम लिया जा रहा है।
बताया जाता है कि संघ के नेता चिंतन बैठक में पार्टी की हार पर हर हाल में समीक्षा पर आमादा थे। लेकिन, भाजपा के कुछ नेताओं को इसमें अपने लिए मुश्किलें नजर आ रही थीं। कारण, हार के लिए कहीं न कहीं उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना था। लिहाजा, शुरू से ही वे इससे बचने की कोशिशों में लगे थे। आडवाणी ने खुद भी बैठक से पहले कहा था कि इसमें हार की समीक्षा के बजाए आगे की रणनीति पर चर्चा करना बेहतर होगा। उनकी लॉबी के नेता तो इस बैठक को ही रद्द करवाने में लगे थे। लेकिन, संघ ने इस पर कडा रवैया अपनाते हुए अपना रुख स्पष्ट कर दिया था कि बैठक भी होगी और हार पर समीक्षा भी। यह उन नेताओं के लिए झटके की तरह था, जो अब तक हार की जिम्मेवारियों से बचने की कोशिश कर रहे थे।
गौरतलब है कि लोकसभा चुनावों में पार्टी की हार के लिए मुख्य रूप से आडवाणी और उनके रणनीतिकारों को ही कठघरे में खडा किया जा रहा था। इसके बहाने उनके विरोधी पार्टी में आडवाणी लॉबी को कमजोर करने की बाकायदा चालें भी चल रहे थे। वहीं राजनाथ सिंह द्वारा इस मुद्दे पर हीला-हवाली ने उन्हें भी आडवाणी विरोधी नेताओं के निशाने पर ला खडा किया था। पार्टी का अध्यक्ष होने के नाते उन पर भी इसकी जिम्मेवारी कबूल करने का दबाव बनाया जा रहा था। यानी राजनाथ और आडवाणी दोनों के लिए हार पर समीक्षा का मतलब था, संकट को बुलावा। लिहाजा, दोनों ही इससे बचने की कोशिश कर रहे थे। उन्हें लगा कि चिंतन बैठक में अगर हार पर चर्चा हुई, तो विरोधी खुल कर उन पर निशाना साधेंगे। यही वजह है कि बैठक में हार की समीक्षा के बजाए आगे की रणनीति पर चर्चा की जरूरत जताई जाने लगी थी। लेकिन, संघ के इस एलान से कि भाजपा चिंतन बैठक में हार की समीक्षा से नहीं बच सकती, इसे ठंडे बस्ते में डालने की इन नेताओं की कोशिश नाकाम होती दिखने लगीी थी। तभी जसवंत सिंह के मुद्दे के रूप में उन्हें वह हथियार मिल गया, जिसने उन्हें हलाल होने से बचा लिया। वैसे भी पत्र के माध्यम से हार के लिए राजनाथ को जिम्मेदार बताने से जसवंत पार्टी अध्यक्ष की नजरों में चढे हुए थे।
जिन्ना के गुणगाण के कारण संघ तो मेजर साहब से नाखुश था ही, लेकिन उनके खिलाफ किसी कार्रवाई की पहल भाजपा द्वारा ही होनी थी। लिहाजा, भाजपा आलाकमान ने एक तीर से दो निशाने साधने की योजना बना ली। जसवंत को चिंतन बैठक से महज एक दिन पहले पार्टी से निकाल कर एक तरफ संघ को भी खुश कर दिया और दूसरी तरफ चिंतन बैठक में अनुशासन जैसे मुद्दे की हवा बनाकर हार की समीक्षा के मुद्दे को भी नेपथ्य में पटकने में कामयाबी पा ली। अपने मतलब साधने के लिए जसवंत को बलि का बकरा बनाने से किसी तरह की परेशानियों से भी सामना नहीं करना पडा और चिंतन बैठक के मंच को आडवाणी-राजनाथ के खिलाफ इस्तेमाल करने की योजना बना रहे असंतुष्ट नेता भी शांत पड गए। तभी बैठक में हार को लेकर बाल आप्टे की रिपोर्ट रखे जाने के बावजूद उसपर कोई खास चर्चा नहीं हो पाई। सारा फोकस पार्टी में अनुशासन और संघ की विचारधारा के प्रति भाजपा नेताओं की आस्था को मजबूत बनाने पर ही रहा। यही वजह है कि फजीहत से बच जाने की खुशी में राजनाथ ने पहली बार अपने मुंह से यह घोषणा की कि आडवाणी पांच वर्षों तक प्रतिपक्ष के नेता के अपने पद पर बने रहेंगे। जबकि इससे पहले राजनाथ खेमे के लोग ही लौह पुरुष के लिए मुश्किलें पैदा करने में लगे थे।
भाजपा के सूत्रों का कहना है कि संभावित मुसीबत के मद्देनजर ही राजनाथ और आडवाणी फिलहाल अपनी-अपनी हैसियत बचाए रखने की कवायद में जुटे हुए हैं। इस वक्त उनकी प्राथमिकता एक-दूसरे के लिए गड्ढा खोदने की बजाए किसी तरह खुद को टिकाए रखने की है। वर्ना विरोधी भी मजबूत हो सकते हैं और संघ भी उनपर हावी हो सकता है। और अपनी इसी चाल के आगे उन्होंनेे जसवंत को अपने अभियान का बकरा बना दिया।
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