सोमवार, 29 जून 2009

भाजपाई खेत, कांग्रेसी फसल


राम मंदिर आंदोलन के रथ पर सवार होकर कभी भाजपा ने सत्ताशीर्ष का सफर तक तय किया था। तब अयोध्या और इससे सटे इलाकों में भगवा पार्टी की फसल लहलहाती थी। लेकिन, आज बदले हालात में अपने इस गढ़ में वह ठूंठ नजर आती है। जबकि कांग्रेस यहां लगातार अपना दबदबा बढ़ाती जा रही है। आखिर क्यों? बीजेपी के सिकु$ड़ते और कांग्रेस के फैलते जनाधार के पीछे के कारणों की तह में झांकती रिपोर्ट।


90 के दशक के आस-पास राम मंदिर का मुद्दा भारतीय जनता पार्टी के लिए संजीवनी बन कर उभरा था। तब भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या और इससे लगे इलाकों में उसका अपना एक गढ़ कायम हो चुका था। राज्य में भी उसका जनाधार अचानक इतना बढ़ा कि वह प्रदेश की सत्ता तक पर विराजमान हो गई। तत्पश्चात इस लहर के कारण ही दिल्ली के सिंहासन पर भी उसका कब्जा हुआ। पर आज करीब दो दशकों के बाद वह तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। न ही उत्तर प्रदेश में भाजपा सत्ता में है और न ही केंद्र में उसकी हालत अच्छी है। गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही। ये वे प्रदेश हैं, जो भाजपा के हिंदुत्व ब्रांड राजनीति की प्रयोगशाला के तौर पर जाने जाते थे। कहने का तात्पर्य कि अपने गढ़ में ही उसकी दुर्गति हो रही है। हालिया लोकसभा चुनाव में फैजाबाद संसदीय सीट पर भाजपा प्रत्याशी लल्लू सिंह की बुरी हार ने भी संकेत दे दिया कि भगवा किला अपने मजबूत आधार वाले स्थानों में भी दरक चुका है। भाजपा के ऊर्वर खेत पर कांग्रेस की फसल लहलहाने लगी है। यहां उसके उम्मीदवार निर्मल खत्री की जीत इसका जीता-जागता उदाहरण है।


गौरतलब है कि 90 के शुरुआती दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन की लहर ने यहां भगवा पार्टी का मजबूत जनाधार कायम कर दिया था। इसी पर सवार होकर उसके उम्मीदवार विनय कटियार ने यहां से तीन-तीन बार संसद का सफर तय किया। लेकिन, आंदोलन की धीमी पड़ती आंच ने धीरे-धीरे भाजपा के जनाधार में सेंध लगाना शुरू कर दिया। आज की तारीख में वहां पूरी तरह कांग्रेस की घुसपैठ हो चुकी है। उसने अपनी खोई जमीन वापस पा ली है। तभी फैजाबाद में उसके उम्मीदवार को जीत मिली और भाजपा के प्रत्याशी लल्लू सिंह को चौथे स्थान से ही संतोष करना पड़ा। इतना ही नहीं इस संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले छह विधानसभा सीटों पर भी भाजपा की हालत पतली हो चुकी है। उसके कब्जे में सिर्फ अयोध्या की सीट है। यहां पिछले असेंबली इलेक्शन में लल्लू सिंह विजयी हुए थे, जो इस बार संसदीय चुनाव में खेत रहे। उन्हें कुल 7,57,238 मतों में महज 1,51,558 वोट ही मिले। इस हार के कई मायने निकाले जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि राम नाम की राजनीति करने वाले दल की भगवान राम की जन्मभूमि पर ही जमीन खिसक चुकी है। अब उसके खेत में कांग्रेस की फसल झूमती-लहराती नजर आ रही है। विधानसभाई इलाकों में भी कांग्रेस की स्थिति में काफी बदलाव दृष्टिगोचर हो रहे हैं। हालांकि पिछले चुनाव में यहां कांग्रेस को पांच सीटों में से एक भी सीट प्राप्त नहीं हुई थी। लेकिन, बताया जाता है कि अगर आज वहां चुनाव होते हैं, तो भाजपा को अपनी एकमात्र अयोध्या सीट से भी हाथ धोना पड़ेगा और कांग्रेस को उल्लेखनीय सफलता प्राप्त होगी।


ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर भाजपा की अपने इस महत्वपूर्ण गढ़ में ऐसी दुर्गति क्यों हो रही है? क्यों साधू-संतों और मंदिरों की इस नगरी में उसका बोरिया-बिस्तर सिमटता जा रहा है? इसी राम जन्मभूमि को अपनी सियासत का ककहरा बनाकर भाजपा ने सत्ता सुख भोगा। इसी राम मंदिर आंदोलन से उसकी पहचान कायम हुई। इसी ने उसे जनाधार दिया। लेकिन, आज इसी जगह उसकी पहचान खो रही है। अयोध्या को मंदिरों का शहर कहा जाता है, जहां करीब 4 हजार मंदिर हैं। हर मंदिर में कम से कम 5-10 साधू, महंत रहते हैं और ये मंदिर आंदोलन के दौर से ही भाजपा का समर्थन करते रहे हैं। लेकिन, कभी भाजपा के साथ कदम दर कदम मिलाने वाले ये साधू-संत भी अब उसके साथ नहीं दिखते। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर है कि जिस पार्टी को उन्होंने उसकी विचारधारा और हिंदुत्व की प्रखर वकालत की वजह से समर्थन दिया था, उसने उन्हें पूरी तरह छला। अयोध्या में राम मंदिर बनाने की कसमें खाने वाले उसके नेताओं ने सत्ता में पहुंचकर अपने वादे को भुला दिया। मंदिर की याद उन्हें तब-तब ही आई, जब चुनावों का वक्त आया। इस बार तो फैजाबाद में चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे नरेंद्र मोदी ने भी राम मंदिर मुद्दे पर अपनी जुबान नहीं खोली। इस मुद्दे पर कुछ न बोलकर रामभक्तों को तो उन्होंने निराश किया ही, भाजपा के ऐसे रवैए ने आज धर्माचार्यों को भी उससे दूर कर दिया है। कल तक उसे दिल्ली की सत्ता पर आसीन कराने के लिए पूरा जोर जगाने वाले ये संत-महात्मा आज उसे जी भर-भर कर कोसते हैं।


अयोध्या की पावन धरती पर वास करने वाले संत देवराम दास वेदांती गुस्से में कहते हैं, 'भाजपा ने लाखों-करोड़ों हिंदुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ किया है। जिस मुद्दे पर हमलोगों ने केंद्र में उसकी सरकार बनाने के लिए समर्थन दिया, उस मुद्दे को सत्ता में पहुंचकर वह भूल गई। राम नाम की याद उसे केवल चुनावों में आती है। चुनावी सभाओं में गला फाड़-फाड़कर राम मंदिर का नारा लगाने वाले भाजपा के बड़े नेताओं को तो भगवान राम का दर्शन करने की भी फुर्सत नहीं है। लोकसभा चुनाव में फैजाबाद से पार्टी के उम्मीदवार रहे लल्लू सिंह संतों के निमंत्रण की भी लगातार अनदेखी करते रहे। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी निर्मल खत्री हमेशा से संतों की भावनाओं का ख्याल रखते रहे। उनके निमंत्रण पर कार्यक्रमों में हाजिर होते रहे। हारते रहने के बावजूद लोगों के बीच रहने की वजह से ही उन्हें जीत मिली और लल्लू को हार। संतों और हिंदू समाज की अवहेलना भाजपा की हार का कारण बन रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद वह सबक सीखने को तैयार नहीं।' भाजपा को लेकर संतों में नाराजगी इस कदर बढ़ चुकी है कि वे किसी भी हालत में अब उसपर विश्वास नहीं करना चाहते। न ही चुनावों में वे पार्टी की मदद करने आगे आ रहे हैं। इसी का नतीजा है कि अयोध्या जैसे स्थान और उससे लगे क्षेत्रों में भी भाजपा का जनाधार लगातार खत्म होता जा रहा है। हालांकि संघ और उसके आनुषंगिक संगठन लाख नाराजगी के बावजूद अभी भी भाजपा के लिए काम कर रहे हैं, पर उसका आर नहीं दिखता। जनता इन सबकी मंशा जान चुकी है। शायद यही कारण है कि अयोध्या और फैजाबाद जैसे उसके प्रतिकात्मक स्थल में भी भाजपा कमजोर हुई है और देश के अन्य हिस्सों में भी धीरे-धीरे ही सही, कुछ ऐसा ही हो रहा है।


मंदिर आंदोलन के बाद फैजाबाद पर भाजपा का लगातार परचम लहराता रहा, लेकिन अब ऐसा नहीं है। पिछले दो बार से यहां दूसरी पार्टियों के उम्मीदवार मैदान मार रहे हैं। और बदले परिवेश में अब कांग्रेस अपने इस पुराने गढ़ में वापसी कर रही है। फैजाबाद में उसकी जीत इसका संकेत है। इस संसदीय सीट के अंतर्गत आने वाले अयोध्या, मिल्कीपुर, सोहावल, बीकापुर, दरियाबाद व रुदोली विधानसभा सीटों में भी महज अयोध्या में ही भाजपा का कब्जा है। लेकिन यह सीट भी उसने आज से करीब ढाई साल पहले जीती थी। तब लल्लू सिंह ने यहां से विजय पताका फहराई भी। लेकिन, इस बार संसदीय चुनाव में वह जीत नहीं पाए। उनके वोटों के प्रतिशत में भी गिरावट दर्ज की गई है, जो संकेत है कि भाजपा की जमीन खिसक चुकी है। अन्य विधानसभा सीटों पर इस समय बसपा या सपा का कब्जा है। पर लोकसभा चुनावों के आंकड़ों पर गौर किया जाए, तो साफ होता है कि कांग्रेस अब इन जगहों पर वापसी कर रही है। यानी भाजपा के खेत में कांग्रेस की फसल लहलहाने को तैयार है। बाबरी विध्वंस के बाद कांग्रेस से मुंह मोडऩे वाले मुसलमानों की अब उससे नाराजगी दूर हो गई है। कहने का मतलब सालों बाद कांग्रेस की सूखी डालों पर हरियाली लौट रही है। तो क्या अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए प्रदेश में उम्मीदें पूरी तरह दम तोड़ रही हैं?


राजनैतिक जानकारों की इस सवाल पर एकमत राय है कि भाजपा की हालत बहुत हद तक पतली हो चुकी है। फैजाबाद समेत उत्तर प्रदेश के लोकसभा चुनाव परिणाम इसका संकेत हैं। अब भाजपा कोशिश भी करे, तो वह 90 के दशक वाली स्थिति में नहीं लौट सकती। कारण, उसका दोमुंहापन पूरी तरह से एक्सपोज हो चुका है। हिंदू समाज की नजरों में भी उसकी विचारधारा की पोल खुल चुकी है और साधू-संतों के समक्ष भी वह बेपर्दा हो चुकी है। इसी का नतीजा है कि संत भाजपा से नाराज हैं। वे अब किसी भी हालत में उसकी मदद को तैयार नहीं। हालांकि लोकसभा चुनावों में बुरी पराजय के बाद पार्टी में एक बार फिर अपने मूल एजेंडे पर लौटने पर विचार-विमर्श हो रहे हैं, लेकिन इसका फायदा अब शायद ही मिले। संत समाज में भाजपा को समर्थन करने को लेकर भारी विरोधाभाष है। अधिकांश की राय है कि अब भाजपा को चुनावों में मदद न की जाए। भाजपा के प्रति सॉफट कॉर्नर रखने वाले संतों की गिनती अब नगण्य रह गई है और वे भी जन-भावनाओं और दूसरे संतों की सोच के मद्देनजर खुलकर भाजपा प्रेम का इजहार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। ऐसे में पार्टी के लिए चुनावों में उत्प्रेरक साबित होते रहे इस वर्ग से उम्मीद बेमानी है। हार के बाद भाजपा के नेताओं में भी हिंदुत्व को लेकर भारी मतभेद उभर आए हैं। एक गुट आलाकमान पर इस बात का दबाव डाल रहा है कि अब पार्टी को विवादास्पद मुद्दों से तौबा कर विकास की अग्रगामी राजनीति करनी चाहिए। वहीं दूसरी तरफ कट्टर संघी बैकग्राउंड वाले भाजपाई नेता हार के बाद पार्टी को अपने मूल मुद्दों पर लौटने की वकालत कर रहे हैं। ऐसे में संभव नहीं कि आसानी से भाजपा इस मुद्दे पर ठोस निर्णय ले सके। राष्ट्रीय कार्यकारिणी से पहले पदाधिकारियों की बैठक में जिस तरह मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज हुसैन ने हिंदुत्व को लेकर तीखे सवाल चस्पा किए, उससे साफ है कि इस मुद्दे पर संगठन में सिर-फुटव्वल की स्थिति पैदा हो चुकी है। इस बात को लेकर जबरदस्त मतभेद हैं कि हिंदुत्व की कौन सी धारा अपनाई जाए। दीन दयाल की राष्ट्रवाद वाली या वरुण मार्का हिंदुत्व।


जहां तक देश की 80 प्रतिशत हिंदू जनता का सवाल है, तो वह भी भाजपा की सियासी चाल को समझ चुकी है। कहें तो बहुत पहले से ही वह इसे समझती रही है। वर्ना क्या कारण है कि भाजपा हिंदुत्व की विचारधारा पर चलते हुए भी 18 प्रतिशत वोट पाने वाली पार्टी ही बनी रही। और वह भी उस दौर में, जब इस विचारधारा की लहर चलने की बात की जाती थी। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। ऐसे में 18 प्रतिशत कहां लुढ़कता है, देखना होगा। सहयोगी दल भी इस बात को भांप कर ही उससे दामन छुड़ा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ गंभीर और विकासपरक राजनीति के रथ पर सवार कांग्रेस दोबारा से अपने सुनहरे दिन वापस पाने की कोशिशों में लगी है। इसका सकारात्मक परिणाम भी उसे हासिल हो रहा है। अयोध्या जैसे राम नाम के प्रतीक वाले इलाके में भी उसने भाजपा को मात देकर अपनी उम्मीदें जिंदा कर दी हैं। फैजाबाद से सटे सुल्तानपुर, अमेठी, बाराबंकी, गोंडा जैसे संसदीय क्षेत्रों में भी इस बार कांग्रेस ने ही जीत का शंखनाद किया है। भाजपा यहां भी उसके विजय रथ को रोकने में कामयाब नहीं हो पाई। कहने का मतलब भाजपा खो रही है और कांग्रेस जिंदा हो रही है। उत्तर प्रदेश में भी और राम जन्मभूमि में भी। इसी जगह ने उससे कभी उसकी उम्मीदें छीनी थीं, अब इसी जगह से उसकी उम्मीदें जाग रही हैं।

ये कैसी मुश्किल है


हाजीपुर से सांसद बनते रहे पासवान को अब अपना राजनैतिक वजूद खतरे में दिख रहा है। लिहाजा, वह अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखने के लिए बेतरह हाथ-पैर मार रहे हैं। हार के बाद अब वह किसी तरह संसद का सफर तय करनेे की भी ताक में हैं। लेकिन, इसके लिए भी उन्हें लालू-मुलायम के साथ की दरकार है। तो, क्या मिल पाएगा उन्हें यह दयादान? और इस दान की राजनीति से कितनी फलेगी-फूलेगी उनकी सियासत? एक समीक्षा।

कहा जाता है कि 'डेमोक्रेसी' में 'परमानेंसी' की किसी सियासी व्यक्ति को उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। पर बहुतेरे ऐसी उम्मीद रखते हैं। राम विलास पासवान भी उनमें से एक हैं। शायद परिस्थितियां भी अब तक उन्हें ऐसी उम्मीद रखने की वजह देती रही हैं। अल्पकालिक व्यवधान को छोड़ दिया जाए, तो लगातार करीब तीन दशकों से वह सत्ता और संसद का हिस्सा रहे हैं। लेकिन, इस बार परिस्थितियां बदली हुई हैं। और वह भी पूरी तरह। अब वह किसी सदन या सरकार का हिस्सा नहीं हैं। लोकसभा चुनाव में जनता ने उनके साथ उनकी पूरी पार्टी को बिहार से उखाड़ फेंका है। कोई नहीं जीत पाया। न पासवान, न ही उनके परिवार का कोई और सदस्य। आज उनका ओहदा महज लोक जनशक्ति पार्टी का अध्यक्ष होना भर रह गया है। ऐसे में उनकी राजनैतिक प्रासंगिकता को लेकर सियासी गलियारों में सवाल उठ रहे हैं। और ये सवाल पासवान को भी अंदर तक मथने लगे हैं। तभी तो सियासत में घाट-घाट का पानी पी चुके दलित नेता रामविलास पासवान इन दिनों अपनी आगे की सियासी रणनीति पर विचार करने में व्यस्त हैं। नए सिरे से वह अपनी राजनैतिक धरातल की समीक्षा कर रहे हैं। साथ ही लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी का सूपड़ा साफ होने के बावजूद सांसद बनने के रास्ते भी तलाश रहे हैं। यह सोचकर कि सियासी परिदृश्य में किसी तरह उनका नाम बना रहे। पर इसके लिए वह चौथे मोर्चे के अपने दोनों साथी (लालू और मुलायम) के रहमो-करम पर निर्भर दिखते हैं।


बताया जाता है कि सियासत में अपने नए दोस्तों की मदद से ही पासवान संसद में पहुंचने का जुगाड़ करने में लगे हैं। उनके उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद सीट से लोकसभा उपचुनाव लडऩे की बातें भी कही जा रही हैं। गौरतलब है कि सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की दो लोकसभा सीटों- फिरोजाबाद और कन्नौज से चुनाव लड़ा था। इन दोनों ही जगहों पर उन्हें जीत मिली। अब उन्होंने फिरोजाबाद सीट खाली करते हुए कन्नौज सीट कायम रखने का फैसला किया है। लिहाजा, फिरोजाबाद में आने वाले दिनों में उपचुनाव होना है। पासवान इसी सीट पर सपा समर्थित लोजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं। अगर वह यहां से चुनाव लड़ते हैं और जीत दर्ज करते हैं, तो अपने दोनों साथियों की तरह वह भी लोकसभा के सदस्य बन जाएंगे। सूत्र बताते हैं कि सपा मुखिया मुलायम भी इसके लिए तैयार हैं। लेकिन, कल्याण सिंह यहां पासवान के अरमानों के आड़े आ रहे हैं। वह इस सीट से अपने बेटे राजवीर सिंह को चुनाव लड़वाना चाहतेे हैं। वैसे भी चुनावों से पहले मुलायम ने खुद भी राजवीर को संसद भेजने का वादा किया था। उस वक्त सभी टिकट बंट जाने के कारण राजवीर को पार्टी महासचिव बना दिया गया था। अब कल्याण फिरोजाबाद सीट पर अपने बेटे को लड़ाने का दबाव बना रहे हैं। ऐसे में पासवान की यहां से लड़कर संसद पहुंचने की संभावना छिन्न हो सकती है। शायद तभी वह दूसरे विकल्पों की तरफ भी नजरें गड़ाए हुए हैं।


ऐसे ही एक विकल्प के तहत वह झारखंड के मार्फत राज्यसभा पहुंचने की भी संभावना को खंगालने में लगे हैं। अगर चूडिय़ों के शहर फिरोजाबाद में उनके अरमान टूटे, तो वह झारखंड में अपनी उम्मीदें उगा लेंगे। राजद के एक बड़े नेता भी अनौपचारिक बातचीत में ऐसी संभावना की पुष्टि करते हैं। लेकिन यहां भी उन्हें लालू व अन्य की मदद की दरकार होगी। शायद इसी के दृष्टिगत वह इन दिनों कांग्रेस के साथ अपने मधुर रिश्तों की याद दिलाना नहीं भूलते। अगर पासवान झारखंड से राज्यसभा आते हैं, तो उनका कार्यकाल करीब एक साल का ही रहेगा। इसके बावजूद वह इस उम्मीद को नहीं छोडऩा चाहते। कम से कम संसद में इंट्री तो मिलेगी। बाद में और कोई जुगाड़ हो जाएगा। जुगाड़ के तो वैसे भी पासवान महारथी हैं। सो, इस वक्त पासवान को संसद में अपनी उपस्थिति तय करने की सबसे ज्यादा दरकार महसूस हो रही है। उनकी ऐसी इच्छा स्वाभाविक भी है। सांसद नहीं रहने की वजह से उनको लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। उनके राजनैतिक वजूद खत्म होने की संभावना तक जताने लगे हैं लोग। आज की तारीख में वह न तो सत्ता में हैं और न ही सत्ता में रहने वाली पार्टी के साथ। तभी केंद्रीय मंत्री के रूप में दिल्ली में मिले मकान को भी खाली करने का फरमान आ गया।


जानकार भी मानते हैं कि बदले सियासी हालात में अगर पासवान अगले पांच साल राष्ट्रीय परिदृश्य से गायब रहे, तो उनके गुमनामी में खो जाने का खतरा है। कांग्रेस ने अपनी दलित नेता मीरा कुमार को लोकसभा स्पीकर बनाकर भी पासवान के सामने राजनैतिक रूप से अस्तित्व का सवाल पैदा कर दिया है। ऐसे में पासवान की चिंता और बढ़ गई है। वह हरसंभव कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह उनकी राजनैतिक प्रासंगिकता कायम रहे। इस बेचैनी का नतीजा ही है कि देश में रिकार्ड मतों से चुनाव जीतने वाले यह स्वयंभू दलित मसीहा इन दिनों सपा-कांग्रेस जैसी पार्टियों के समर्थन से बिहार से बाहर फिरोजाबाद सीट से संसद पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। और इस सहयोग के लिए याचना तक की जा रही है। उत्तर प्रदेश में पासवान की पार्टी के प्रवक्ता राज कुमार ओझा कहते हैं, 'राम विलास पासवान का यहां से चुनाव लडऩा लगभग तय है। सपा से तो हमारा पहले से ही राजनैतिक गठजोड़ है। लालू-मुलायम-पासवान जैसे दिग्गजों ने पहले से ही उत्तर प्रदेश और बिहार में मिलकर राजनैतिक लड़ाई लडऩे का एलान किया हुआ है। कांग्रेस से भी पासवान के हमेशा मधुर रिश्ते रहे हैं। हमारे नेता उस दौर में सोनिया गांधी के पक्ष में खड़े होन वाले पहले शख्स थे, जब उनके विदेशी मूल का मुद्दा जोर पकड़ा हुआ था। ऐसे में हमें पूरी उम्मीद है कि कांग्रेस फिरोजाबाद में हमारे खिलाफ प्रत्याशी नहीं खड़ा करेगी।'
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या लालू और मुलायम भी पासवान की चिंता को लेकर गंभीर हैं।

इस पर सियासी जानकारों का मानना है कि इस वक्त तीनों नेताओं की एक-दूसरे की मदद करना मजबूरी है। कारण, बिहार में नई परिस्थितियों में लालू भी काफी कमजोर हुए हैं। उन्हें नीतीश का मुकाबला करने के लिए पासवान के साथ-साथ कांग्रेस की भी जरूरत है। लिहाजा पासवान को अगले विधानसभा चुनाव तक बांधे रखने के लिए वह उनकी हरसंभव मदद करेंगे। यही हाल उत्तर प्रदेश में मुलायम का है। भले ही चुनावों में उनकी बहुत दुगर्ति न हुई हो, लेकिन नुकसान तो बड़ा हुआ ही है। कांग्रेस के बढऩे और मायावती के बरकरार रहने से उन्हें आगे अपने लिए खतरा बढ़ता नजर आ रहा है। सो, वह पासवान के बहाने मायावती के दलित वोटबैंक की काट खोज रहे हैं। लेकिन, यह इतना आसान भी नहीं। फिरोजाबाद में पासवान कांग्रेस के समर्थन के बगैर जीत जाएंगे, यह यकीन के साथ नहीं कहा जा सकता। इसका इल्म पासवान को भी है। ठीक उसी तरह झारखंड में केवल लालू के बूते पासवान का सपना पूरा नहीं हो सकता। यही वजह है कि पासवान और उनके नेता कांग्रेस प्रेम का राग भी गाने में लगे हैं। वहीं दूसरी तरफ नए सिरे से पार्टी की जमीन मजबूत करने की भी कोशिशें की जा रही हैं।


अपनी राजनैतिक प्रासंगिकता के गुम होने के खतरे को देखते हुए ही पासवान भी अचानक सक्रिय हो गए हैं। इन दिनों वह लगातार बिहार के दौरे पर हैं। अपनी सियासी जमीन का अंदाजा लगा रहे हैं। और उन्हें जो नजर आ रहा है, वहां उनकी जमीन ही खिसकी है। दलित वोटों के अकेले ठेकेदार रहे पासवान को बिहार में निराशा ही हाथ लग रही है। नीतीश ने दलितों में भी महादलित कार्ड खेलकर पासवान को बड़ा झटका दिया है। यह झटका चुनावी नतीजों के रूप में अपना संकेत पहले ही दे चुका था। हाजीपुर से लगातार आठ बार से लोकसभा चुनाव जीत रहे पासवान को इस बार हार का मुंह देखना पड़ा। उनकी पार्टी का खाता तक नहीं खुला इस राज्य में। लालू-मुलायम को भी नतीजों से धक्का लगा, पर इसके बावजूद वे संसद पहुंचने में कामयाब रहे। ऐसे में पासवान आज सियासी बियाबान में भटकते दिख रहे हैं। बिल्कुल अकेले। उन्हें लालू-मुलायम के रूप में सहयोगी जरूर नजर आ रहे हैं, पर उनके सहयोग से शायद ही कुछ भला हो। उनकी तो खुद की सियासी दुनिया उजड़ चुकी है। बावजूद इसके पासवान उनके सहारे अपनी सियासी राह के सुनहरा होने की उम्मीद पाल रहे हैं। तभी पासवान से क्षुब्ध उनके एक करीबी कहते हैं, 'पासवान जी हैं तो दलित नेता, पर उन्हें कंटहा ब्राह्मण (महाब्राह्मण) कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। ये वो ब्राह्मण होते हैं, जो मरे लोगों का दान लेते हैं। पासवान वही कर रहे हैं। क्या बचा रह गया है उनके पास। सब खत्म हो चुका है। लोग उन्हें पूरी तरह समझ चुके हैं। सत्ता के साथ रहकर इतने वर्षों तक मलाई खाने में व्यस्त रहे। पार्टी और जनाधार की चिंता नहीं की। और अब भी सबक लेना नहीं चाहते। भगवान सद्बुद्घि दे उन्हें।'


पासवान के प्रति रोष पाले ऐसे कई लोग हैं। उनकी पार्टी में भी। लंबे समय से उनमें असंतोष की आग पल रही थी। अब नई परिस्थितियों में वह खुल कर भड़क रही है। पासवान के कई करीबी लोकसभा चुनावों के बाद उनका साथ छोड़कर नीतीश का हाथ थाम चुके हैं। बिहार में लोजपा के एकमात्र एमएलसी और पासवान के पीछे साए की तरह लगे रहने वाले संजय सिंह जैसे उनके सिपहसालार भी। सत्ता से दूर होने का खामियाजा पासवान झेल रहे हैं। इसके लिए उनकी पार्टी के कई लोग लालू को कारण मानते हैं, जो पासवान के सबसे बड़े दोस्त बने हुए हैं। लिहाजा, अब पार्टी में नीतीश का हाथ थामने की मांग भी दबे स्वरों में उठने लगी है। बताया जाता है कि सुशासन सरकार के मुखिया भी पासवान को अपने साथ देखना चाहते हैं। ऐसी कोशिश वह पहले भी कर चुके हैं। तब जब रामाश्रय सिंह, नागमणि, नरेंद्र सिंह जैसे लोग उनका साथ छोड़ गए थे। आज भी नीतीश का पासवान के प्रति सॉफ्ट कॉरनर है। जबकि लालू से छत्तीस का आंकड़ा। ऐसे में संभव है कि अगर पासवान लालू मोह त्याग दें, तो नीतीश से उनका गठबंधन कायम हो सकता है। इस कदम से पासवान संसद भी पहुंच सकते हैं और आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अपनी संभावनाएं भी जिंदा रख सकते हैं। पार्टी में व्याप्त निराशा से भी इससे आसानी से निपटने में मदद मिलेगी। इसी समीकरण के मद्देनजर लोजपा के नेता पासवान को यह राह पकडऩे की सलाह दे रहे हैं।


देखना शेष है कि अपने सियासी जीवन के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे पासवान की अगली रणनीति क्या होती है। फिलवक्त वह लालू-मुलायम के सामने दानपात्र लिए नजर आ रहे हैं। अपनी राजनैतिक प्रासंगिकता को कायम रखने के लिए। मुश्किल की इस घड़ी में वह दान लेने-देने की सियासत में उलझे रहेंगे या सफलता की असली सीढ़ी की तरफ कदम बढ़ाएंगे, इंतजार रहेगा।

मिशन मजबूती


कांग्रेस को सत्ता में पहुंचाने के बाद राहुल अब अपने नए मिशन पर जुट गए हैं। मिशन है संगठन को मजबूत बनाना। इसके तहत पारंपरिक वोटरों को वापस पार्टी से जोडऩे की कवायद हो रही है। और साथ ही पुराने गढ़ों में कांग्रेसी पताका लहराने की गंभीर पहल।

मंत्रिमंडल में शामिल न होकर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने संकेत दे दिया था कि उनका इरादा फिलहाल सत्तासुख भोगने का नहीं, संगठन के लिए काम करते रहने का है। और अब वह नजर आने लगा है। सरकार गठन के बाद एक बार फिर राहुल अपने पुराने मिशन पर जुट गए हैं। पार्टी को मजबूत बनाने की गंभीर पहल के मद्देनजर गांधी-नेहरू परिवार की चौथी पीढ़ी के इस युवराज ने अब उन इलाकों पर ध्यान केंद्रित किया है, जो कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करते थे। जहां उसके परंपरागत वोटर हुआ करते थे और एक मजबूत कैडर बेस। राहुल ने इन क्षेत्रों को अपनी प्राथमिकता में शामिल करते हुए वहां पार्टी को पुनर्जीवित करने का प्रयास शुरू कर दिया है। चुनावी नतीजों का अध्ययन करने के बाद राहुल गांधी की टीम आदिवासी बहुल क्षेत्रों पर खासतौर पर फोकस कर रही है। कारण, यहां पार्टी का जनाधार पिछले वर्षों में सिकुड़ता देखा गया है। हालांकि पिछले दो साल से राहुल की टीम छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में जमीनी स्तर पर काम करती रही है, लेकिन उसका कोई सकारात्मक परिणाम चुनावों में देखने को नहीं मिला। लिहाजा अब नए सिरे से, नए फार्मूले के तहत काम करने की जरूरत महसूस की जा रही है।

बताया जाता है कि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी लोकसभा चुनावों में युवा कार्ड के चलने से खासे उत्साहित हैं। उसी जोश से लबरेज अब वह आदिवासी वोटरों का विश्वास जीतने में लगे हैं। छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में राहुल और उनकी टीम आदिवासी वोटरों के बिखराव की वजहों का पता लगाने की कोशिश कर रही है। जो रुझान मिले हैं, उसके अनुसार आदिवासी मतदाताओं में अपनी गहरी पैठ के कारण ही कांग्रेस पहले मध्य प्रदेश में एकछत्र राज करती रही थी। लेकिन इससे कटकर छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद मध्य प्रदेश में पार्टी की हालत पतली हो गई। अब यहां भाजपा का वर्चस्व कायम है। सूबे में लगातार उसकी सरकार ही सत्तासीन हो रही है। इस तथ्य के बावजूद कि भाजपा में आंतरिक गुटबाजी अपने चरम पर है। जिस छत्तीसगढ़ क्षेत्र की वजह से कांग्रेस की मध्य प्रदेश में तूती बोलती थी, उस आदिवासी बहुल राज्य में भी पार्टी 11 में से महज एक लोकसभा सीट ही जीत पाई। रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा की प्रदेश सरकार की पुनर्वापसी ने भी कांग्रेस के खिसके जनाधार का ही आभास कराया है। ऐसे में इस प्रदेश को राहुल ने अपनी नई प्रयोगशाला बना कर काम शुरू कर दिया है। इसके तहत संगठन को चाक-चौबंद बनानी की कोशिश की जा रही है।

राहुल की टीम ने विभिन्न प्रदेशों में पार्टी के जनाधार खिसकने के पीछे जो कारण ढूंढ़े हैं, उसके मुताबिक संगठन के भीतर खींचतान सबसे ब$ड़ी वजह है। इसके अतिरिक्त युवा संगठनों की नजरअंदाजी और चापलूसों की कोटरी भी पार्टी की छवि खराब करने का काम करती रही है। इन वजहों से पार्टी की नीतियों व कार्यक्रमों को जनता के बीच सही तरीके से पहुंचाने में नाकामी हाथ लग रही है। नेताओं के बीच गुटबाजी से कार्यकर्ताओं का उत्साह भी ठंढा पड़ा है। जहां पार्टी सत्ता में हैं, वहां सत्ता के लिए कांग्रेसियों में धमाचौकड़ी मची हुई है और जहां सत्ता से दूरी, वहां एक-दूसरे गुटों को नीचा दिखाने की कसरत। ऐसे में अनुशासनहीनता भी जोर पकड़ रही है। मतदाताओं में इससे पार्टी के प्रति एक आक्रोश पैदा हो रहा है। लिहाजा, राहुल अब संगठन के अंदर के इस दोष को दूर करने का जतन कर रहे हैं। पार्टी की विश्वसनीयता बढ़ाने के साथ ही संगठन में अनुशासन कायम करने की दिशा में भी काम हो रहा है। युवाओं को प्रतिनिधित्व देना इसी का एक हिस्सा है। ताकि उनमें रोष की स्थिति पैदा न हो। अक्सर युवाओं को यह शिकायत करते देखा गया है कि काम तो वे करते हैं, पर सत्ता की मलाई क्षत्रप चाटते हैं। अब ऐसी शिकायत को दूर करने की कोशिश की जा रही है। मंत्रिमंडल में जगह से लेकर सांगठनिक फेरबदल की कवायद इसी के दृष्टिगत हो रही है।

उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात में प्रयोग के तौर पर राहुल ने कांग्रेस के युवा संगठनों में व्याप्त खामियों को दूर करने के लिए जो कदम उठाए थे, उसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। इससे सबक लेते हुए अब राहुल ने पूरे देश में युवक कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन के ढांचे में बदलाव के संकेत दिए हैं। इसके तहत साफ सुथरी प्रक्रिया से सांगठनिक चुनाव कराने की तैयारियों को अमलीजामा पहनाया जा रहा है। साथ ही युवक कांग्रेस की संसद बनाने का भी अनूठा प्रयोग करने की तैयारी हो रही है। सूत्र बताते हैं कि राहुल गांधी और उनकी ब्रिगेड के सदस्य देश भर से प्राप्त आंकड़ों को लैपटॉप पर स्टोर कर दिन-रात इसका विश्लेषण कर रहे हैं। वे पार्टी को ब्लॉक स्तर से लेकर संसद तक अपने पैरों पर खड़ा करवाने की रूपरेखा बना रहे हैं। उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों में चिंतन शिविर का आयोजन कर राहुल ने पहले ही इस संबंध में अपना इरादा स्पष्ट कर दिया था। ऐसे शिविरों के माध्यम से युवाओं, महिलाओं, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को पार्टी से जोडऩे की कोशिशें की जा रही हैं। उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और उड़ीसा जैसे प्रदेशों में कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में इसका फायदा भी नजर आया है। अब इन शिविरों का दायरा बढ़ाया जा रहा है। विशेषकर उन इलाकों में, जहां कांग्रेस के परंपरागत वोटरों की बहुतायत है।

झारखंड, उड़ीसा, आंध्र्र प्रदेश में आदिवासी वोटरों की बेरुखी से ही चुनावों में कई सियासी सूरमा धूल चाट चुके हैं। मसलन उड़ीसा में वरिष्ठ आदिवासी नेता गिरिधर गमांग, उनकी पत्नी और बेटे को हार का सामना करना पड़ा, तो आंध्र में रेणुका चौधरी जीत दर्ज कराने में नाकाम रहीं। विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस भले ही सत्ता में पुनर्वापसी करने में कामयाब रही, लेकिन आदिवासी बाहुल्य इलाकों में मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी का करिश्मा नहीं दिखा। झारखंड में भी पिछली बार पार्टी के पास 6 सांसद थे, जबकि इस बार सिर्फ सुबोध कांत सहाय ही संसद का सफर तय करने में कामयाब हुए। इसके पीछे कहीं न कहीं कांग्रेस के परंपरागत आदिवासी वोटरों की उससे बेरुखी मुख्य वजह है। इसे देखते हुए राहुल इस वर्ग को पार्टी की मुख्यधारा से जोडऩे की विशेष पहल कर रहे हैं। युवा व अल्पसंख्यक वोटरों के साथ ही इस वर्ग पर भी खासा ध्यान दिया जा रहा है। राहुल गांधी के दिशानिर्देश पर युवक कांग्रेस के पदाधिकारी इन दिनों अपने-अपने इलाकों में जोर-शोर से पार्टी के सुनहरे दिन वापस लाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं।

पंजाब और उत्तराखंड में युवक कांग्रेस व एनएसयूआई के प्रदेश स्तरीय चुनाव पूर्व चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह की देखरेख में करवाकर राहुल ने एक उल्लेखनीय पहल की थी। अब इस पद्घति से अलग हटकर राहुल ने गुजरात में विधानसभा व लोकसभा क्षेत्र स्तर पर चुनाव शुरू करवाए हैं। संगठनात्मक सुधार की दिशा में इस पहल को बहुत अहम माना जा रहा है। इस चुनाव में पूरी पारदर्शिता के साथ पदाधिकारियों का चयन किया जाता है। आठ सदस्यों की समिति में जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, उसे समिति का अध्यक्ष चुना जाता है। साथ ही आठ प्रतिनिधि भी चुने जाते हैं। ऐसी प्रक्रिया हर राज्य में चलाई जा रही है। चाहे वह पुडुचेरी हो, चाहे तमिलनाडु। इसका मकसद पूरे देश में संगठन स्तर पर संसद तैयार करना है। और ये सारे काम राहुल बिना शोर-शराबे के खामोशी के साथ कर रहे हैं। पार्टी के अग्रिम संगठनों में लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव करवाकर उन्होंने एक बेहतरीन शुरुआत की है। इसका फायदा कुछ हद तक लोकसभा चुनावों में मिला। इसके बाद इसे और विस्तार दिया जा रहा है। राहुल का मानना है कि इसी से संगठन की नींव मजबूत होगी और कांग्रेस अपनी पुरानी स्थिति में लौट पाएगी।

राहुल के करीबियों का कहना है कि उन्होंने कांग्रेस को पुनर्जीवित करने के लिए दो से तीन साल का समय तय कर रखा है। इस दरम्यान वह पूरी मेहनत और रणनीति के साथ कांग्रेस के अग्रिम संगठनों को मजबूत बनाएंगे। ताकि अगले लोकसभा चुनाव में पार्टी अकेले बूते बहुमत प्राप्त कर सके। देखना शेष है कि राहुल की इस कवायद का क्या परिणाम निकल कर आता है। वैसे बहुत हद तक इसकी झलक इस वर्ष उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनावों में दिख जाएगी।

कांग्रेस का कायाकल्प

कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद अब पार्टी का सांगठनिक चेहरा भी बदलने की तैयारी हो रही है। इसके लिए विचार-मंथन का दौर जारी है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने दरबारियों से इस मुत्तलिक लगातार चर्चा कर रही हैं। हालांकि फरमान सोनिया के जरिए ही सुनाया जाना है, लेकिन निर्णय प्रक्रिया में राहुल के सुझावों को खासा सम्मान दिया जा रहा है।
सूत्र बताते हैं कि राहुल गांधी ने पार्टी आलाकमान को अपनी पसंद और अगले लोकसभा चुनाव के लिए की जा रही तैयारियों से भली-भांति अवगत करा दिया है। सोनिया ने भी राहुल की हर सलाह को माना है और उन्हें अपनी योजनाओं को कार्यान्वित करने की खुली छूट दी है। कई वरिष्ठ नेताओं के मनमोहन मंत्रिमंडल का हिस्सा बनने के उपरांत अब संगठन में नए चेहरों को लाने की तैयारी की जा रही है। ये नए चेहरे कौन हों, इस पर भी सोनिया राहुल की पसंद का ख्याल रख रही हैं। संगठन को मजबूत बनाने के लिए राहुल न सिर्फ विस्तृत सदस्यता अभियान शुरू करने पर जोर दे रहे हैं, बल्कि संगठन के चेहरे को भी धारदार बनाने की वकालत कर रहे हैं। साथ ही वह पार्टी में एक व्यक्ति, एक पद के फार्मूले का भी सख्ती से पालन होते देखना चाहते हैं। यही वजह है कि मंत्रिमंडल में शामिल होन से इंकार करते हुए उन्होंने कहा था कि किसी व्यक्ति को एक वक्त में एक ही काम करना चाहिए। इससे ही वह अपने काम से न्याय कर पाता है। माना जा रहा है कि उनकी इस सोच को संगठन के पुनर्गठन में खास तवज्जो दी जाएगी।

पार्टी संगठन में महासचिव मुकुल वासनिक, गुलाम नबी आजाद व पृथ्वीराज चौहान तथा कार्यसमिति सदस्य वी नारायणसामी के मंत्री बनने से संगठन में उनकी जगह काम करने वाले नए लोगों को मौका दिया जाना है। ये सभी संगठन के काम बेहतर ढंग से करते रहे हैं। लिहाजा इनके विकल्प की तलाश भी गंभीरता से हो रही है। प्रणव मुखर्जी, एके एंटोनी, अजय माकन व वीरप्पा मोइली के पास अलग-अलग राज्यों के प्रभार हैं और ये सरकार में मंत्री भी बनाए गए हैं। इन्हें भी राज्यों के प्रभार से मुक्ति मिल सकती है। सीपी जोशी से भी राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष का पद वापस लिया जा सकता है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार इस बार संगठन में ऑस्कर फर्नांडीस, पीजे कूरियन, अशोक तंवर, मनीष तिवारी, मारग्रेट अल्वा, सुरेश कोडीकुन्नील जैसे नए चेेहरे शामिल किए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्यों से भी कांग्रेस संगठन में पदाधिकारी बनाए जा सकते हैं। यह भी तय माना जा रहा है कि सांगठनिक बदलाव में उन राज्यों को अहमियत दी जा सकती है, जहां से अब तक प्रतिनिधित्व का अभाव रहा है। साथ ही विधानसभा चुनाव के लिए तैयार राज्यों का भी ख्याल रखा जाएगा।

माल तुम्हारा, मान हमारा


कांग्रेस ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत केंद्र व राज्य सरकारों की लगभग 450 योजनाओं, कार्यक्रमों संस्थानों आदि के नामकरण नेहरू-गांधी के नाम पर कर डाले हैं। इन योजनाओं में देश की जनता के 4 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा लगे हुए हैं, लेकिन नाम व प्रचार हो रहा है पार्टी व परिवार विशेष का।

आप हिंदुस्तान के किसी कोने में चले जाइए, वहां आपको गांधी-नेहरू परिवार के नाम पर कुछ न कुछ देखने-सुनने को जरूर मिल जाएगा। मसलन जवाहरलाल नेहरू उद्यान, इंदिरा गांधी स्टेडियम, राजीव गांधी मार्ग आदि-आदि। लेकिन, यह तो बानगी भर है। दरअसल, देश भर में पिछले लगभग दो दशकों में लगभग 450 ऐसी सरकारी योजनाओं की घोषणा की गई है, जिनका नामकरण राजीव गांधी, इंदिरा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के नाम पर किया गया है। इनमें केंद्र व राज्य की कांग्रेसी सरकारों द्वारा घोषित विभिन्न परियोजनाओं के अलावा शिक्षण संस्थानों, सड़कों, बंदरगाहों, हवाई अड्डों, पार्कों, खेल प्रतियोगिताओं, अस्पतालों तक के नाम शामिल हैं। इन योजनाओं, कार्यक्रमों, संस्थानों में आम आदमी के टैक्स का करीब 4 लाख करोड़ रुपया लगा हुआ है। इन्हीं पैसों के बूते कांग्रेस सरकार के ये कार्यक्रम देश और आम आदमी के विकास की सुनहरी तस्वीर बनाने में जुटे हुए हैं। हालांकि यह बहस का अलग मुद्दा है कि देश की जनता की गाढ़ी कमाई से चल रही इन योजनाओं से आम आदमी कितना लाभान्वित हुआ है, लेकिन इससे कांग्रेस और गांधी-नेहरू परिवार का बतौर ब्रांड खूब प्रचार-प्रसार हुआ है। हो रहा है। पर चुनावी मौसम में अब यह कांग्रेस के लिए मुसीबत बन सकता है। संभव है कि आम चुनावों की गहमागहमी के बीच मुद्दों के अभाव से जूझ रहा विपक्ष इसे कांग्रेस के खिलाफ एक सशक्त मुद्दा बनाकर उसे कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करे।

दरअसल, संसदीय मामलों के विशेषज्ञ एवं राजनैतिक विचारक ए सूर्यप्रकाश ने हाल ही में चुनाव आयोग में एक जनहित याचिका दायर कर इस मामले पर से परदा उठाने का प्रयास किया है। साथ ही चुनाव आचार संहिता के तहत आयोग से मांग की है कि तत्काल केंद्र व राज्य सरकारों की ऐसी योजनाओं से पार्टी विशेष के नेताओं के नाम हटाने के निर्देश जारी किए जाएं। अपनी इस मांग के पक्ष में सूर्यप्रकाश ने तर्क दिया है कि योजनाओं में आम आदमी से वसूले गए टैक्स का पैसा इस्तेमाल हो रहा है, जबकि इनसे नाम हो रहा है पार्टी व परिवार विशेष का। इसका लाभ कांग्रेस को चुनावों में भी हो रहा है। लिहाजा, सभी योजनाओं, कार्यक्रमों, संस्थानों आदि से राजीव गांधी, इंदिरा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के नाम को हटाकर कुछ ऐसे न्यूट्रल नाम रखे जाएं, जिसका लाभ किसी भी राजनैतिक दल को न हो। बताया जाता है कि इस याचिका पर चुनाव आयोग के पदाधिकारियों को भी पसीने आ रहे हैं। इस मामले में उनसे न निगलते बन रहा है और न उगलते।

सरकारी योजनाओं के माध्यम से राजनैतिक लाभ कमाने की कोशिशें कोई नई बात नहीं है। लगभग हर राजनैतिक दल की तरफ से सत्ता में रहते हुए ऐसे हथकंडे अपनाए जाते हैं। कई बार तो सियासी दलों के बीच इस मुद्दे पर प्रतिशोधात्म कार्रवाई तक की हालत पैदा हुई है। एक दल की सरकार आई, तो उसने अपने नेता के नाम पर नामकरण कर दिया। जब वह सत्ता से उतरी और दूसरा दल सत्ता में आया, तो उसने पूर्ववर्ती सरकार के फैसले को पलट डाला। फिर सारी योजनाओं और संस्थानों के नामकरण अपनी पसंद के अनुसार किए गए। उत्तर प्रदेश में मायावती और मुलायम सिंह यादव के बीच ऐसे खेल देखे जा चुके हैं। लेकिन, इतनी बड़ी संख्या में योजनाओं का नामकरण किसी एक परिवार के सदस्यों के नाम पर होने का ताजा खुलासा अचंभित करने वाला है। कांग्रेस ने बड़े ही योजनाबद्घ तरीके से पिछले कुछ सालों में तमाम सरकारी योजनाओं-कार्यक्रमों को गांधी-नेहरू परिवार के तीन सदस्यों के नाम कर डाला। हालांकि इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि उक्त तीनों हस्तियों का भारत में विकास को दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है, लेकिन खेल प्रतियोगिताओं, शिक्षण संस्थानों, छात्रवृत्तियों, शोध संस्थानों, पीठों आदि के नामकरण में भी उनके नाम का इस्तेमाल आश्चर्यचकित करता है। भारत जैसे देश में विभूतियों की कभी कमी नहीं रही है। खेल से जुड़े संस्थानों व प्रतियोगिताओं का नामकरण अगर इस क्षेत्र की महान शख्सियतों के नाम पर होता, तो शायद वह ज्यादा न्यायोचित होता। ऐसे ही तर्क अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों, वैज्ञानिक शोध संस्थानों आदि पर भी कायम होते हैं। यह वाकई अचंभित करने वाला है कि कांग्रेस सरकारों ने अपनी महत्वपूर्ण योजनाओं, कार्यक्रमों के नामकरण में सिर्फ तीन नामों को ही तवज्जो दी है। और वे नाम हैं- जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी व राजीव गांधी। अन्य विभूतियों की बात छोड़ भी दें, तो खुद कांग्रेस के अंदर भी कई ऐसे महान चेहरे रहे हैं, जिनके नाम पर विचार किया जा सकता था। लेकिन, शायद कांग्रेस के हुक्मरानों का इन तीन नामों के अलावा किसी के नाम याद नहीं रहे हैं। इक्का-दुक्का योजनाएं गोपाल कृष्ण गोखले, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरोजनी नायडू जैसे दूसरे बड़े नेताओं के नाम पर घोषित हुईं, पर ज्यादातर जगहों पर गांधी-नेहरू परिवार के सदस्यों के ही नाम की पट्टिका लगी नजर आती है।

इस वक्त नेहरू-गांधी के नाम पर 12 परियोजनाएं और राज्य सरकारों के 52 कार्यक्रम चल रहे हैं। इसके अलावा 98 विश्वविद्यालयों व अन्य शिक्षण संस्थानों, 6 हवाई अड्डों व बंदरगाहों, 66 छात्रवृत्तियां व फैलोशिप, 47 खेल प्रतियोगिताएं, पदक व स्टेडियम, 15 राष्ट्रीय पार्क एवं अभयारण्य, 39 अस्पताल व चिकित्सा महाविद्यालय, 37 राष्ट्रीय विज्ञान एवं शोध संस्थान, पीठ व महोत्सव तथा 74 सड़कें, भवन व जगहों का नामकरण नेहरू-इंदिरा-राजीव के नाम पर किया गया है। पेयजल, आवास, रोजगार गारंटी योजना, वृद्घा पेंशन सहित लगभग सभी योजनाएं तीन व्यक्ति जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी व राजीव गांधी के नाम पर ही चल रही हैं। इस पर सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं, जो देश की आम जनता से टैक्स के रूप में वसूली गई हैं। गौरतलब है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना में राजीव गांधी विद्युतिकरण कार्यक्रम पर 28 हजार करोड़ रुपए व राजीव गांधी पेयजल मिशन पर 21 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया था। इसके अतिरिक्त उद्यमी मित्र योजना, श्रमिक कल्याण योजना एवं शिल्पी स्वास्थ्य बीमा योजना राजीव गांधी के नाम पर चल रही है। इंदिरा गांधी और जवाहर लाल नेहरू के नाम पर पहले से ही बड़ी-बड़ी योजनाओं के अलावा बड़े सरकारी और शिक्षण संस्थान चल रहे हैं। इंदिरा आवास योजना के लिए वित्तीय वर्ष 2008-09 में 7919 करोड़ और 2009-10 में 7914।70 करोड़ रुपए जारी किए गए। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्घ पेंशन योजना के लिए 2008-09 में 3443 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं।

यहां यह बात उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी के मूल्यों पर चलने का दावा करने वाली कांग्रेस ने उनके नाम पर सिर्फ एक योजना- पिछड़ा क्षेत्र विकास फंड रखा है। विपक्षी नेता इसे कांग्रेस द्वारा पार्टी व अपने नेताओं की छवि चमकाने के उद्देश्य से की गई कार्रवाई के तौर पर देखते हैं। इस दिशा में पार्टी द्वारा प्रयास अक्सर होते रहते हैं। देश के सबसे नामी मैनेजमेंट संस्थानों में से एक शिलांग के आईआईएम का नाम भी बदलकर पिछले दिनों राजीव गांधी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट कर दिया गया है। इस पर भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी कहते हैं, 'कांग्रेस में परिवारवाद की तो परंपरा ही रही है। उसे नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों के अलावा हिंदुस्तान में किसी की महानता नजर नहीं आती। राजग की जब केंद्र में सरकार थी, तो उसने व्यक्तियों के नाम पर नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के नाम पर योजनाएं शुरू कीं। वर्तमान में भी मध्य प्रदेश में वहां की भाजपा सरकार ने अपनी योजना का नाम मुख्यमंत्री योजना रखा न कि शिवराज योजना। कांग्रेस देश की जनता को लंबे समय से मूर्ख बनाने का प्रयास करती रही है और उसकी यह कोशिश आज भी जारी है।'
गांधी-नेहरू परिवार के प्रति कांग्रेसी सरकारों का प्रेम राज्यों में भी देखा जाता रहा है। जब-जब किसी राज्य में कांग्रेस सत्ता में आई है, उसने जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा व राजीव गांधी के नाम पर ही योजनाओं का पिटारा खोला। इस मकसद से कि इन योजनाओं का जब भी नाम लिया जाए, गांधी-नेहरू परिवार परिदृश्य में रहे। शायद यही वजह है कि इस परिवार की प्रासंगिकता आज भी भारतीय राजनीति और सामाजिक पटल पर कायम है। या कहें कायम रखी गई है। दूसरी महान विभूतियों को भुला कर। स्पष्ट है कि इसके पीछे कांग्रेस ब्रांड को भारतीय मतदाताओं के समझ हमेशा जिंदा रखने का प्रयास ही अहम वजह है।

सोमवार, 22 जून 2009

भाजपा का गृहयुद्घ


भगवा खेमे में मची है भारी उथल-पुथल। हालात बेहद गंभीर। पार्टी कई मोर्चों में बंट चुकी है। सबका मकसद एक, संगठन पर अपना दबदबा कायम करना। और इसके लिए रची जा रही है रणनीतियां। किस धड़े में क्या चल रहा है, हकीकत को बेपर्दा करती रिपोर्ट।
लोकसभा चुनावों में हार के बाद भाजपा में हाहाकार मचा हुआ है। हर कोई एक-दूसरे के सिर हार का ठीकरा फोड़ने की कोशिश कर रहा है। और आरोपों-प्रत्यारोपों की तलवार भी ऐसे भांजी जा रही है, मानो दुश्मनों पर वार किया जा रहा हो। अपने-पराये की सारी हदें तोड़ कर। लिहाजा, सबसे अलग सियासी पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा के भविष्य को लेकर भी तरह-तरह के सवाल उठने लगे हैं। पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से पहले जिस तरह इसके नेताओं के बीच तीखी नोंकझोंक हुई, उसने अनुशासित पार्टी होने के उसके भ्रम को भी दूर कर दिया। विनय कटियार वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह से भिड़े, तो मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज ने अध्यक्ष राजनाथ पर ही हमला बोल दिया। चुनाव में हार की समीक्षा के लिए बुलाई गई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भी जमकर हंगामा बरपा। गरमागरम बहस की आड़ में पार्टी की गुटबाजी भी खुलकर सतह पर आ गई। वैसे अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह, प्यारे लाल खंडेलवाल जैसे नेताओं ने पहले ही हार को लेकर जवाबदेही तय करने की मांग कर संकेत दे दिया था कि कार्यकारिणी की बैठक में बवाल मचना तय है। अब यह बवंडर कहां जाकर थमेगा, कोई भी दावे के साथ कुछ कहने की हालत में नहीं।
दरअसल, भाजपा के भीतर मचा घमासान संगठन में पद-प्रतिष्ठा की लड़ाई का परिणाम है। हर नेता आडवाणी के बाद पार्टी में अपनी शहंशाही चाहता है। इसके लिए बाकायदा रणनीतियों के तहत संगठन में अपनी स्थिति मजबूत बनाने की कोशिशें की जा रही हैं। बताया जाता है कि अध्यक्ष पद से रिटायर होने की स्थिति में राजनाथ सिंह की नजर आडवाणी के स्थान पर है। लेकिन, साथ ही वह इस कोशिश में भी हैं कि अध्यक्ष पद पर उनका कार्यकाल किसी तरह बढ़ जाए। हालांकि ऐसी संभावना अब कम ही दिख रही है। सो, पहले विकल्प को लेकर भी वह भीतरखाने अपनी तिकड़म भिड़ाने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी में ठाकुर लॉबी को बढ़ावा देने के आरोप उनपर इसी के दृष्टिगत मढ़े जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ आडवाणी अब भी पार्टी पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहते हैं। यही वजह है कि लाख दबाव के बावजूद वह लोकसभा में विपक्ष का नेता बनने का मोह नहीं छोड़ पाए। आगे पीएम इन वेटिंग बने रहने की चाहत भी उनकी बरकरार है। ऐसे में संघ ने दबाव बनाया, तो अरुण जेतली को राज्यसभा में विपक्ष का नेता और लोकसभा में सुषमा स्वराज को उपनेता घोषित करवाकर एक सधी चाल चल दी। इस मकसद से कि अपनी टीम के नेताओं के माध्यम से संगठन पर आगे भी अपना अघोषित कब्जा जमाए रखें।
वैसे उनके ऊपर बढ़ रहे हमलों के मद्देनजर संभावनाएं जताई जाती हैं कि वर्षांत आडवाणी विपक्ष के नेता का पद छोड़ देंगे। इसी के दृष्टिगत दूसरी पंक्ति के नेता पहले ही यह इंतजाम कर लेना चाहते हैं कि आडवाणी का स्थान लेने वाला मनोनीत नेता न होकर चुना हुआ नेता हो। चूंकि इस बार पार्टी के सभी दिग्गज लोकसभा पहुंच गए हैं, इसलिए नंबर दो की लड़ाई में और तीखापन आ गया है। जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और मुरली मनोहर जोशी जैसे लोगों को यह दर्द साल रहा है कि पार्टी की बुरी हार के बावजूद आडवाणी विपक्ष के नेता पद पर कैसे बैठे हैं। वे हार की जिम्मेदारी तय करने की बात कर रहे हैं, जबकि आडवाणी गुट हार के लिए सामूहिक दायित्व के सिद्घांत पर जोर दे रहा है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में आडवाणी विरोधी ऐसे ही नेताओं की मांग पर हार के लिए समीक्षा समिति बनाने का एलान किया गया। इस घोषणा के पीछे भी गुटों की अपनी-अपनी राजनीति है। कोशिश की जा रही है कि किसी न किसी स्तर पर हार का ठीकरा कहीं फोड़ा जाए। लेकिन, लड़ते हुए नेताओं की वजह से पार्टी जरूर थरथराने लगी है। एकता तार-तार हो रही है और अनुशासन बेपर्दा। इससे आडवाणी की छवि पर भी असर पड़ रहा है।
दबी जुबान में पार्टी के ही कुछ नेता यह कहते पाए जाते हैं कि आडवाणी और वाजपेयी की बराबरी कभी नहीं हो सकती। वाजपेयी ने वक्त रहते बड़ी शालीनता से सियासत को अलविदा कह दिया, लेकिन आडवाणी पार्टी की दुर्गति के बावजूद कुर्सी का मोह पाले बैठे हैं। उन्हें लग रहा है कि अभी भी प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं जिंदा है, जो कभी पूरी नहीं हो सकतीं। कम से कम उन्हें पीएम प्रोजेक्ट कर तो कतई नहीं। संघ भी इस बात को समझकर नए सिरे से रणनीतियां बनाने में लगा है, लेकिन आडवाणी ब्रिगेड के लोग यहां भी सवाल उठा रहे हैं। सुधींद्र कुलकर्णी, स्वप्न दास, अरुण जेतली जैसे लोग भाजपा और संघ के रिश्तों पर पुनर्विचार की जरूरत जता रहे हैं। इस मकसद से कि संघ के प्रभुत्व को चुनौती देकर पार्टी पर अपना नियंत्रण कायम कर सकें। इसे खतरे बतौर देखकर ही आडवाणी विरोधी खेमे के लोग लगातार लौहपुरुष पर हमले बोल रहे हैं। उनका मकसद है हार के लिए आडवाणी को जिम्मेदार साबित करना। ताकि संगठन में उन्हें तवज्जो मिल सके और उनका दबदबा कायम हो। हिंदुत्व को लेकर चल रही बहस इसी रणनीति का हिस्सा है। जहां आडवाणी समर्थक हिंदुत्व से दूरी के पक्ष में हैं, वहीं विरोधी संघ के बगैर भाजपा के अस्तित्व पर ही सवाल उठा रहे हैं। उनका मानना है कि भाजपा आरएसएस के बगैर रह ही नहीं सकती। इसके पीछे ठोस तर्क भी दिए जा रहे हैं कि ऐसी कोशिशें पहले भी हुईं, पर नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। 50 के दशक में जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष मौलीचंद शर्मा और फिर बलराज मधोक ने संघ से दूरी की बात की थी, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया।
खुद राजनाथ सिंह ने यह कहकर कि संघ से रिश्ता खत्म करने का सवाल ही पैदा नहीं होता, आडवाणी खेमे पर निशाना साधने का ही काम किया है। कहने का मतलब कि भाजपा के भविष्य के नेता को लेकर पूरी पार्टी बंट गई है। अलग-अलग खेमों से अपने हित के अनुरूप कवायदें हो रही हैं। और इससे संगठन की चूलें हिल रही हैं। बाहर से भले ही हार को सामान्य ढंग से लेने का दिखावा किया जा रहा हो, लेकिन अंदर का गरम लावा बार-बार फूट रहा है। संघ इससे चिंतित है और वह अपने तरीके से इससे निपटने की कोशिश कर रहा है। पर लगता नहीं कि इस घमासान पर आसानी से नियंत्रण पाया जा सकेगा। भाजपा के नेताओं के बीच अहं, संदेह और स्वार्थ की ऊंची दीवार खड़ी हो चुकी है। कोई किसी को नेता मानने को तैयार नहीं। हर कोई कमांडर की बोली बोल रहा है। चाहे वह आडवाणी, राजनाथ हों या फिर अरुण जेतली, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू, जसवंत सिंह, मुरली मनोहर जोशी, नरेंद्र मोदी, हर कोई भाजपा का चेहरा बने रहना या बनना चाहता है। हां, अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कोई लॉबी का सहारा लेना चाहता है, तो कोई अकेले ही समर में कूद पड़ा है। इस लड़ाई से कार्यकर्ताओं का पार्टी से मोहभंग होने लगा है।
दिल्ली में भाजपा में मची इस मारकाट से अन्य प्रदेशों में भी संगठन की बुनियाद हिलने लगी है। वहां भी गुटबाजी और असंतोष खुल कर सतह पर आ गए हैं। उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन की मांग फिर से जोर पकड़ रही है, तो कर्नाटक में मुख्यमंत्री येदुरप्पा के लिए मुश्किलें मुंह बा रही है। राजस्थान में वसुंधरा राजे के खिलाफ भी हमले बढ़ गए हैं। अन्य प्रदेशों से भी ऐसी ही खबरें आ रही हैं। अरुण जेतली को राज्यसभा में पार्टी का नेता बनाए जाने पर तो जैसे चारों तरफ से हमले हो रहे हैं। इन हमलों के पीछे आडवाणी को ही निशाना बनाया जा रहा है। और इन हमलों के निहितार्थ सभी समझ भी रहे हैं। तभी राजनाथ को हार की जिम्मेवारी लेने के लिए खुद आगे आना पड़ा। दुनिया को यह दिखाने के लिए कि वह पार्टी के शुभचिंतक हैं और संगठन की बेहतरी के लिए हर बलिदान को तैयार हैं। लेकिन बलिदान के बदले वह पद मोह नहीं छोड़ रहे। इसपर उनकी पार्टी के ही नेता चुटकी लेते कहते हैं, 'अगर अध्यक्ष के नाते वह हार की जिम्मेवारी ले रहे हैं, तो उन्हें पद भी छोड़ देना चाहिए। दरअसल, राजनाथ तो खुद ही पार्टी में मचे घमासान के लिए जिम्मेवार हैं। वह पार्टी में सबकुछ अपने मन-मुताबिक चलाना चाहते हैं। इस बात की परवाह उन्हें नहीं कि इससे संगठन का आंतरिक लोकतंत्र तार-तार हो रहा है। उनकी नजर आडवाणी की जगह पर है। जबकि वह इसके काबिल नहीं।'
राजनाथ पर ऐसे आरोप मढ़ने वाले पार्टी में कई लोग हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आडवाणी के सारे प्रशंसक हों। उनपर हमले बोलने वाले भी कई हैं। उनका सीधा-सीधा कहना है कि आडवाणी पदलोलुप व्यक्ति हैं। वाजपेयी जी के समय में भी वह पीठ पीछे उनके लिए मुश्किलें खड़ी करने की साजिश रचते रहते थे। उन्हें बर्दाश्त नहीं होता था कि वाजपेयी प्रधानमंत्री बनने में सफल हो गए। हार के बावजूद वह अब भी पीएम बनने का सपना पाले हुए हैं। रथ यात्रा निकालने का फैसला तो उन्होंने कर लिया है, पर अब इससे सत्ता तक पहुंचने में वह कामयाब नहीं हो सकते। कहने का तात्पर्य कि भाजपा में आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर जोरशोर से चल रहा है और चलाया जा रहा है। हार की व्यापक समीक्षा भले ही बाद में हो, पर हार का ठीकरा अभी से ही एक-दूसरे के सिर फोड़ने की कोशिश हो रही है। और इसके लिए सभी सीमाएं लांघ दी गई हैं। कहें तो एक तरह से गृहयुद्घ की स्थिति है भाजपा में। पद के लिए छिड़ी इस लड़ाई में हर पैंतरे खेले जा रहे हैं। विरोधी लॉबी के खिलाफ मीडिया में खबरें छपवाने से लेकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने तक। इस घमासान में भाजपा के 'पार्टी विथ डिफरेंस' के दावे की पोल परत दर परत खुलती जा रही है। और साथ ही उसकी सियासी राह भी कंटीली होती जा रही है। देखना शेष है आगे यह गृहयुद्घ और कैसी-कैसी शक्लें अख्तियार करता है। फिलहाल हार पर हाहाकार है।