सोमवार, 20 जुलाई 2009

‘नवाबी शौक’ के पीछे

मुगल बादशाह बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में समलैंगिक रिश्तों का जिक्र करते हुए ऐसा करने वालों को आडे हाथों लिया था। और कहा था कि कई बडे-बडे लोगों ने अपने घरों में बीस-बीस लौंडों को रख रखा है, जिससे वे अपनी जिस्मानी भूख मिटाते हैं। ऐसे रिश्ते अप्राकृतिक-अनैतिक तो हैं ही, समाज को गलत रास्ते पर भी उतारते हैं। पर, तब ऐसे संबंध रखने वाले गिनती के चंद लोग थे। और उस वक्त शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक समय ऐसा भी आएगा कि बडी तादाद में ऐसे रिश्तों के हिमायती सडकों पर आकर इसे वैधता दिलाने की लडाई लडेंगे। लेकिन, आज ऐसा हो रहा है। दुनिया भर में समलैंगिक रिश्तों को कानूनी और सामाजिक मान्यता दिलाने के लिए आंदोलन चलाए जा रहे हैं। बडे पैमाने पर। और इसी का नतीजा है कि अब तक दुनिया के १२७ मुल्कों में ऐसे रिश्तों को मान्यता मिल चुकी है। भारत भी अब उनमें से एक है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल के अपने फैसले में समलैंगिक रिश्तों को वैध ठहराने के पीछे जो तर्क दिया है, उसके अनुसार समलैंगिकता कोई बीमारी नहीं, बल्कि मनुष्य की ‘काम’ इच्छा की एक अन्य अभिव्यक्ति भर है। लिहाजा, इसे कोई अपराध नहीं माना जा सकता। कुछ इन्हीं तर्कों के साथ विश्व के अन्य देशों की सरकारों ने भी इस रिश्ते को मान्यता दी है। हालांकि, यह अलग बात है कि आज भी अधिकांश लोगों के लिए यह एक पाप है, जिसे मान्यता देना समाज के मुंह पर कलंक थोपने के समान है। लेकिन, समाज में इसका समर्थन करने वाले भी अब खुलकर सामने आते दिख रहे हैं। कई बडी-बडी हस्तियों, मसलन महेश भट्ट, जॉन अब्राहम, सेलिना जेटली ने तो बाकायदा इसे लोकतंत्र में व्यक्ति को मिलने वाले स्वतंत्रता के अधिकार के साथ जोडकर देखा है। वैधता मिलने पर हर्ष भी जताया है।
दरअसल, समलैंगिकता को कानूनी मान्यता देने की प्रक्रिया १९८९ में डेनमार्क से शुरू हुई थी। वह पहला देश था, जिसने समलैंगिक जोडों को विवाहित दंपति के बराबर का दर्जा दिया था। इसके बाद अन्य देशों में ऐसे संबंध रखने वाले और इसका समर्थन करने वाले तो जैसे खुलकर सामने आ गए। १९६० के दशक के अंत में अमरीका के स्टोनवाल पब से शुरू हुए दंगों से जन्मा ‘गर्व से कहो कि हम गे हैं’ का नारा पश्चिमी समाज में एक मानवाधिकार आंदोलन में तब्दील हो गया। तभी, चंद वर्षों में नार्वे, स्वीडन, आइसलैंड, फिनलैंड, नीदरलैंड, कई अमरीकी राज्यों, दक्षिण अफीक्रा, नेपाल जैसे १२० से ज्यादा देशों में इसे वैधानिकता का आवरण मिल गया। लडाई अब भी जारी है। कहीं कानूनी मान्यता के लिए, तो कहीं सामाजिक मान्यता के लिए। कहने वाले लाख कहते रहें कि ऐसी सोच रखने वाले उंगलियों पर गिनती के लोग हैं और समाज को गलत दिशा दे रहे हैं, लेकिन यह सोच लगातार अपना दायरा बढा रही है। देश-दुनिया सब जगह।
पहले यह परदे के पीछे था, आज खुलेआम। इसके पीछे कई लोग पश्चिमी देशों के एक खास वर्ग द्वारा चलाई जा रहीी साजिश तक करार देते हैं। उनका कहना है कि एड्स नियंत्रण के नाम पर बंटने वाले माल और ब्लू फिल्मों के अलग-अलग रूप के माध्यम से धन बटोरने वाले इसे अपने लिए संभावना बतौर देख रहे हैं। यही वजह है कि वे इसे विश्वव्यापी बनाने पर तुले हैं। जबकि ऐसे संबंध रखने वाले लोगों की तादाद न के बराबर है। वहीं ऐसे तर्कों को समलैंगिकता के पैरोकार यह कहकर ठुकराते हैं कि क्या इतिहास में दर्ज नवाबों, सुकरात, टेनिस खिलाडी मार्टिना नवरातिलोवा, हिटलर जैसे अनेकानेक लोग इसी दृष्टिगत ऐसे संबंध बनाते रहे। क्या आज लाखों-लाख आम समलैंगिक लोग वैधता मिलने पर इसीलिए जश्न मना रहे हैं? नहीं, ये उनकी खुशी का इजहार है। लंबे समय से उन्हें दोयम दर्जे का क्यों माना जाता रहा है। उनके कृत्य को अपराध की संज्ञा क्यो दी जाती रही है। इससे मुक्ति पर हर्ष तो स्वाभाविक है।
याद आता है कि कभी भारत में भी लोग ऐसे व्यक्तियों के लिए उपहासस्वरूप आंख मारकर कहते थे, ‘इनके शौक जरा अलग हैं’, ‘इन्हें नवाबी शौक है’ या फिर ‘पटरी से उतरी गाडी’ और ‘राह से भटका मुसाफिर’। इन जुमलों में तंज तो था, पर कहीं न कहीं तिरस्कार की जगह एक तरह की स्वीकार्यता भी। यह कि ऐसे भी होते हैं। समलिंगी यही समझाना चाहते हैं, हां ऐसे होते हैं। होते रहे हैं। स्वाभाविक और सामान्य लोगों की तरह। उनके शारीरिक संबंध का दायरा जरूर थेडा अलग है। लेकिन वे अपराधी नहीं। समाज ने उन्हें मान्यता नहीं दी थी। पर अब उसके लिए भी लडाई लडी जा रही है। आखिर अगर लोग अद्र्घनारीश्वर की पूजा करते हैं, किन्नरों का आशिर्वाद लेते हैं, तो फिर समलैंगिकों को मान्यता देने से गुरेज क्यों? यह धारा सडकों पर उतर चुकी है। अपनी राह बनाने के लिए। और वह बन भी रही है। हम-आप लाख हाय तौबा मचाएं।

बदलो बिहार


लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस अब बिहार में अपनी खोई जमीन को वापस पाने में जुट गई है। राहुल गांधी ने इसके लिए बाकायदा एक रणनीति बनाई है। आखिर क्या है वह रणनीति? और क्या इसके बूते पार्टी प्रदेश में अपनी वापसी में कामयाब हो सकती है? एक आकलन।

पटना के कुर्जी रोड स्थित बिहार प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में कभी सन्नाटा पसरा हुआ करता था। लेकिन, इन दिनों यहां खूब चहल-पहल नजर आती है। लोकसभा चुनावों के बाद संगठन में जो नई ऊर्जा का संचार हुआ है, वह यहां आने वाले नेताओं, कार्यकर्ताओं के चेहरे पर और उनके हाव-भाव से स्पष्ट झलकता है। भले ही चुनावों में कांग्रेस ने महज दो ही सीटें जीती हों, पर पार्टी के लोगों को लगता है कि उन्होंने एक लंबी और महत्वपूर्ण लडाई जीत ली है। और वह है वर्षों से लालू प्रसाद यादव की बंधक बनी कांग्रेस को उस कैद से मुक्ति दिलाने की लडाई। उन्हें लग रहा है कि इसके बाद अब पार्टी के लिए आगे की राह बहुत मुश्किल नहीं होगी। यही वजह है कि अब दोगुने जोश के साथ पार्टी बिहार में अपनी खोई हुई जमीन को दोबारा हासिल करने में जुट गई है।
इस दिशा में पार्टी के महासचिव राहुल गांधी गंभीरता से रणनीतियां बनाने में लगे हैं। उनकी नजर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों पर है। वह चाहते हैं कि चुनावों से पूर्व संगठन को इतना मजबूत कर दिया जाए कि अकेले बूते कांग्रेस दूसरी पार्टियों को चुनौती दे सके। यही वजह है कि लालू की राजनैतिक बेडियों से पार्टी को आजाद कराने के बाद वह संगठन को मजबूत बनाने का खाका बनाने में लगे हैं। इसके तहत पूरी पारदर्शिता के साथ युवा कांग्रेस का सांगठनिक चुनाव कराना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। बाकायदा इसके लिए जल्द ही सदस्यता अभियान भी शुरू किया जा रहा है। हालांकि यह अभियान अन्य प्रदेशों में भी चलाए जा रहे हैं, लेकिन बिहार पर राहुल की खास नजर है। दरअसल, राहुल प्रदेश में अपने लिए ऐसे युवा नेताओं की टीम चाहते हैं, जो किसी लॉबी में न रहते हुए निष्ठा से संगठन के प्रति काम करें। हवा-हवाई नेताओं की जगह वह उन लोगों को तरजीह देना चाहते हैं, जिनमें वाकई क्षमता हो। ऐसे युवाओं की तलाश में जुटे राहुल की संभावित टीम में विनोद शर्मा, सरदार गुरूजीत सिंह, कुमार आशीष, मनोज शर्मा जैसे युवा कांग्रेसियों का नाम लिया जा रहा है। समीर सिंह को भी आने वाले दिनों में खास तवज्जो मिलनी तय है।
विनोद शर्मा लंबे अरसे से कांग्रेस से जुडे रहे हैं। सीताराम केसरी के कार्यकाल के दौरान वह पार्टी की टिकट पर विधानसभा चुनाव भी लड चुके हैं। लोकसभा चुनावों के दौरान उन्होंने महाराजगंज में मीडिया का कार्यभार भली-भांति अंजाम दिया। साथ ही पटना साहिब में कांग्रेस उम्मीदवार शेखर सुमन के साथ भी सक्रियता के साथ चुनाव मैदान में काम करते रहे। अब चुनावों के बाद वह पटना में नीतीश सरकार की नाकामियों से जनता को रूबरू करा रहे हैं। कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष समीर सिंह के साथ कदम से कदम मिलाते हुए वह पार्टी का जनाधार बढाने की कोशिशों में लगे हैं। बताया जाता है कि उनकी इच्छा पालीगंज से विधानसभा का चुनाव लडने की है। सरदार गुरूजीत सिंह भी मोकामा से विधानसभा का चुनाव लड चुके हैं और सक्रिय युवा नेता के तौर पर जाने जाते हैं। मनोज शर्मा युवा कांग्रेस के महासचिव बतौर एक ऊर्जावान और कर्तव्यनिष्ठ यूथ लीडर की पहचान रखते हैं। इन युवा कांग्रेसियों को आने वाले दिनों में राहुल की तरफ से तरजीह दी जा सकती है। गौरतलब है कि कांग्रेस के युवराज ने सन २०१० तक देश के सभी राज्यों में युवा कांग्रेस के चुनाव कराने का लक्ष्य निर्धारित कर रखा है। इसका मकसद क्षमतावान युवा नेताओं को मुख्यधारा में लाना है, ताकि संगठन की मजबूती बढ सके।
युवा कांग्रेस के सांगठनिक चुनाव के साथ ही कांग्रेस महासचिव ने अपने विस्तृत बिहार दौरे का कार्यक्रम भी तय किया है। बाढ प्रभावित कोशी प्रक्षेत्र के उनके दौरे के बाद पार्टी को इस इलाके में उल्लेखनीय सफलता मिली थी। कहा जाने लगा कि कांग्रेस यहां अपने पुराने सुनहरे दिन की ओर लौटने लगी है। इसने अन्य पार्टियों की चिंताएं बढा दी हैं। तभी नीतीश इन दिनों यहां कांग्रेस को जमने से रोकने के लिए अपना विशेष ध्यान लगा रहे हैं। इस इलाके के लिए घोषणाएं और उनके दौरे को इसी से जोडकर देखा जा रहा है। कोशी प्रक्षेत्र के अलावे लोकसभा चुनावों के दौरान राहुल अन्य क्षेत्रों का दौरा नहीं कर पाए थे। अब संसद के बजट सत्र के बाद वह बिहार की यात्रा पर फिर से निकलने वाले हैं। अपने प्रदेश दौरे में वह युवाओं, दलितों और मुसलमानों को पार्टी से जोडने की विशेष पहल करते नजर आएंगे। हालांकि हालिया लोकसभा चुनावों में मुसलमान वोटरों का पार्टी की तरफ रुझान देखने को मिला है, लेकिन कांग्रेस अपने इस परंपरागत वोटबैंक को पूरी तरह अपने पाले में लाने की योजना बना रही है। फिलहाल लालू की पार्टी राजद से छिटके मुस्लिम मतदाता कांग्रेस और कुछ हद तक नीतीश की पार्टी जद (यू) के पक्ष में नजर आ रहे हैं। शायद इसी के मद्देनजर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शर्मा दिवंगत राजीव गांधी के जन्मदिन पर २१ अगस्त से दलितों और मुसलमानों की बस्तियों की पदयात्रा की अपनी योजना का शुभारंभ करने वाले हैं। इस कार्यक्रम की शुरुआत राहुल गांधी ही करेंगे। अनिल शर्मा ने राहुल गांधी के साथ गांव-गांव भ्रमण का भी कार्यक्रम रखा है। प्रदेश के युवा वोटरों को कांग्रेस से जोडने के लिए राहुल सम्मेलनों और विश्वविद्यालयों के दौरे के माध्यम से उनसे संवाद स्थापित करेंगे। कहने का तात्पर्य कि कांग्रेस बपने इस पुराने गढ में दोबारा अपनी पहचान वापस पाने के लिए पूरी तरह बेचैन दिख रही है। राहुल और प्रदेश के नेताओं के साथ-साथ आलाकमान भी इस दिशा में माथापच्ची में उलझा है कि किस तरह कांग्रेस को बिहार में एक मजबूत दल के रूप में खडा किया जाए।
सूत्र बताते हैं कि दिल्ली में भी पार्टी के बडे नेता बिहार में कांग्रेस के लिए उम्मीद देख रहे हैं। यही वजह है कि नई परिस्थितियों में राज्य के सामाजिक और राजनैतिक समीकरण के मद्देनजर वे भी नए सिरे से पार्टी को खडा करने की कवायद में जुट गए हैं। इसके लिए लोकसभा में पार्टी के प्रदर्शन की समीक्षा की जा रही है। देखा जा रहा है कि कहां और क्या पार्टी के लिए फायदेमंद रहा और क्या नुकसानदेह साबित हुआ। केंद्रीय स्तर पर इस हलचल को देखते हुए ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शर्मा व प्रभारी इकबाल सिंह की मुखालफत करने वाले नेता भी सक्रिय हो गए हैं। वे संगठन में बदलाव की जरूरत जता रहे हैं। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष व प्रभारी ने बाहर से आए दल-बदलुओं को टिकट की सिफारिश कर पार्टी का बंटाधार करवाया वर्ना लोकसभा चुनावों में पार्टी कई सीटें जीत सकती थी। गौरतलब है कि इस बार ३७ में से २२ सीटों पर कांग्रेस ने बाहर से आए लोगों को अपना उम्मीदवार बनाया था। जहां तक चुनावों में उसके प्रदर्शन की बात है, तो कुल ३७ सीटों में से सिर्फ २ पर कांग्रेस की जीत हुई और दो पर ही वह दूसरे नंबर पर रही। ३० जगहों पर उसके उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए। एक दर्जन सीटों पर तो कांग्रेस के प्रत्याशियों को २५ हजार से भी कम वोट मिले। इन आंकडों का हवाला देते हुए आलाकमान से संगठन का चेहरा बदलने की मांग की जा रही है। कहा जा रहा है कि अगर कांग्रेस को बचाना है, तो किसी युवा दमदार चेहरे को पार्टी अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए। इसके लिए जिन नामों का सुर्रा छोडा जा रहा है, उनमें अधिकांश अनिल शर्मा के विरोधी के रूप में जाने जाते हैं। मसलन सदानंद सिंह, राम जतन सिन्हा, महाचंद्र सिंह, डॉ अशोक कुमार, विजय शंकर दूबे। विदित हो कि अनिल शर्मा के अध्यक्ष बनने के वक्त इनमें से कई नेता इस पद की दौड में शामिल थे। जब उनकी दाल नहीं गली, तो उन्होंने अनिल शर्मा के खिलाफ एक तरह से मोर्चा खोल दिया। मोर्चेबाजी अब भी जारी है।
हालांकि इससे बेफिक्र अनिल शर्मा लगातार संगठन में अपना कद बढाने में लगे हैं। लालू के साथ मिलकर चुनाव न लडने की वकालत वह पहले से ही करते रहे हैं। राहुल भी ऐसा ही चाहते थे, इसलिए उनकी बात मानी भी गई। यह अलग बात है कि चुनावी नतीजों में इस फैसले का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं आया। लेकिन, लालू की जद से बाहर आकर कांग्रेस में एक उम्मीद जरूर जगी। लोगों के भी इस पार्टी के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव देखा गया। यह बदलाव कांग्रेस के लिए उत्साहजनक है। लेकिन जिस तरह पार्टी में खेमेबाजी चल रही है, उससे उसकी भविष्य की उम्मीदों को पलीता भी लग सकता है। इसी कारण अब जब नए हालात में उसके पुराने वोटबैंक वापस लौटते दिख रहे हैं, तो पार्टी हर कदम फूंक-फूंक कर रखना चाह रही है। शायद यही कारण है कि अनिल शर्मा के खिलाफ विरोधियों की चाल अभी तक कामयाब नहीं हो पाई है। हां, पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व बिहार में जुझारू और युवा नेताओं को भी आगे लाने के पक्ष में जरूर है। शायद इसी को देखते हुए शकील अहमद को बिहार कांग्रेस का नेतृत्व सौंपने की बातें भी उठ रही हैं।
जहां तक शकील अहमद का सवाल है, तो उनके लोकसभा चुनाव में हारने व केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह न मिलने पर इस चर्चा को बल भी मिला था। लेकिन बताया जाता है कि शकील खुद बिहार की राजनीति से दूर रहना चाहते हैं। अपनी यह इच्छा उन्होंने आलाकमान तक पहुंचा दी है। लिहाजा, गांधी परिवार से उनकी नजदीकी के मद्देनजर अब उन्हें एआईसीसी में जगह देने की बात चल रही है। फिलहाल वह प्रवक्ता का दायित्व निभा रहे हैं। लेकिन, आलाकमान बिहार में कांग्रेस के लिए रणनीतियां बनाने में उनकी मदद ले रहा है। शकील भी लालू से संबंधविच्छेद कर चुनावी मैदान में उतरने की वकालत करने वाले प्रमुख लोगों में शामिल रहे थे। शायद यही कारण है कि अब उनकी राय को तवज्जो दी जा रही है, ताकि प्रदेश में कांग्रेस को दोबारा खडा किया जा सके। बताया जाता है कि कांग्रेस आलाकमान दलित, मुसलमानों के साथ ही ब्राह्मण, भूमिहार जैसी उच्च जातियों और पिछडे वर्ग के मतदाताओं को भी पार्टी से जोडने की रणनीति पर काम कर रहा है। संभव है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस संगठन में इन वर्ग के नेताओं को भी उचित प्रतिनिधित्व मिले।
ऐसे में एक सवाल यह भी कि क्या इन रणनीतियों से कांग्रेस प्रदेश में अपनी लोकप्रियता का परचम लहरा पाने में कामयाब होगी। विश्लेषकों का मानना है कि इस वक्त मौका और दस्तूर, दोनों कांग्रेस के साथ है। अगर वह इसे चतुराई से भुनाती है, तो वह प्रदेश में बेहतर भविष्य की उम्मीद कर सकती है। लालू के चंगुल से बाहर आकर पार्टी ने एक सकारात्मक पहल की है, उस पहल को सावधानी से बढाने की जरूरत है। लेकिन इसमें उसे यह ध्यान रखना होगा कि अति-उत्साह में लालू-पासवान की राजनैतिक धारा का अनुसरण न करे। पार्टी में खेमेबाजी पर अंकुश लगाकर ऊर्जावान और क्षमताशाली लोगों को आगे लाना ही कांग्रेस की उम्मीदों को लौ दे सकता है। चाटुकारिता और तानाशाही ने ही कभी यहां कांग्रेस की मिट्टी पलीद कराई थी। अदूरदर्शी फैसले की आग में तभी पार्टी आज तक झुलसती रही। अब जब उसके कार्यकर्ताओं और नेताओं में उत्साह जागा है, तो उस ऊर्जा को बिहार के साथ कांग्रेस की तस्वीर बदलने में इस्तेमाल किया जा सकता है।

टारगेट लालू

बीते ५ वर्षों के दौरान रेलवे के कामकाज, परिचालन और वित्तीय हालत पर श्वेतपत्र लाने का एलान कर ममता बनर्जी ने पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद की मुश्किलें बढा दी हैं। कहा जा रहा है कि यह कदम कांग्रेस की एक सोची-समझी राजनीति का हिस्सा है। आखिर क्या है सच्चाई?

ममता बनर्जी। केंद्र सरकार की रेल मंत्री। लोकसभा में रेल बजट पेश करते हुए जब उन्होंने बंगाल के लिए परियोजनाओं की झडी लगाई, तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। कारण, केंद्र की सत्ता में भागीदार होने के बावजूद बंगाल की शेरनी की नजरें तो राइटर्स बिल्डिंग पर ही टिकी हुई हैं। यानी पश्चिम बंगाल की सत्ता के संचालन का केंद्र राइटर्स बिल्डिंग पर। जहां इस वक्त कॉमरेडों का कब्जा है। लेकिन, जब उन्होंने अपने भाषण में पूर्व रेलमंत्री और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव पर निशाना साधा, तो लोगों को जरूर इस पर हैरानी हुई। यह समझ से परे था कि आखिर ममता इस बिहारी क्षत्रप को क्यों घेर रही हैं? लालू पर हमला बोलकर उन्हें क्या हासिल होगा? हैरानी स्वाभाविक है, पर इसके पीछे एक अनकही कहानी है। और उस कहानी का स्क्रिप्ट तैयार किया है कांग्रेस ने। ममता ने तो सिर्फ उसे आवाज देने का काम किया है। पर इस आवाज की गूंज में लालू का राजनैतिक भविष्य जरूर हिचकोले खाता दिख रहा है।
गौरतलब है कि रेल मंत्री ममता बनर्जी ने एलान किया है कि वह अपने पूर्ववर्ती रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल में रेलवे के परिचालन, संगठनात्मक स्थिति और वित्तीय हालात पर श्वेतपत्र लाएंगी। बीते ५ वर्षों में रेलवे के आय-व्यय का ब्योरा संसद में पेश करने के उनके इस फैसले से अचानक लालू की पेशानी पर बल पड गए हैं। रेलमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल को अपने सियासी जीवन की एक बडी उपलब्धि बतौर प्रचार करते रहे लालू के लिए अब वही दौर भूत की तरह उनके पीछे लग गया है। ममता ने अपने भाषण में जिस तरह लालू की उपलब्धियों की हवा निकाली और उस पर गंभीर सवाल खडे किए, उसने संकेत दे दिया है कि आगे इस मुद्दे पर लालू की परेशानियां और बढने वाली हैं। संकेत दिखने भी लगे हैं। अचानक उनके विरोधी सक्रिय हो गए हैं। बिहार में उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो बाकायदा इस मुद्दे पर लालू से राष्ट्र की जनता से माफी मांगने को कहा है। नीतीश कहते हैं कि ‘लालू जिस वित्तीय जादूगरी की बात करते थे, वह दरअसल वित्तीय घपलेबाजी थी। उसकी पोल अब खुलने लगी है और श्वेतपत्र आने के बाद तो कई और राज खुलेंगे।’
रेल मंत्री के तौर पर लालू की काबिलियत पर नीतीश ही नहीं, कई लोगों ने सवाल उठाया है। उनका साफ कहना है कि अपने कार्यकाल के दौरान लालू रेलवे की गलत तस्वीर पेश करते रहे। मुनाफे का जो आंकडा वह मीडिया के समक्ष दिखा रहे थे, वह झूठ का पुलींदा था। हल्ला मचाते रहे कि ७७.५० रुपए खर्च कर सौ रुपए कमाई हो रही है। जबकि असलियत में ९२.५० रुपए खर्च किए जा रहे थे। यही वजह है कि जो लक्ष्य पिछले साल रखे गए थे, वह हासिल नहीं हो पाए। अंतरिम बजट का टारगेट भी पूरा नहीं हो पाया। इसी का नतीजा है कि नई रेल मंत्री ममता बनर्जी को इसका भांडा फोडने को विवश होना पडा। ममता ने अपने भाषण में लालू पर कई तीर छोडे। उनकी हर बाजीगरी की पोल खोली। बाकायदा आंकडों को साक्ष्य बतौर रखते हुए। साथ ही यह भी एलान कर दिया कि आगे रेलवे के बीते पांच वर्षों के कार्यकाल पर श्वेतपत्र भी लाया जाएगा। ममता की इस घोषणा की राजनैतिक हलकों में तरह-तरह से व्याख्या की जा रही है।
कहा जा रहा है कि श्वेतपत्र के माध्यम से कांग्रेस लालू पर लगाम कसने की कोशिश कर रही है। हाल के दिनों में जिस तरह लालू केंद्र की यूपीए सरकार के समर्थक होने के बावजूद लगातार उस पर हमले बोल रहे हैं, उससे कांग्रेस में नाराजगी है। खासकर, लोकसभा चुनावों के बाद नए हालात में भी कांग्रेस लालू को अपने लिए दोस्त कम दुश्मन ज्यादा समझ रही है। बिहार में अपनी खोई जमीन को वापस हासिल करने में जुटी कांग्रेस को लग रहा है कि लालू को कमजोर कर ही उसे फायदा हो सकता है। कारण, कांग्रेस के वोटबैंक में लालू ने ही सेंध लगाई है। यही वजह है कि पहले कांग्रेस ने लालू के चंगुल से खुद को आजाद किया और अब अपने खोए जनाधार को प्राप्त करने की कवायद कर रही है। वह लालू को संभलने या दोबारा खडा होने का मौका नहीं देना चाहती। फिलहाल कांग्रेस का लालू का हाथ थामने का कोई मूड नहीं है। वह लालू की परेशानी में ही अपना हित देख रही है। रेलमंत्री के रूप में उनकी उपलब्धियों पर चोट को भी इसी से जोड कर देखा जा रहा है।
सूत्र बताते हैं कि रेल बजट के दौरान लालू के खिलाफ ममता ने जो तेवर दिखाए, वह उनकी अपनी सोच या राजनीति-रणनीति का हिस्सा नहीं था। दरअसल, उसके पीछे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की रणनीति काम कर रही थी। मतलब, एक सोची-समझी सियासी योजना। इसके सूत्रधारों में प्रणव मुखर्जी, दिग्विजय सिंह जैसे लोगों के नाम बताए जाते हैं। कहीं न कहीं इसमें नीतीश कुमार की भूमिका के भी चर्चे हैं। वह चाहे जद (यू) की भाजपा से बढती दूरियों और कांग्रेस से परदे पीछे गलबहियों की खबरों को लेकर हो, चाहे सूबे में होने वाले आगामी चुनाव की तैयारियों के दृष्टिगत। लिब्रहान रिपोर्ट संसद पटल पर रखे जाने के बाद संभव है कि भाजपा के कई बडे नेताओं की परेशानियां बढें। ऐसी स्थिति में जद (यू) भाजपा से रिश्ते तोडकर कांग्रेस के साथ हाथ मिला सकता है। पार्टी के अंदर पिछले कुछ दिनों से ऐसी बातें चल भी रही हैं कि उसे भाजपा से संबंध-विच्छेद कर कांग्रेस से हाथ मिला लेना चाहिए। इससे जदयू को मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर लाने में मदद मिलेगी। साथ ही केंद्र सरकार में शामिल होकर वह बिहार में अपने विकास कार्यों को और गति दे पाएगा। ऐसे में कांग्रेस के श्वेतपत्र संबंधी कदम से राजद से उसके रिश्तों का नया समीकरण उभर सकता है। साथ ही यह पहला मौका होगा कि किसी राजनैतिक गठबंधन की सरकार अपने बीते कार्यकाल के दौरान किसी खास मंत्रालय के कामकाज पर श्वेतपत्र लाएगी।
ममता की इस घोषणा के पीछे कांग्रेस की भूमिका की पुष्टि इस बात से भी होती है कि आमतौर पर ऐसे फैसले सरकार के शीर्ष नेतृत्व से सलाह-मश्विरे के बाद ही लिए जाते हैं। यह किसी मंत्री का निजी फैसला नहीं होता। कहने का तात्पर्य कि ममता ने अगर यह एलान किया, तो इससे पहले कांग्रेस आलाकमान व इसके वरिष्ठ नेेताओं से इस पर चर्चा हो चुकी थी। सूत्र बताते हैं कि श्वेतपत्र लाने की दिशा में इन दिनों जोर-शोर से तैयारियां भी चल रही हैं। सरकार के कुछ प्रमुख वित्तीय सलाहकार और सांख्यिकी-व्याख्याकार लालूराज के दौरान रेलवे के वित्तीय आंकडों को खंगालते हुए उसका अध्ययन कर रहे हैं। ताकि लालू के दावे की पोल खोल कर उन्हें पूरी तरह बेनकाब किया जा सके। इसकी भनक लालू को भी लग चुकी है। तभी इन दिनों राजनीति के बियाबान में भटक रहे लालू कांग्रेस आलाकमान से इस मुद्दे पर बातचीत के लिए संपर्क साधने में लगे हैं। लेकिन, कांग्रेस की तरफ से उन्हें कोई भाव नहीं दिया जा रहा। उल्टे वह सार्वजनिक रूप से इस श्वेतपत्र की वकालत कर रही है।
कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी कहते हैं, ‘यदि रेलमंत्री द्वारा श्वेतपत्र जारी करने से पारदर्शिता बढती है, तो इसमें बुरा क्या है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी को देखते हुए समीक्षा जरूरी भी है।’ पार्टी इसके पीछे किसी साजिश से साफ इंकार करती है। लेकिन हकीकत यह है कि कांग्रेस ममता के मार्फत लालू की हालत पतली करने में लगी है। आखिर बिहार में कांग्रेस को लालू से ही तो वोट छीनने हैं। नीतीश से तो उसके बाद निपटने की जरूरत होगी। बदले हालात में रेलवे के कई बडे अधिकारी भी बढ-चढकर लालू की फजीहत का सामान जुटाने में लगे हैं। लालूराज में खुद को उपेक्षित महसूस करते रहे ऐसे अधिकारी इन दिनों ममता बनर्जी को लालू की बाजीगरी की बारीकियां समझाने में जुटे हैं। उनकी हसरत है कि वे लालू को परेशानहाल में देखें। लालू परेशान हैं भी। पर वह ऐसा दिखाना नहीं चाहते। एक तरफ वह कांग्रेस से मिल-बैठकर इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ हर जांच का सामना करने की बात कहकर खुद को पाक साफ दिखाने का जतन भी। कांग्रेस इस मुद्दे पर कहां तक जा सकती है, उसका अंदाजा लगाना लालू को भारी पड रहा है। इसी डर से वह अभी से ही अपने वोटबैंक को यह संकेत देने में लग गए हैं कि उनके खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही है। वह कहते भी हैं, ‘चाहे जिससे जांच करा लो, कमी ढूंढे नहीं मिलेगी। अगर मिली, तो मैं कान पकडकर माफी मांगने को तैयार हूं। मुझसे ईष्र्या करने वाले मेरे कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं। मुझे सब मालूम है कि यह किसके इशारे पर हो रहा है।’
वहीं ममता कांग्रेस और लालू के बीच की इस राजनीति में खामोशी के साथ अपना रोल अदा करने में लगी हैं। कांग्रेस से मिलकर चलने में ही वह अपना हित समझ रही हैं। कारण, पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद वह खुद को बतौर सीएम देख रही हैं। कांग्रेस को भी पूरा यकीन है कि इस बार कॉमरेडों का सूबे की सत्ता से उखडना तय है। उस हालत में निश्चित तौर पर ममता ही सीएम बनेंगी। तब रेलमंत्री कोई कांग्रेसी होगा और पार्टी अपने मनमुताबिक श्वेतपत्र का इस्तेमाल करेगी। यानी दूर-दूर तक इस मुद्दे पर सियासी गोटें बिछी हुई हैं। देखना शेष है कि इस बिसात पर लालू कैसी गोटें चलते हैं। फिलहाल बिना शोर मचाए अपना सियासी लक्ष्य साधने में माहिर कांग्रेस के मुकाबले उनकी हालत बेहद पतली नजर आ रही है।
आंकडों की बाजीगरी
रेलवे को भारी मुनाफे वभाग में बदलने का ढिंढोरा पीटने वाले लालू पर अब आंकडों के साथ खिलवाड करने का दोष मढा जा रहा है। जिस सरकार के वह रेल मंत्री रहे, बदले हालात में आज वही उनके खिलाफ श्वेतपत्र ला रही है। रेल मंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि सन २००८-०९ में लालू ने अपने बजट में ११,७८६ करोड की आमदनी का जो आंकडा पेश किया था, वह फरवरी में चुनाव से पहले अंतरिम बजट तक आते-आते महज ५५७२ करोड रह गया। और अब यह मात्र २६४२ करोड है। अंतरिम बजट के दौरान लालू ने ८० हजार करोड रुपए के कैश सरप्लस की बात कही थी, लेकिन यह महज १७,४०० करोड रुपए है। साथ ही उन्होंने वार्षिक योजना में ३४०० करोड रुपए के संसाधन निजी क्षेत्र की भागीदारी के जरिए जुटाने की व्यवस्था की थी, जिनमें ३३०० करोड तो कभी जुटाए ही नहीं जा सकते थे।

लालगढ के पीछे


३२ वर्षों से बंगाल की सत्ता पर एकछत्र राज। लेकिन, अब अपने ही गढ में गंभीर चुनौतियों का सामना करने को मजबूर। बंगाल की वाम मोर्चा सरकार की आज यही हकीकत है। उसे अपने ही कामरेडों को आतंकवादी करार देकर वजूद की लडाई लडनी पड रही है। बाकायदा उनपर प्रतिबंध लगाकर। पर इस दमन की कार्रवाई से उसके विरोधी दलों की जमीन जरूर मजबूत हो रही है। वे इसे अपने लिए जागती संभावनाओं के तौर पर देख रहे हैं। आखिर क्यों पैदा हुए ऐसे हालात? माओवादियों के नाम पर खेला जा रहा है कौन सा सियासी खेल?

२०-३० के दशक में चीनी कम्युनिस्ट नेता माओ ने कहा था- ‘पावर फ्लोज फॉर्म द बैरल ऑफ ए गन’ यानी सत्ता बंदूक की नली से होकर निकलती है। उनका मत था कि हक मांगा नहीं जाता, छीना जाता है। और इसके लिए हिंसा करनी पडे, तो वह भी वाजिब है। उन्होंने जब यह राय प्रकट की थी, तब चीन में गृहयुद्घ का दौर था। अपनी इसी सोच और रणनीति के सहारे आगे चलकर वह चीन की सत्ता तक हासिल करने में सफल रहे। आज २१ वीं सदी के पहले दशक में बंगाल में कुछ ऐसा ही प्रयोग हो रहा है। कहें तो नए सिरे से यह प्रयोग दोहराया जा रहा है। बंदूक के सहारे सत्ता छीनने और सत्ता बचाए रखने की जद्दोजहद के तौर पर। प्रत्यक्षत: एक तरफ माक्र्स के सिद्घांतों से प्रभावित सत्तारूढ वामपंथी सरकार है और दूसरी तरफ माओ त्से-तूंग की विचारधारा को आत्मसात कर हाथों में हथियार उठाए माओवादी। लेकिन, अप्रत्यक्षत: कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस भी अपने -अपने हित साधने में व्यस्त। और इस खेल में प्रयोगशाला बना है प्रदेश के मिदनापुर जिले का लालगढ इलाका। वह क्षेत्र, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि इसके अंतर्गत आने वाले ४४ गांवों को माओवादियों ने अपने कब्जे में ले लिया है। और सरकार उसे मुक्त कराने का प्रयास कर रही है। इस संघर्ष में दोनों ओर से गोलियां बरस रही हैं, धमाके हो रहे हैं। लेकिन, इन धमाकों में कुछ शोर खामोश पड गए हैं। बेहतर कहें, तो खामोश कर दिए गए हैं। क्योंकि वह आवाज है आम आदमी की। निर्दोष, निर्धन और असहाय ग्रामीणों की। यानी पूरा का पूरा प्रकरण सियासी ताने-बाने में उलझा है। ऐसा मकडजाल, जिसे समझना और समझाना जरूरी है।
दरअसल, लालगढ में आज जो हो रहा है, वह अचानक नहीं। इसकी पृष्ठभूमि बहुत पहले से तैयार हो रही थी। सिंगुर और नंदीग्राम ने इसे गति दी और एक दिशा भी। और जो दिशा मिली, वह वाम मोर्चा खासकर माकपा के लिए एक बडा धक्का था। हो भी क्यों न। आखिर तीन दशक से ज्यादा वक्त तक जो कैडर उसके एक इशारे पर कुछ भी करने का तैयार रहते थे, वे उसकी खुली मुखालफत पर उतर चुके थे। इसी का नतीजा था कि लोकसभा चुनावों में वामपंथी पार्टियां अपने सबसे मजबूत गढ से ही उखड गईं। बुरी तरह। इसके बाद से ही उसे यह खतरा और भी सताने लगा है कि कहीं आगामी विधानसभा चुनावों के बाद राज्य से उसकी हुकूमत ही न उखड जाए। राजनैतिक जानकारों का भी आकलन रहा है कि जैसी गतिविधियां इस प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में चल रही है, उसके बरकरार रहने का मतलब है तीन दशकों से लगातार सत्ता पर कुंडली मार कर बैठी वाम सरकार का अंत। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर बंगाल के गांवों में ऐसा क्या हो रहा है, जो वाम सरकार के खात्मे की इबारत लिख रहा है।
इसे जानने के लिए हमें तीन दशक पीछे मुडना होगा, जब वामपंथी पार्टियां इस प्रदेश की सत्ता पर आसीन हुई थीं। ७० के दशक में तब बंगाल में नक्सलबाडी आंदोलन अपनी गति में था। कानू सान्याल, चारू मजूमदार और कनाई चटर्जी जैसे नक्सल नेताओं ने जमींदारों और भू-स्वामियों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल पूं*का हुआ था। साम्यवाद और शोषणहीन समाज की बुनियाद के लिए। आर्थिक समानता लाने के लिए। उस वक्त कम्युनिस्ट पार्टियों को लगा कि इस आंदोलन का समर्थन कर वे सत्ता हथिया सकती हैं। उन्होंने ऐसा किया भी। तत्कालीन कांग्रेस सरकार के खिलाफ नक्सल आंदोलन का इस्तेमाल कर वह सत्ता में पहुंचने में कामयाब हो गर्ई। लेकिन हुकूमत पाने के बाद इस समस्या की जड में पहुंचने से वह बचती रही। सरकार को खतरे से बचाने के लिए तब नक्सली नेताओं को साधने की कोशिश हुई। उन्हें किसी न किसी तरह उपकृत कर आंदोलन की गति को कुंद किया गया। बदले में नक्सली नेता सत्ता के दलाल बन गए। वे सत्ताधारी दल के लिए वोट का जुगाड करते रहे और सरकार उनके आराम का ख्याल करने लगी। इसी अन्योनाश्रय संबंध की परिणति है कि देश में दूसरी पार्टियों की लहर के बावजूद बंगाल में वाम का डंका बजता रहा। आंदोलन के नाम पर नक्सली नेता माकपा के कैडर बन कर काम करते रहे। और वह भी इतनी सक्रियता से कि गांवों में माकपा का एक मजबूत किला कायम हो गया। इसी अभेद्य दुर्ग के कारण तब से अब तक माकपा एण्ड एसोसिएट्स बंगाल में एकछत्र राज करती रही है। साथ ही साथ माकपा इस बीच अलग से अपने कैडर खडा करने की भी कोशिशें करती रहीं। वैसे कैडर, जो गांव-देहात में उसके लिए वोट मैनेज करें। उसके कैडर ऐसा करते भी रहे।
हालांकि इसका मतलब यह कतई नहीं कि राज्य की ग्रामीण जनता वामपंथी पार्टियों की मुरीद बनी रही। उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। उन्हें तो सरकार आज तक खाद्यान्न और पेयजल तक मुहैया नहीं करा पाई है। सरकारी योजनाओं का लाभ भी इन गरीब आदिवासियों को कभी नहीं मिला। उनके पास रोजगार के साधन नहीं। जिंदा रहने के लिए आज के दौर में भी वे पैसे की बजाए सामानों की अदला-बदली करते हैं। और ये हालात इस तथ्य के बावजूद हैं कि इनके वोटों के सहारे माकपा लगातार सत्ता पाती रही है, जमीन-जंगल और गरीब गांववालों की बात करती रही है। दरअसल यहां सेहत सुधरी, तो माकपा कैडरों की। उन्हें सरकार से वोटबैंक इक_ा करने और उसे कायम रखने के एवज में हर सुविधा उपलब्ध होती रही। इसका प्रमाण है गांवों में उनकी लंबी-चौडी इमारतें। उनके जीने का अंदाज। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिन दूरदराज गांवों में विकास की हवा जरा भी नहीं पहुंची, वहां माकपा कैडर कैसे और क्यों कर पुष्पित-पल्लवित होते रहे। लालगढ में माकपा कैडर तो वर्गभेद की जीती जागती मिसाल हैं। जबकि वे आर्थिक समानता का नारा बुलंद करते रहे हैं। उनके पास सब कुछ है- गाडी, हथियार, पैसा-पहुंच सब। कईयों के घरों में तो एयरकंडीशनर तक। लेकिन ग्रामीण बदहाल। इन्हीं संसाधनों के सहारे सालोंसाल से माकपा कैडर ग्रामीणों का शोषण करते रहे हैं, उन्हें अपनी जागीर बनाए रखा है। पार्टी को सत्ता में पहुंचाने के लिए। शहरी इलाकों से परे बंगाल के ग्रामीण इलाकों में हमेशा से इन्हीं माकपा कैडर की ही हुकूमत चलती रही है। उनका फरमान ही प्रशासन का फरमान होता था। राशन कार्ड हो या कोई दूसरी जरूरत, प्रशासन माकपा यूनिट के निर्देश पर ही काम करता था। स्थानीय स्तर पर जन-वितरण प्रणाली की दूकानों का लाइसेंस हो या कोई और ठेका, सब माकपा के इन्हीं कैडरों के हिस्से आते थे। इस सुविधा को भोगने के बदले माकपा के कैडर गांव के लोगों, आदिवासी जनता को येन-केन-प्रकारेन पार्टी से जोडे रखने का काम करते थे। डराना-धमकाना, उनके परिवार पर अत्याचार और उन्हें मूलभूत सुविधाओं से कोसों दूर रखना भी इसमें शामिल है। माकपा के कैडर जानते थे कि अगर ग्रामीण जनता जागरूक हुई, तो उनका बोरिया-बिस्तर उखड सकता है। लिहाजा वे उन्हें आदिम युग में ही जिंदा रखते रहे। विकास और आधुनिकता की बयार से मीलों दूर। सरकार पर आरोप भी लगते रहे कि उसके कैडर गांवों में लोगों को वोट नहीं डालने देते, बल्कि खुद ही बूथ अपने नियंत्रण में लेकर मत डाल देते हैं। कहने का मतलब कि एक सोची समझी रणनीति के तहत माकपा नक्सलियों की मदद से सत्ता का स्वाद चखती रही। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सभी नक्सली नेताओं ने माकपा की चरणवंदना स्वीकार कर ली। लेकिन ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा जरूर रही। जो आंदोलन के साथ रहे, वे जनसमर्थन के अभाव में शिथिल पड गए। उन्होंने गाहे-बगाहे इस पर आवाज भी उठाई कि माकपा सरकार नक्सल आंदोलन के सहारे सत्ता में आई, लेकिन बाद में उसे ही नकार दिया। अपना खुद का कैडर स्थापित करने लगी, जिन्हें आंदोलन से कोई सरोकार नहीं था। और ये कैडर वही थे, जो आंदोलन से उपजे और सत्ता का हिस्सा बन गए।
लेकिन तस्वीर इधर कुछ वर्षों में बदलने लगी थी। ग्रामीणों के बीच कुछ ऐसे संगठन पहुंचने लगे थे, जो उन्हें उनकी दास्तां की असली वजह समझाने और उन्हें एकजुट करने में कामयाबी हासिल करने लगे थे। इन संगठनों को कहीं न कहीं राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था। कहें तो नक्सली नेताओं का एक बडा तबका धीरे-धीरे माकपा के विरोध में उतरता जा रहा था। और ममता बनर्जी इन्हें अप्रत्यक्ष समर्थन देकर राज्य की सियासी तस्वीर बदलने की कोशिश कर रही थी। सिंगुर, नंदीग्राम जैसे इलाकों में ममता ने अगर वाम सरकार की नींदें उडाने में सफलता पाई, तो यह उन माओवादियों की मदद के फलस्वरूप ही संभव हुआ। प्रदेश की राजनीति पर बारीक नजर रखने वाले जानकार भी कहते हैं कि तृणमूल नेता ममता बनर्जी माकपा को उसके ही हथियार से घायल करने का काम बडी खामोश रणनीति के तहत कर रही थीं। एक तरफ वह माकपा के ग्रामीण वोटबैंक पर निशाना साधने में लगी थीं, तो दूसरी तरफ माकपा कैडर में भी सेंध लगाने की जुगत भिडा रही थीं। इसी का नतीजा है लोकसभा का चुनाव परिणाम।
लेकिन ममता यहीं नहीं रुकना चाहतीं। कारण, उनकी नजर प्रदेश की सत्ता पर है। वह विधानसभा चुनाव के दृष्टिगत ही सारे उपाय कर रही हैं। इसीलिए एक-एक कर वह माकपा के प्रभाव वाले सभी इलाकों में उसकी जडों में म_ा डालने का काम कर रही हैं। नंदीग्राम, सिंगुर, खेजुरी के बाद नंबर आया लालगढ का। माकपा के बडे गढ मिदनापुर का केंद्र लालगढ। अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर एक नंदीग्राम की वजह से माकपा को इतना सियासी नुकसान उठाना पडा, तो मिदनापुर पर कब्जा कर ममता उसकी क्या हश्र करा सकती है। कभी मिदनापुर माकपा का गढ होता था। लेकिन बदली परिस्थितियों में आज पूर्वी मिदनापुर में तृणमूल की तूती बोलती है और पश्चिमी मिदनापुर में लालगढ के माध्यम से वह इसे धरातल पर उतारने का प्रयास कर रही है। मिदनापुर में करीब १६ हजार गांव हैं। और यहां ममता सिंगुर दोहराने में लगी है। यही माकपा की परेशानी का सबब है। और इसी से निपटने के लिए वह लालगढ में अपना नया प्रयोग कर रही है। ताकत के बल पर अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को शांत करने का। उसे खतरा है कि ये आवाजें न सिर्फ उसके विरोधियों को मजबूत कर सकती है, बल्कि उसकी कहानी का ‘द एंड’ भी कर सकती है। और इसकी आहट हो भी चुकी है।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष नवंबर महीने में जब मुख्यमंत्री बुद्घदेव भट्टाचार्य व तत्कालीन केंद्रीय इस्पात मंत्री राम विलास पासवान लालगढ-झारग्राम-शालबनी इलाके में प्रस्तावित जिंदल के कारखाने का शिलान्यास करने गए थे, तो उनके काफिले पर हमला किया गया था। लैंडमाइन ब्लास्ट के माध्यम से। वह तो गनीमत थी कि चूहों के तार कुतरने की वजह से विस्फोट तय समय के कुछ देर बाद हुआ, वर्ना कुछ भी अनिष्ट हो सकता था। इसके बाद बंगाल की पुलिस ने यहां माओवादियों के खिलाफ सख्त अभियान छेड दिया था। आरोप लगाए जाते हैं कि पुलिस ने बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं पर अत्याचार किए, जिसकी वजह से ग्रामीण माकपा की मुखालफत पर उतर आए। इस स्थिति को भुनाया तृणमूल कांग्रेस ने। पुलिसिया अत्याचार के खिलाफ आदिवासियों ने तृणमूल नेता छत्रधर महतो के नेतृत्व में पुलिस अत्याचार प्रतिरोध समिति का गठन किया और इलाके को पुलिस के लिए बैन कर दिया। इससे सहम कर माकपा सरकार ने अंतत: वहां बल का प्रयोग करने का फैसला किया। कारण, उसे इस विद्रोह से अपनी जमीन खिसकने का खतरा था। उसे यह भी ज्ञात हो चुका था कि कभी उनके लिए काम करने वाले लोग अब उनके खिलाफ हो गए हैं। ऐसे में खिसियाई माकपा से बदले की कार्रवाई अपेक्षित थी। साथ ही वह उन विद्रोहियों को यह भी संदेश देना चाह रही थी कि इस लडाई का अंजाम उनके लिए ठीक नहीं होगा। बेहतर होगा कि वे माकपा के साथ बने रहें, तृणमूल के बहकावे में न आएं। कारण, पूर्वी मिदनापुर में नंदीग्राम ने ममता का नियंत्रण स्थापित किया। तब माओवादियों का भी उन्हें समर्थन हासिल हुआ था। पश्चिमी मिदनापुर में लालगढ यही काम कर सकता है, क्योंकि यहां भी कभी माकपा का साथ देते रहे माओवादी अब तृणमूल के करीब आते दिख रहे हैं। यही माकपा की छटपटाहट की वजह है। लेकिन, इस बीच केंद्र सरकार ने माओवादियों पर प्रतिबंध लगाकर अपनी चाल चल दी। दरअसल, कांग्रेस इस कदम से बदहाल ग्रामीणों की सहानुभूति बटोरना चाहती है। वह जान रही है कि प्रतिबंध से माकपा के बागी कैडरों में यह संदेश जाएगा कि यह सब बंगाल सरकार की वजह से हो रहा है। इससे माकपा की सियासी राह और मुश्किल होगी। वहीं इस मुद्दे पर माकपा कुछ कहने से परहेज कर रही है। अगर वह इसकी वकालत करती है, तो उसके कैडरों में व्याप्त गुस्सा और बढेगा। अगर मुखालफत करती है, तो विरोधी उसपर माओवादियों का समर्थन करने का आरोप मढेंगे। यानी माकपा के लिए इस वक्त इधर कुआं, उधर खाई वाली स्थिति है। इसी बेचैनी में वह अपने वजूद को बचाए रखने की कोशिश कर रही है। अपने कैडरों के और बिखराव को रोकने के लिए ही वह लालगढ में शक्ति का प्रयोग कर रही है। लेकिन ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या लालगढ एक और नक्सलबाडी आंदोलन की तरफ बढ रहा है? नक्सलबाडी ने ७० में कांग्रेस को सत्ता से उखाडकर वाम पार्टियों को बंगाल की सत्ता में पहुंचाया था, कहीं लालगढ वाम मोर्चा को सत्ता से उतारने का बायस न बन जाए।

भाजपा का शुद्घिकरण


लोकसभा चुनावों में हार से हलकान भाजपा अब नए सिरे से संगठन को चाक-चौबंद करने के अभियान में जुटी है। इसके लिए नए-नए नुस्खे भी आजमाए जा रहे हैं। बदले हालात में जहां पार्टी की दुर्गति कराने वाले हवा-हवाई नेताओं के पर कतरे जा रहे हैं, वहीं जनाधार वाले कर्मठ नेताओं को खास तरजीह दी जा रही है। और क्या चल रहा है भगवा खेमे में, जायजा लेती रिपोर्ट।

कहा जाता है कि गंभीर प्रयास के बावजूद अगर आपको अपेक्षित नतीजा नहीं मिल पा रहा हो, तो निराश होने की बजाए नए सिरे से अपनी रणनीतियां तैयार करें। इससे सफलता की उम्मीद बढ जाएगी। लोकसभा चुनावों में बुरी तरह पिटने के बाद भाजपा में भी इन दिनों कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। वह अपनी हार और इससे उपजी निराशा-हताशा से ऊपर उठकर बदली रणनीतियों के साथ अपने भविष्य को सुनहरा बनाने की कोशिशों में जुट गई है। इसके तहत पार्टी अपनी उन खामियों को दूर करने में जुटी है, जिसने चुनावों में उसकी संभावनाओं को पलीता लगाने का काम किया। हार के पश्चात कारणों की समीक्षा में लगे पार्टी नेताओं को जो संकेत मिल रहे हैं, उसके अनुसार कई मोर्चों पर संगठन को लेकर बेजारी ने भाजपा का काम खराब किया है। यही वजह है कि संगठन को दोबारा नए सिरे से खडा करने की जरूरत महसूस हो रही है। और इसी के दृष्टिगत पार्टी के पितृ पुरुष श्यामाप्रसाद मुखर्जी के जन्मदिन छह जुलाई से पूरे देशभर में एकसाथ भाजपा ने सदस्यता अभियान शुरू किया है। इसका मकसद सांगठनिक चुनाव से पहले मजबूत और पारदर्शी तरीके से सदस्यों का एक नया नेटवर्क बनाना है, ताकि सही तरीके से सही लोग चुन कर पार्टी पदों पर आ पाएं।
हालांकि सांगठनिक चुनाव का तरीका पहले जैसा ही होगा, लेकिन इस बार सदस्यता अभियान का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया गया है। नए फार्मूले के तहत पार्टी के राष्ट्रीय स्तर से लेकर निचले स्तर तक के सभी नेता व कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्रों में सदस्यता अभियान चलाएंगे। पर, नए तरीके से। विभिन्न स्तरों पर नियुक्त सदस्यता अभियान प्रमुखों को निर्देश दिया गया है कि वे एक परिवार से दो से ज्यादा सदस्य नहीं बनाएं। पहले यह देखा जाता रहा है कि अभियान की जिम्मेदारी लेने वाले पार्टी कार्यकर्ता एक ही घर के सभी लोगों को सदस्य बनाकर अपना लक्ष्य पूरा कर देते थे। लेकिन, अब ऐसा नहीं हो पाएगा। सदस्यता अभियान में फर्जीवाडे को रोकने के लिए ही पार्टी ने प्रावधान किया है कि अभियान प्रमुखों को अलग-अलग घरों से सदस्य बनाने होंगे। इसमें महिलाओं, युवाओं को भी जोडने को कहा गया है। साथ ही बसपा की तरह जातीय गणित का ख्याल रखने की हिदायत भी दी गई है। इतना ही नहीं, सदस्यों की जो सूची बनाई जाएगी, उसमें उनका पूरा विवरण और उनका फोन नंबर देना अनिवार्य बनाया गया है। कहा जा रहा है कि इसी के आधार पर बाद में सूचियों का निरीक्षण भी किया जाएगा। विधानसभा, बूथ और सेक्टर स्तर पर सदस्यता अभियान प्रमुखों की नियुक्ति भी भाजपा में पहली बार हुई है। कहने का तात्पर्य कि नए नियम को भाजपा अपने लिए परिवार नियोजन मंत्र के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। ज्यादा से ज्यादा और वास्तविक सदस्य बनाने की पहल के साथ।
बताया जाता है कि पार्टी आलाकमान को विभिन्न प्रदेशों से सदस्यता अभियानों में भारी फर्जीवाडे की शिकायतें मिलती रही हैं। पहले कुछ स्वयंभू किस्म के लोग अपने लोगों के या फर्जी नाम एक सोची-समझी रणनीति के तहत सदस्यता सूची में डलवा देते थे। इससे सदस्य बनाने का उनका कोटा भी पूरा हो जाता था और मनमाफिक सदस्य भी बन जाते थे। बाद में सूची में दर्ज इन्हीं नामों के आधार पर वे पार्टी पदों पर आसीन होने में सफल हो जाया करते थे। यानी नीचे के स्तर से ही संगठन के चुनाव में अनियमितता का बोलबाला चल रहा था। इससे काम करने वाले, जमीन से जुडे लोगों में असंतोष पैदा होता था। अलग-अलग प्रदेशों में असंतोष की ज्वाला कई बार धधक भी चुकी है। इससे पार्टी को नुकसान भी हुआ है। लेकिन, अब भाजपा ने इस बीमारी की जड में पहुंचकर इसे दुरुस्त करने का काम शुरू किया है। सदस्यता अभियान के स्वरूप में बदलाव को इसी कडी में देखा जा सकता है।
सुगठित संगठन की यह कला भाजपा ने बसपा से प्रभावित हो अपनाने की पहल की है। सदस्यता अभियान को पारदर्शी ढंग से संपन्न कराने के बाद ही संगठन के चुनाव की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इसके अक्टूबर से दिसंबर तक पूरे होने की उम्मीद है। सबसे पहले वार्ड स्तर पर चुनाव होंगे। इसके बाद मंडल, जिला व प्रदेश स्तर पर। और अंत में राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होगा। बताया जाता है कि राजनाथ सिंह इस पद पर दोबारा आसीन होने की इच्छा रखते हैं, लेकिन इसकी संभावना नगण्य है। कारण, इसके लिए पार्टी का संविधान बदलने की जरूरत होगी, जो संभव नहीं दिखता। लिहाजा इस पद के लिए अभी से ही कई नाम उभरने या उभारे जाने लगे हैं। अरुण जेतली, सुषमा स्वराज और अनंत कुमार इस दौड में मुख्य चेहरे हैं। पर इस रेस में जिस तरह अपनी-अपनी लॉबी के हितों को साधने की पहल हो रही है, वह संगठन को दुरुस्त करने की भाजपाई पहल की सफलता को लेकर जरूर संशय पैदा कर रही है।
बहरहाल, भाजपा में नई जान फूंकने की कवायद जोर-शोर से चल रही है। इसी के अंतर्गत विभिन्न प्रदेशों में पार्टी अध्यक्षों को बदला गया है या फिर बदले जाने की तैयारी हो रही है। राजस्थान, हरियाणा व हिमाचल प्रदेश में पुराने अध्यक्षों की छुट्टी करते हुए नए चेहरों को कमान सौंप भी दी गई है। आगे पंजाब, उत्तराखंड, दिल्ली आर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के अध्यक्षों की छुट्टी की बारी है। उनकी जगह नए लोगों को मौका दिया जाएगा। विदित है कि ओम प्रकाश माथुर की जगह अरुण चतुर्वेदी को राजस्थान में, आत्मा राम मनचंदा के स्थान पर कृष्णपाल गुर्जर को हरियाणा में और हिमाचल में जयराम ठाकुर की जगह खीमीराम को पार्टी का नेतृत्व सौंपकर उसकी सेहत सुधारने का जिम्मा सौंपा गया है। ये सभी नेता ६० वर्ष से कम उम्र के हैं। पार्टी ने तय किया है कि भविष्य में किसी भी प्रदेश में ६० वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति को अध्यक्ष नहीं बनाया जाएगा। उनकी जगह युवा और ऊर्जावान लोगों को तरजीह दी जाएगी। साथ ही भाजपा इस बात का भी ख्याल रख रही है कि इन पदों पर आने वाले लोग संघ के भी गुडबुक में शामिल हों। इससे संघ से भी उन्हें अपनी मजबूती के अभियान में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मदद मिलती रहेगी। हाल के दिनों में भाजपा-संघ रिश्तों को लेकर दोनों संगठनों के बीच जो खटास पैदा हुई है, भाजपा उसका सम्मानजनक हल निकालना चाहती है। वह संघ को एकबारगी अपने से अलग नहीं करना चाहती। शायद इसीलिए वह ऐसा रास्ता निकाल रही है, जिससे संघ भी तुष्ट रहे और भाजपा की गाडी भी पटरी पर रहे। हां, संघ में जरूर भाजपा से रिश्ते पर विचार-मंथन का दौर जारी है।
भाजपा में अब इस बात की महत्ता को समझने की कोशिश की जा रही है कि जमीन से जुडे, जनाधार वाले नेताओं को हर हाल में तवज्जो दिया जाना चाहिए। कारण, बहुत हद तक इसकी अनदेखी ही पार्टी की दुर्गति का बायस बनी है। लिहाजा, अब काम करने वाले क्षमतावान लोगों को मुख्यधारा में लाया जा रहा है। इसमें सभी वर्गों का ख्याल रखा जाएगा। युवाओं, महिलाओं के साथ ही जातीय समीकरण का भी। बताया जाता है कि भाजयुमो अध्यक्ष अमित ठाकर को केंद्रीय राजनीति में लाने की तैयारी हो रही है। पार्टी की युवा इकाई के अध्यक्ष बतौर ठाकर ने बेहतर काम किया है। उन्हें लोकसभा में टिकट देने की भी चर्चा थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे यह संदेश गया कि युवा-युवा की रट लगाने वाली भाजपा में भी उन्हीं युवाओं की पूछ होती है, जो परिवारवाद के प्रतीक हैं। पार्टी उस भ्रम को तोडने की पहल करना चाहती है। इसीलिए अमित ठाकर के साथ ही कई और युवा नेताओं को अहम जिम्मेदारी सौंपने पर विचार किया जा रहा है। सुभाष यदुवंश, पूनम महाजन, अनुराग ठाकुर जैसे युवा नेताओं को भविष्य में तरजीह मिलने की उम्मीद है। प्रदेशाध्यक्षों से भी राज्यों में युवा नेतृत्वकर्ताओं को आगे लाने को कहा गया है। पार्टी के इस फैसले से प्रदेशों में युवा नेताओं में उत्साह देखा भी जा रहा है।
इन कवायदों के बीच लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों के अध्यक्षों की छुट्टी कर यह संदेश भी देने की कोशिश की जा रही है कि प्रदर्शन नहीं करने वालों को खामियाजा भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। संकेत साफ है- जो करेगा, वह पाएगा। जो नहीं करेगा, वह भोगेगा। राजस्थान में ओम माथुर विधानसभा चुनावों के बाद लोकसभा चुनाव में भी पार्टी की हालत नहीं सुधार सके। लिहाजा, उन्हें अपनी सेहत सुधारने के लिए पद से छुट्टी दे दी गई। हरियाणा में मनचंदा का मन चंगा नहीं था, तभी पार्टी का सूपडा साफ हो गया। हिमाचल में भाजपा की सरकार होने के बावजूद जयराम ठाकुर पार्टी की ‘जय हो’ नहीं करा पाए। इसलिए इन सभी को सजास्वरूप बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। पंजाब में राजिंदर भंडारी, दिल्ली में ओपी कोहली, उत्तराखंड में बच्ची सिंह रावत को भी चुनावों में भाजपा की दुर्गति के लिए दंड मिलना तय है। सूत्र बताते हैं कि कई प्रदेशाध्यक्षों ने तो खुद ही इस्तीफे की पेशकश की हुई है। संभव है उनपर आगे निर्णय की मुहर लगा दी जाए।
संगठन को चुस्त-दुरुस्त करने में लगी भाजपा अब अपने पुराने वफादारों की तरफ भी नजरें इनायत कर रही है। संकेत है कि भाजपा छोड कर गए कुछ प्रमुख नेताओं को आने वाले दिनों में पार्टी में वापस लेने की औपचारिक घोषणा की जा सकती है। साथ ही असंतुष्ट नेताओं की समस्या पर भी अब ध्यान देकर उनकी नाराजगी दूर करने की कोशिशें हो रही हैं। यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ पार्टी नेताओं के गिले-शिकवे दूर किए जाने की खबरें इसका प्रमाण हैं। आडवाणी खुद भी पार्टी नेताओं को संगठन की संभावनाएं जिंदा करने के लिए मार्गदर्शन दे रहे हैं। पार्टी नेताओं को प्रवक्ता बनने से परहेज करने की हिदायत देकर उन्होंने इसी का परिचय दिया है। शायद लौहपुरुष को लगता है कि उम्मीदें अभी मरी नहीं हैं, सिर्फ सोई हैं। बस उसे जगाने की जरूरत है, पीएम की वेटिंग तो खुद ही कन्फर्म हो जाएगी। तभी वह अपने अरमानों के बिखरने के बाद भी ‘एक बार और’ की तर्ज पर समर में बने रहना चाहते हैं। कहने का मतलब, अपने आगे के सफर को सुलभ बनाने के लिए भाजपा गंभीरता से प्रयासों में जुट गई है। गंभीरता दिख भी रही है। लेकिन, उपलब्धियों के लिहाज से यह गंभीरता हकीकत के धरातल पर कितना उतर पाती है, देखना दिलचस्प होगा। वैसे आने वाले कुछ महीनों में महाराष्ट्र समेत अन्य प्रदेशों में होने वाले विधानसभा चुनाव इसकी झलक तो दे ही देंगे। दिल्ली की दूरी नापने का असली खेल तभी शुरू होगा।