रविवार, 30 अगस्त 2009

ऐ मियां टेढा, हम तुमसे डेढा

संघ एक तरफ जहां आडवाणी की विदाई सुनिश्चित करने में लगा है, वहीं लौह पुरुष किसी भी हालत में हाथ खडे करने को तैयार नहीं। लिहाजा, दोनों के बीच रिश्तों में खटास बढती जा रही है। आने वाले दिनों में प्रभुत्व की यह जंग आर-पार की लडाई के रूप में भी सामने आ सकती है।
आज से करीब पांच साल पहले तत्कालीन संघ प्रमुख के.एस.सुदर्शन ने सार्वजनिक तौर पर इस बात की वकालत की थी कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व युवा हाथों को सौंप देना चाहिए। लेकिन, तब नेतृत्व को लेकर दूसरी पंक्ति के नेताओं में सिर-फुटव्वल की स्थिति ने इस कवायद को आगे बढने से रोक दिया। इस मुद्दे पर पार्टी में गुटबाजी के दृष्टिगत भी संघ को लगा कि अगर वह इस मामले में विशेष पहल करेगा, तो स्थिति और विस्फोटक हो सकती है। लिहाजा, सुदर्शन की सोच पर खास कवायद नहीं हो पाई। पर लोकसभा चुनावों में हार के बाद उपजी परिस्थितियों में संघ अब एक बार फिर भाजपा को अटल-आडवाणी युग से निकाल कर नए युग की ओर ले जाने के लिए सक्रिय हो गया है। चूंकि वाजपेयी तो अस्वस्थता का शिकार होकर पहले ही सक्रिय राजनीति से खुद को अलग कर चुके हैं, लिहाजा निशाने पर हैं लौह पुरुष आडवाणी। वही आडवाणी, जो लोकसभा चुनावों से पहले और बाद भी यह एलान कर चुके थे कि भाजपा के हारने पर वह सक्रिय राजनीति को अलविदा कह देंगे। लेकिन, चुनावों में भाजपा की हार के बावजूद न तो उन्होंने राजनीति से संन्यास लिया और न ही कुर्सी का मोह त्याग पाए। अब भी वह लोकसभा में विपक्ष के नेता के पद से चिपके बैठे हैं। यही वजह है कि संघ को उन्हें अब यह कहना पड रहा है कि बहुत हुआ, अब सिंहासन खाली करने की तैयारी करिए। पर लौह पुरुष इस मूड में नहीं दिखाई दे रहे। वह अब भी पार्टी में अपना दबदबा बरकरार रखना चाहते हैं। और साथ ही पीएम इन वेटिंग की तमन्ना भी। उनकी इस अदा ने संघ को कुपित कर दिया है।
पिछले दिनों दिल्ली आए संघ प्रमुख मोहन भागवत को बाकायदा आडवाणी को बुलाकर उन्हें जल्द से जल्द अपना उत्तराधिकारी चुनने का फरमान सुनाना पडा। हालांकि इसके लिए कोई समय-सीमा तो नहीं तय की गई है, लेकिन कहा गया है कि अब इस संबंध में और हीला-हवाली बर्दाश्त नहीं की जा सकती। अब यह आडवाणी पर निर्भर है कि इस संबंध में वह अपना निर्णय कब सुनाते हैं। लेकिन, अंदर की खबर यह है कि आडवाणी आसानी से हाथ खडा करने को तैयार नहीं। वह अब भी प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले हुए हैं। उन्हें लगता है कि अगर उत्तराधिकारी की घोषणा हो गई, तो उनके हाथ से यह मौका निकल जाएगा। यही वजह है कि वह ठोंक बजाकर नेता विपक्ष के रूप में पांच साल का कार्यकाल पूरा करने का इरादा जता रहे हैं। संघ के दबाव के बावजूद। इतना ही नहीं वह अपनी लॉबी के लोगों को पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर काबिज करवाकर अपने बचाव के लिए घेराबंदी की कोशिशों में भी जुटे हुए हैं। इसमें संघ आडे आते दिखा, तो उसे पार्टी से दूर रहने की अप्रत्यक्ष चेतावनी भी दे दी गई। विदित है कि भाजपा को संघ के नियंत्रण से आजाद करने के स्वर भी उन्हीं नेताओं ने छेडे हैं, जिन्हें आडवाणी का करीबी माना जाता है। ऐसे नेता नहीं चाहते कि आडवाणी कमजोर पडें। कारण, इससे उनके हित भी प्रभावित होंगे। लिहाजा वे आडवाणी पर भी हथियार न डालने का दबाव बना रहे हैं। पर संघ भाजपा को खुला छोडने को तैयार नहीं। न ही वह इस मामले में अब और इंतजार करने को राजी है। वह हर हाल में इस मुद्दे पर शीघ्रातिशीघ्र अंतिम निर्णय तक पहुंचना चाह रहा है। ऐसी परिस्थिति में हाल तक भाजपा और संघ के बीच चल रहा द्वंद्व अब आडवाणी बनाम संघ में तब्दील हो गया है। संभव है कि आने वाले दिनों में यह लडाई खुलकर भी सामने आए।
हालांकि संघ प्रमुख मोहन भागवत इस मामले का अमर्यादित ढंग से हल निकालने से बचना चाहतेे हैं। वह चाहते हैं कि आडवाणी खुद ही सम्मानजनक ढंग से अपना निर्णय सुना दें। कारण, भागवत के आडवाणी से हमेशा से अच्छे रिश्ते रहे हैं। उनके पिता ही कभी आडवाणी को संघ में लेकर आए थे। लेकिन, संघ के दूसरे नेताओं के दबाव के आगे भागवत भी मजबूर हैं। वह ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकते, जो संघ के प्रतिकूल हो। लिहाजा, उन्हें भी आडवाणी को दो टूक कहना पड रहा है कि वह युवा नेताओं को आगे आने के लिए रास्ता साफ करें। और वह भी जितनी जल्दी हो सके उतनी। वर्ना संघ को मजबूर होकर अपने सिरे से कदम उठाने होंगे। यहां दोनों पक्षों की अपनी-अपनी मजबूरियां हैं। इसी मजबूरी ने संघ और आडवाणी को एक-दूसरे के सामने ला खडा किया है। संघ भाजपा को स्वतंत्र नहीं छोडना चाहता और आडवाणी संघ का दबाव नहीं सहना चाहते। दोनों पक्षों की इसी सोच से तलवारें तनने वाली स्थिति पैदा हुई है। वहीं संघ और आडवाणी के बिच छिडी इस लडाई से भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेताओं के दरम्यान नेतृत्व को लेकर चल रहा घमासान भी फिर से सतह पर आता नजर आने लगा है। आडवाणी का उत्तराधिकारी बनने को लेकर पार्टी के नेताओं में दांव-पेंच तेज हो गए हैं। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह का कार्यकाल दिसंबर में खत्म हो रहा है। इसे देखते हुए आडवाणी समर्थक नेताओं ने इस पद पर भी अपनी नजरें गडा दी हैं। संसद के अहम पदों पर तो आडवाणी समर्थक नेताओं ने पहले से ही कब्जा जमाया हुआ है। अब अध्यक्ष पद की कुर्सी को लेकर भी उन्होंने अपनी चालें चलनी शुरू कर दी हैं। इसने आडवाणी विरोधी नेताओं के कान खडे कर दिए हैं। वे संघ को मोहरा बनाकर जवाबी चालें चल रहेे हैं। सूत्र बताते हैं कि संघ के कई बडे नेता भी चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने खेमे में बंटे भाजपा नेताओं की राजनीति में शामिल हो गए हैं। कोई आडवाणी के हिसाब से दांव चल रहा है, तो कोई राजनाथ के साथ चल रहा है। अपने-अपने पसंद के नेता के लिए सभी बिसात बिछाने में लग गए हैं। संघ बनाम आडवाणी की जंग में अगर आडवाणी खेमा राजनाथ की कुर्सी पर नजरें जमा रहा है, तो राजनाथ घडे की नजर लोकसभा में आडवाणी के पद पर है। इससे भाजपा में नेतृत्व की लडाई के निकट भविष्य में और भडकने की संभावना है।
बताया जाता है कि आडवाणी विरोधी खेमा संघ बनाम आडवाणी की जंग को और हवा देने में लगा है। इसके लिए बाकायदा मीडिया का सहारा भी लिया जा रहा है। ऐसी खबरें छपवाई जा रही हैं, जिससे लगे कि आडवाणी संघ को मुंह चिढाने में लगे हैं। ताकि आडवाणी और संघ के नेताओं में खटास बढे। आडवाणी विरोधी नेताओं को लग रहा है कि यह लडाई जितनी धार पकडेगी, उनके लिए रास्ते उतने ही आसान होंगे। कारण, अंत में वही होगा जो संघ चाहेगा। और संघ फिलहाल आडवाणी की विदाई चाह रहा है। पर्दे के पीछे चल रहे इस खेल से भाजपा में जारी गुटबाजी के और गहराने की आशंकाएं तैरने लगी हैं। राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष के पद से वसुंधरा राजे की विदाई को लेकर जैसा तमाशा हुआ, वह इसी की कडी है। हालांकि अब तक आडवाणी संघ पर भारी ही पडे हैं। भले ही जिन्ना प्रकरण के बाद उन्हें अध्यक्ष की कुर्सी छोडनी पडी, लेकिन खुद को पीएम इन वेटिंग घोषित करवाने में वह कामयाब रहे। इसे आडवाणी खेमे के नेताओं ने अपनी ताकत बतौर मीडिया में प्रचारित करवाया। खबरें आती रहीं कि आडवाणी संघ पर हावी हैं। इससे उनकी लॉबी के नेताओं में उत्साह भी भरता रहा। पर लोकसभा चुनावों के बाद आडवाणी खेमे के नेताओं को लगने लगा है कि उनपर एक सोची समझी साजिश के तहत हमले किए जा रहे हैं। उन्हें कमजोर करने के दृष्टिगत, ताकि पार्टी पर दूसरे घडे के लोग काबिज हो सकें। उत्तराखंड में खंडूरी को मुख्यमंत्री पद से हटाया जाना और अब राजस्थान में विपक्ष की नेता वसुंधरा को हटाने को लेकर हुए तमाशे को इसी साजिश का हिस्सा माना गया। इसने भाजपा में गुटबाजी की राजनीति को नया मोड दे दिया है। आडवाणी भले ही सार्वजनिक तौर पर संघ और अपने विरोधियों की मुहिम की मुखालफत न कर रहे हों, पर खतरे को वह भी भांप रहे हैं। यही वजह है कि अंदर ही अंदर वह अपने दबदबे को बरकरार रखने के प्रति गंभीर हो गए हैं। उनकी इसी गंभीरता से संघ विचलित है।
एक तरफ संघ भाजपा में नई पीढी को आगे बढाने की कवायद कर रहा है, तो वहीं आडवाणी पार्टी को पूरी तरह अपने नियंत्रण में करने की रणनीति पर चल रहे हैं। इससे दोनों के बीच तलवारें खिंचनी स्वाभाविक है। जिस तरह आडवाणी अडे हुए हैं, उससे इस लडाई के और खतरनाक रूप अख्तियार करने की संभावना है। संघ अब हर जगह अपने वफादारों को बिठाना चाह रहा है, चाहे वह प्रदेश इकाई की बात हो चाहे केंद्र में। वहीं आडवाणी के खेमे में अब ज्यादातर वैसे लोग हैं, जिन्हें संघ पसंद नहीं करता। हिंदुत्व के रथ पर सवार होकर राजनीति के अहम मुकाम पर पहुंचे आडवाणी की हिंदुत्व से बढती दूरी भी संघ को रास नहीं आ रही। यही वजह है कि संघ आडवाणी की विदाई कर भाजपा में नए सिरे से ऊर्जा भरने की कोशिश कर रहा है और आडवाणी उदारवादी छवि के सहारे सियासत के अपने आखिरी सपने को पूरा करने की। इसके लिए वह संघ से भी दो-दो हाथ करने से पीछे नहीं रहेंगे। इसका संकेत उन्होंने भागवत से हुई मुलाकात के बाद दिया भी। यह कहते हुए कि प्रतिपक्ष के नेता के तौर पर उनका इरादा पूरे पांच साल तक काम करने का है।
गौरतलब है कि आडवाणी का ऐसा रुख वर्ष 2005 में भी देखने को मिला था, जब पाकिस्तान में उन्होंने जिन्ना की घर्मनिरपेक्ष छवि की प्रशंसा की थी। तब संघ ने उन्हें सीघा संदेश दिया था कि वह अध्यक्ष का पद छोड दें। आडवाणी तब भी आसानी से हार मानने को तैयार नहीं हुए थे। लेकिन, अंतत: 6 महीने बाद संघ के दबाव में उन्हें पद छोडना पडा था। अब संघ ने उन्हें फिर फरमान सुनाया है, नेता प्रतिपक्ष का पद छोडें और अपने उत्तराधिकारी का नाम बताएं। और इस बार भी आडवाणी हार नहीं मानने का संकेत दे रहे हैं। तो क्या, इस बार भी आखिरकार आडवाणी ही हार मानेंगे या फिर बदले हालात में संघ को झुकना पडेगा। फिलहाल दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। हां, लडाई जरूर आर-पार की बनती दिख रही है। अंजाम जो भी हो, रोचक होगा। इंतजार करें।
लौह पुरुष का चिंतन चक्र
लोकसभा चुनावों में हार के बाद से ही आडवाणी पार्टी में अपने विरोधियों के निशाने पर हैं। जून में जब पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होने वाली थी, तब भी आडवाणी विरोधी खेमे के नेताओं ने इसमें हार की समीक्षा करने की मांग की थी। लेकिन, तब असंतोष के उभरे स्वर को यह कह कर शांत कर दिया गया था कि इसपर 21 जुलाई से शिमला में होने वाली चिंतन बैठक में चर्चा होगी। अब जब चिंतन बैठक का वक्त आया, तो आडवाणी चुनावी हार की जगह आगे की रणनीति पर विचार करने की बात कहने लगे। समीक्षा की मांग करने वाले यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी जैसे नेताओं को तो बैठक में बुलाया भी नहीं गया। इसने आडवाणी के खिलाफ पार्टी नेताओं में उबल रहे गुस्से को और भडका दिया है। वे आरोप लगा रहे हैं कि चूंकि लोकसभा चुनाव के लिए रणनीति बनाने का काम आडवाणी और उनके करीबी नेताओं ने किया था, इसलिए वे हार पर चर्चा करने से कतरा रहे हैं। कारण, हार पर चर्चा हुई तो उनकी असफलता उजागर हो जाएगी।
वहीं आडवाणी खेमे के नेताओं का मानना है कि हार पर चर्चा करने से अब कोई फायदा नहीं। उल्टे इससे टकराव ही बढेगा। वे तो चिंतन बैठक की जरूरत पर ही सवाल उठा रहे हैं। यह कहते हुए कि जब देश में स्वाइन फलू और जबरदस्त सूखे की स्थिति पैदा हो रही है और आम चुनाव भी अभी काफी दूर हैं, तो चिंतन बैठक का क्या औचित्य है। लेकिन, संघ ने इस बैठक के लिए एजेंडा तय कर दिया है। इस हिदायत के साथ कि हार पर समीक्षा जरूर हो। यही वजह है कि आडवाणी के विरोधी इस बैठक को लौह पुरुष पर हमला तेज करने का मंच मान रहे हैं। भले ही यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे नेता इसमें हिस्सा नहीं ले रहे, लेकिन मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह और विनय कटियार जैसे लोग आडवाणी की परेशानी बढा सकते हैं। इस चिंतन बैठक में पार्टी उपाध्यक्ष बाल आप्टे हार के कारणों पर रिपोर्ट भी पेश करेंगे। बताया जाता है कि इसमें उन्होंने राष्ट्रीय नेताओं की नाकामी, चुनाव प्रबंधन की गडबडी और शीर्ष पर कलह को प्रमुख वजह बताया है। स्वाभाविक है कि इसकी गाज आडवाणी पर ही गिरेगी।
बताया जाता है कि भाजपा की बीमारी को दूर करने का जो फार्मूला संघ ने खोजा है, उससे न सिर्फ आडवाणी बल्कि उनके करीबियों को भी अपने लिए खतरा महसूस हो रहा है। इसी को देखते हुए वे अब आर-पार को तैयार हो रहे हैं। हालांकि कुछ लोग वक्त की नजाकत और संघ की ताकत के मद्देनजर पाला बदलने पर भी विचार कर रहे हैं। राजनाथ सिंह को भी संघ के इलाज में अपने लिए मुसीबतें नजर आ रही हैं। लेकिन, वह संघभक्ती के सहारे उससे पार पाने की चेष्टा कर रहे हैं।

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