किसी वक्त मनोरंजन का प्रमुख जरिया रहा सर्कस आज दम तोड रहा है। बदलते माहौल और सरकारी उपेक्षा ने इसके कलाकारों को दो जून की रोटी से भी महरूम कर दिया है। इनके दर्द की किसी को परवाह नहीं। अगर यही हाल रहा, तो मनोरंजन का यह अनोखा माध्यम इतिहास के पन्नों में खो जाएगा।
मशहूर फिल्मकार राज कपूर ने कभी सर्कस और इसके कलाकारों को लेकर एक फिल्म बनाई थी। मेरा नाम जोकर। इस फिल्म में सर्कस के कलाकारों की व्यक्तिगत जिंदगी और उनके जज्बातों का बडा ही मार्मिक चित्रण किया गया था। उस वक्त यह फिल्म सुपर फलॉप साबित हुई थी। लेकिन, राज कपूर की मौत के बाद जब दोबारा इसे प्रदर्शित किया गया, तो इसे बेजोड सफलता हासिल हुई। तब लोगों की टिप्पणी थी कि अक्सर लोग किसी की मौत के बाद ही उसकी असली अहमियत समझते हैं। जब राज कपूर जिंदा थे, तो अपनी सारी कमाई दांव पर लगा कर बनाई गई उनकी इस ड्रीम प्रोजेक्ट को लोगों ने नकार दिया। लेकिन, जब वह इस दुनिया में नहीं रहे, तो दर्शकों-आलोचकों सभी ने इसे हाथों-हाथ लिया। कुछ ऐसा ही इस फिल्म का विषय-वस्तु रहे सर्कस के साथ दोहराया जा रहा है। बदले हालात और सरकार की बेरुखी के कारण यह फिलहाल अपने सबसे दुख भरे दौर से गुजर रहा है। मुमकिन है कि मनोरंजन की इस विधा का अस्तित्व ही खत्म हो जाए। और शायद तभी इस ओर लोगों का ध्यान जाए। लेकिन, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।
सर्कस इंडस्ट्री की दुर्दशा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कभी देश में 300 से ज्यादा सर्कस थे, आज इनकी संख्या सैकडे को भी पार नहीं करती। बमुश्किल 70-80 सर्कस कंपनियां ही बची हैं। उनमें भी महज 11 ही इंडियन सर्कस फेडरेशन में दर्ज हैं। बाकी किसी तरह अपना नाम जिंदा रखने की लडाई लड रही हंै। लेकिन, मनोरंजन के नए-नए साधनों के आगे आज उनकी भी हालत इतनी दयनीय हो चुकी है कि करीब 20 हजार लोगों को रोजी-रोटी मुहैया कराने वाली इस दिलचस्प कला की आखिरी सांसें कभी भी उखड सकती हैं। इंडियन सर्कस फेडरेशन के चेयरमैन अशोक शंकर को हालांकि पूरी उम्मीद है कि यह कला मरेगी नहीं, जिंदा रहेगी। लेकिन वह भी मानते हैं कि टेलीविजन और इंटरनेट के दौर में सर्कस को भारत में अपने सबसे बुरे दौर से गुजरना पड रहा है। इसके पीछे वह इस क्षेत्र के प्रति सरकार की बेरुखी को बडी वजह मानते हैं। वह कहते हैं, सरकार को सर्कस अकादमी का गठन करना चाहिए, ताकि विदेशों की तरह यहां भी सर्कस से जुडने की इच्छा रखने वाले नए कलाकारों की प्रतिभा को निखारा जा सके। साथ ही रिटायरमेंट के बाद कलाकारों को नौकरियों में आरक्षण दिया जाना चाहिए क्योंकि इस क्षेत्र में करिअर बहुत लंबा नहीं होता। ट्रेनिंग सेंटर के गठन से सर्कस में लोगों का मनोरंजन करके अपनी जिंदगी का बडा हिस्सा गुजार देने वालों को प्रशिक्षक के तौर पर रोजगार भी मुहैया हो पाएगा। आज सरकारी उपेक्षा और समुचित मंच नहीं होने के कारण ही प्रतिभाशाली कलाकार सर्कस से दूर होते जा रहे हैं।
जेमिनी सर्कस के मालिक अजय शंकर की भी कुछ ऐसी ही राय है। उनका कहना है कि सरकार का समुचित सहयोग न मिलने के कारण सर्कस खत्म हो रहे हैं। इसके साथ ही सर्कस के कलाकारों की खानाबदोश जिंदगी और मौजूदा वक्त में जरूरी स्थायित्व की कमी के कारण भी स्थिति बहुत विषम हो गई है। इस ओर सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है। उल्टे कभी बच्चों-जानवरों के शोषण या कभी कोई और आरोप लगा कर वह सर्कस वालों को परेशान ही करने का काम करती है। लिहाजा, देश में सर्कस की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। सर्कस से जुडे अन्य लोगों का भी मानना है कि सरकार की अदूरदर्शी नीतियों ने सर्कस के समक्ष अस्तित्व का संकट खडा किया है। पहले जब मनोरंजन के बहुत ज्यादा साधन नहीं हुआ करते थे, तब सर्कस में दर्शकों की अपार भीड जुटा करती थी। गांव-कस्बों ही नहीं, बडे शहरों व महानगरों में भी सर्कस खूब चलते थे। लोग दूर-दूर से सर्कस देखने आया करते थे। लेकिन आज टीवी, इंटरनेट के जमाने में लोगों की मनोरंजन की आदतों और रुचियों में बदलाव के कारण सर्कस को अपना अस्तित्व बचाने के लिए कठिन लडाई लडनी पड रही है। ऊपर से सरकार द्वारा सर्कस में जानवरों और बच्चों से काम कराने पर रोक ने सर्कस के ताबूत में अंतिम कील ठोंकने का काम किया है। इसकी आड में सर्कस वालों को तो परेशान किया ही जा रहा है, दर्शकों खासकर बच्चों की इसमें रुचि भी बिल्कुल खत्म हो गई है। नतीजतन, सर्कस का बिजनेस 50 प्रतिशत से भी ज्यादा कम हो गया है। अपोलो सर्कस के मैनेजर आर के यादव कहते हैं, सरकार का समर्थन तो सर्कस को नहीं ही मिल रहा है। ऊपर से उसने इतने नियम-कायदे हम पर थोप दिए हैं कि काम करना मुश्किल हो रहा है। बच्चों से हम काम करा नहीं सकते, जबकि हकीकत यह है कि कम उम्र में ही इस विधा को सीखा जा सकता है। 14 साल की उम्र तक तो शरीर इतना परिपक्व हो जाता है कि जिम्नाज्म सीखा ही नहीं जा सकता। जानवरों के खेल पर भी रोक लगा दिया गया है। इन वजहों से ही सर्कस को दिक्कतों का सामना करना पड रहा है।
सरकार की सख्ती का असर सर्कस की गुणवत्ता पर भी पड रहा है। पहले जहां एक बडे सर्कस में शेर-चीते, घोडे, हाथी, बाघ और अनेक जानवरों के अलावा 400-500 लोग इसके सदस्य होते थे, आज सौ लोग भी बमुश्किल ही होते हैं। स्वाभाविक है कि जब खर्च के मुकाबले आमदनी कम से कमतर हो जाएगी, तो भला कौन लाव-लश्कर के साथ सर्कस चलाना चाहेगा। यही वजह है कि आज अधिकांश सर्कस मजबूरी में ही गाडी खींच रहे हैं। और वह भी सर्कस के लिए अपनी पूरी जिंदगी झोंक चुके प्रौढ कलाकारों के बूते। जिनके लिए सर्कस के तंबुओं से अलग जिंदगी की ख्वाहिश भी मौत के समान है। वे जाएं, तो जाएं कहां। इसके अलावा वे कर भी क्या सकते हैं। करिअर की अनिश्चतता के कारण हीी इस इंडस्ट्री से नए लोग नहीं जुड रहे। जो यहां काम कर रहे हैं, वे भी अपने बच्चों को इससे दूर ही रखना चाहते हैं। नई लडकियों को खेल सिखाने वाली ऐसी ही एक प्रौढ कलाकार मोना विश्वास कहती हैं, मैंने अपनी पूरी जिंदगी सर्कस और इस कला के नाम समर्पित कर दी। लेकिन अनिश्चतताओं से भरी यहां की जिंदगी को देखते हुए मैंने अपनी दोनों बेटियों को इससे दूर रखा। आज मेरी एक बेटी नर्स है और दूसरी टीचर। बहुत संघर्ष से मैंने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है। सबके साथ ऐसा नहीं हो पाता है। मैं खुशकिस्मत थी कि अपने बच्चों को बेहतर जिंदगी दे पाई, वर्ना वे भी इन्हीं तंबुओं में कैद होकर रह जातीं।
40 वर्षीय मोहम्मद रशीद भी उन लोगों में हैं, जिन्हें सर्कस विरासत में मिली। उनके मां-बाप दोनों सर्कस में ढेर सारा पानी पीने और फिर उसे निकालने का करतब दिखाते थे। रशीद भी खुशी-खुशी इसका हिस्सा बन गए। लेकिन आज उम्र के इस पडाव पर आकर उनकी सोच बदल गई है। वह अपने बच्चों को इससे दूर रखना चाहते हैं। वह कहते हैं, मैं अपने बच्चों को खानाबदोशी की जिंदगी नहीं देना चाहता। आज वक्त बदल गया है। जरूरतें बदल गई हैं। इस क्षेत्र में रहकर अब कोई कुछ हासिल नहीं कर सकता। सर्कस मर रहा है। इस मरती हुई कला का हाथ थाम कर कोई जिंदा रहने का आखिर सोच भी कैसे सकता है। बदले दौर में सर्कस के लिए ऐसी सोच रखने वाले कलाकार ढेरों हैं। ग्रेजुएट हरी बाबू से लेकर मैनेजर बालाकृष्णन, झूले पर खेल दिखाने वाले जयराम, शूटर गजानंद व सीमा पंडा और रिंग मास्टर एस मोहम्मद तक। ये वे लोग हैं, जिन्होंने सर्कस के सुनहरे दिन देखे हैं। वे दिन, जब इसके कलाकारों को पैसा भी मिलता था और प्रसिद्घी भी। भारत में सर्कस का घर कहे जाने वाले केरल के कन्नूर जिले से कई ऐसे सर्कस कलाकार आए, जिन्हें दुनिया भर में प्रसिद्घी मिली। मार्शल आर्ट ट्रेनर और जिमनास्ट कीलेरी कुन्हिकन्नन गुरुक्कल न सिर्फ भारत में सर्कस की महान हस्ती थे, बल्कि सात समंदर पार भी उनके प्रशंसक हुए। लेकिन, आज के दौर में पुराने लोग भी सर्कस के भविष्य को लेकर अनिश्चित हैं। यही वजह है कि प्रतिभाशाली लोग अब इस क्षेत्र में नहीं आ रहे। जो नए लोग आ रहे हैं, वे गैर प्रशिक्षित और अकुशल होते हैं। जिनके लिए सर्कस में आना उनके लिए मजबूरी होती है। महज किसी तरह पेट भरने की मजबूरी। लिहाजा, जिंदगी को लेकर स्थायित्व की अनिश्चतता से असली कलाकार सर्कस से दूर होते जा रहे हैं। और साथ ही दर्शक भी। इससे सर्कस दम तोड रहा है।
हालांकि केरल में सरकार द्वारा सर्कस के कलाकारों को पेंशन दी जाती है। दक्षिण में सर्कस के कद्रदान भी हैं, पर सिर्फ चंद प्रशंसकों के बूते सर्कस जैसी विस्तृत कला को जिंदा रख पाना आसान नहीं है। कलाकारों को भी अब यहां अपने वजूद की संभावनाओं की कल्पना बेमानी सी लगती है। तभी तमिलनाडु के पुष्पा चक्रवर्ती कहते हैं, आज जवान हैं, काम कर रहे हैं। सर्कस की जिंदगी तब तक है, जब तक शरीर में दम। आगे क्या होगा, कुछ नहीं मालूम। अभी पिछले दिनों गाजियाबाद में एक सर्कस शो के दौरान एक कलाकार झूले पर खेल दिखाते गिर कर अपनी जान गंवा बैठा। इस घटना ने वृताकार क्षेत्र में ऊंचे तने शामियाने के भीतर चकाचौंध कर देने वाली रोशनी और आर्केस्ट्रा की तेज धुनों के बीच अपना गम भुला कर लोगों के जीवन में रस घोलने वाले मजबूर कलाकारों की जिंदगी के अंधेरे को बयां कर दिया। वह दर्द, जो इन तंबुओं में ही कैद होकर रह जाता है। लोग इन कलाकारों को हंसते-गाते, दूसरों को मनोरंजन करते तो देखते हैं, लेकिन इस हंसी के पीछे छिपे उनके दर्द को शायद ही कोई महसूस कर पाता है। न ही उसे महसूस करने की जरूरत ही समझी जाती है। सरकारें भी उनकी ओर नहीं देखती। सर्कस और इसके कलाकारों की यही दर्दे दास्तां है। खेल के दौरान उन्हें मिलने वाली हर दाद के पीछे एक दर्द। कराहते करतब शायद जल्द ही दम तोड दें।
रविवार, 30 अगस्त 2009
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सर्कस कला के विभिन्न पहलुओं को छूता हुआ आपका यह महत्व पूर्ण आलेख है । सर्कस के लुप्त होते जाने की पीछे राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव है । यदि सरकार चाहे तो इस कला का पुनर्जीवन हो सकता है लेकिन शाय्द अन्य कुछ कलाओं की तरह यह भी लुप्त हो जाने के लिये अभिशप्त है। अगर विदेशों मे यह कला महत्व पाती है तो हमारे यहाँ क्यों नही । यहाँ लाईव क्रिकेट देखने के तो शौकीन मिलेंगे लेकिन लाईव एडवेंचर के नही । यह अफसोसजनक है ।
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